Wednesday, June 30, 2010

आँधियों में भी....!!!

आँधियों में भी जलता रहा दिया ,
वैसे ज़माना हमेशा मेरे खिलाफ रहा ।

कोई न सगा न कोई नातेदार, दोस्त, रिश्तेदार ,
हर बार उनसे मैं ही ठगाता रहा ।

हर बार वो बढे आगे पहल खुद की ,
जब मैं बढ़ा तो उन्होंने बताया धता ।

इरादा न था मेरा किसी को बेपर्दा करूं
जिंदगी मे एक से एक नंगो से पाला पडा ।

कहाँ से लाऊं उनके लिए पैसा ,
जिसके बगैर सबने किनारा किया ।

किसी के लिए न लूँगा अब उधार ,
चाहे वो हो कर्जे से लद्दा हुआ ।

बहनों को बिकी ज़मीन का चाहिए पैसा
जिस मकान मे रहता हूं उसमे चाहिए हिस्सा ।

जिनके लिए तिनके इकट्ठे किये ,
उन्होंने ही नशेमन मेरा फूँक दिया ।

आज तक 'रतन' ने न फ़ोकट मे चाय पी ,
ग़ालिब को उधार पीने मे आता था मज़ा ।

जब कोई अपनापन..... !!!

जब कोई अपनापन जताने लगता है ,
दिल मे मेरे शुबहा गहराने लगता है ।

बाद मे वही दुश्मनी निभाने लगता है ,
जिस पर अपना दम निकलने लगता है ।

हम तुम्हे ही चाह कर भी क्या करते
बेदखल_ए_ बज़्म करने को चाल कोई चलने लगता है ।

मंज़र देखे ऐसे ऐसे अपनी नज़र ने
एक दूजे के लिए हरेक पराया लगने लगता है ।

तिलस्म सी लगने लगी अब तो दुनिया,
कभी कभी तुम्हारा फंसूं सुहाना लगने लगता है ।

कारीगरी भी उस कारसाज़ की देखी ,
हरेक उलमान ठिगना लगने लगता है ।

यहाँ मय छोड़ी, आरज़ू_ए_वस्ल छोड़ी , वहाँ,
शराब का दरिया हूर का जिस्म दमकने लगता है ।

अपना कहूं भी तो किसको कहूं अब तो ,
जो मिलता है दिल पर खंज़र चलाने लगता है ।

इरादा तो न था करूँ गुहार खुदा से भी ,
जबकि खुद_बा _खुद जलजला उठने लगता है ।

हम क्यों कहें किसी को दुश्मन भी अपना,
जब ऐरा_गैर नत्थू खैर दोस्ती जताने लगता है ।

हम चाक गरेबान हो गए तो ख़याल ये आया ,
कौन सा गद्दार मेरे फ़साने मे टांग अडाने लगता है ।

महशर भी देखेंगे और तुम को भी अहल_ए_सितम ,
अहसास ये दिल को दुखाने लगता है ।

तर्क_ए_वफ़ा तुम करो और इलज़ाम आये हमपे
इकरार तेरा दिल को रुलाने लगता है ।

मकरोफान तुम्हारे तुम्हे ही ले डूबेंगे
समंदर मे नाव, पतवार पुराना लगने लगता है ।

कब इस जलते दिए पर न पड़ी ठंडी फुहारे,
अब वही फिर से बरसने लगता है ।

कायनात भर मे सदा जो धड़कन बन के रहा ,
वही खुदा अब अपना रफ़ीक लगने लगता है ।

हम न भूलेंगे तुमको भले तुम बदल जाओ,
ताज के आगोश में जब दरिया लहराने लगता है ।

नाज़ था जिसको सर पे उठाएंगे दुनिया ,
वक़्त_ए_रुखसत वो हाथ छुडाने लगता है ।

और क्या कहे तुमसे ही 'रतन'की सनम,
कोई मुर्शिद जिन्नात की सूरत सताने लगता है ।

Wednesday, June 2, 2010

किसी को इतना भी

किसी को इतना भी दबाना नहीं चाहिए
की वह मजबूर एक आह को भी तरसे

पिछली बार भी बाला की तपिश थी
इस बार भी पता नहीं सावन बरसे न बरसे

हम क्यूँ फिरते रहे मुह छुपाते मुह चुराते
अख्तियार उनको था मेरी मौत पर आते न आते

गोते खाते ही ज़िन्दगी अपनी तमाम हुई
हम डूबे भी तो किनारे पे आ कर के

मालूम नहीं क्या लुत्फ़ मिलता है किसी को
धोखा खाकर फिर उसी पत्थर से टकराने मे

नहीं चाहिए तुम्हारी नवाजिश हमको अब तो
उम्र तमाम हुई तुम जैसों को यार बनाते-बनाते

चुल्लू भर पानी भी न मिलेगा तुम्हे
कहाँ तक फिरोगे मुह चुराते छिपाते

हमें मालूम नहीं था इस तरह दमन झाताकोगे
जब कोई सहारा न था किस तरह मंजिल तलाशते

tamam दौड़ ख़तम हुई ,ख़तम हुई भागा-भागी
अच्छा होता रिश्तेदारों जो तुम घर के बाहर मरते

धुप में बाल सफ़ेद नहीं किये हमने अपने
अभी तुम निरे बच्चे हो चले हो पहाड़ा पढ़ाने

सिकंदर मारा तो दुनिया जहां जान गए
मैं मिटा तो कोई नहीं आया कब्र पे फूल चढाने

मैं ही अकेला गुनेहगार नहीं किसी का
तुम खुद ही फ़ैल हो गए मदरसे में दाखिला लेके

मुझे नहीं चाहिए थे तुम्हारी मेहेर्बानियाँ
एक को छोड़कर तमाम के एहसान उठाते

मर गया मैं दुनियावालों से यह कहके
बहुत गुलज़ार किया मेरे कमरे में बैठकी लगा के

मैं फिर-फिर आऊँगा दुनिया में लौट के
तुझसे निपटने कुत्ते की बोली बोलने वाले

तुम्हारी कसम थी मेरे को न हाथ लगाने की
मैं जनता था वह न बैठेगा चुप कपालक्रिया कर के

गोया आशना थी वोह मेरी रहो-रग से
मर गया मैं मैं आई भी तो तेरही में आग लगाने

मैं समंदर किनारे भी प्यासा ही रहा 'रतन '
जबकि गंगा बहती थी मेरे घर से हो कर के
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