ये इम्तहां मेरे दिल की ( कविता )
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तुझे चाहा खता दिल की/
तुझे पाया, रजा दिल की/
मिल कर नजरों से दूर रहा,
खोया तुझे, सजा दिल की/
मुहब्बत सीने में छुपाए रहा,
जख्मी ये अदा दिल की/
करीब से करीब था वो लम्हा,
तू और मैं दो जिस्म एक जां हो सकते थे/
तेरे बदन की बास दो जहां में फैली,
तू मेरी और मैं तेरा हो सकते थे/
कितने तूफान आए दरमियाँ तेरे- मेरे,
तू चाहती तो शोलों के बवंडर से जूझ सकते थे/
पर तेरी ऐसी कोई चाहत न हुई,
दिल में हो बात पर तूने लब से न कही/
तुझ पर कुर्बान हम अपनी जान कर सकते थे,
ये बात दीगर है कि दीवाने ऐसे और भी हो सकते थे/
ये शामत तूने क्यूँ बुलाई जानबूझ कर?
तुझे चाहा, यही बन गई कजा दिल की/
मुकद्दर का फैसला कुछ भी होता,
हम तुझे जनमजले जमाने से दूर ले जा सकते थे/
सबकी नजरों से छिपा कर अपने हरम में रख सकते थे,
ये नाचीज भला किस दिन तेरे काम आ सकता था/
तुझे चाह कर भी ख्वाबों में न बुला सकता था,
तेरी मनमानी पर न अवरोध लगा सकता था/
तू चाहती तो तेरी खुशबुओं को हवा में बिखेर सकता था,
सबसे बड़ी बात मेरी जान! तुझे अपनी बना सकता था/
चमन- चमन गुलजार हुआ, एक कली के खिल जाने से,
दिल मेरा दिलशाद हुआ तेरे मचल- मचल जाने से/
हमकदम बन कर तू साथ- साथ" रतन " के चली,
ये इम्तहां दिल की, शम्मअ महफिल में जली//
राजीव रत्नेश
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