Friday, October 30, 2026

तुम्हारे सिवा गजल

तुम्हारे सिवा
गजल-- राजीव रत्नेश" रतन"

भूमिका:
कुछ रिश्ते जिंदगी में इस तरह शामिल होते हैं कि उनके
बिना अपना वजूद ही अधूरा लगता है/ वह एक शख्स,
जिससे हम दुख बाँटते हैं, अपने ख्वाब सुनाते हैं और
अपनी मुहब्बत का ऐलान करते हैं/ यह गजल उसी एक
सहारे का नाम है, जिसके बगैर चाँद-सितारे भी खामोश
रह जाते हैं/

गजल:

तुम न होते तो किससे हम पूरे अपने अरमान करते,
चाँद-सितारों को भला क्यों कर निगहबान करते/

दुख-दर्द अपना किससे बाँटते तुम्हारे बगैर,
मुहब्बत का तुम्हारे सिवा किससे ऐलान करते/

तन्हा सफर की रात में जब साया भी छूट जाता,
किसके भरोसे हम ये राह आसान करते/

तेरी हँसी न होती तो इस उजड़े हुए दिल को,
कौन से मौसम से हम इसे गुलिस्तान करते/

खुद से भी जो कहना था, तुझसे ही कहा हमने,
वरना किस आईने को अपना हमजबान करते/

तेरी नजर के सदके, मिली हर खुशी हमें,
वरना गम बरकरार रहता, किसे मेहरबान करते/

ऐ" रतन" इस दुनिया में कोई हमसफर न होता,
तो किसके दम पर हम खुद को इंसान करते//

शब्दार्थ:
अरमान: इच्छा, हसरत
निगहबान: रखवाला, निगरानी करने वाला
ऐलान: घोषणा, सार्वजनिक कथन
गुलिस्तान: बाग, उपवन
हमजबान: एक ही भाषा बोलने वाला, हमराज
सदके: न्यौछावर, कुर्बान
मेहरबान: कृपालू, दयालू
हमसफर: साथ चलने वाला

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मुहब्बत बन जाती है गजल

मुहब्बत बन जाती है
गजल-- राजीव रत्नेश" रतन"

भूमिका:
मुहब्बत कोई एक दिन में पैदा होने वाली शय नहीं/
पहले दिल में खुलूस जागता है, फिर वह इबादत की
शक्ल ले लेता है और शिद्दत बढ़ते-बढ़ते अकीदत बन 
जाती है/ यह गजल उसी सफर की दास्तान है, जहाँ
जो कभी महज गुमान लगता था, वही आखिर में
हकीकत निकलता है/

गजल:

शिद्दत की इबादत हो तो अकीदत बन जाती है,
दिल का खुलूस आगे चल कर मुहब्बत बन जाती है/

तुम्हें पाकर हम क्या बताएँ, ऐसा लगता है,
जिसे गुमान समझे थे, हकीकत बन जाती है/

जो नजर पहले-पहल बस इक शरारत लगती थी,
वही नजर दिल की सबसे बड़ी नेमत बन जाती है/

तन्हाई में जो लम्हे बोझ से लगते थे  कभी,
तेरी याद में हर घड़ी वो राहत बन जाती है/

वफा के रास्ते में जब कदम रख देता है कोई,
हर इक ठोकर भी उसके लिए रहमत बन जाती है/

जिसे दुनिया ने दीवानगी का नाम दिया" रतन"
वही दीवानगी इक दिन इबादत बन जाती है//

शब्दार्थ:
शिद्दत: तीव्रता, गहराई
इबादत: उपासना, पूजा
अकीदत: गहरी आस्था, श्रद्धा
खुलूस: सच्चापन, निश्छल प्रेम
गुमान: भ्रम, अनुमान
हकीकत: यथार्थ, सच्चाई
नेमत: वरदान, अनमोल देन
राहत: सुकून, चैन
रहमत: कृपा, मेहरबानी

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नजर सय्याद की है गजल

नजर सय्याद की है
गजल-- राजीव रत्नेश" रतन"

भूमिका:
शिकारी तीर चलाता है, पर असल में उसकी नजर किस पर है,
यह कौन जानता है? यह गजल उसी खेल की है: ख्वाबों की
उड़ान, जलती शम्अ, अधूरा जाम और आँधी से भिड़ता नन्हा
दिया, सब एक ही दर्द की अलग- अलग शक्लें/

गजल:

तीर चलाया तूने, पर नजर तुझ पर सय्याद की है,
तू समझा जाल तेरा है, यह साजिश तेरे ईजाद की है/

मेरे ख्वाबों की उड़ान खला के पार, उस रुहे- आजाद की है,
जो कफस में रहकर भी, हर पल सिर्फ फरियाद की है/

जुगनू से आफताब बना, यह सोचा कब था मैंने,
यह रोशनी मुझको तेरी ही दी हुई इमदाद की है/

दिल उमड़ा तो चंद लफ्ज कहे, तब जाकर जाना,
शोला- ओ- शबनम की तासीर तेरी हर याद की है/

नजर- ए- हिकारत से शम्अ ने जब देखा परवाने को,
जल- बुझा वो चुपचाप, कि आदत हर आशिक- ए- नाशाद की है/

साकी ने जाम लबोंसे लगाकर दफअतन हटा भी लिया,
दिल पर जो चोट लगी, वो एक अधूरी मुराद की है/

नन्हा दिया आँधी से भिड़ता रहा रात भर,
है तो दिया ही, पर जिद उसकी फौलाद की है/

चराग मुहब्बत का जलाया था हमने, ऐ दिले- नादान,
तपिश सँभाली न गई, पूरी दास्तां दिले- बर्बाद की है/

ऐ" रतन" हर शेर तेरा दर्द की कोरव से जन्मा,
यह सारी रौनक उसी एक उस्ताद की है//

शब्दार्थ:
सय्याद: शिकारी
ईजाद: आविष्कार, गढ़ना
रुहे- आजाद: आजाद आत्मा
कफस: पिंजरा
इमदाद: मदद
तासीर: असर, प्रभाव
नाशाद: दुखी, उदास
दफअतन: अचानक
मुराद: मनोकामना
फौलाद: इस्पात
तपिश: ताप, जलन

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गुमनामियों का गिला नहीं हरगिज गजल

गुमनामियों का गिला नहीं हरगिज़
  गजल---- राजीव रत्नेश " रतन "

भूमिका:
यह गजल मुहब्बत और जमाने की टकराहट की दास्तान है/
गुल और बुलबुल, जो उर्दू शायरी में इश्क के सबसे पुराने
प्रतीक हैं, यहाँ उन प्रेमियों की जगह खड़े हैं, जिन्हें समाज ने
उम्र- कैद सुना दी है/ कफस( पिंजरा ) बंदिशों का प्रतीक है,
तीरंदाज और संगसार जमाने की सख्ती के/ पर शायर हार नहीं मानता/ वह सवाल उठाता है कि किस कानून या मजहब में
मुहब्बत जुर्म लिखी है और अंत में ऐलान करता है कि गुमनामी
का उसे कोई गिला नहीं, वह पुराने उसूलों से टकराकर एक नई
राह बनाएगा/ वह जानता है कि " मौज-मस्ती के दिन बीत चुके,
अब बंदिशों से टकराने का वक्त है/" गजल का मिजाज बागियाना
है, दर्द के साथ हौसला भी है/

गजल

उम्र भर की कैद- ए- बा- मशक्कत, जीने की उम्मीद के लिए,
गुल-ओ- बुलबुल बाग में थे, बस मुहब्बत की ताईद के लिए/

छोड़ दें राह- ए- वफा और कफस में काटें बाकी उमर?
बुलबुल पूछे गुल से," क्या हम मिले थे इस सजा-ए- शदीद के लिए?

कफस तोड़ें तो तीरंदाजों के निशाने पर हैं हम, बचें तो संगसार,
हर तरफ पत्थर सजे हैं, दुश्मनों की ईद के लिए/

किस कानून- ओ- मजहब में लिखा है, मुहब्बत एक गुनाह है,
मकतब- ए- इश्क में हर सजा माफ है, इश्क के मुरीद के लिए/

हम मुहब्बत भी करेंगे, ये कफस भी तोड़ेंगे हम,
जी रहे हैं हम फकत उस एक दिन की दीद के लिए/

जिम्मेदारियाँ हमारी भी हैं, समझते हैं समझने वाले,
पर दो- रोजा मुहब्बत में कहाँ बचता वक्त मजीद के लिए/

वो दिन लद गए, जब खलील मियाँ उड़ाया करते थे फाख्ता,
अब बंधन किसी को भाता नहीं, लाख हो ताकीद के लिए/

समझ जा ऐ जमाने, हम बाज न आएँगे, इतना याद रख,
रास्ता खुला रखना, इश्क में हर आने वाले शहीद के लिए/

" रतन" को गुमनामियों का गिला नहीं इश्क में हरगिज़,
टकराएँगे पुराने उसूलों से, इक नई जदीद के लिए//

शब्दार्थ
कैद- ए- बा- मशक्कत: कठोर श्रम सहित कैद
ताईद: समर्थन, पुष्टि
राह- ए- वफा: वफा का रास्ता
कफस: पिंजरा, कैदखाना
सजा-ए- शदीद: कठोर सजा
संगसार: पत्थर मार-मार कर दंड देना
मकतब- ए- इश्क: इश्क की पाठशाला
मुरीद: चाहने वाला, अनुयायी
दीद: दर्शन या दीदार
दो- रोजा: दो दिन का, क्षणिक
मजीद: और अधिक
फाख्ता उड़ाना: बेफिक्री के शौक में वक्त बिताना
ताकीद: सख्त हिदायत
शहीद: यहाँ इश्क में जान देने वाला
जदीद: नया, आधुनिक
गुमनामी: अनाम रह जाना
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ये रास्ते गजल

ये रास्ते---- गजल
---- राजीव रत्नेश " रतन "

भूमिका:
          मंजिल की तलाश में निकले मुसाफिर के लिए रास्ते
कभी हमकदम बनते हैं, कभी दगा देते हैं/ यह गजल उसी
सफर की है, जिसमें साथी छूट गया, पर रास्ते अब भी उसी
को पुकारते हैं/

गजल:

निकले मंजिल के वास्ते, गाते ये रास्ते,
चलते-चलते हमकदम बन जाते ये रास्ते/

कोहसारों ने दरक कर राह दी उन्हें,
जहाँ रात हुई, ठिकाना दिलाते ये रास्ते/

नदियों ने  आखिरश हमें रोका नहीं,
हम बढ़ते गए, हाथ बढ़ाते ये रास्ते/

चार दिन की चाँदनी है मेहमानवाजी,
बाद उसके बदल जाते ये रास्ते/

जब खून के रिश्ते भी दगा कर जाते हैं,
कैसा होता है सफर, बताते ये रास्ते/

माना सफर तवील था, मगर इतना भी नहीं,
कि साथ छोड़ना भी सिखाते ये रास्ते/

हर मोड़ पर " रतन " ने तुम्हें दी सदा,
वफा न सही, तुम्हें ही बुलाते ये रास्ते//

शब्दार्थ:
कोहसार: पहाड़
दरकना: फटना, दरार पड़ना
आखिरश:  आखिरकार
मेहमान नवाजी: अतिथि-सत्कार
दगा: धोखा
तवील: लंबा
सदा: पुकार, आवाज
खंजर: कटार
वफा: निष्ठा, निभाना
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Monday, October 26, 2026

गुमाँ और यकीन | रतन की ग़ज़ल

भूमिका
प्यार में अक्सर हम सामने वाले को वैसा देख लेते हैं, जैसा देखना चाहते हैं। यह ग़ज़ल उसी सच को स्वीकारती है: कुछ भ्रम मेरा अपना था, और कुछ भरोसा उसका दिया हुआ। टूटने के बाद भी जो भीतर बचा रहा, वह है दृढ़ता।
ग़ज़ल
जिससे प्यार किया था, लगता मुझे वो बेहतरीन था,
कुछ तो गुमाँ था मेरा, कुछ तो वो पक्का यकीन था।
जो भी कहा-सुना था हमने, ख़ुद ही वो भूल गया,
मिलन की रात का वो समाँ कितना रंगीन था।
झूठ भी उसके मुझे सच की तरह लगते रहे,
दिल मेरा उसकी अदा का इस क़दर शौक़ीन था।
सब दिखा था, फिर भी मैंने आँख मूँदी थी, कि बीच
जो हमारे था, वो पर्दा कितना रेशमी, महीन था।
छोड़कर जाना भले ख़ंजर का कोई वार न था,
पर मेरे दिल के लिए वो उससे भी संगीन था।
आज भी दिल पूछता है, क्या वो सच में ऐसा था?
या मेरी ही चाह का हर नक़्श इतना हसीन था?
टूट कर भी इश्क़ में "रतन" रहा फ़ौलाद-दिल,
हर सितम के बाद भी वो और भी मतीन था।
शब्दार्थ
गुमाँ: भ्रम, अनुमान
यकीन: भरोसा
समाँ: माहौल, दृश्य
रंगीन: रंगों से भरा, आनंदमय
अदा: हाव-भाव, अंदाज़
शौक़ीन: चाहने वाला
रेशमी: रेशम जैसा कोमल
महीन: बारीक, पतला
ख़ंजर: कटार
संगीन: गंभीर, भारी
नक़्श: चित्र, छवि
हसीन: सुंदर
सितम: ज़ुल्म
मतीन: दृढ़, मज़बूत

रास्ता बदल-बदल के

भूमिका: मंज़िल अक्सर उतनी बड़ी नहीं होती, जितना बड़ा उसका रास्ता होता है। यह ग़ज़ल उसी रास्ते की है: गिरने, फिसलने, ठोकरें खाने और फिर भी चलते रहने की। जो लोग काँटों के डर से पीछे रह गए, उनसे कोई शिकायत नहीं; और जो मिला, उसमें सबसे क़ीमती वे तजरबे निकले जो सफ़र ने दिए।
मंज़िल तक आ पहुँचा हूँ रास्ता बदल-बदल के,
गिर-गिर कर उठा हूँ कई बार फिसल-फिसल के।
आगे बढ़ता ही रहा हूँ ठोकरें खा-खा के,
लोग पीछे रह गए काँटों के डर से टल के।
कुछ ने रोका, कुछ ने टोका, कुछ ने कहा "सँभल के",
मैं चला अपनी ही धुन में, हर बार मचल के।
धूप ने जलाया मुझको, पर मैं रुका नहीं हूँ,
सोना बना हूँ अक्सर आग में पिघल के।
अँधेरों से क्या डरना, सुबह इन्हीं में पलती है,
सूरज भी तो उगा है रात से निकल के।
मंज़िल पे आके जाना, दौलत तो रास्ता थी,
कितने मिले हैं मुझको तजरबे असल के।
"रतन" की जीत पर हैरान मत हो लोगो,
हर हार के साँचे में निकला है वो ढल के।
शब्दार्थ
मंज़िल: लक्ष्य, गंतव्य
फिसलना: पैर का डगमगाकर गिरना
ठोकर: चलते हुए पैर का किसी चीज़ से टकराना, ज़िंदगी की चोट
टल जाना: रास्ते से हट जाना, पीछे हट जाना
सँभल के: सावधानी से
मचलना: उमंग या ज़िद में आगे बढ़ना
पिघलना: गर्मी से तरल हो जाना
तजरबा: अनुभव
असल: वास्तविक, सच्चा
साँचा: वह ढाँचा जिसमें ढालकर आकार दिया जाए

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!