Friday, July 23, 2010

बस एक बार .......!!!!!!!

तूलिका भी हो रंग भी हो ,
कनवास भी हो ,
और गर मैं
चित्रकार भी होता
फिर भी भगवन तुम्हारी
तस्वीर नहीं बना सकता ।


कारण साफ़ है ,
तेरी कोई रूपाकृति नहीं ही।
तू रोम_रोम मे समाया है
कण_ कण मे व्यापक है ।
हो मेरे ही अंतर्मन मे
पर आज तक अफ़सोस
तुम्हे पहचान न पाया
ठीक से जान न पाया ।

ये बात नहीं है की
मैंने कोशिश नहीं की
बारम्बार ध्याया है तुझे
समाधि मे बुलाया है तुझे ।

तुम्हारा आज तक कर
नहीं पाया संधान ,
तुम अगम हो अगोचर हो
फिर भी मुझसे अछूते नहीं हो
मैंने बार_बार तुम्हारा अनुभव किया है ।

देख देख कर सितारों की चाल ,
ये हरियाली ये बाग़_बगीचे
क्या नहीं तुम्हारी उपस्तिथि के गवाह

पर मैं सोचता हूं
यह सब करने की
ज़रूरत क्या है
क्यों न मैं अपनी
आत्मा में भी व्यापक
तुमको निरख लूं ।

और एक बार
बस एक बार ही
तुम्हारा अनुभव
अपने अन्दर ही कर लूं ।

निश्चय.....!!!!!

और लोग भले जाएँ
चार काँधे चढ़ के
हम अपनी डगर
खुद पार करेंगे ।

नहीं चाहिए किसी
की मेहरबानी ,
हर सूरत है अपनी,
जानी_पहचानी ।

फिर किस पर
हम नाज़ करेंगे ,
हम अपनी डगर ,
खुद पार करेंगे ।

भले बचपन बीता ,
लाड्ड_ दुलार मे ,
यौवन आया सुकुमार ,
बन कर के ।

बुढापे मे नहीं
त्रास सहेंगे ।
हम अपनी डगर
खुद पार करेंगे ।

बहुत दोस्त हैं कहने
को अपने ,
मौका आने पर
बहाने बनाते ।

हम अविश्वास प्रस्ताव
पास करेंगे
हम अपनी डगर
खुद पार करेंगे ।

सगा नातेदार रिश्तेदार
काम न देगा ,
अपना बेटा ही
दाह कर्म करेगा ।

हम न किसी से
फ़रियाद करेंगे ,
हम अपनी डगर
खुद पार करेंगे ।

जीवन नैया पर
सवार होकर ,
भले दूर जाओ
साथ छोड़ कर,
हम तट को ,
मंझदार करेंगे ।

जीवन की गुलामी
एक त्रासदी है ,
हम ही नहीं
सभी के साथ यही है ।

फिर भी हम यही
बात कहेंगे
हम अपनी डगर
खुद पार करेंगे ।

Wednesday, July 21, 2010

जी का जंजाल........!!!!!!

जी का जंजाल लगती है दुनिया
अपने को क्या समझती है दुनिया

मोहताज़ नहीं मैं सुन e ज़िन्दगी
मैं बर्बाद कर दूंगा तेरी बसी दुनिया

अल्ला तल्ला की क़सम है मुझको
जेहाद के नाम पर कुर्बान ये दुनिया

जब इल्म नहीं था अपनी कमसिनी का
बारे गारा सर पे रख दी अहले दुनिया

न नाम आया और न नामाबर आया
इंतज़ार मे ख़ाक कर दी अपनी दुनिया

फैसले तोः दरअसल वक्ते मशहर होंगे
हम क्यूँ न गुजरें उसकी गली से अहलेदुनिया

वादा ओ इकरार को अभी कैसे झूठा समझे
ऐतबार पे तो कायम है saari ये दुनिया

हम पहले कभी इतने नाउम्मीद न थे
की जब चाहे उम्मीद पे पानी फेर दे दुनिया

सदियों से तलाश की आबे जमजम की
पलट आये समंदर से प्यासे अहले दुनिया

न जानते थे नाकर्दन गुनाहों की होती सज़ा
वर्ना हम कितने गुनाह करते अहले दुनिया

बीच भंवर सफीना दिल का जब डूबा
थोडा लडखडाये फिर संभले अहले दुनिया

थोडा लिहाज़ करता करता,करता अदब-ए-रसूल
वर्ना देखता 'रतन' कितने पानी में दुनिया ॥
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बगावत है मेरी
ये एलान-ए-जंग है
नहीं अनारकली के
लिए न ही अकबर से
सिर्फ झूठे रस्म-ओ-रिवाजों से
पुराने ख्यालों से उसूलों से ॥

जी का janjal

Wednesday, July 7, 2010

जाने क्यों ....?????

अपने गम छुपा कर भी
मुस्कुराता रहता हूं मैं
फिर भी लोग कहते हैं
क्यों गूम्सूम रहता हूं मैं ।

शान मे किसी की
कमी न हो जाये ,
इसलिए सबसे
बा_अदब रहता हूं मैं ।

कोई गालियाँ भी दे
तो खामोश रहता हूं मैं
बेगाने को भी अपना
जान के गले लगता हूं मैं ।

मतलब निकालने को लोग
मतलब रखते हैं ,
गोया की किसी काम
का मुझको समझते हैं ।

मुकद्दर भी कोई चीज़ है
यह तो हर बशर जानता है
असलियत मुकद्दर की
अच्छी तरह समझता हूं मैं ।

उसकी गली मे भूले से
कदम क्या रख दिया
अभी भी अपना दीवाना
समझते हैं वो ।

मुहब्बत भी देखी और
देखी तगाफुल भी
दोनों से बाखबर
बा_ होशियार रहता हूं मैं ।

चले गए दीन_ओ_ईमान भी ,
उनकी मुहब्बत मे
पर अभी भी मुरव्वत से
काम लेता हूं मैं ।

ये झूठे रिश्ते_नाते
कब तक फरेब देंगे
असलियत इनकी
अच्छी तरह समझता हूं मैं ।

अच्छा हुआ .......!!!!!!!!!!

अच्छा हुआ मुझे प्यार मे,
कामयाबी न मिली
मिल भी जाती तो जान भी
सलामत न होती ।

नाकर्दा गुनाहों की कुछ
इस तरह मिली सज़ा
पराई तो पराई अपनी
भी साथ छुड़ा गयी ।

ये नहीं था कि उसे मेरे
पहले प्यार की नहीं थी खबर
साथ देने को उसने किया
वादा फिर वादे से मुकर गयी ।

कारण अज्ञात भी नहीं
ये सदियों से होता आया है ,
मुफलिसों पे काबिज़ हो जाती है
पैसे वालो की हस्ती ।

जब से आया शबाब मुझ पर
निभा रहा हूं जफायी का बोझ
अगर वो वफ़ा निभाती तो क्या
फिर भी क्या नीचे की ज़मीन खिसक जाती ।

पहाड़ की छोटी सर करने की
नीयत दिल पर चोट कर गयी ,
ढूँढने को समंदर से मोती
मेरी चाहत सीपियों से बहल गयी ।

मेरा क्या है आधी से ज्यादा
शबेगम काट चुका हूं ।
बाकी जो बची है जुदाई के गम मे
जिंदगी बिखर जाएगी ।

मुहब्बत का फ़साना
हमेशा रहा है अधूरा
जग जानता है फरहाद को
जीते जी शीरी न मिल पायी ।

हम पहले बेखौफ थे
अपनी मुहब्बत से
जानते न थे वो तकदीर की
खलाओ मे गूम हो जाएगी ।

मैं मंजिल की तरफ
बद्ध जा रहा था
ठोकर लगी तो जाना
उधर वो था मकतल की जानिब ।

बरसात अच्छी लगती थी
खटकती है अब बुरी तरह
चाँदनी चाँद की अब
तन badan मे आग लगाती ।

'रतन' को गिला नहीं किसी से
अपनी तकदीर पे है भरोसा
कभी तो मिलेगी 'ताज'
शहर मे रह कर जो दुबारा नहीं मिलते !!!
बड़े से बड़ा गुनाह है गर
दुनिया मे कोई
तो वह है किसी का
किसी से बेवफाई !!!