Saturday, October 17, 2026

ऐ रूपहले चाँद

ऐ रूपहले चाँद

ऐ रूपहले चाँद,
तुझे जुल्कों के बादल ने घेरा है,
यही मेरी तफसील है
कि तू आज तक बदनाम है/

मैंने सिर्फ तेरे होंठों पर, तेरी नजाकत पर
ऊँगली रखी थी,
और इसी बात का तूने बना दिया अफसाना/

ये थी मजबूरी मेरी,
सिर्फ तुझी को चाहता था
किसी और को नहीं,
क्यूँकि दिल में मुहब्बत तेरी थी
तुझी से था मेरा याराना/

बात बढ़ी तो गालों को सहलाया,
होंठों को कई-कई बार चूमा/
और बतौर साहिर
' मेरे गीत तुम्हारे हैं '
गीत और गजल तुझ पर निसार दिया/
लुधियानवी ने और कुछ पाया न पाया,
पर मैं तो तेरा दिया जख्म खा गया/

मुझे ठीक से मालूम नहीं,
मैंने तुझे पाया भी तो किस हाल में,
औरों को सुपुर्द ऐश- ट्रे किया,
मुझे ढंढ़ी कुल्फी तक न खिलाई/

यही तो अफसोस मुकद्दर से है,
साथ न तेरा-मेरा लिखा था,
आखिर छेड़ा तुमने जुदाई का तराना/

बाप तुम्हारा मरा जाता था,
चार दिन की उसे जिंदगी मिली थी,
वो भी उधार माँग कर लाया था/
मैं कुछ समझ न पाया
कैसा बनाया तुमने बहाना/

मैं जानता था उसके दिल में
उसकी विरासत में मेरा हिस्सा जरा भी न था/

बाब- कट में निखरा तेरा,
कार्तिक- पूर्णिमा के चाँद सा चेहरा,
ऐ दिलनशी! किसके सर बँधा सेहरा
वो मंजर मैने देखना न चाहा,
बस चाट खाकर तेरी शादी से लौट आया/

तेरे बाप ने डायरी निकाली,
बराती- घराती की लिस्ट बना डाली
एक लिस्ट मुझे भी दी थी
पर उसमें मेरा नाम शामिल न था,
और मेरे नाम से कार्ड भी न दिया था,
ये वो चाल थी उसकी,
जिससे कभी पाला न मेरा पड़ा था/

तुम्हें बाहों में ले पाने की तमन्ना पुरजोर थी,
इसमें सिर्फ तेरी नीयत का दखल था,
तुझी से करता था प्यार,
बस तुझी पर नजर थी/

सलामत हो घर- द्वार तेरा तुझे,
इबादत तो मेरी आदत हो गई है/
सुब्हो- शाम राधेकृष्ण न कहूँ,
तो वक्त मेरा गुजरता नहीं,
तुमसे बिछड़ कर अब तो
मेरी बिल्कुल फुर्सत हो गई है/

ख्वाब तेरा था, नींद भी तेरी थी,
बड़ी मुश्किल से कटती थी रात,
हमें नहीं आता था,
दिल दे के किसी को,
फिर उसे भुलाना/

व्याकरण तेरा क्या था,
दर्शन था कि अजूबा,
बस फलसफा यही था पुराना,
दिया था तुझे दिल नजराना/
तुम्हारी मम्मी ने मुझे बताया था,
कि तुम अहसान किसी का रखा नहीं करते/
ये बात और है,
हमने कभी तुमसे तगादा नहीं किया/

पैमाना मेरा भर कर जाम मेरे होठों से लगाया तुमने,
हर हाल में तुझे चाहा, तुझे दिल में बसाया हमने/
आ जाओ अब एक बार पास भी मेरे,
न तुम अब दूर जाओ,
मुहब्बत की चाहत से परखा है तुमको,
न तुम मुझको यूँ भूल जाओ/

याद आएगी तेरी हर महफिल में,
दिल ने सदा तुझे ही पुकारा है,
दूर से ही आकर सुन जाओ,
हाले- दिल जो हमारा है/

बरबाद हुए तुम
तो अपनों की चाहत से,
तुझे दिल में बसाया था
तो बस हम्हीं ने/

आ जाओ तो कसम से,
सारा मालिकाना तुम्हारा है,
वरना हो जाएगा हर कोई दूर,
कहीं न कोई तुम्हारा है/

हम तुमसे दूर हो के भी क्या करेंगे,
इसलिए पास तुझे बुलाया है,
नजर- ए- खास से देखा है तुम्हें
और अपना बनाया है/

न दूर अब तुम जाओ
परवाह- ए- मुहब्बत करो,
अपनी महफिल में लौट आओ/
जमाना हमेशा तुम्हारा मुद्दई रहेगा,
पास हमारे तुमको आना ही होगा/

हर कोई तुम्हारा न होगा,
कोई पीछे न चलेगा/
आगे चलने वाले कम होंगे,
कोई पीछे मुड़ के न देखेगा/

शादी तुम्हारे वालदैन ने,
कहीं और कर दी/
हर हाल ' रतन ' तो तुम्हारा है,
आ जाओ और करीब,
चाहत का यही इशारा है

    राजीव रतनेश  

ख्यालों को परवाज करूँ कैसे गजल

ख़यालों को परवाज़ करूँ कैसे,
शक्ल-ए-फ़साना करूँ कैसे।
अफ़साना तो अपना मुख़्तसर-सा है,
हर दर्द का बयान करूँ कैसे।
तेरे नैन-नक़्श का अजब उठान,
ऐसे हुस्न का बयान करूँ कैसे।
तेरी हँसी, तेरी शिकायतें भी,
यादों से उनको जुदा करूँ कैसे।
तेरी शादी में मेरा नाम न था,
उस चोट को लफ़्ज़ों में ढालूँ कैसे।
तेरी महफ़िल से चाट खाकर लौटा,
उस मंज़र को दिल से मिटाऊँ कैसे।
ज़माने के सामने हँसता रहा,
दिल का अफ़साना अयाँ करूँ कैसे।
रतन, जो गुज़री वही तो ग़ज़ल है,
उसमें तेरा नाम छुपाऊँ कैसे।

Friday, October 9, 2026

करूँ भी कैसे गजल

करूँ भी कैसे
---- राजीव रत्नेश

तुमसे दूर रहकर जीने की तमन्ना करूँ भी कैसे,
तेरे बिन रंज-ओ-गम का सामना करूँ भी कैसे/

अनजाना तेरा दर्द जबीं पर छलक आया है,
जो जख्म तुमने दिया, उसका अफसाना करूँ भी कैसे/

तेरी खोज में सुनसान सड़क पे निकल आया हूँ,
इस बेनिशाँ सफर को अब वीराना करूँ भी कैसे/

तेरी मुहब्बत को दिमाग का खलल समझूँ भी तो कैसे,
तू जान- ए- महफिल है, तुझे बेगाना करूँ भी कैसे/

हर घड़ी मुसलसल तेरी याद में ही गुजरती है,
तेरे इंतजार का अब बहाना करूँ भी तो कैसे/

तेरे रूप-रंग के मिजाज से ही आहत हूँ जरा सोचो,
अपने शेरों में जिक्र- ए- सनमखाना करूँ भी कैसे/

तेरी किस्मत मेरे मुकद्दर से जो आ मिली,
मुहब्बत को आजमाने का रास्ता करूँ भी कैसे/

खलाओं में भटकती रहेगी आखिर कब तलक,
सजा कर तुझे पेश- ए- जमाना करूँ भी कैसे/

तेरे बिना तो मैं किसी काम का भी नहीं, सोचो तो,
पेश किसी को अपना जिंदगीनामा करूँ भी कैसे/

अलकावली सुरभित जंगल में जैसे मधुमास- मंजरी,
चकित चितवत चकोरी को पेश आसमाँ करूँ भी कैसे/

बहता निर्झर, झील में पुष्पित नील- कमल,
कमल-दल पर सोती शबनम का अफसाना करूँ भी कैसे/

रतन, तेरे ही दर पे रख दिया है दिल भी अपना मैंने,
अब और किसी को अपना सहारा करूँ भी कैसे/

                   राजीव रत्नेश
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Wednesday, October 7, 2026

उम्र हमारी भी हुई गजल

उम्र हमारी भी हुई
  ---- राजीव रत्नेश

उम्र हमारी भी हुई, तुम्हारी भी हुई,
हम एट्टीन के हुए, तुम स्वीट- सिक्सटीन ही हुई/

बात ये कि महफिल को तुमने प्ले- ग्राउंड समझा,
मारा छक्का और खुद हेड- विकेट भी हुई/

हम दिलीप कुमार न हुए, तुम मुमताज हो गई,
बिना बात के हम हीरो, तुम हीरोइन हो गई/
चूक हमसे हुई या तुमसे हुई, नामालूम,
किस बात पर खफा हुई, क्या बात हो गई/

दो दिन भी न निभाया गया तुमसे मेरा साथ,
आज वक्त ने भी तुमसे वफा का तकाजा किया/
हम पूछ कर भी तुमसे, क्या बिगाड़ लेते तुम्हारा,
तीर- ए- नजर से तुमने हमें ही निशाना किया/

शमशीर आखिर तुम्हारी नाकाम हुई,
तुफंग हमारी भी जंग में सुपुर्द- ए- खाक हुई/
मिला क्या tumhe ये खेल करके आखिर,
किस तरह जिंदगी हमारी- तुम्हारी बर्बाद हुई/

बर्बादी- ए- मुहब्बत का ये भी नजारा हुआ,
न हम तुम्हारे हुए, न तुम हमारी हुई/
दास्ताँ तल्ख तो थी, मगर इतनी भी तवील न थी,
कि महफिल में हमारी ही रुसवाई हुई/

महदूद है मुहब्बत, शिकवा भी किससे करें,
वैसे मुहब्बत में जायज शिकवा भी गिला भी/
फिर क्यों लौट-लौट आती है नजर तेरी खिड़की से,
हम गर मिट गए होते, तो होती क्या तुम्हें सजा भी/

अब ' रतन ' किससे कहें अपने दिल का हाल यहाँ,
जिसे अपना समझा, वही हमसे जुदा हुई/
हँसते हुए जो शुरू हुई थी ये कहानी,
देखते-देखते जाने कब दर्द की दास्ताँ हुई/

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तेरा ही था जमाना गजल

तेरा ही था जमाना
---- राजीव रत्नेश

सुन तो रहा था गौर से जमाना हमारी दास्ताँ,
हमको ही नींद आ गई सुनाते हुए अफसाना/

दिल फरेब था मौसम, तेरी याद का मंजर,
तुम्हें ही सुनाना, तुम्हीं से कभी झुठलाना/

एक बार फिर तूफान उठा कहीं समंदर में,
अहले- दिल ने चाहा, समंदर को कह दें टा-टा/

कुछ न सोचेंगे तुम्हारे सिवा किसी के बारे में,
तुम्हें सदा देते-देते ही चाहेंगे तुमसे बिछड़ना/

उछलती लहरों ने ही तो शोर मचाया समंदर में,
हमने जमाने से बगावत न कर, चाहा तुझे सँभालना/

जानना भी नहीं चाहते थे, अफसाने की हकीकत,
हमको सुनाने से पहले करते जमाने से शिकवा/

खुद दूर हुए महफिल से, कैसे तुझे हम समझाते,
पत्थर तराश कर हमने यकीनन तुम- सा बनाया/

तुम्हें देखा तो मुझे अपनी शिकस्त का ख्याल आया,
मेरे लग कर ही तुम्हें था हर हाल मुझे आजमाना/

मातम था या खुशी की शहनाई का आलम था,
शरमाता था चाँद तुझसे, तेरा ही था जमाना/

' रतन ' को नहीं चाहिए तेरी मुफ्त में मुहब्बत,
आकर गले न मिले और दिल में रखा शिकवा/
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Tuesday, October 6, 2026

तुम्हीं मेरी वकालत हो---- नज्म

तुम्हीं मेरी वकालत हो
--- राजीव रत्नेश

दीवाने को तब्दीली- ए- राख की हाजत नहीं,
तुम्ही मेरी वकील हो,
तुम्हीं मेरी वकालत हो/

तेरे दर पे आया हूँ,
तो कुछ सोच कर ही आया हूँ,
कल से निकला हूँ,
मगर आज भी
तेरा नजारा पूरा नहीं हुआ/

कहीं चाहत में अपनी,
कोई कमी तो नहीं रह गई मुझसे?
तुम पास आकर भी
न जाने कहाँ चली जाती हो---
एक अनबूझ पहेली की तरह
मेरे सामने रहती हो/

नखरे दिल को दिखाती हो,
मगर पास आती नहीं,
मन में जाने कैसी खिचड़ी पकती हो,
होली का त्यौहार भी
अक्सर भूल जाती हो/
और फिर अपनी ही मनमानी करके,
मुझे महबूब समझ कर
इठलाती हो,
नखरे दिखाती हो/

तुम्हें शाम के धुँधलके में,
किसी झुरमुट के पीछे,
जब देख लेता हूँ,
मैं जहाँ कहीं भी रहूँ,
सब छोड़ कर
तुम्हारे पास आ जाता हूँ/

तुम समझाती हो,
फिर दूर न जाने की कसमें खाती हो/
मुझको पलकों पर बिठाने की बात करती हो,
और फिर----
अपनी ही बात से
खुद मुकर जाती हो/

बहाने बनाती हो,
उन बहानों में खुद उलझ जाती हो,
और मैं,
दिल को दिलासा देकर,
स्वयं को बहलाता हूँ/

शरत्- पूर्णिमा की चाँद हो तुम मेरी,
अधखिली रात हो तुम,
अभी भी आ जाओ पास मेरे-----
जिंदगी की
वक्त- ए- शाम हो तुम/

कब तक तुम्हें पुकारूँ?
कब तक आवाज दूँ तुम्हे?
मेरे बेबुनियाद फसानों की
जागती रात हो तुम,
नजरों से नजाकत दिखाती हो,
अदाओं की गुलफाम हो तुम/

मनमर्जी तुम्हारी
आखिर कब तक चलेगी?
मेरी बज्म- ए- गजल की
मधुमास हो तुम/

अब भी करीब आ जाओ,
इठलाती, मदमाती----
बरसात हो तुम/

' रतन ' को तुम्हीं से मतलब है,
तुम्ही उसकी आवाज हो/
आ जाओ मुकाबिल महफिल के,
मेरी जान हो तुम/
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कभी न कभी फिर पुराना याराना तो होगा --- गजल

कभी न कभी मुलाकात तो होगी
------ राजीव रत्नेश

सुन कर मेरा हाल वो सिसकता तो होगा,
मिलने को मुझसे वो तड़पता तो होगा/

मेरी याद जब- जब उसको आती होगी,
मेरे बारे में कम से कम सोचता तो होगा/

मेरी यादों को थपक कर सुलाने वाला,
मेरे बिन भी वो कहीं सोता तो होगा/

जिसने मुझको दर्द- ए- दिल दिया था,
खुद भी उस दर्द से गुजरा तो होगा/

महफिल में सबके साथ हँसता तो होगा
घर लौट कर पर बिखरता तो होगा/

मेरी तहरीरें पढ़कर कसक यकायक उठती होगी,
दिल उसका जोर-जोर धड़कता तो होगा/

मुसाफिर हूँ तेरी राह- ए- मंजिल का ऐ नामबर,
जहाँ तू चाहे हमारा गुजर-बसर तो होगा/

मुठ्ठी में फागुन, आँखों में बरसात होगी,
तेरा-मेरा दाना- पानी कहीं साथ तो होगा/

रतन, दिल में उसकी याद बसी है अभी भी,
कभी न कभी उससे फिर पुराना याराना तो होगा/

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!