तुम सा एक रहनुमा ( गजल )
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नजरों से गिरा हूँ, दिल में रहा चाहता हूँ/
हर हाल तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ/
प्यार सबसे करता हूँ, तगादा नहीं करता,
सब जानते हैं, मैं क्या चाहता हूँ/
प्यार अगर किसी खेल का ही नाम है,
जिंदगी में खेलना मैं ये जुआ चाहता हूँ/
लिख के मेरा नाम जमीं पर मिटाते तो हो,
अगर हर्फे- गलत हूँ, तो मिटा चाहता हूँ/
ये किस तरफ से आई अजान की सदा,
मैं उधर की तरफ बढ़ा चाहता हूँ/
अगर पहले ही रुक जाता, तो संगम न होता,
मैं तो दरिया हूँ बस बहा चाहता हूँ/
तहरीर लिखने की अदा रास न आई मुझे,
मैं तो बस जमाने के लिए आईना चाहता हूँ/
किसी को प्यार में गच्चा देना, मेरा काम नहीं,
मैं तो खुद जमाने के सितम सहा चाहता हूँ/
दुनिया के ऐशो-आराम, तुम्हें हों मुबारक,
मैं न सितारे, न चाँद, न ये जहां चाहता हूँ/
किसी की मुझे गरज नहीं ' रतन '
बस तुम सा एक रहनुमा चाहता हूँ//
राजीव रत्नेश
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