सब्जा पे आई बहार ( गजल )
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गोल-गोल गोलगप्पे जैसे फूले तेरे गाल /
जूड़े में बाँधा है तूने रेशमी लाल रुमाल /
तेरा इरादा क्या है, आँखों में तेरे डोरे लाल,
ओ छैल- छबीली, तेरा पैरहन जैसे सुर्खाब /
चेहरे पर लटकें काली अलकें तेरी सुकुमार,
मेरी समझ से तू बागों की गुले- गुलाब /
आकर दिल में मेरे, और बढ़ा देती हो प्यास ,
जामे- लब तो देती नहीं, और लगा देती आग /
हवाओं के सफर के रास्ते में, तू गेसू खोल उड़ाए,
तेरे जुल्फों की हिरासत से, मुश्किल से छूटा दिलदार /
है बुखार तुझको, और तू कफ- सीरप मंगवाए,
आ मेरे पास, पास मेरे है अचूक पैरासिटामाल /
जमाना कुछ भी कहे, तू मेरे पास तो आजा,
हाथों से दबा कर अपने दर्दे- सर कर दूँ गायब /
नाक साफ कर दे क्यारी में, रंग-बिरंगे फूल आएँ,
तोड़ ले जो फूल तो शबनम हो जाए शर्मसार /
साफ- सुथरी होकर आजा बाहर, करता मैं इंतज़ार हाल जानने को तेरा, लोग बाहर खड़े बेकरार /
लाइट आन कब हो, आँखों में काटी सारी रात,
पूछा तुझसे जलाने को लाइट, सुना तेरा तकिया- कलाम /
कैसे ' रतन ' तुझे समझाएँ, कि तू मेरे दिल की रानी,
बागों में है तू तो, सब्जा पे जैसे आई हो बहार //
राजीव रत्नेश
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अशआर
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(१) बाली उमर में दिल पर हुस्न का तीर खा गया,
मुद्दत बाद जख्म भरा, पर निशान छोड़ गया //
(२) तुझसे मेरा याराना तो काफी पुराना लगे/
कैसा घाव दिया है कि भरने में जमाना लगे //
(३) जबसे देखा है तुझको, तेरी सौगातों से घिरा हूँ /
अक्स मद्दम हो चला है, कि कोहरों से भरा हूँ //
राजीव रत्नेश
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" गोलगप्पे जैसे गालों पर जब लाल रूमाल फबता है/
रतन के सूखे आँगन में, चंदा की बहार का साज सजता है //"
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