Thursday, July 16, 2026

मैं तुझे पहले से पहचानता था ( गजल )

मैं तुझे पहले से पहचानता था  ( गजल )
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मुझे जब तेरी याद आई तो बेतरह आई/
तुझसे मिला तो कहा, आमी तोमाके भालो बासी/

तुझे मुबारक हो तेरी भावना, तेरे विचार,
मौके पर तुझे न ठुकराता, तो तू मुझे ठुकरा देती/

मेरी गुमशुदगी में तेरे बाप का पूरा हाथ था,
भूल न पाया कभी तेरी वो आँखें कजरारी/

कुन्तल थे तेरे कमर पे बल खाते हुए,
झील में लटका के बैठी पाँव, लाल हुआ पानी/

हाले- दिल जो मैं कुछ पहले बयाँ कर देता,
तो होती मेरी तरफ से यह बड़ी नादानी/

तुझे तो मैं मौके पर मौका दे रहा था,
ताकि समेट ले जज्बात, भूल जा सारी कहानी/

दूर तुझे अपने से खुद ही जान-बूझ कर किया,
प्रीत के मामले में थीं तुम आधी खिली कली/

तेरा साथ मुझे कभी चैन नहीं दे सकता था,
भले तुझ पर आई हो झकझोर जवानी/

गुलाबी रंग तेरे गालों पर मला जरूर था,
दुनिया को दिखाने, कि तू मेरी प्रीत पुरानी/

नहीं चाहिए था मुझे तेरा साथ, तेरा हाथ,
नहीं चाहा तेरे बाप का साथ, तू नंबर एक सयानी/

अपने - मेरे संबंध के बीच भाई को लाई थी,
वह भी चाहता था पाटना, तेरे मेरे बीच की खाई/

तुझे सालों का अन्तराल दिया था, समझ-बूझ ले,
तेरी चाहत थी मुझे पाने की, पर मेरी मजबूरी थी/

मैं जानता था, इक दिन तू बेवफा बन के रहेगी,
तू वफा नहीं जानती, न थी साथ निभाने वाली/

तेरा इरादा जानता था, फिर भी पूछा तुझसे,
' क्या हुआ तुमको मुझसे प्यार जनाबे- आली '/

तुमने कहा भइया से मिलिए, दिल में गर कुछ है,
मैं जानता था तेरी बगिया का वही था माली/

तुम भूल गई प्यार- प्यार में खुद का गाना गाना,
' रह न जाए तेरी मेरी बात, रात की तरह आधी '/

मैं जानता था तेरा जवाब, खुद कुफ्ले- लब न खुलेगा,
बहाना तलाश कर अपने भाई से कुबूलवाएगी/

तुम्हारे मइया को दलाल के रूप में आना नापसंद था मुझे,
वह भी जानता था, मैं तुझे भूल नहीं सकता, न ही तू भूल सकती है/

मुझसे पूछा तो उसे सुझा दिया, ये रिश्ता जो तोड़ना चाहे,
तो आउट आफ साइट, आउट आफ माइंड होता, उसे बताया/

और ऐसा ही किया गया, मुझे अँधेरे में रख कर,
तुझे परदेश, शादी के बंधन में बाँध खाना किया/

और मैं भँवरों की तरह तेरे बाग के फूलों पे भ्रमरता,
तेरे ही चमन में मँडराता मारा-मारा फिरा करता हूँ/

मैंने तुझसे मिलने की कोई जरूरत समझी ही नहीं,
तुझ पर अपना कोई हक न जताया जान-बूझ कर ही/

तू सोचती होगी, पहले भी तो इजहारे- तमन्ना कर सकता था,
पहले तेरा दीवाना कोई और भी था, मैं कैसे टाँग फँसा
सकता था/

तुझे जान कर पहले ही तेरी आदत जानता था ' रतन ',
तुझे पहचानता था, तू मेरा साथ नहीं दे सकती थी/

                   राजीव रत्नेश
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तुझे मुझको भूलने में पल भर न लगा/
तुझको भूलने में मुझे एक जमाना लगा//

                     राजीव रत्नेश
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Tuesday, July 14, 2026

अभी तक तो तेरी हवेली की ( गजल )

अभी तक तो तेरी हवेली की  ( गजल )
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तू साज है मैं तेरी आवाज हूँ/
तेरे लिए मैं एक जज्ब- ए- खास हूँ/

अंदाजे- महफिल हूँ, माहौले- जश्न हूँ,
साकी के लिए मैं मुरादे- खास हूँ/

तिश्ना- लब हूँ, मुझे तो तेरी ही प्यास है,
आजा पास, तेरे बिना उदास ये रात है/

दिल की आवाज हूँ, दर्दे- खास हूँ,
तू क्यूँ हैरान है, मैं तेरा सब्रे- खास हूँ/

दिल वालों की महफिल में आ गया हूँ,
उमड़ते दिल के दर्दों का अहसास हूँ/

गौरे- तमन्ना हूँ, तेरी मजलिस की बात है,
तेरी हर मतलबे- खास में तेरी ही बात हूँ/

मोहब्बत की कहूँ कि नफरतों की कहूँ,
अपने से जुदा, अपने ही दिल का दाग हूँ/

हैरान हूँ, पशेमान हूँ, क्या बात तुझ में खास है,
नदामत के हैं पलकों में आँसू, लर्जा हर आवाज है/

मुहब्बत की बातों से नावाकिफ था अभी तक,
वैसे तो मैं राँझे, महीवाल से ज्यादे परीशान हूँ/

किस गली में लाई ' रतन ' को ये मुहब्बत भी,
अभी तक तो तेरी हवेली की हसीं शाम हूँ/

           राजीव रत्नेश
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उसका भरोसा मत करना ( गजल )

उसका भरोसा मत करना  ( गजल )
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दिल वालों से फरेब के सिवा कुछ नहीं मिलता/
इसीलिए खिलौनों से ही दिल बहलाया करता/

नजदीकी यार- दोस्तों से बात करते सहमा रहता,
जाने कौन सा फरेब नहीं उनके जेहन में समाया रहता/

मुहब्बत की तजरबेकारियाँ कुछ काम नआई,
उनकी मुहब्बत में तो गम का ही सरमाया रहता/

कहाँ तक कहूँ उनकी दरियादिली- ए- फरेब,
हर बार कुछ न कुछ गुल नया नया ही 
दिल तो खिलौनों से भी बहल जाया करता/

खुद मुहब्बत ने भी इसी बात की तसदीक की,
जिसके दिल न हो, वो किसी को फरेब नहीं दिया करता/

उसकी अँगड़ाइयों में मुझे तो फरेब का साया नजर आता,
इसी तरह वो मुझे तड़पा-तड़पा कर आजमाया करता/

जानता- समझता हूँ कि दिलफरेब सायों से तस्कीन नहीं होगी,
असल के खिलौनों से अब तो दिल नहीं बहलाया करता/

उसकी आँखों के काजल के साथ गाल पे बह लेता हूँ,
वह कौन सा काजल लगाता है, बतलाया नहीं करता/

मुहब्बत की रानाइयाँ, मुझे तो लगती हैं ऊल-जुलूल,
कौन सी बात है, जो वो मुझसे छिपाया नहीं करता/

मेहमानों के आने पर खातिर-तवाजह वो करता है,
बाजार से क्या सामान मँगवाया है, बताया नहीं करता/

मैं भी कहाँ उसके चारे में आकर अटक गया,
कांटे में क्या फँसाया था, मुझे पता नही चलता/

मेरी आबाद- मुहब्बत का बस इतना ही फसाना है,
सिमटे तो दिले- आशिक, फैले तो जमाना नहीं बनता/

मुहब्बत की बारीकियों से खुद उलझा- सुलझा किया,
फरेब जान कर भी उससे करते किनारा नहीं बनता/

अलमस्त जवानी चंदा की, शेरो- सुखन मेरे उसके नाम,
मेरी हिकायतों में उसको किसी किरदार का आसरा नहीं रहता/

बातें उसकी यकीनन शीरीं, लहजा खालिस हिन्दुस्तानी,
उसके होंठों पर अपने होंठ रखे, मुझे चाशनी का मजा
नहीं मिलता/

गरज अपनी अब तो तू भी समेट ही ले ' रतन ',
उसका भरोसा मत करना, वो किसी कायदे का वायदा
नहीं करता/

            राजीव रत्नेश
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इश्क भी कैसी अजब इबादत है ( गजल )

गमे- फिराक में कुछ इस तरह उलझा कि नया फसाना नहीं मिलता/
जिसे अपना कह सकूँ, ऐसा प्यार का कोई मुझे तोहफा नहीं भिलता/

असली प्यार के लिए बेमोल हूँ, मगर कोई मेरा खरीदार नहीं मिलता,
लुटा दूँ अपनी गजलें उसके नाम पे, ऐसा कोई किरदार नहीं मिलता/

हर इक मोड़ पर तेरी यादों का धुआँ- सा फैल गया लगता है,
इस दिल को अब कहीं सुकूँ का कोई बहता दरिया नहीं मिलता/

लोग कहा करते हैं कि वक्त हर गहरे जख्म को भी भर देता है,
मगर तेरे वायदे के बावजूद कोई ऐसा मेहरबां नहीं मिलता/

रात भर चंदा से तेरी ही बाते करता, तेरी हिकायतें सुना करता हूँ,
सुबह होते ही मुझे आसमानी सितारों का कोई कारवां नहीं मिलता/

हमने हर दर्द को हँस कर, सीने से भींच कर दिल में उतार लिया,
फिर भी दिल को जीने का कोई मुकम्मल तरीका नहीं मिलता/

सारी रात खवाबों में अक्सर तू मेरा साथ ही तो रहा करती है,
मगर क्या बात है, सुबह होते ही तेरा पता- ठिकाना नहीं मिलता/

तेरी हँसती हुई हसीन आखों की कोरों में, ये शबनमी अश्क कैसे हैं,
रात भर मेरी तरह क्या तू भी सो ना सकी, मुझे कोई सलीका नहीं मिलता/

सँभाल- संभाल कर हमने रख छोड़े थे सारा असबाबे- जमाना,
फिर भी ऐन मौके पर तेरे बचपन की गुड़िया का वो बक्सा नहीं मिलता/

' रतन ' ये इश्क भी कैसी अजब, कैसी गजब इबादत हुआ करती है,
जिसको चाहो उसी से मुझे तो दिल का अधूरा फलसफा मिलता है//

                      राजीव रत्नेश
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अपने फन को सलामत ही रखना ( गजल )

अपने फन को सलामत ही रख  ( गजल )
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दिल में शूल है, लब पे उसूल है/
यही जिंदगी का अजब दस्तूर है/

दर्द को हमने हँस कर कबूल किया,
यही इश्क का शायद पहला उसूल है/

जिसे अपना समझा, वही दूर हो गया,
इश्क का फैसला कितना मुश्किल है/

हर एक मुस्कराहट के पीछे छिपा,
किसी बेबसी का ही एक शूल है/

न शिकवा किया, न गिला ही किया,
यही दिल का सदियों पुराना वसूल है/

धूप कितनी भी हो, सिर नहीं झुकता,
मेरे किरदार का यही तो नूर है/

जख्म गहरे मिले, मुस्करा भी दिए,
दर्द से दोस्ती ही अब तो दस्तूर है/

राह काँटों भरी थी, चला भी वही,
जिसके सीने में जीने का सुरूर है/

दिल को बेचूँ तो आसां हो जिंदगी,
पर लब पे अब भी उसूल है/

कल से चंदा अजब पशो- पेश नें है,
क्या कहा उसने कि मेरे माथे पे शिकन है/

' रतन ' अपने फन को सलामत ही रखना,
यही दौलत है, बाकी तो सब फिजूल है//

         राजीव रत्नेश
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Monday, July 13, 2026

आज की रात जवाब दे दे ( गजल )

आज की रात जवाब दे दे  ( गजल  )
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गमे- हिज्र में यूँ फँसा कि कोई फसाना नहीं मिलता/
यूँ भी मुकम्मल मुझे कोई प्यार का जहां नहीं मिलता/

तेरा कुछ हाल तो कभी कोई ठिकाना नहीं मिलता,
कभी जमीं नहीं तो कभी कोई आस्मां नहीं मिलता/

तेरे होंठों की लग्जिश ने कुछ यूँ चाल चल दी,
कि अर्जे- खाक भी इतना कभी बेनिशां नहीं मिलता/

उदास शजर को देखा तो दिल हदस कर रह गया,
नादान इस तरह भी किसी को सहरा नहीं मिलता/

पलकों तले की बेपर्दगी तारी थी दूर- दूर तलक,
अश्के- गम भी दो बूँद दरमियाँ नहीं मिलता/

दिल की धड़कनों ने कोहराम सा अंदर मचा दिया,
जुल्फे- बरहम को कभी थोड़ा ताजियाना नहीं मिलता

तुझको छूकर आती तो है नसीमे- सहर भी, क्या पता,
मेरे दिल को कभी तेरे प्यार का आशियाना नहीं मिलता/

शहर का वाहियात मौसम कभी तो खुशगवार भी होगा,
खुदा की रहमत है कि मुझे तेरा कोई समाचार नहीं मिलता/

हुनरमंद हैं जमाने में एक से बढ़ कर एक, सदा देते तुझे,
शहर की गलियों में ढूंढ़ता हूँ, पर वो जमाना नहीं मिलता/

तेरे प्यार में तड़प-तड़प कर ही लगता है कि जान जाएगी,
मुझे तेरी मुहब्बत का कोई इश्तहार नहीं मिलता/

आकर मंजिल पे मिल जाओ, बिछड़े राही की तरह,
मुझे लिखने को अब नया तेरा कोई फसाना नहीं मिलता/

कल तारीख बदल जाएगी, आज की रात तक मुझे जवाब दे दे,
' रतन ' को कभी ये मौसम आशिकाना नहीं मिलता/

              राजीव रत्नेश
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तेरी नजरों का निशाना ( गजल )

तेरी नजरों का निशाना  ( गजल )
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महरुमे- वफा हूँ, वफा चाहता हूँ/
क्या कह रहा हूँ, ये क्या. चाहता हूँ/

रैन-बसेरा ढूंढ़ता, जग में फिरता हूँ,
तेरे तो दिल नहीं है, मैं ठिकाना चाहता हूँ/

हमसाया बने, कोई हमसफर तो हो,
बाकी का सफर, मैं सुहाना चाहता हूँ/.

तुम बन के रह सको तो रहो, नहीं तो,
किसी और ठौर किस्मत आजमाना चाहता हूँ/

मुहब्बत मेरी मजबूरी का ही नाम हो तो हो,
मैं तेरे ही गले में बाहें डालना चाहता हूँ/

जिसकी मर्जी, चाहे तो मुझे आजमाए,
मैं मील का पत्थर हूँ, तेरा पता चाहता हूँ/

लुटाने को मेरे पास बचा कुछ तो नहीं,
पाने को सारा आस्मां चाहता हूँ/

दरवेश हूँ तेरी रहगुजर का मैं, बस तुझे,
अपनी दुआओं से नवाजना चाहता हूँ/

मिल जा मुझसे सदाबहार चमन सी,
तुझे सौंपना रहमते- खुदा चाहता हूँ/

घायल न कर सका ' रतन ' को कोई,
बस तेरी नजरों का निशाना चाहता हूँ

       राजीव रत्नेश
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थाम लिया हो वक्त ने रेल का पहिया जैसे,
और रेल तेरे घर के मुहाने पे उड़ी है/
तेरे आ जाने का इंतजार है उसको शायद,
तुआए तो वक्त चले, रेल आगे बढ़े/

          राजीव रत्नेश
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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!