Sunday, February 8, 2026

अपना कोई नहीं ( कविता)

कभी- कभी ऐसा लगता है,
इतनी बड़ी दुनिया में,
अपना कोई नहीं/
बेकार ढूढ़ता हूँ मैं,
गैरों में भी,
अपने पन का,
कोई अहसास/
और इसी में,
बसर कर देता हूँ,
चंद अपने कीमती लमहात/
और तब भी पाता हूँ,
कहीं गैरियत की बू,
तो बड़ी उमस सी लगती है/
कभी- कभी ऐसा लगता है,
इतनी बड़ी दुनिया में,
अपना कोई नहीं/

         राजीव रत्नेश
        ++++++++++

Saturday, February 7, 2026

तुम्हारे हाथ में पत्थर है( कविता)

तुम्हारे हाथ में पत्थर है( कविता)
***************************

आ भी जाओ महफिल में,
         दो तर्जुबानी का वास्ता,
बजाहिर है सागर में रंगीन पानी,
          दिखाओ मेहरबानी का रास्ता/

बादल फिर भी गरजेंगे,
          तूफान तेरे पहलू में लरजेंगे,
भूल जाओ कही सुनी बातें,
           छोड़ दो नातवानी का रास्ता/

जिस गली में तुम रहते हो,
            उसमें हमारा आना-जाना नहीं,
जहाँ फरिश्ते वजू करते हों, 
             वही है हमारी किस्मत का रास्ता/

हजारों आबशार गेसू में छिपाए,
              तेरी जुल्फें झटकने की अदा
हम न समझे हैं अभी तक भी,
               न जमाना तुम्हारी ये अदा/

फना हो जाएँगे हम, सितारों में कहीं,
                तुझको खबर होने से कहीं पहले,
आओ दर पे हमारे, पल्लू सर पे डाल के,
                 इसके पहले कि हम हो जाएँ खुदा/

आजा चलें  मस्जिद साथ- साथ,
                   हो जाएगी तेरी-मेरी नमाज अदा,
उड़ेंगी जुल्फें तेरी होकर बेखबर,
                    हो जाएगा दो- जहां का हक अदा/

मजबूरियाँ मोहब्बत की क्या,
                      लगता हमको इतनी सी बात भी नहीं पता,
खुद फर्मान तू है, तेरे आगे भला,
                       और किसी का हो क्या सकता है हौसला?

तुम्हारे हाथ में पत्थर है,
                        पर हाथ मेरे तो खाली हैं,
जंग गर जबानी हो" रतन",
                         तो बाज आओ , हक में तुम्हारे अच्छा//

                 """""""""""""""""""
बहाव पे दरिया है तो क्या,
                कश्ती बँधी तट से डगमगाती है,
तूफानों का खौफ नहीं मुझे,
                 बंधन से हस्ती मेरी कसमसाती है//

                 राजीव" रत्नेश"
              '"""""""""""""""""""""""

नहीं लगता अच्छा---!!! ( कविता)

नहीं लगता अच्छा---!!! ( कविता)


यार मेरा मासूम सा है, अभी तलक,
           खिली-खिली सी है, जवानी की कली अभी/
मस्त निगाही है, चंचल अदाएँ हैं,
            अधखिली जैसे हो जूही कहीं/

प्यार उससे करता हूँ खुल कर,
              दिल के हर गोशे में महसूस उसे करता हूँ,
खामोशी उसकी मुझको खलती है,
              पर लबों की उसकी फुसफुसाहट मुझे पसंद नहीं/

जरा सा छेड़ने पर गुले- गुलगूँ,
               जानता हूँ, गुलजार मेरा आशियां हो जाएगा,
सदाबहार है मौसम मस्तरानी का,
               बिखरा है सारे आलम में जल्वा- ए- खुदाई/

बदला-बदला है मौसम, बदली फिजां है,
                 उसके ढंग में रंगे गुलाबो- चमन,
अभी तक न समझ पाए हैं इशारा उसका,
                  क्या है नरगिसी आँखों की जुबानी?

हम न खुद सीखे हैं, न किसी को सिखा पाए,
                   आज तक वफा का रहन- सहन, चलन,
बोलने से पहले खिलखिलाती है,
                    चटकती है तेरे चमन की हर एक कली/

उसको कहो, दर्देदिल दे के जो जाए,
                      तो एक दिन जिंदगी में दरमां बन आए,
रुपहला बादल है, मंजर है शाम का,
                       बरसे तो भींग जाए बस्ती की हर गली/

हन फिर-फिर उसके रुखे- रौशन को निहारेंगे,
                        भले करे न वो मुझको मंजूरे- नजर,
उसकी चलती फिरती तस्वीरों से भरे रहते हैं,
                         उसके इश्तहारों से ज्यादातर कार्यक्रम- ए- टी. वी/

याद न दिलाएँगे उसको हम,
                            उसके पुरखों की पुरानी खायत,
न बाँधेंगे उसको अपने पल्लू से,
                             भले हो वो अपने खानदान में इकलौती/

हम समझा लेंगे अपने दिले- मुज्तर को,
                             कम से कम तब तक के लिए ही,
औकात है कुछ मेरी भी मजलिसे- हकीकत में,
                              जब तक वो छोड़ न जाए मेरी गली/

बोसीदा कदमों की आहट पसंद नही रतन
                                आए जब तक न वो पायल झनकाती ही,
किसी की मजबूरियों का ख्याल मुझे ज्यादा,
                                 नहीं लगता अच्छा तड़पना बुलबुल का कैद                                                                                  में ही//

                     राजीव रत्नेश
                ****************

तुझे समंदर से निकला गौहर मानेंगे---- कविता

             तुझे समंदर से निकला गौहर मानेंगे---- कविता
             **************************************

तेरी औत्सुक्य पूर्ण निगाहें उठती हैं मेरी तरफ,
तेरे आकर्षण से मुग्धित देखता मैं तेरी तरफ/

कितने झंझावातों का उत्फुल्ल उफान है तेरी खदान,
ज्यादा कुछ मालूम नहीं मुझे, तू ही मेरी क्यारी की शान/

बरबस निगाही का एक न्हराव तेरा- मेरा चेहरा,
चंचल शोख अदाओं से बार बार मुझे निहारना तेरा/

हम अदाओं से घायल हो जाते हैं बारम्बार,
तू ही मेरी चमने- जिन्दगी की है मस्त बहार/

दूर तक नजर जाती है, नहीं मिलता समंदर का ओर छोर,
कश्ती है जर्जर, टूट चुके हैं पतवार, नहीं कोई साहिल की आस/

कोई जजीरा ही मिले, दम भर को जहाँ ठहर पाऊँ,
मिले तेरा साथ तो फिर मैं इधर से उधर जाऊँ/

अनजान तू नहीं मेरे गर्दिशे- हालात से, आ जा अब देर न कर,
सँवर जाएगी दुनिया मेरी, और तू अब टालमटोल न कर/

जाड़े की थोड़ी रिमझिम भी अरमानेदिल को कुचलती है,
सितम तेरा गाहे बगाहे का, देख अब तू और हैरान न कर/

मजबूरियों में तुझे पुकारा था, अब कैसा खैर- ओ- शिकवा,
आजा रात में दीप जला, नीले अंबर के तले/

तेरी फुसफुसाहट सुन कर ही, दिलोजान से तुझे पुकारेंगे,
आजा सबेरे वाली गाड़ी से, लेने तुझे हम आएँगे/

न जान महफिल की शोखियों के बारे में ज्यादा न पूछ,
हम हो जाएँगे  मुब्तिला तेरे इश्क में, अला बला न पूछ/

किस ठहराव पे आके ठहर गई जिन्दगी मेरी आखिर,
हैरान हूँ जान कर मुहब्बत की मजबूरी तेरी/

 ऐ मेरी नादान वफा तू जो गर मेरी न हो सकेगी,
किससे रखूँ साबका, कौन है, जो मेरी हो के रहेगी/

नासमझ एक बार तो दिखा खुद जौहर अपने भी,
हम तो हरी झंडी दिखाएँगे, सिग्नल मिल जाने पर ही/

न समझ कुछ तो बस इतना ही समझ जा मेरी जानेमन!
हम मिलेंगे ख्वाबों में ही, आधी रात गुजर जाने पर ही/

अलमस्त बहार तू, अलमस्त तेरी भरपूर जवानी भी,
नजर आएगा चटकता शगूफा भरी महफिल में ही/

न और सितम ढ़ा, बुला ले मुझको अपनी हवेली पर ही,
सही समझो तो आन मिलो चौराहे वाली गली पर ही/

हम जानते हैं, न मिलने पर खतरनाक तेरा इरादा हो जाएगा,
हम खींच लाएँगे बाहर तुझे, बढ़ते हुए दावानल से भी/

इन नजरों को तो गुस्ताखियों का अपना सिला दे दे,
हम तुम मिल न पाएँ तो, कहीं पौध मुहब्बत का लगा दें/

तेरी कमजोरियों को भी अपना बदला हुआ हुनर मानेंगे,
तू समझे न समझे, तुझे हम समंदर से निकला गौहर मानेंगे//

                    राजीव" ख्नेश"
               """"""""""""""""""""""""'""

लोगों की नसीहत भी( कविता)

लोगों की नसीहत भी( कविता)

तेरे फिराक में क्या- क्या न ख्वाब बुने मैंने,
तुझे अपनी पलकों पे बिठा के अरमान चुने मैंने,
अपने रूबरू तुझे बिठाके क्या- क्या न शेर कहे मैंने,
लोगों की नसीहत भी और खबरदारी के जुमले सहे मैंने

तू बेखबर नथी तेरे-मेरे दरम्यान उठती अफवाहों से,
हैफ! अफवाह, अफवाह ही रहे होते जमाने में,
तुझसे मिल कर तमन्ना को और पायमाल किया मैंने,
दमघोंटू माहौल में जीना भी, तुझी से सीख लिया मैंने,
अब कहीं जाके इस बेदर्द दिल को अता किया करार तुमने,
लोगों की नसीहत भी और खबरदारी के जुमले सहे मैंने/

झील में पाँव लटकाए बैठे थे, गगन में मुस्कराता चाँद,
हम तुम एक दूसरे से मुब्तिला थे, क्या नहीं मुझे याद
बाहों के बंधन में संभाल रखी थी, अपनी अमानत तुमने,
सुनहले पलों को क्या तुम भी करती हो मेरे साथ याद,
मुहब्बत की राहों में बेतरह लोगों के नखरे सहे हमने,
लोगों की नसीहत भी और खबरदारी के जुमले सहे मैंने/

मेरी जिन्दादिली के आगे, दुनिया की दीवार भला क्या थी,
हम तुमको जानते थे, मेरे लिए चीज आखिर तुम क्या थी,
मुहल्ले के मनचलों की फबती का सामां आखिर तू थी,
हम तुझे खुली हवा में सांस लेने को, साथ ले के चले आए,
तेरे लिए कितने सपने सजे, पलकों पे मेरे अपने,
लोगों की नसीहत भी और खबरदारी के जुमले सहे मैंने/

अब दम साध के चैनो- सुकूं से बैठो, ज़माने को मुझ पर छोड़ो,
कितनों के सपनों को चुराकर तुझे हम लेकर साथ आए हैं,
समझ सको तो समझ जाओ, तेरे फिराक की रातों से,
कितने सितारे हम तोड़ कर, तेरे आँचल के लिए भर लाए हैं,
दरिया- ए- मुहब्बत के बीच, कितने गोते खाए मैंने,
लोगों की नसीहत भी और खबरदारी के जुमले सहे मैंने/

नजदीकियाँ ज्यादातर मुहब्बत में अजाब बन जाती हैं,
मासूमियत मुहब्बत की नासमझ लोगों की शिकार बन जाती है,
हम तुम एक ही राह के दो अनजान राही हैं दरअस्ल,
कश्ती जर्जर हो तो फिर याद किसी की पतवार बन जाती है,
गुर जो भी मुहब्बत के हों, तेरे सीखे- सिखाए सीखे मैंने,
लोगों की नसीहत भी और खबरदारी के जुमले सहे मैंने/

परचमे- इश्क लहराते हुए, मुहब्बत की गलियों में निकला हूँ,
फुलवारी में भी खुशियों के साथ हकीकतन घुला-मिला हूँ,
जमघट में, वीराने में भी बस इक तेरी याद का ही सहारा है,
फसाने दिल के भुलाने को, जाने कहाँ- कहाँ से गुजरा हूँ,
मुहब्बत के फलसफे के कितने अंजाम भुगते हैं मैंने,
लोगों की नसीहत और खबरदारी के जुमले सहे मैंने/

किश्तों में मर-मर के जिया है, किसी तरह मुहब्बत को मैंने,
सहा है जिन्दगी में कितने सितमगरों की आमद को मैंने,
नजरअंदाज न कर मुहब्बत के फसाने को, तेरी बलाएँ लेंगे,
तेरी-मेरी नजदीकियों में भी, दूरियों के अहसास दिखाए तुमने,
इक तेरी मुहब्बत पाने के लिए, कितने झमेले सहे मैंने,
लोगों की नसीहत भी और खबरदारी के जुमले सहे मैंने//

                       राजीव" रत्नेश"
                 """"""""""""""""""""""""""""""

क्यूँ तू मुझसे निस्बत रखती है? ( कविता)

क्यूँ तू मुझसे निस्बत रखती है?  ( कविता)
+++++++++++++++++++++++++

क्या तू मुझसे झूठी मुहब्बत करती है?
या ख्वामखाह मेरी सोहबत चाहती है,
नहीं जानता बारीकियाँ इश्क की,
न जाने क्यूँ तू मुझसे निस्बत रखती है/

मुहब्बत जोर मारेगी, तू खिचीं आएगी,
मजलिस में तेरे रुख्सारों की सुर्खी सताएगी,
अन्जान इतनी न बन, यदि मुक्कदस कहानी तेरी,
नजरों में तेरे सुर्ख डोरे की लाली शरमाएगी/
कुछ तो बात है, जो मुझसे मतलब रखती है,
क्या तू मुझसे झूठी मुहब्बत करती है/

खड़की से सुब्हे- रौशन की रश्मि तुझे जगाती है,
इक अँगड़ाई के साथ बदल करवट तू फिर सो जाती है/
देवी- जागरण से बदन क्या तेरा टूट रहा होता है,
या फिर खुद तू मधुर सपनों में खो जाती है/
कैसे कहूँ तू मस्त बहार! मेरी खिदमत करती है,
क्या तू मुझसे झूठी मुहब्बत करती है/

नवजवान दिलों में धड़कन बन के रहती हो,
कभी- कभी मेरी नजरों में नजरबंद हो के रहता हो/
जाने क्या सूझी तुझे, इस बाली उमर में,
दिल में मेरे सजा-ए- उम्रकैद गुजारना चाहती हो/
तू सिर्फ अपना इजाफा- ए- अज्मत चाहती है,
यही बात है क्या, जो तू मुझसे निस्बत रखती है/

दिलजलों की बातों पर ध्यान दिया न करो,
लुटते हों अरमान, तुम ख्याल किया न करो/
अभी ही तो हमने भी तुझे जाना- परखा है,
इक ही नजर में ढेरों सवाल किया न करो/
खुद नहीं जानती, और मुझे नसीहत करती है,
या ख्वामखाह मेरी सोहबत चाहती है/

जमाने से टक्कर इक दिन तेरी-मेरी होगी ही,
इसके पहले जमाना दीवार बने, हो जा मेरी ही/
दिल से तुझे सदा देता, हसरते- दिल पूरी कर दे,
तुम हुनरमंद हो, दुनिया तो कमबख्त है ही/
पेश तू मुझे अपने रहमो-करम करती है,
न जाने क्यूँ तू मुझसे निस्बत रखती है/

इक बार बढ़ गए कदम, लौटना गँवारा न हुआ,
भले हट गए वो, हटने का मेरा इरादा न हुआ/
किसी ने समझी ही नहीं, इश्क की अज्मत वरना,
हम भी क्या करते, कोई सहारा अपना न हुआ/
तुम भी कुछ ऐसा करने की हिकमत चाहती हो,
क्या तू मुझसे झूठी मुहब्बत करती है/

मेरी तरफ से हरकत ऐसी मुझसे न बन पड़ेगी,
भले इक बार जमाने से, मुझसे ठन पड़ेगी,
हम मुब्तिला- ए- इश्क होकर, तुझी से अमान माँगेंगे,
हर साल की दीवाली की तरह रौशनियाँ जल उठेंगी/
क्या है मेरी अखि्तयारे- किस्मत, समझती है,
या ख्वामखाह मेरी सोहबत चाहती है//
              ----------

कल मेरी जान आएगी, साथ में सपनों की बारात लाएगी,
सुब्ह आए चाहे शाम आए, याद मुझे आज सारी रात
आएगी/
उसको पा कर दिल उमगता है मेरा प्यार की शिद्दत
से,
वो आएगी तो मेरे लिए, आँखों के प्यालों में शराब
लाएगी//
              *************

ऐ मुहब्बत तू मेरी जानी-पहचानी है,
इक तिरी तस्वीर ही मेरे पास निशानी है/
तेरी नथ की नग, सितारों सी झिलमिलाती है,
कभी हिलती है, कभी करामात दिखाती है//
           ****************

दिल के सहरा पे, हुई थी इनायते- सावन कभी,
ऐ जाने- बहारां! आई थी खुद तू मेरे पास कभी/
दिलजलों की भी नजर थी तेरे हुस्नो- शबाब पे,
तेरी रजामंदी सुनने को तरसते थे मेरे कान कभी//

                  राजीव रत्नेश
          मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
          +++++++++++++

शायद तुम कल आओ ( नज्म)

शायद तुम कल आओ  ( नज्म)
+++++++++++++++++++

रोज सबेरा,
आशा का इक नया सूरज,
उगा जाता है/
कि कल तुम नहीं आईं,
आज जरूर आओगी,
दिल को दिलासा दे जाता है/

मैं जानता हूँ,
यह सूरज भी डूब जाएगा,
पर मेरा इंतजार खत्म नहीं होगा/
कल फिर नये सूरज,
के इंतजार में,
झील किनारे बैठा रहूँगा/

कंकरियाँ फेंकता रहूंगा,
बैठा हुआ झील के किनारे,
गहरे पानी में तुम्हारा अक्स,
उभरेगा इसी झील में,
तुम पीछे से आकर,
हाथों से अपने,
मेरी आँखें मूँद लोगी/

और मेरे गले में,
बाहें डाल कर कहोगी,
' कबसे बैठे हो?
चलो घर चलो'
पर सूरज तो कब का,
ढल चुका,
पर तुम न आए/

आने वाला हर,
कल का सबेरा,
कराएगा तुम्हारा इंतजार/
जिस तरह बिछड़ी हो,
' शायद तुम कल आओ'
        ---------

About Me

My photo
ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!