Sunday, March 28, 2010

तुम्हे अब शायद मेरा इंतज़ार नहीं ,
कोई गैर हो बिच मे इमकान नहीं ।
कमसिन हो पर इतनी नादान नहीं ,
इस रिश्ते मे होते रस्मो रिवाज नहीं ।

hothon se jaam ....... !!!!!

होठों से जाम लगा कर हाय हटाया तुमने

भरी महफ़िल मे अपना जलवा दिखाया तुमने ।

सितमगर इतना तो बता क्या मिला तुम्हे

जो इतना हंगामा बरपा किया तुमने ।

एक तेरा गम ऊपर से जुल्मोसितम

ज़माने ने क्या क्या कहर ढहाए हमपे ।

तुम्हारी उल्फत मे हँसे घडी दो घडी

उम्र भर रुलाता रहा तू हमको ।

कितने बवाल है जिंदगानी के

रास्ता गलत बता के दूर हो गया हमसे ।

जज्बातों का बाज़ार गरम किया हमने

उपाए से दिल तोड़ दिया तूने बिना हमसे पूछे ।

कहर बरपा आसमान है आज की रात

तू गया है सफ़र पे बिना हमसे पूछे ।

बरबादिए किस्मत का तमाशा देखा किये

अंजुमन_ए_नाज मे है तू हमसे बिना पूछे ।

वादा शिकन पैमाना तोड़ के क्या मिला

जाम ही न मिलते तो 'रतन' जियेगा कैसे ।

दिलकश अदा है खामोश तुम्हारी सदा है ,
करम फरमा तुम्हारी जुस्तजू क्या है .
तुम मुझसे किस रिश्ते की उम्मीद मे हो ,
मुझे नहीं पता तुम्हारी आरज़ू क्या है ।

लाचारी न होती ..... !!!

काश ! मुहब्बत लाचारी न होती ,
मुझ पर तुम्हारी मेहरबानी न होती ।

अपने भी दुश्मन बन गए आखिर
काश निगाहों की मेजबानी न होती ।

हमारी मुहब्बत कोई पहचाने न
दिल से दूर यह बदगुमानी न होती ।

दूसरों की बदमिजाजी न होती ,
गर जो तुम्हारी नातवानी न होती ।

ख़ामोशी की ज़बान सभी समझते हैं ,
मुहब्बत कभी भी ज़ुबानी नहीं होती ।

खुद से दूर हुए तुम हमसे 'रतन',
गोकि औरत कभी बेचारी नहीं होती ।

Tuesday, March 23, 2010

हमी नहीं हैं .......!!!!!


हमीं नहीं कई हैं चाहने वले तेरे

जो तुझे देखते हैं हो जाते है दीवाने तेरे ।

हर किसी से दिल लगा बैठी है तू सनम

हर किसी की जुबां पर है अफ़सोस तेरे ।

आतिशे दिल न बुझी है न बुझेगी कभी

महफ़िल मे हर किसी पे चलते निशाने तेरे ।

सब कुछ सिमट आया है इसी पैकर मे

ये शोखी_ए_गुल , बहार , ये मदमाती हवाए तेरे ।

खुदगर्ज़ ज़माना नहीं बल्कि सिर्फ तू है

सब है तेरे सरगोश फिजा के नज़ारे तेरे ।

ये माना दिल हमारा पहले तुझ पे आया था

बना लिए कई हमराज़ दरम्याने इश्क मेरे तेरे ।

न समझे हैं न समझेंगे ये ज़माने वाले

कब तू कलि से फूल बनी कब हुई हमारे हवाले ।

नज़रों से फिर शम्म_ए_महफ़िल रौशन होगी

जलजले आयेंगे हुस्न पे कुर्बान होंगे परवाने तेरे ।

अफ़साने केस _ओ_लैला , किस्सा_ए_शिरी औ फरहाद

हम मिट भी जाए होंगे ये सारे मरहले तेरे ।

समझाने से तो न समझेगी अहले दुनिया

निकले थे सूयेमक्तल थे कभी जो सपने तेरे ।

सितम आराइयो पे तेरे हमें नाज़ है अब तक

वगरना मिट तो जाते हम भी जैसे परवाने तेरे ।

इन्कलाब सा चमन मे है बागबान परीशां हैरान

कौन आ गया है सर्याद फूल चुनने तेरे ।

यकलख्त एक तीर दिल के आर_पार हुआ

खिंची म्यान से चल दी तलवार सामने तेरे ।

महफूज़ नहीं है जान भी अब तो कसम तेरी

दाम लगा दिया है बाप ने तेरे, गिर्द मेरे तेरे ।

दिल पहले ही दे चुके अब जान बाकी है

अब तो बस ईमान है वो भी हवाले तेरे ।

तेरे सिवा लाचार जिंदगी का कौन सहारा

नाखुदा भी तू है पतवार भी अपने तेरे ।

दरवेश की ये दुआ है ज़माने भर से

हो भीख भी तेरी और कटोरे भी तेरे ।

अभी सफ़र तय भी न हो पाया तू अलहदा

तेरा इस्तकबाल करे जो तू आये अकेले ।

हम तुझे ज़माने भर की नज़रों से छुपा के रखेंगे

अदावत भी मोल लूं जहां से आये ,जो तू आये हरम मे मेरे ।

मैं तुझे चाहता हूं बस तुझी पे मरता हूं 'ताज'

दूसरा कोई सहता क्या 'रतन' ने ज़ुल्म सहे कितने तेरे ।

हमी नहीं... !!

ग़ज़ल लिखने का कुछ
सामान तो चाहिए
तुम नहीं तो तुम्हारा
अहसास तो चाहिए ।
बिक जाते बेमोल हम
जो तुम मुस्कुरा देते
हुनर है तुम्हारे पास
बस जुबां तो चाहिए ।

Tuesday, March 16, 2010

मजबूरी

तुम वो नगमा हो
जिसे हम गुनगुना नहीं सकते
तुम वो साज़ हो
जिसे हम बजा नहीं सकते
तुम मेरे दिल की
वो खामोश सदा हो ,जिसे
हम चाह कर भी
किसी को सुना नहीं सकते
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जीने की सजा हम पाए हुए हैं
बिन पाए तुझे हम पाए हुए हैं
मर मर कर भी जीने को मजबूर हैं
ज़ख्म मोहब्बत से बहुत खाए हुए हैं
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तेरे मिलने की आस में
सड़कों की ख़ाक छानता रहा
तू मिल न सका मुझसे
सिर्फ रहगुजर ताकता रहा

कितना खुशनुमा मौसम था
जब तू पहली बार mila था
अबकी मिलते भी तो ऐसे
जैसे बरसों से बिचड़ा था

मैं तुझे देखकर कैसे
अनदेखा करू
न देखूं तुझे तो
किसे देखा करून

तू ही बता ई सनम
ये दूरियां अब कैसी
जज्बात मिट गए
अब सलामियाँ कैसी

मौसम बहार का था
शायद वह सावन था
मेरी डायरी में लिखा
तेरा पता मनभावन था

तेरी याद में आसूं
मिज्गाअन में पिरोता रहा
अबकी मिलो तो
मौसम भी रोता रहा

अफसुर्दा मौसम
ये सुरखाब का नज़ारा
कैसा होता है
ये मोहब्बत का tamasha

तेरा वो तीर
दिल को पार निकल गया
मैं सोचता ही रहा
और तू दूर निकल गया

अपना कौन
दर्देदिल कहूं किस्से
दूरियां बढ़ रहीं
मिलें तुझसे कैसे

बड़ी बेबाक तेरी बातें
अपनों से जैसे अपनों की बातें
दुआ सलाम तक का आलम
उन गुजरे लम्हात की बातें

रौशनी सकुचाती है
तेरे बगैर ही मुस्कुराती है
अपना हुआ बेगाना
ये प्यार का दुश्मन जमाना
दिल बीसमिल जिगर घायल
अपना ही क्या रहा ठिकाना

तेरे होठों से वो मौसम की बातें
बातों ही बातों में
बातें ही बातें
पुरशरसआर थी महफ़िल

सरेबज्म तेरी
बेबाक बातें
कहीं से नहीं आते ख़त
दें जवाब किसका

इंतज़ार किसी का
ये ख्याल किसका
आरजू में तेरी हाल अब किसका

बिछड़े सनम
तेरा मासूम चेहरा
बस्ता है आँखों में
कैसे हते तुम पर से pएहर