Saturday, December 18, 2010

ABHYARTHANA

झरनों के कल-कल निनाद में 
तड़ित की क्षणिक चकाचौंध में  
प्रभात की सुबह की आद्र ओस में 
मैं अनुभव करता हूं तुझे भगवन 


घनघोर कालिमा के श्यामल पटल में 
चंद्रराश्मियों के आलोकित आवरण में 
अपनी ही बनायीं तिलिस्म की झूठी पकड़ में 
मैं अनुभव करता हूं तुझे भगवन 


सुमनों पर जब मंडराता है भ्रमर 
कलिका खोल देती है अपना घूंघट 
जिसकी मादकता में भूल जाता सबकुछ 
फिर-फिर पाता है रस सिंचित नवजीवन 


वृक्षों पर टिकोरें बन जाते हैं रसाल  
किसी के जामुनी केश्राशी में प्रकटित चाँद 
मैं अपनापन भी जब पूर्णरूपेण भूल जाता हूं
तब आकाशगंगा की चाल में पाता तेरा नर्तन 


जब कोई योगी योगबल से कुछ पाता है 
बना लेता है जब मुझसे कोई पहचान 
मैं भी अनवरत संघर्ष का कर देता हूं एलान 
तुझे पाने का प्रण करता होकर अविराम 


गूंगा नहीं बता सकता जिस तरह मिठास 
वैसा ही कुछ मुझको भी होता एहसास 
नक्षत्रों के जगमग में रहस्य होता पर्दाफाश   
हर कहीं तेरी माया का वाद्य गुंजन 


प्रकट प्रकृति की अनुपम शोभा निरख 
तुम हो इसका होता निश्चित भान 
काश मैं अग्नि की तरह व्यापक 
मानव-निर्मित बिजली का यंत्रों से होता ज्ञान 


सब तरफ तेरा ही अद्भुत चमत्कार 
पार ना पा सके योगी,भोगी और विद्वान् 
मैं अकिंचन रजकण  सा  ढूंढता तुझे 
समझा तो यही समझा घट-घट में तू विराजमान 


तेरा ही दिया जीवन जिए जा रहा हूं
खुद ही कैसे कर सकता मृत्युवरण? 
जब तुमने अवसर दिया है स्वयं को जानने का  
फिर क्यूँ अपने को कम आंके अनमोल 'रतन'
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जिसे जोगी जान ना पाए 
        ध्यान लगा गिरि-गह्वरों में 
मैंने अक्सर अनुभव 
        किया उसे अपने ह्रदय में