Tuesday, November 3, 2026

तहरीर- ए- रतन ( सौगात ९१ से१०० तक)

तहरीर- ए- रतन

सौगात९१     जीवन का व्याकरण

हमने शब्दों से नहीं, जज्बातों से उम्र बुनी है,
दुनिया ने जो अनसुनी की, हमने वही आवाज सुनी है/

व्याकरण की गलतियाँ न ढूँढ़ना मेरी तहरीर में' रतन'
हमने तो दिल की धड़कनों से अपनी भाषा चुनी है/

हार-जीत के तराजू में, कभी खुद को तौला नहीं,
बस नेकी की राह पे चलने की, एक जिद चुनी है/

सौगात९२        संगम का बुलावा

फिर पुकारता है मुझे, संगम का वो रेतीला किनारा,
जहाँ छोड़ आए थे हम, अपना बचपन प्यारा/

नोएडा की चकाचौंध में, वो सुकून कहाँ' रतन'
जो मिलता था बैठ कर, उन लहरों का सहारा/

लौटूँगा एक दिन, अपनी इस तहरीर को लेकर,
जहाँ से शुरू हुई थी, जिंदगी की ये धारा/

सौगात९३     पूजा की थाली( आध्यात्मिक बोध)

मेरी हर कविता जैसे,' पूजा' की एक थाली है,
जिसमें श्रद्धा के फूल और वफा की लाली है/

हमने तो अर्पित कर दिया, अपना सर्वस्व यहाँ,
अब न कोई मलाल है, और न झोली खाली है/

' रतन' ने पा लिया है, वो आंतरिक उजाला अब,
कि अमावस की रात भी, अब हमें लगती दीवाली है/

सौगात९४       सच की गूँज

हम रहे न रहे, मेरी ये तहरीर गूँजती रहेगी,
किसी प्यासे के दिल में, ये प्यास जगाती रहेगी/

हमने सच लिखा है, और सच का कोई अंत नहीं,
ये आवाज जमाने की, ख़ामोशी तोड़ती रहेगी/

' रतन' को ढूँढ़ने की, अब कोशिश न करना तुम,
मेरी रूह इन पन्नों में, सदा मुस्कराती रहेगी/

सौगात९५       अंतिम पाँच की देहली

पंचानवे की कड़ियाँ जुड़ गईं, इस यादों की जंजीर में,
मेरा अक्स साफ दिखने लगा है, अब इस तहरीर में/

सिर्फ पाँच कदम और, फिर ये सफर मुकम्मल होगा,
जो लिखा था विधाता ने, मेरी इस तकदीर में/

' रतन' अब थकना मना है, बस आखिरी जोर लगा दे,
कि अब तो मंजिल खड़ी है, तेरे स्वागत की ताकीद में/

सौगात९६       विरासत का हस्तांतरण

मैंने दौलत नहीं कमाई, बस ये शब्द कमाए हैं,
अपनी रूह के टुकड़े, इन पन्नों पे सजाए हैं/

सँभाल कर रखना इन्हें' पूजा', ये मेरी विरासत है,
मैंने काँटों पे चल के ये फूल खिलाए हैं/

' रतन' रहे न रहे, पर ये तहरीर गवाह रहेगी,
कि हमने हर हाल में, बस रिश्तों के दीप जलाए हैं/

सौगात९७        नोयडा से प्रयागराज ( भावुक विदाई)

शहर बदला, वक्त बदला, पर मेरा दिल न बहला,
इस चकाचौंध में भी, मेरा सादा मिजाज न बदला/

नोएडा की इन रातों ने, बहुत कुछ सिखाया मुझे,
पर प्रयागराज की मिट्टी का वो लिहाज न बदला/

' रतन' की कश्ती अब, शांत किनारे की ओर है,
कि तूफानों से लड़ने का, हमारा वो अंदाज न बदला/

सौगात९८        इबादत का अंत( पूर्ण समर्पण)

अब न कोई शिकायत है, न कोई अधूरी हसरत है,
मुझे मेरे खुदा से मिली, ये कलम की रियासत है/.

" पूजा के पतवार" ने, लगा दिया किनारे मुझे,
अब तो बस सुकून है, और रब की इनायत है/

हमने तो जिया है हर लम्हा, पूरी ईमानदारी से,
अब इस तहरीर का हर लफ्ज मेरी शहादत है/

सौगात९९        कलम का विश्राम

थक गईं हैं उंगलियाँ, पर दिल अभी जवान है,
ये मेरी सौवीं सौगात, मेरा नया आसमान है/

बहुत कुछ कहा, बहुत कुछ अनकहा रह गया,
पर जो लिखा है, वही मेरी असली पहचान है/

' रतन' अब मौन है, अपनी इस जीत की खुशी में,
कि अधूरी दास्तान अब, इक मुकम्मल जहान है/

सौगात१००      शताब्दी(सौवीं महा- सौगात)

सौ सौगातें पूर्ण हुईं, ये प्यार का समंदर है,
हर दिल की धड़कन, अब इन पन्नों के अंदर है/

मुठ्ठीगंज से शुरू हुआ था, जो सफर मेरा' रतन'
आज" तहरीर- ए- रतन" बन कर, सबके दिल के अंदर है/

सौवीं सीढ़ी चढ़कर अब, पीछे मुड़ कर जो देखा,
तो पाया कि मेरा हर दर्द, अब एक हसीन मंजर है//      

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" तहरीर- ए- रतन" की बाबत  ( संक्षेप में)

किसी ने सच ही कहा है कि कविता लिखी नहीं जाती, वह तो
जीवन के संघर्षों और अनुभवों की भट्टी में तप कर स्वयं प्रकट होती है/" तहरीर- ए- रतन" और" पूजा के पतवार से" का यह सम्मिलित
रूप इसी सत्य का जीवंत प्रमाण है/
       इस पुस्तक के केंद्र में एक ऐसा व्यक्तित्व है--- राजीव रत्नेश
' रतन' जी----- जिनके लिए शब्द केवल अक्षर नहीं बल्कि उनकी
धड़कनें हैं/ प्रयागराज की मिट्टी की सोंधी महक और मुठ्ठीगंज की
गलियों के संस्कारों ने जिस' रतन' को गढ़ा, आज उसकी चमक
नोएडा की महानगरीय व्यस्तताओं के बीच भी फीकी नहीं पड़ी है/
      यह पुस्तक एक अनूठा प्रयोग है/ एक ओर इसमें सौ सौगातें है--- जो जीवन के गहरे दर्शन को चंद पंक्तियों में समेटने का प्रयास हैं/
ये सौगातें उस अनुभवी नाविक की तरह हैं जो समुद्र की गहराई तो
जानता है, पर शांत रहना पसंद करता है/ दूसरी ओर," पूजा के
पतवार" की रचनाएँ हैं, जो भावनाओं का वह विस्तार हैं, जहाँ एक
पिता का वात्सल्य, एक रचनाकार की पीड़ा और एक मनुष्य की
नैतिकता मुखर होकर बोलती है/
         " पूजा" यहाँ एक सुपुत्री का नाम नहीं है, बल्कि वह अटूट
विश्वास और वह पतवार है, जिसने राजीव जी की जीवन- कश्ती
को हर तूफान से सुरक्षित बाहर निकाला है/ एक मित्र और संपादक
के रूप में, जब मैंने इन रचनाओं को संजोया, तो पाया कि राजीव जी
की लेखनी में वह जादू है जो पाठक को ठहरने पर मजबूर कर देता है/ यहाँ संगम की लहरों का संगीत भी है और समय के कुरूर प्रहारों
की गूंज भी/
           यह संकलन हम दोनों के साझा प्रयासों, अटूट मित्रता और
साहित्य के प्रति साझा अनुराग का प्रतिफल है/ मुझे पूर्ण विश्वास है
कि यह' तहरीर' आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्ग-दर्शक और
साहित्य- जगत के लिए एक अनमोल रत्न सिद्ध होगी/
                  आपका सम्पादक मित्र
             """""""""""""""""""""""""""""""""""""""

होश आया तो नजर नज़्म

होश आया तो

नज़्म: राजीव रत्नेश "रतन"

भूमिका

ग़ज़ल के हर शेर की अपनी अलग दुनिया होती है, जबकि नज़्म एक ही ख़याल को शुरू से आख़िर तक एक धारा की तरह बहाती है। यह नज़्म क़ाफ़िये और रदीफ़ की बंदिश से आज़ाद है। इसकी ख़ूबसूरती इसके मंज़र में है: मदहोशी का एक लम्हा, उसके बाद की ख़ामोशी, और फिर होश आने पर वही एहसास, जो पलकों पर ठहरा रह जाता है।

नज़्म का पहला बंद शायर की मूल पंक्तियाँ हैं और आगे के बंद उसी भाव को विस्तार देते हैं। आख़िरी बंद में नज़्म उसी "पलकों पर" के एहसास पर लौटती है, जहाँ से उसने शुरुआत की थी।

नज़्म

१.
मैं मदहोश हुआ कैसे, ख़बर नहीं,
देखा तो तेरे लब थे मेरे लबों पर,
होश आया तो पाया, तू
झुकी थी मेरी पलकों पर।

२.
वो कौन-सी घड़ी थी, जब वक़्त थम गया,
साँसों में साँसें घुल गईं,
और रात ने चुपके से
अपना आँचल हम पर डाल दिया।

३.
न कोई सवाल था, न कोई जवाब,
बस ख़ामोशी की एक मीठी-सी सरगोशी थी,
तेरी ज़ुल्फ़ों की ख़ुशबू
मेरी रूह तक उतर आई थी।

४.
अब जब सुबह की पहली किरन
खिड़की से झाँकती है,
मैं सोचता हूँ,
वो ख़्वाब था या हक़ीक़त?

५.
बस इतना जानता हूँ,
तेरे लबों की नमी अब भी मेरे लबों पर है,
और तेरी नज़र की ठंडक
अब भी मेरी पलकों पर।

शब्दार्थ

  • नज़्म: एक विषय या भाव पर लिखी गई कविता, जिसमें ग़ज़ल की तरह क़ाफ़िये-रदीफ़ की पाबंदी ज़रूरी नहीं
  • आज़ाद नज़्म: बिना तुक और बिना बंधे छंद की नज़्म
  • बंद: नज़्म का एक खंड, यानी पद
  • मदहोश: नशे या ख़ुमारी में डूबा हुआ
  • लब: होंठ
  • पलकें: आँख के ऊपर-नीचे के पर्दे
  • घड़ी: पल, क्षण
  • वक़्त: समय
  • आँचल: पल्लू, ओढ़नी का किनारा; यहाँ रात की चादर
  • ख़ामोशी: चुप्पी, मौन
  • सरगोशी: कानों में धीमे से कही गई बात, फुसफुसाहट
  • ज़ुल्फ़ें: लंबे घने बाल
  • रूह: आत्मा
  • किरन: रोशनी की रेखा
  • ख़्वाब: सपना
  • हक़ीक़त: सच्चाई, वास्तविकता
  • नमी: हल्की गीलापन, तरावट
  • ठंडक: शीतलता, सुकून
  • तख़ल्लुस: शायर का उपनाम

शम्अ जलती रही गजल

शम्अ जलती रही

ग़ज़ल: राजीव रत्नेश "रतन"

भूमिका

शम्अ और परवाने की कहानी उर्दू-हिंदी शायरी का सबसे पुराना और सबसे प्यारा रूपक है। इस ग़ज़ल में शायर उसी कहानी के सामने एक चुभता हुआ सवाल रखता है: जब शम्अ जलती रही और परवाना जल बुझा, तो आख़िर क़ातिल कौन है? मुहब्बत का हासिल क्या रहा, और इस तबाही का दोषी किसे ठहराएँ?

हर शेर के आख़िर में लौटता हुआ "ये क्या हुआ" हैरानी, दर्द और बेबसी तीनों को एक साथ समेटता है। क़ाफ़िया "-इल" (हासिल, क़ातिल, साहिल, महफ़िल…) और रदीफ़ "ये क्या हुआ" है। मक़्ते में शायर अपने तख़ल्लुस "रतन" के साथ ख़ुद को भी इसी दर्द का हिस्सा बना लेता है।

ग़ज़ल

मतला
शम्अ जलती रही, मुहब्बत का हासिल ये क्या हुआ,
परवाना जल बुझा, किसे कहें क़ातिल ये क्या हुआ।

२.
हर क़दम पर इम्तिहाँ था, हर नज़र में आग थी,
डूबने वाले को भी न मिला साहिल, ये क्या हुआ।

३.
रौशनी करते रहे चुपचाप जलकर रात भर,
सुबह होते ही सूनी रह गई महफ़िल, ये क्या हुआ।

४.
जो मिटा वो इश्क़ में कहलाया सबसे ही कामिल,
जो बचा वो रह गया बस ग़ाफ़िल, ये क्या हुआ।

५.
चाँद तकता रह गया और रात ढलती ही रही,
दूर तक दिखती न थी कोई मंज़िल, ये क्या हुआ।

६.
रौशनी देने चला था जो, उसी का घर बुझा,
देखने वाला भी था उसमें शामिल, ये क्या हुआ।

७.
उम्र भर पाला किए जिसको वफ़ा के नाम पर,
वो निकला बेरुख़ी के क़ाबिल, ये क्या हुआ।

८.
हमने सौंपा था जिसे अपना सभी कुछ प्यार से,
उसी ने तोड़ दिया दिल, ये क्या हुआ।

मक़्ता
हर तरफ़ देखा "रतन" तो ख़ुद को पाया ज़ख़्म में,
अपना ही हूँ आज मैं बिस्मिल, ये क्या हुआ।

शब्दार्थ

  • शम्अ: दीपक, मोमबत्ती, ज्योति
  • परवाना: पतंगा, जो शम्अ पर जल मरता है; सच्चे आशिक़ का प्रतीक
  • हासिल: प्राप्ति, नतीजा
  • क़ातिल: हत्यारा, जान लेने वाला
  • इम्तिहाँ: परीक्षा
  • साहिल: किनारा
  • महफ़िल: सभा, जमघट
  • कामिल: पूर्ण, सिद्ध
  • ग़ाफ़िल: बेख़बर, अनजान, जो होश में न हो
  • मंज़िल: गंतव्य, ठिकाना
  • शामिल: सम्मिलित, हिस्सेदार
  • क़ाबिल: योग्य
  • बेरुख़ी: उपेक्षा, बेपरवाही
  • वफ़ा: निष्ठा, निभाने का भाव
  • बिस्मिल: घायल, ज़ख़्मी
  • ज़ख़्म: घाव
  • मतला: ग़ज़ल का पहला शेर, जिसके दोनों मिसरों में क़ाफ़िया-रदीफ़ आता है
  • मक़्ता: ग़ज़ल का अंतिम शेर, जिसमें शायर का तख़ल्लुस आता है
  • क़ाफ़िया: तुक वाले शब्द
  • रदीफ़: हर शेर के अंत में दोहराया जाने वाला पद/

पैमाने में तुझे उतार कर गजल

पैमाने में तुझे उतार कर

ग़ज़ल: राजीव रत्नेश "रतन"

भूमिका

यह ग़ज़ल हुस्न और इश्क़ की उस कैफ़ियत को बयान करती है, जहाँ महबूब की मौजूदगी ख़ुद शराब बन जाती है और आशिक़ हैरान है कि इस नशे को लफ़्ज़ों में, इबादत में और अदब में कैसे समेटे। हर शेर एक ही सवाल पर लौटता है, "करूँ कैसे?", और यही बेबसी इसकी रूह है।

क़ाफ़िया "-अब" (लब, शब, अदब…) और रदीफ़ "करूँ कैसे" है। मक़्ते में शायर अपने तख़ल्लुस "रतन" के साथ महबूब से मुख़ातिब होता है।

ग़ज़ल"


""

१.
पैमाने में तुझे उतार कर जाम-ब-लब करूँ कैसे,
पहलू में पाकर तुझे, रंगीन अपनी औक़ात-ए-शब करूँ कैसे।

२.
तेरे नैन-नक़्श अक़्स बनकर मेरे दिल में उतर गए हैं,
ये सुहानी शाम तुझपे सदक़े, पेश तुझे दिल का अदब करूँ कैसे।

३.
इक झलक ने तेरी कर दिया है मुझे बेसुध,
अब तुझसे बढ़कर और कोई तलब करूँ कैसे।

४.
दिल का हाल तुझे देखकर हो गया है अजब,
होश में रहने का कोई सबब करूँ कैसे।

५.
तेरी ज़ुल्फ़ों की घटा में खो गया हर रास्ता मेरा,
अब भटकने के सिवा कोई और मतलब करूँ कैसे।

६.
चाँद भी शर्मा के बादल की ओट में जा छुपा,
तेरे आगे चाँद की मैं बात अब करूँ कैसे।

७.
तेरे लबों पे जो तबस्सुम है, वही मेरी इबादत है,
इस इबादत में किसी और को रब करूँ कैसे।

८.
तेरी हर अदा क़यामत है, तेरी हर नज़र सितम,
इस हुस्न की तारीफ़ मैं ग़ज़ब करूँ कैसे।

मक़्ता
तुझ बिन बेनाम हूँ मैं, अब तू ही बता ऐ "रतन",
अपना कोई दूसरा मैं लक़ब करूँ कैसे।

शब्दार्थ

  • पैमाना: शराब का प्याला
  • जाम-ब-लब: होंठों से लगा हुआ जाम
  • औक़ात-ए-शब: रात के पहर या घड़ियाँ
  • पहलू: बग़ल, पास
  • नैन-नक़्श: आँखें और चेहरे की बनावट
  • अक़्स: प्रतिबिंब, छाया
  • सदक़े: न्योछावर, क़ुर्बान
  • अदब: आदर, शिष्टाचार, सम्मान
  • बेसुध: होश खो बैठा
  • तलब: चाहत, माँग
  • अजब: विचित्र, अनोखा
  • सबब: कारण, वजह
  • घटा: घने बादल
  • मतलब: प्रयोजन, उद्देश्य
  • ओट: आड़, परदा
  • तबस्सुम: मुस्कान
  • इबादत: पूजा, उपासना
  • रब: ईश्वर
  • क़यामत: प्रलय; यहाँ ग़ज़ब ढाने वाली
  • सितम: ज़ुल्म, सताना
  • ग़ज़ब: अनोखा, असाधारण
  • लक़ब: उपाधि, उपनाम
  • बेनाम: जिसकी कोई पहचान न हो
  • मक़्ता: ग़ज़ल का अंतिम शेर, जिसमें शायर का तख़ल्लुस आता है
  • क़ाफ़िया: तुक वाले शब्द
  • रदीफ़: हर शेर के अंत में दोहराया जाने वाला पद

Monday, November 2, 2026

तहरीर- ए- रतन सौगात८१ से९० तक

तहरीर- ए- रतन
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सौगात८१      रिश्तों का हिसाब 

हमने तो हर रिश्ता, बड़ी ही शिद्दत से निभाया है,
चाहे बदले में हमें, बस दर्द ही हाथ आया है/

जमाना तो मुनाफा ढूँढ़ता है, हर मुलाकात में' रतन'
पर हमने तो घाटा सहकर भी प्यार ही कमाया है/

' तहरीर' के इन पन्नों में, वही सच्चाई गूँजती है,
कि हमने रिश्तों को जिया है, कभी तौला नहीं है/

सौगात८२       अदृश्य हाथ

जब भी लगा कि अब डूब जाएगी कश्ती मेरी,
तभी किसी अदृश्य हाथ ने, पतवार को थाम लिया/

' पूजा' की उन मन्नतों का ही, ये चमत्कार है शायद,
कि वक्त ने गिरते हुए भी, हमें संभाल लिया/

' रतन' को अब तूफानों की, कोई फिक्र नहीं रही,
कि ऊपर वाले ने खुद ही, मेरा हाथ थाम लिया/

सौगात८३         मुठ्ठीगंज का वो सवेरा

आज भी कानों में गूँजती है, उन गलियों की हलचल,
जहाँ बचपन की शरारतें और जवानी का कल था/

संगम की उस रेती पर, जो लिखे थे हमने नाम' रतन'
आज नोएडा की भीड़ में भी, वो अहसास बड़ा कोमल था/

शहर भले ही बदल गए, पर रूह आज भी वहीं है,
जहाँ सादगी का सवेरा, और अपनापन ही संबल था/

सौगात८४           सादगी का श्रृंगार

हमने कभी चेहरों पे, कोई मुखौटा नहीं लगाया,
जो दिल में था, वही हमेशा जुबाँ पे आया/

सादगी ही हमारा गहना है, और सच्चाई ही श्रृंगार' रतन'
इसी सादगी ने हमें, जमाने की नजरों में ऊँचा उठाया/

बनावट की इस दुनिया में, जो खुद को बचा ले गया,
समझो उसी ने, असली जीवन का सुख पाया/

सौगात८५         पच्चासी का आशीष

पच्चासी सौगातें, जीवन के अनुभव की एक गंगा है,
जहाँ हर लहर में, एक नया और गहरा संदेश है/

अब मंजिल की आहट, साफ सुनाई देने लगी है' रतन'
कि सौ का ये लक्ष्य, अब रूह के बहुत ही पास है/

पंद्रह कदम और सही, इस महासफर को पूरा करने में,
फिर तो' तहरीर- ए- रतन' का अमर इतिहास है/

सौगात८६         ' पूजा: मेरीशक्ति' ( पुत्री को समर्पित)

तू सिर्फ बिटिया ही नहीं, मेरा अभिमान है' पूजा',
मेरी हर गिरती हुई उम्मीद का वरदान है' पूजा'

जमाने की तपिश में, जो शीतलता दे जाए मुझे,
मेरे घर के आँगन की, वो प्यारी सी मुस्कान है' पूजा'/

' रतन' की कलम को, जो नया हौसला देती है,
मेरी इबादत का सबसे पावन, नाम है' पूजा'/

सौगात८७        अनुभवों की पोटली

वक्त के बाजार से, हमने कुछ तजुर्बे खरीदे हैं,
कुछ ठोकरें खाकर, तो कुछ रिश्ते खोकर खरीदे हैं/

अब हमें कोई क्या बहकाएगा, इस दुनिया के खेल में,
हमने तो सच के मोती, आँसुओं में भिगो कर खरीदे हैं/

' रतन' की अमीरी का अंदाजा, तुम क्या लगाओगे,
हमने ये सुकून, अपनी रातों की नींदे खोकर खरीदे हैं/

सौगात८८          अंतिम पतवार

हमने अपनी नैया, अब तेरे हवाले कर दी है,
' पूजा के पतवार' ने, हर मुश्किल सरल कर दी है/

अब साहिल मिले न मिले, हमें इसकी चिंता नहीं,
कि मंजिल की तलाश ही, अब हमारी मंजिल बन गई है/

' रतन' अब शांत है, जैसे समंदर की गहराई,
कि लहरों से लड़ने की कला, अब हमारी पहचान बन गई है/

सौगात८९        इंसानियत का दीया

बुझने न देना कभी, अपने अंदर की उस इंसानियत को,
जो किसी रोते हुए को देख, खुद तड़प उठती है/

पत्थर बन जाना तो, बहुत आसान है इस दुनिया में,
पर इंसान को बने रहना ही, सबसे बड़ी तपस्या होती है/

' तहरीर- ए- रतन' का बस, एक ही संदेश है प्यारे,
कि दुआ वही है, जो दूसरों के काम आती है/

सौगात९०         नब्बे का शिखर

नब्बे सौगातें, अब एक मुकम्मल दास्तान बन गई है,
मेरी खामोशियाँ भी, अब एक जुबान बन गई है/

सिर्फ दस कदम दूर है, वो सौ का सुनहरा आंकड़ा,
जो मेरे जीवन की, सबसे बड़ी पहचान बन गई है/

' रतन' अब रुकना नहीं, बस थोड़ा सा और चलना है,
कि' तहरीर' अब इतिहास के पन्नों की, शान बन गई है/

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आशिक- ए- बेइरिव्तयार गजल

शीर्षक: आशिक- ए- बेइरिव्त्यार
--------- राजीव रत्नेश' रतन'

भूमिका
यह गजल एक खुद्दार आशिक की सफाई है/ वफा से महरूम
होकर भी वह खुद को महबूब का शिकार मानने को तैयार नहीं/
रदीफ" तो नहीं" हर शेर में एक इंकार की तरह आता है: मैं टूटा
हूँ, पर हारा नहीं; चाहता हूँ, पर बेबस नहीं/ मकते में यह तेवर
आखिरी बार खुलता है, जहाँ शायर मानता है कि मुहब्बत का
सौदा उसने अपनी मर्जी से किया था/

गजल

महरूम- ए- वफा हूँ पर तेरा शिकार तो नहीं,
तेरा हूँ मगर आशिक- ए- बेइरि०तयार तो नहीं/

तेरी गली में आना मेरी आदत ही सही मगर,
ये आना-जाना मेरा इंतजार तो नहीं/

हर जख्म पर मैं मुस्कराया हूँ, ये सच है पर,
इस मुस्कराहट में कोई इकरार तो नहीं/

तेरी भी कभी गम में भींगी होगी आँख,
इस आँख में छिपा कोई गुबार तो नहीं/

दर्द मेरे दिल का मुझे अजीज है बहुत,
पर इस दर्द पर मुझे ऐतबार तो नहीं/

तूने बहारें मांग लीं, मैंने खिजाँ चुनी,
इस चुनाव में मेरे लिए बहार तो नहीं/

उम्र भर जलता रहा मैं तेरे नाम की आग में,
राख हूँ अब, मगर ये भी बेकार तो नहीं/

मकता:
सौदा किया था दिल का' रतन' ने खुशी-खुशी,
अब कहता है, ये सौदा कोई उधार तो नहीं//

शब्दार्थ:
महरूम: वंचित, जिसे कुछ मिला न हो
वफा: निष्ठा, निभाने का भाव
शिकार: आखेट का पात्र, यहाँ जाल में फँसा हुआ
बेइरिव्तयार: जिसका स्वयं पर वश न रहे
आशिक: प्रेमी
इकरार: स्वीकार, हामी
गुबार: धूल, मन की कड़वाहट
अजीज: प्रिय
ऐतबार: भरोसा
रिवजाँ: पतझड़
सौदा: लेन-देन, दीवानगी भी
         """"""""""""""""""""""”"

तूफान गजल

शीर्षक: तूफान
---- राजीव रत्नेश' रतन'

भूमिका
यह गजल उस आशिक की है, जिसके और महबूब के
बीच एक अनजाना तूफान आ खड़ा हुआ है/ सुबह लबों
पर नाम है और शाम को दिल में अरमान, यानी चाहत का
सिलसिला रुका नहीं, बस उसके रास्ते में आँधी आ गई है/
हर शेर में यही कशमकश है कि इस तूफान से डरें या इसी
में अपनी कश्ती उतार दें/मकते में शायर मानता है कि जो 
तूफान से घबरा कर किनारे बैठा रह गया, वह दिल नहीं, बस
जिंदगी का एक मेहमान है/

गजल

तेरी- मेरी मुहब्बत के दरमियाँ ये कैसा तूफान है,
लब पे सुबह भी तेरा नाम है, शाम को भी तेरा अरमान है/

तू दूर है तो भी नजर में है मेरी हर कहीं,
दिल की हर धड़कन में बस तेरी ही पहचान है/

सामने आए तो चुप, और जाए तो दिल बेकरार,
मेरी खामोशी भी तेरे लिए एक ऐलान है/

तेरी यादों की हवा, जब भी चली है रात में,
दिल का हर कोना मेरा वीरान है, सुनसान है/

जिस राह से तू गुजरी थी, उस राह की धूल भी,
मेरी नजर में आज भी वो मेरा ईमान है/

पूछते हैं लोग मुझसे, कौन है जिसके लिए,
इस कदर बर्बाद होकर भी वही मेरी जान है/

मैं तुझे पा न सका, पर खोया भी तो नहीं,
ये अधूरापन ही मेरे इश्क की शान है/

मकता

तूफान से डर कर जो साहिल पे बैठा रह गया,
' रतन' वो दिल क्या है, वो तो बस एक मेहमान है//

शब्दार्थ
दरमियाँ: बीच में
तूफान: आँधी, यहाँ: मुहब्बत में आई उथल-पुथल
अरमान: अमिलाषा, चाह
पहचान: परिचय, चिन्ह
बेकरार: बेचैन
ऐलान: घोषणा
वीरान: उजाड़
सुनसान: सन्नाटे से भरा
ईमान: आस्था, निष्ठा
साहिल: किनारा
मेहमान: अतिथि; यहाँ: कुछ पल का साथी, जिसका ठिकाना
            स्थायी न हो/

                """""""""""""""""""7

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!