Thursday, July 30, 2026

तभी तो जाकर कहीं मुकम्मल ( कविता )

तभी तो जाकर कहीं मुकम्मल  ( कविता )
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तुझे भुला कर जो मुश्किल मेरी आसान हुई है/
तभी तो जाकर कहीं मुकम्मल मेरी दास्तान हुई है/

भुला पाना तुझको मेरे लिए कोई आसान नहीं था,
समंदर से मोती लाने से बढ़ कर मुश्किल था मेरे लिए/
तुझे क्या बताऊँ, कितने तू मेरे दिल के करीब थी,
तू मेरी किस्मत थी या किसी और की तकदीर थी/
तेरे कदमों में जहाँ के रत्नो- जवाहर बिछे थे,
किसी की सर्द आह तो मेरी तू खास जज्बात थी/

जबसे तू गई है, दिल में मुकम्मल बरसात हुई है,
तभी तो जाकर कहीं मुकम्मल मेरी दास्तान हुई है/

नजर को तेरे साथ ही साथ मैंने भी तो फेरा है,
क्या मालूम किस गली, किस बस्ती में तेरा डेरा है/
ये दिलो- जां तुझे मुबारक, अल्फाज वापस लेता हूँ,
तू मेरी जाने- गजल, तुझसे कौन सा हिसाब लेता हूँ/
तू आए तो गुल महके, चमन गुलजार हो जाए,
सावन में पड़े झूले, तू झूले तो मैं भी पेंग बढ़ाऊँ/

तेरी नजरें हैं नीची, कुछ तो नई बात हुई है,
तभी तो जाकर कहीं मुकम्मल मेरी दास्तान हुई है/

किरदार तो था तू ही मेरे अफसाने का,
तेरे बिन ये दिन क्या और रात न थी भली/
आ जाओ तो तुझे सुनाऊँ दर्दे- दिल की दास्तां,
तेरे लिए नहीं कोई रोक, खुला दिल का दरवाजा/
तेरी कजरारी आँखों के काजल की ही बात होगी,
रात की रानी, बेला की महक की दास्तान होगी/

तेरे आइने का नूर गया, रोशनी की शुरूआत हुई है,
तभी तो जाकर कहीं मुकम्मल मेरी दास्तान हुई है/

तू कहे तो तेरी महफिल के पिछवाड़े का रास्ता खोलूँ,
कितने तेरे दीवाने हैं, उनके लिए मैं भी पर तोलूँ/
नफे-नुकसान का हिसाब न रखा कभी आज तक,
तू कहे तो फिर दो-चार पैग चढ़ा कर झूमूँ/
महफिल में अब वह जोर नहीं, चिल्ल- पों- शोर नहीं,
रक्स तेरा हो और मैं रहूँ नजर ओट, किसी हाल मंजूर नहीं/

कुछ तो आइने- बरदार की तेरे, मुझसे बात हुई है,
तभी तो जाकर कहीं मुकम्मल मेरी दास्तान हुई है/

अपनी- अपनी पसंद-नापसंद की बात है, तू चाहे तो चाहूँ,
अपनी- अपनी चाहत है, तू माँगे तो मैं भी जाम माँगू/
कितनी दूर से चल कर तेरी महफिल तक पहुँचा हूँ,
तू थमाए प्याला सिर्फ, और मैं तेरी नजरों के जाम चाहूँ/
हर तरफ बू- बास बसी है तेरे मयखाने की,
यही तो आरजू बची रह गई है अरमानों की/
तू कहे तो पी लूँ आज छक के ऐ मेरे साकी!
दिलजलों के लिए अभी तो शुरू शाम हुई है/

आज तेरी महफिल में ही मेरी आखिरी रात हुई है,
तभी तो जाकर कहीं मुकम्मल मेरी दास्तान हुई है//

               राजीव रत्नेश
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Tuesday, July 28, 2026

आखिर रतन ने भला तेरा ( गजल )

आखिर रतन ने भला तेरा  ( गजल )
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तेरी यादों पर नियंत्रण लगाया है/
तब कहीं जीवन संयमित पाया है/

तू जान न सका, न ही समझा मुझे,
पाकर तुझे मैंने सीप में मोती पाया है/

निर्झर गिरते तेरी आँखों से,
वादियों में प्यार के जल-प्रपात छाया है/

मैं तुझे जान-बूझ कर अनदेखा करता हूँ,
समझ- बूझ कर तूने, लहजा शिकवा का बनाया है/

इस बात का कोई गम नहीं, भूला तू मुझको,
मैंने भी तो इस दिल से मूरत तेरी हटाया है/

साहिल तक ही साथ, तेरा-मेरा था रोज का,
जाकर बस तूने खारे पानी से चेहरा धोया है/

महबूब मेरे अब जाकर किसी से भी शिकवा कर,
वार न तेरा आज तक मुझ पर कहीं चल पाया है/

ऐ गुलबदन! जाने- चमन! शाने- महफिल थे कभी,
तेरे बिना चमन बेनूर, महफिल में गम का साया है/

अंदाज तेरा शायराना, बातें तेरी तिलस्माना,
तेरा फुसूँ मुझ पर तो कभी न तेरा चल पाया है/

बहारों में घूमो, नज्जार- ए- शौक में रहो,
तेरा फन, आखिर किस तरह मुझे भुलाया है/

मजरूह न कभी दिल मेरा, तेरा न मुंतजिर,
सिर्फ तुझे तेरी याद के समंदर से निकाला है/

तेरे होठों पर वो रस- विचुंबित जाम छलक रहा,
सच बता, मेरे सिवा किसी और को पिलाया है/

कहीं न चला जब तेरा जादू , वार मुझ पर किया,
आखिर" रतन" ने ही भला तेरा क्या बिगाड़ा है//

                राजीव रत्नेश
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Monday, July 27, 2026

ये तूने क्या किया ( कविता )

ये तूने क्या किया ( कविता )
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प्यार में बेवफा! ये तूने क्या किया,
सजाते- सजाते मेरा घर, गैर का घर सजा दिया/
मुहब्बत तुझे मुझसे थी या गैर से,
बसाते- बसाते मेरा घर, गैर का घर बसा दिया/
यकीन न था मुझे कि तू रास्ता बदलेगी,
किस बात का तूने मुझसे आखिर बदला लिया/
नैरंगियाँ इश्क की छाई थी तेरी महफिल में,
किस बात पे तूने मेरी मुहब्बत से किनारा किया/

किफायतशार थी तो पहले से ही,
मुफ्त में गैर के घर की रौनक बनी/
मेरी दुनिया लूटी पहले फिर,
गैर का भी चैनो- सुकूं लूट लिया/

बरसी बदली घटा घनघोर थी,
तेरी जवानी का यूँ मन- मयूर थिरक उठा/
मैं बढ़ जाता तेरी ओर,
पर जाते-जाते संभल गया/

क्या सोच कर तूने मेरी बगिया से,
ताजा खिला गुलाब तुमने अनायास तोड़ा/
मस्त- मलंग थी तो मुझसे निबाहा होता,
प्यार मुझसे किया, गैर का घर तूने जोड़ा/
सादा- ओ- मासूम तो पहले तू न थी,
किस नाज से अपना बनाया घरौंदा तोड़ा/

बेतरह चाहा था जिसे, आज मुझसे ही,
तूने हर रिश्ता खत्म किया, गैर से निबाहा/
दूरी कुछ भी न थी तेरे- मेरे घर के बीच,
फिर क्यूँ बहाना तूने दूरी का बनाया
मैं तुझसे दूर रह नहीं सकता,
ये जान कर भी तूने दबदबा बनाया/

तू दिलशाद रही, तेरा दिल आबाद रहा,
तू दिलबाग रही, मैं दिले- बरबाद रहा/
फिर क्यूँ मेरे शहर में आके,
अपने हाथ से तूने पत्थर मारा/

गैर अजीज था तो पहले ही बताया होता,
अरे ओ बेवफा! दिल तो न मेरा लिया होता/
तेरी किस्मत के मारे तो और भी थे,
उनसे भी अपना निबाह कर लिया होता/

गैरों से अजमीयत थी तेरे इश्क की,
तो मुझको जाल में न फंसाया होता/
करके बरबाद मुझे तूने गैर के साथ,
कम से कम अपना घर तो न बसाया होता/

तुझे दे देता छूट मैं पहले ही,
काश! मुझे पहले से ही बताया होता/
कसूरवार तुझे न ठहराता कभी,
तूने इरादा अपना पहले जतलाया होता/

        """""""""""" राजीव रत्नेश

फलसफा इश्क का ये तूने औरों को भी तो सुनाया होगा/
मैं कैसे यकीं कर लूँ कि मेरे बारे में उनको न बताया होगा//

राजीव रत्नेश
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Sunday, July 26, 2026

वह अपनी ही नजर में सदा ( गजल )

वह अपनी ही नजर में सदा  ( गजल )
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तुमको पाया, सब कुछ मेरे पास रहा/
तुमको खोया, दिल बहुत उदास रहा/

सोचा था, तुमसे कुछ न कहेंगे हम,
पास पाया तो दिल में एक एहसास रहा/

जमाने ने दिए, गम के अंबार, मगर,
तुमको देखा तो जीने का विश्वास रहा/

किसी ने दिए खुशियों के खजाने,
किसी के हिस्से, गम का आभास रहा/

जबरन किया व्यर्थ- विवाद हमने,
कहाँ जन्म-जन्म का विश्वास रहा/

जख्म पर मरहम लगाने चले तो थे,
आते-आते मगर सब प्रयास रहा/

देखा मेरा उन्मुक्त- व्यवहार दुनिया ने,
भावनाओं का फिर भी उपहास रहा/

सागर की उत्ताल तरंगे भी थमीं,
देख मेरा भावों का विस्तार रहा/

जीवन नदिया की बहती धारा है,
किसी ठौर न इसका निवास रहा/

सुबह का सूरज, शाम को डूब गया,
उम्र बीतने का दिल में आभास रहा/

कितना पाया, कितना कुछ गंवाया,
जीवन भर इसका न कोई ख्याल रहा/

गए थे समंदर से मोती लाने,
गहराई का मगर न एहसास रहा/

अपनी दुनिया में रहना सीखा हमने,
भीड़ में भी अपना अलग निवास रहा/

आस्मान में दूधिया रोशनी बिखरी,
चंद्र- किरणों में अद्मुत प्रकाश रहा/

" रतन" को कौन दुनिया में खरीद सका,
वह अपनी ही नजर में सदा खास रहा//

              राजीव रत्नेश
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हकीकते- इश्क इनको ( गजल )

हकीकते- इश्क इनको     ( कविता )
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हसीं अक्सर मुजस्सिम बुते- जफा होती है/
सारी कायनात पर अपनी जहाँगीरी रखती हैं/

शोर-शराबे और हंगामें होते हैं पसंद इनको,
खल्वत में इनकी नानी भी मरती है/

जमाने भर को अपना मुद्दई समलती हैं,
आखिरशः किसी से न दिल लगाती हैं/

अपना बना कर, निकम्मा कर के ही बाज आती हैं,
खुद समझती नहीं, प्यार का दाँव लगाती हैं/

अपना समझ कर ही तो इनसे फरेब खाया,
अपने आगे किसी को न कुछ समझती हैं/

मुहब्बत परचून की दुकान का माल समझती हैं,
बिना हींग- फिटकरी लगाए ही चोखा खाती हैं/

हमने भी तो इन्हें दिल से न याद किया कभी,
जानते-समझते थे, ये बरबाद- तबीयत होती हैं/

इश्क का न ये मुकम्मल फलसफा होती हैं,
दिली धड़कता है जरूर, भेजे से सफा होती हैं/

हमने कभी न कहा कि हमसे दिल लगाओ,
छेड़ मुहब्बत का तराना, साजे- वफा तोड़ देती हैं/

मुहब्बत में इनके बरबाद होते-होते आखिर बचे,
काँटे का चारा हजम कर भी मछली नहीं फँसती है/

बरबाद मुहब्बत का फसाना न सुनायेंगे " रतन",
हकीकते- इश्क इनको महशर में समझ आती है

                       राजीव रत्नेश
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Sunday, July 19, 2026

बस उसे जमाने की नजरों से ( गजल )

बस उसे जमाने की नजरों से  ( गजल )
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उसे देखा, उसे चाहा, अपना दर्द उससे बताया था/
हर खुशी और गम में उसे कलेजे से लगाया था/

बावफा कभी बन कर न रहा वो मेरे साथ- साथ,
महफिल में बेमतलब का ही तूफान उठाया था/

कितना गुरुर था उसको अपने चेहरा- ए- खास पर,
बड़ी मुश्किल से मुझे मुखड़ा अपना दिखाया था/

दिलजलों के हुजूम में वो खुद भी शामिल था,
अपने आप को सबसे अलहदा दिखाया था/

अंदेशा पहले से था कि बेवफाई भरी नस-नस में है,
खुद से न उसने, कभी प्यार का इज़हार किया था/

शोख थे नजारे, शबाब पे थी उसकी महफिल,
मुझे भरमाने को, जानबूझ कर जाम छलकाया था/

तक़दीर का सिकन्दर वो था, जहाँ तक जान पाया,
निशाना उसका खाली जाता, जो नजरों पे न बिठाया होता/

चूक उससे हुई या मुझसे ही हुई, नामालूम,
पहल उसने की, इरादा प्यार का जताया था/

उसे अपना समझ कर ही दिल की मलिका बनाया था,
जब- जब वो रूठा, सारी- सारी रात उसे मनाया था/

मेरी ही गजल गैर ने उसके सामने सुनाया था,
भरी महफिल से उसे खुद मैंने ही उठाया था/

कुछ दिनों तक वो बिल्कुल खामोश- चुपचाप रहा,
काफी दिन गए तक, मुझे नखरा दिखाया था/

मुझे ही चाहता था, बात-बात पे मुझे सुनाता था,
अजाबे- मुहब्बत, इसरार में उसके मैंने पाया था/

डोरे- ताबीज के भुलावे में वह सदा रहा,
खुद गया तो गया, मुझे भी साथ में बुलाया था/

यार से दूरी बना कर वह खुद कुछ यूँ रहा,
मुगालते में मुझे रखा, किस तरह फुसलाया था/

एहतिराम- ए- मुहब्वत उसका समझ न पाया था,
' दूर के ढोल होते सुहाने ', मुझे उसने बताया था/

उंगलिया न उठाने पाए कोई उसके इश्क पर,
एक गुलाब रोज, मेरे लिए माली से मँगाया था/

साहिल पे गया था, मेरी कश्ती पे सवार होने,
उसे शायद सिर्फ मेरी पतवार का सहारा था/

कश्ती मेरी ले जा, पतवार भी साथ लेता जा,
पहले भी मुझे कभी न समंदर का आसरा था/

मशविरे जरूर लेता रहा मुझसे, अदब के साथ,
पुरव्ता फैसला अपना उसने पहले से बनाया था/

अहसासात को मेरे अल्फाज देता था मगर,
अपने दिल का एक भी पर्दा न उठाया था/

क्या जरूरत थी, सभी रिश्तों का ह्वाला देना,
काम निकल गया तो उसने मुझे भुलाया था/

कैसे रहता उसपे आखिर एतबार भी अपना,
मेरे पीछे उसने अपने यार को लगाया था/

वक्त है कि अब तो उस किताब- ए- दोस्ती को बंद करूँ,
हर सफहा उसने अपने नाम लिखवाया था/

कितनी तवील सजा पाया उसने भी इंतजार का,
बावस्ता मुझसे जबकि उसका हर फसाना था/

आगे कुँआ, पीछे खाई समझ उसे आगाह किया था,
कितना गम सीने में आखिर उसने छिपाया था/

मजबूर न था ' रतन ', उसकी मुहब्बत के लिए,
बस उसे जमाने की नजरों से बचाया था/

                राजीव रत्नेश
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गमे- दिल की बात है, रहे- आम तक न पहुँचे/
तेरी - मेरी बात है, सरे- दरबार तक न पहुँचे/
मेरी बेदिली की तुझे, कानो- कान खबर न हो,
किसी हाल ये बात तेरे बाप तक न पहुँचे//

                  राजीव रत्नेश
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Saturday, July 18, 2026

अशआर

(१) मेरी नदामत उसकी पलकों पे सजी थी,
उसने चेहरा भी अपना छुपाया था/
     उसके चेहरे पर गमगीनी छलक रही थी,!
हाले- दिल मैंने मैंने उसको सुनाया था//

(२) मिला मौका तोआप से आदाब बजा लिया/
       इसी बहाने हमने दुनियादारी निभ दिया/

(३ ) गमे- दिल की बात है, रहे- आम तक न पहुंचे/
       तेरी मेरी बात है, सरे- दरबार तक न पहुंचे/
       मेरी मुफलिसी की तुझे कानो- कान खबर न हो,
       किसी हाल ये बात तेरे बाप तक तक न पहुँचे//

(४ ) असली प्यार के लिए बेमोल बिकता हूँ,
       मगर कोई मेरा खरीदार नहीं मिलता/
       लुटा दूँ अपनी गजलें उसके नाम पर,
       ऐसा मेरी जिंदगी में किरदार नहीं मिलता//

(५ ) हाले- दिल उसको सुनाया, वो पशेमां- सा रहा,
       मातमी चेहरा भी उसने बनाया कुछ देर तक/
       मेरी तर्ज- ए- बयानी पर मगर ऐ दोस्त!
       भीतर ही भीतर बहुत मुस्कराया कुछ देर तक//

                    राजीव रत्नेश
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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!