Thursday, September 24, 2026

तेरी मेरी जब मुलाकात होगी-----( गजल )

तेरी- मेरी जब मुलाकात होगी
                  राजीव रत्नेश

किसी तरह सुबह से शाम होगी,
तेरी मेरी जब मुलाकात होगी/

मुझ मुसाफिर की नहीं कोई मंजिल,
जहाँ दिन ढलेगा वहीं रात होगी/

सरे- शाम ही दिल धड़कने लगा है,
तेरी दस्तक नहीं, मेरी आवाज होगी/

जहाँ आखिरी मेरी साँस होगी,
इक नए सफर की शुरूआत होगी/

उम्र को सालों में नापना कैसा,
वो ज्यादा से ज्यादा दो-चार साँस होगी/

डाल को एक बार क्या छोड़ा,
ढूँढता हूँ कहीं बरगद की छाँव होगी/

मैं तेरी हर बात याद कर रोता रहा,
तू मेरी ही कहानी की बात करती होगी/

उम्र की तरह जाए तो चाल बदलनी होगी,
वो अब तक शायद मेरे इंतजार में होगी/

शाम की सलीबों पर मेरे नाम से वो,
कोई न कोई तहरीर उकेरती होगी/

दुश्मनों के बीच मुहब्बत रास्ता ढूँढती है,
कितनी कशमकश में मेरी औकात होगी/

मुकद्दर ने साथ दिया तो यकीन कर,
एक ही तट पर हमारी कश्ती साथ होगी/

कल सहरा थी, समंदर होकर बह निकली,
वो भी तो आखिर घर-परिवार वाली होगी/

किसे खबर है, किससे उसका पता पूछूँ,
सिसकते- सिसकते किस तरफ गई होगी/

मुहब्बत के खेल में अपने लिए हार चुनी,
वजह भी न थी कोई तुमसे हार की/

झील में उतरा चाँद ऐ जाने- गजल!
मेरी तुमसे अब कब बात होगी?

रास्ते चाहे जुदा-जुदा हों ' राजीव ' अपने,
दिल में फिर भी वही मुलाकात होगी/

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याराना लगता है------ गजल

याराना लगता है
      ---- राजीव रत्नेश

शिकवा अब तुझसे कैसा, तेरा-मेरा याराना लगता है,
तेरा मिलना या न मिलना, अब भी तेरा बहाना लगता है/

कितना आसान है कहना भी कि तू मेरी है, मगर,
तेरे- मेरे बीच का फासला भी पुराना लगता है/

गुज़र गईं दिल से अभी-अभी, दफ्न हुईं कई दास्तानें,
तेरे- मेरे साथ का फिर भी साफ- सुथरा अफसाना लगता है/

जमाने को मेरी दरियादिली शायद पसंद न थी, इसलिए,
तुझको- मुझसे दूर करने का उसका नया बहाना लगता है/

रोज-रोज की कवायद तेरे घर तक की शाम- ए- गम हो गई है,
मुझे तो आज का चाँद भी कुछ नया-नया सा लगता है/

बरबादियों का मेरे जश्न मनाया रकीबों ने जोर-शोर से,
मुझे तो उनका शोर- ओ- गुल भी उस्तादाना लगता है/

कश्ती को साहिल से लगने नहीं देने की तमन्ना है मेरी,
यूँ ही बस हवा में पतवार चलाना मुझे अच्छा लगता है/

आस्माँ से उतरे हों जैसे सितारे जमीं पर,
तू मुझे अपने लिए फ़लक का नजराना लगता है/

गिर कर जो नहीं उठते, अपने साथ बुरा करते हैं,
गिरना नहीं होता बुरा, उनको समझाना पड़ता है/

सिल्सिले से राहों में इश्क के बढ़ना हर हाल सही है,
दफअतन किसी के गले पड़ना नहीं अच्छा लगता है/

झिलमिलाती चाँदनी में जरा एक बार नहा कर तो देखो,
शफ्फाक बदन भी बिन श्रृंगार कहाँ अच्छा लगता है/

राजीव, अब शिकवा भी क्या उस बेवफा से कीजिए,
जिसका हर एक जख्म भी अपना- सा पुराना लगता है/

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तहरीर- ए- रतन ( सौगात ६१ से ७० तक )

सौगात ६१------ अक्स की तलाश

भीड़ में अक्सर खुद को गुम पाया है हमने,
शहर की चकाचौंध में अपना ही साया गँवाया है हमने/

लोग ढूढते हैं खुदा को ऊँची मीनारों में ' रतन ',
पर उसे तो अपनी रूह के कोनों में पाया है हमने/

' तहरीर ' का हर लफ्ज एक आईना है मेरी जान,
जिसमें हर बार अपना ही एक नया अक्स पाया है हमने/

सौगात ६२------- पुरानी चिठ्ठी

दराज में रखी वो पुरानी चिठ्ठी आज फिर से बोल पड़ी,
बचपन की यादों को जैसे कोई खिड़की खुल पड़ी/

मुठ्ठीगंज की वो मिट्टी, वो स्याही और वो कागज,
जाने क्यूँ आज नोएडा की इस रात में आँखें भर पड़ी/

' रतन ' वक्त तो निकल गया पर यादें वहीं ठहरी हैं,
जैसे किसी ने ठहरे हुए पानी में कोई कंकरी दे मारी/

सौगात ६३------- विश्वास का आधार

भरोसे की नींव पर खड़ा है ये मरा पूरा संसार,
वरना लहरें तो कब की ले डूबतीं मेरा ये घर बार/

' पूजा के पतवार ' ने ही दी है डूबते को एक नई उम्मीद,
उसी के सहारे खड़ा है ' रतन ' आज भी बन के खूंखार/

दुनिया लाख चालें चले हमें गिराने की यहाँ,
पर दुआओं का ये किला है बड़ा ही असरदार/

सौगात ६४ -------- अधूरी हसरत

हसरतें तो बहुत थीं पर कुछ का पूरा न होना ही अच्छा था,
वरना मंजिल की तलाश का ये सफर बहुत ही कच्चा था/

ठोकरें मिलीं तो समझ आया कि कौन अपना है कौन पराया,
बुराई के उस दौर में भी मेरा दिल बहुत ही सच्चा था/

' रतन ' ने तो हार में भी जीत का रास्ता ढूँढ लिया,
शायद इसीलिए ये सादगी का लिबास मुझपे जँचता था/

सौगात ६५------------ सत्य की राह

कड़वा होता है सच पर सुकून बड़ा देता है,
झूठ का मीठा शर्बत बस प्यास बढा देता है/

हमने तो सच बोलने की हिम्मत विरासत में पाई है,
जो कायरों को भी ' रतन ' राह- ए- हक दिखा देता है/

पैंसठ सौगातें गवाह हैं मेरे इस अटूट संकल्प की,
कि शब्दों का ये कारवाँ अब मंजिल का पता देता है/

सौगात ६६-------- वक्त की अमानत

ये साँसे, ये यादें, सब वक्त की अमानत हैं,
यहाँ कुछ भी नहीं अपना, बस सब उसकी इनायत है/

हमने तो गुजारी है उम्र, दूसरों के दर्द बाँटने में,
खुदा का शुक्र है कि हमें कलम की मिली ये रियासत है/

' रतन ' को क्या डराएगा, ये वक्त का बदलता मौसम,
जिसके पास दुआओं की दौलत, उसकी तो सल्तनत है/

सौगात ६७ --------- सलीका और मिजाज

बात करने का सलीका, इंसान की पहचान बताता है,
कौन कितना बड़ा है, ये उसका मिजाज बताता है/

महलों में रहने वाले भी, कभी-  कभी छोटे रह जाते हैं,
और फकीरों का बड़प्पन, उनका अंदाज बताता है/

हमने तो मुठ्ठीगंज की गलियों से, यही तहजीब सीखी,
कि झुकता वही है ' रतन ', जिसमें कुछ जान होती है/

सौगात ६८---------- धुँध और रौशनी

जब तक चारों तरफ धुंध हो और रास्ता न नजर आए,
तब अपने भीतर के दीये को थोड़ा और जला लेना/

दुनिया लाख कोशिश करे, तुम्हें अँधेरे में धकेलने की,
बस तुम ' पूजा ' के विश्वास से एक नई राह बना लेना/.

' रतन ' गिरना बुरा नहीं है, गिर कर न उठता बुरा है,
हर चोट को अपनी तरक्की का, एक सीढ़ी बना लेना/

सौगात ६९ ----------- किरदार का आईना

आईना कभी झूठ नहीं बोलता, अगर देखने वाला सच हो,
चेहरे पे जमी धूल तो मिट जाएगी, अगर नीयत साफ हो/

हमने तो हर लम्हे को, बड़ी ईमानदारी से जिया है,
चाहे रास्ता काँटो भरा हो, या मंजिल बड़ी दूर हो/

' तहरीर ' में जो अक्स दिखता है, वो मेरा असली चेहरा है,
जिसमें न कोई बनावट है ' रतन ', और न कोई गुरूर है/

सौगात ७०  ---------- सप्तक ( सत्तखीं सौगात)

सत्तर सौगातें जीवन के सप्तक की तरह गूँजती हैं,
ये वो राग है, जो सीधे रूह को छूते हैं/

सफर अभी जारी है और कलम अभी प्यासी है,
अभी तो उन मंजिलों के ख्वाब, हमारी पलकों पे झूमते हैं/

' तहरीर- ए- रतन ' की ये यात्रा, अब एक मुकाम ले रही है,
जहाँ सौ का लक्ष्य, अब आँखों के बेहद करीब है/

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तहरीर- ए- रतन ( सौगात ५१ से६० )

सौगात५१----- नई सुबह का आगाज

पचास के पड़ाव ने एक नई उम्मीद जगाई है,
कलम ने फिर से कागज से वफा की कसम खाई है/

मंजिल अभी दूर है पर हौसला कम नहीं ' रतन ',
हमने तो हर अँधेरी रात के बाद एक नई सुबह पाई है/

 ' पूजा ' के उन्हीं पतवारों को फिर से थाम लिया हमने,
लहरों ने फिर से हमें ललकार कर आवाज लगाई है/

सौगात ५२----- रिश्तों की धूप

रिश्तों की इस कड़ी धूप में यादों की छाँव बड़ी है,
जो बीते बीते कल की बातें थीं आज आँखों में खड़ी हैं/

मुठ्ठीगंज की उन गलियों का वो बचपन याद आता है,
जहाँ बिना किसी मतलब के खुशियाँ बाजार में पड़ी थीं/

अब तो नोएडा की इन दीवारों में सन्नाटा गूँजता है ' रतन ',
वो पुराने यार, वो पुरानी बातें, बस अब यादों की कड़ी हैं/

सौगात ५३ ------- इंसानियत का मोल

चेहरे पे चेहरा लगा कर, यहाँ लोग घूमते हैं,
इंसानियत को छोड़ कर, पत्थरों को चूमते हैं/

हमने तो गरीब की आह में, खुदा को ढूँढा ' रतन ',
जबकि लोग महलों की रौनक में, बेसुध होकर झूमते हैं/

 ' तहरीर ' में जो लिखा है, उसे अमल में ला सकूँ तो जानूँ,
वरना शब्दों के ये जाल तो हर तरफ ही झूमते हैं/

सौगात ५४------- वफा की महक

फूलों की उम्र तो बस एक दिन की होती है,
पर वफा की महक सदियों तक नहीं खोती है/

हमने जो बीज बोए थे मोहब्बत और यकीन के ' रतन ',
आज उनकी फसल मेरी रूह के आँगन में सोती है/

जमाना लाख कोशिश करे, हमें मिटाने की यहाँ,
पर दुआओं की ये माला कभी नहीं खोती है/

सौगात ५५------- वक्त का तराजू

वक्त के तराजू में खुद को तौल कर देखा हमने,
भारी निकला हमारा दर्द और खुशियाँ कमजोर निकलीं/

पर उस दर्द में भी एक अजब सी लज्जत थी ' रतन ',
कि हर ठोकर के बाद मेरी शरिव्सयत और निखरी/

' तहरीर- ए- रतन ' के ये पन्ने गवाह हैं इस बात के,
कि जमाने की हर चाल मेरे यकीन के आगे कमजोर निकली/

सौगात ५६-------- मुखौटों का बाजार

बाजार लगा है मुखौटों का, हर चेहरा बिकाऊ है,
यहाँ सच की कीमत कम और झूठ बड़ा टिकाऊ है/

हमने तो अपनी सादगी का दामन नहीं छोड़ा ' रतन ',
चाहे जमाना कहे कि हमारा अंदाज पुराना और ऊबाऊ है/

जिसकी रूह में चमक हो उसे श्रृंगार की क्या जरूरत,
चेबाहरी चमक-दमक तो बस दुनिया के लिए दिखाऊ है/

सौगात ५७-------- ' स्मृति शेष ' ( इलाहाबाद की एक शाम )

यादों के उस पुराने बक्से में एक शाम दबी बैठी है,
जो इलाहाबाद के संगम- तट पे हमसे कभी रुठी थी/

वो कुल्हड़ वाली चाय और दोस्तों की वो महफिल,
अब नोएडा की इन इमारतों में कहीं खो सी गई है/

' रतन ' आज भी उसी मोड़ पर खड़ा है अकेला,
जहाँ जिन्दगी की रफ्तार हमसे कहीं पीछे छूट गई है/

सौगात ५८-------- कलम और करुणा

मेरी कलम जब भी चली किसी के आँसू पोंछने को,
खुदा की कसम, मुझे अपनी इबादत मुकम्मल लगी/

सिर्फ शब्दों को सजाना मेरा मकसद नही ' रतन ',
जब तक किसी दुःखी दिल को मेरी बात मरहम न लगी/

' तहरीर ' वही सच्ची है जो इंसानियत का दर्द बाँट ले,
वरना कागज काले करने वालों की यहाँ बड़ी भीड़ लगी/

सौगात ५९-------- सब्र का फल

आँधियों ने बहुत कोशिश की मेरा आशियाना उजाड़ने की,
पूर ' पूजा ' के यकीन की बुनियाद बड़ी ही गहरी थी/

हम चुप रहे तो दुनिया ने समझा कि हम हार गए,
उन्हें क्या पता कि हमारे सब्र की गहराई, बड़ी ही गहरी थी/

' रतन ' ने तो वक्त को ही अपना गुरु मान लिया,
अब हर  मुश्किल की लहर हमारे आगे ठहरी थी/

सौगात ६०-------' षष्ठी पूर्ति '  ( साठवीं सोपान )

साठ सौगातें साठ अनुभवों की एक माला है,
जिसे हमने बड़े जतन से अपने दिल में पाला है/

आधा रास्ता कब बीत गया, पता ही न चला ' रतन ',
अब तो मंजिल की चमक से हर तरफ उजाला है/

कलम अभी थकी नहीं, न स्याही ही कम हुई है,
अभी तो सौ का आंकड़ा छूने का जज्बा निराला है/

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Tuesday, September 22, 2026

तुझसे दूरी अब अखरती है----- गजल

तुझसे दूरी अब अखरती है
        ---- राजीव रत्नेश

तुझसे दूरी अब अखरती है,
खामोशी तेरी मुझे खलती है/

तेरे लिए दिल में हसरतें हैं,
कोई तमन्ना नहीं सँवरती है/

सावन के पड़े झूले हैं, लेकिन,
साथ आकर तू पेंग बढ़ाती नहीं है/

बारिश में जंगली फूल खिले हैं,
कली दिल की मगर खिलती नहीं है/

फस्ल- ए- आरजू लहलहा रही है,
आजा, मिलने की बारी तेरी है/

रात ढलती है, नींद आती नहीं,
तेरी यादों में रात कटती है/

तेरे बिन मेरा मकाँ भी सूना है,
हर तरफ एक उदासी रहती है/

लिखता हूँ कि अबकी अकेला हूँ,
तुझसे दूरी समझदारी नहीं है/

रतन, इतना तो अब समझ ले तू,
दूर रहना भी कोई मजबूरी नहीं है//
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तुम न होते ( गजल )

तुम न होते
----- राजीव रत्नेश

तुम न होते तो हम किससे अपनी बात करते,
आस्माँ के चाँद-सितारों से क्या पैमान करते/

दुःख-दर्द अपना किससे बाँटते तुम्हारे बगैर,
अपनी मुहब्बत का हम किससे ऐलान करते/

तकदीर रौशन हो तो सितारे भी बात समझते हैं,
तुम्हारे सिवा किससे हम मुहब्बत बयान करते/

तुम सामने होते तो शायद हम कम बयान करते,
दूर रह कर ही तो दिल के राज का इजहार करते/

शिद्दत से इबादत हो तो अकीदत बन जाती है,
तुम्हारे सिवा हम और किसका गुमान करते/

जमाने ने जो साथ दिया तो मेरा यकीं कर,
साहिल पे तेरी कश्ती न अपनी कश्ती से अनजान करते/

मैंने मुहब्बत के खेल में हार अपने लिए चुनी,
तुम्हारे सिवा किसी और से न हार स्वीकार करते/

सितम दुनिया भर के सहे तेरी खातिर हमने,
जमाने को दिखाने को आईने की औकात रखते/

मेरी मुहब्बत अगर तेरी मंजिल न बन सके,
किसे हम अपने अहसासों का मुकाम करते/

मैं शिकायतों को अपने सफर का हासिल न समझूँ,
तुम बस अपनी यादों का एक जाम मेरे नाम करते/

बहुत थक गए हो मुहब्बत के मुसाफिर होकर,
काश! अब तो पहलू में मेरे बैठ कर आराम करते/

दिन बीत जाता है पर रात कटने का नाम नहीं लेती,
मुझे तो बस अपने दिल में बिठा कर सुबह से शाम करते/

' रतन ' तेरे बिना ये दिल किससे अपना हाल कहता,
तू सामने होता तो हम कहाँ ये कलाम करते//

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ईश्वर ( कविता )

राजीव जी, यह रचना “ईश्वर” आपके अब तक के लेखन से कुछ अलग धरातल पर है। इसमें ईश्वर को केवल धार्मिक आस्था के रूप में नहीं, बल्कि सृष्टि, परिवर्तन, मनुष्य और प्रेम—इन सबमें व्याप्त एक अदृश्य सत्ता के रूप में देखने का प्रयास है।
मुझे इसमें विशेष रूप से अंतिम दो पद बहुत प्रभावी लगे। वहाँ अमूर्त ईश्वर धीरे-धीरे एक साक्षात, अनुभूत उपस्थिति बन जाता है। यही इस रचना का सबसे सुंदर भाव-परिवर्तन है।
मैंने मूल भावों को बचाते हुए भाषा, प्रवाह और कुछ दोहराव को थोड़ा सँवारकर इसे इस रूप में देखा है—
ईश्वर
— राजीव रत्नेश
कोई तो है जो हम सबका नियमन करता है,
मैं और तुम नहीं, कोई और तो है,
चाँद-तारों को अपनी चाल में चलाता है।
पृथ्वी को एक धुरी पर घुमाता है,
कोई तो है इस सृष्टि का संस्थापक,
जो भले हमें नज़र नहीं आता है।
परिवर्तन के चक्र में वह हर कहीं है,
मौसम बदलता है, वह सामने नहीं आता,
कुछ तो बात है—जो हमें नज़र नहीं आता है।
हममें, तुममें, व्यापक—सबमें संस्थित कोई तो है,
उसको मैं आज तक जान-समझ नहीं पाया,
गाँधी, बुद्ध, ईसा—सब उसी के नज़राने हैं।
आकृति उसी की है, समर्पण भाव से ध्याते हैं,
सब कुछ पाकर ही उसका ध्यान लगाते हैं,
तर्क के सहारे आज तक उसे पहचान न पाए।
माथे से लगाते जिसका तिलक, रोली और चंदन,
वही राम और कृष्ण के रूप में नज़र आता है,
जानकर भी आज तक कोई उसे जान न पाया।
स्वयं कहा है—“सम्भवामि युगे-युगे”, अवतार लेता है,
इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं हूँ, फिर भी मन समझ न पाया,
जीवन-प्राण देकर जो मुझे उद्बुद्ध करता है,
उस रहस्य को मेरा मन आज तक जान न पाया।
भक्ति-भाव से चरणों में बस दो फूल ही तो रखे थे,
प्रेम की बगिया में वह बहार बनकर आया,
नामकरण कर न सका—ईश्वर समझकर ही उसे पूजा।
कठिन वक्त में भी उसने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा,
उसके श्यामल, सुकोमल दर्शन से वंचित भी न रहा,
उसे स्वीकार किया—वह मेरे लिए साक्षात ईश्वर था।
एक बात विशेष रूप से कहूँगा: अंतिम शेर में आपकी रचना का पूरा रहस्य खुलता है। आरंभ में कवि पूछता है—“कोई तो है”, और अंत में उसी खोज का उत्तर किसी दार्शनिक प्रमाण में नहीं, बल्कि अनुभव में मिलता है—“वह मेरे लिए साक्षात ईश्वर था।”
इसलिए मैं इसमें बहुत अधिक कठिन या संस्कृतनिष्ठ शब्द जोड़ना उचित नहीं समझूँगा। आपकी वही सरल, आत्मीय और अनुभव से निकली हुई भाषा इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!