Sunday, October 11, 2009

अपना कोई नही..................!!!!!!!!!1

कभी_कभी ऐसा लगता है ,
इतनी बड़ी दुनिया मे ,
अपना कोई नही ।

व्यर्थ में ही मै ढूंढता हूँ
gairon में अपनेपन का अहसास
और उसी मे बसर कर देता हूँ
चन्द अपने कीमती लम्हात ।

कहीं ठोकर सी लगती है ,
निरर्थक हो जाते हैं सारे प्रयास ।

बड़ी चुभन सी होती है
कंटीले तारों की बाढ़
चारों ओर्र होती है
और मेरा रास्ता रूक जाता है
तो मैं सोचता हूँ
क्या यही है संसार ।

व्यर्थ की दुराशा
रूक जाती हैं धड़कने
साँसों का संचार
कभी_कभी ऐसा लगता है
इतनी बड़ी दुनिया मे
अपना कोई नही ।

जन_मानस के मुर्दा खाने मे
दफनाई गई अपनी भी लाश ,
ठहर गया , मंजिल पाने का
धारा रह गया सारा प्रयास ।

मह्त्वाकान्शाओं का महल
धराशायी हो गया ,
हो गया कहाँ से main
स्वयं ही निरुपाय ।

क्या यही था, अनवरत
संघर्ष का एलान
अपने हो जाते हैं पराये
यह सुना था। देखा भी
रह नही गया बाकी
हृदय मे baaki कोई अरमान ।

sankirdtaa के दायरे मे
जीती है दुनिया
hame सोचने पर कुछ
कर देती है लाचार ।

और मैं अपने ही ताने_बाने मे
उलझ कर रह गया
नही कर सका कुछ
कदम बढ़ा कर चलने को
नही रह गया अवकाश ।

इस सिसकती दुनिया मे
अपने मनोभाव
सिमट कर रह गए
आगाह भी नही कर सके
अपने_परायों को
घुट कर रह गए
अपने चाहत के अरमान ।

अच्छी लगती थी कभी
सुबह की पहली किरण
गुनगुनाहट भवरों की
चहचाहट चिडियों की
झरनों का काल_कल निनाद ।

अब तो व्यर्थ सब
सूना_सूना लगता है
कभी_कभी ऐसा लगता है
इतनी बड़ी दुनिया मे
अपना कोई रहा ही नहीं ।