Monday, March 2, 2026

उनकी फसल पे क्या तुम्हारी?

उनकी फसल पे क्या तुम्हारी?
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इश्क करने की गालिबन मनाही भी नहीं है/
इश्क तजरबाते- जिन्दगानी भी नहीं है/

कल परसों की नहीं आज की बात कहता हूँ,
इश्क का ये फलसफा, ये कहानी पुरानी भी नहीं है/

हम और वो चले थे साथ- साथ, हाथों में हाथ लेकर,
उनके चुंबन के सिवा आज कोई निशानी भी नहीं है/

हम तुम्हें क्या बताएँ, किस मोड़ से तुम मुड़ जाओगे,
अभी तो हो हमकदम, ये किसी की मेहरबानी भी नहीं है/

एक से बढ़ कर फिलास्फर मिले मुझे वफा की राह में,
इश्क समंदर नहीं, इसमें समंदर की मेजबानी भी नहीं है/

गुजर जाती है जिंदगी यूँ ही, रोजमर्रा के खेलों में 
उलझ कर,
जो तुम मुझे मिल जाओ, इस खेल में आसानी भी नहीं है/

मेरी गजलों की फेहरिस्त इतनी लंबी, तुम सरापा समा
जाओ,
कल की दुनिया की उसमें कोई बदगुमानी भी नहीं है/

इधर मेरे करीब आ जाओ, ओ कजरारे नयनों वाली,
तेरी नथ झूलती है हवाओं से, किसी की कारस्तानी भी नहीं है/

पहले तुझे सौम्य गुले- गुलाब जानता था अब शोख
चटकीली अदा काबिज है,
किसी की इसमें, किसी तरह की जररानवाजी भी
नहीं है/

इस मौसम में भी जो नहाए नहीं, रगड़ दिए बस गाल,
क्या आज की फुहारे- घटा कुछ खास मस्तानी भी नहीं है/

मुहब्बतों के इस आज के दौर में, तुझसे लिपट रो तो हम लेंगे,
फिर ये न कहना आजकल की मुहब्बत में रुलाई भी
नहीं है/

आवाजें देता रहा हूँ सदा से तुम्हें, तुम्हें कद्र ही कहाँ
करना आया,
लहरों के शोर में कुछ कही- सुनी और कुछ अनसुनी
भी नहीं है/

दिल की कहता हूँ, दिले- आश्नां भी तुम्हीं, आईना भी
तुम्हीं हो,
दिल के नगमों के नगीनों में, वो चमक, वो ताबानी भी
नहीं है/

मशहूर हो तुम जमाने में, मेरी वसीयत की राजकुमारी
तुम्हीं हो,
प्यार के रंगों की बहार हो तुम, कहीं खिली रातरानी
भी नहीं है/

सजदा करता हूँ मस्जिदों में, घंटे-घड़ियाल बजाता
मंदिरों में,
नहीं सुनता कोई खुदा, मुझ पर किसी की मेहरबानी
भी नहीं है/

हम कहते हैं, मुहब्बत की राह इतनी आसां नहीं ऐ
मुसाफिरों!
रात- दो रात रुकने से क्या होता है, इसमें किसी खास
की तीमारदारी भी नहीं है/

हासिल क्या हुआ, उनकी नाजों भरी महफिल में तुम्हें
भी' रतन',
उनकी फसल पे क्या तुम्हारी कोई जमींदारी भी नहीं
है/
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जी चाहता है रोज तुझसे बातें होती रहें
रोज-रोज, तेरी-मेरी मुलाकातें होती रहें
झीना काला दुपट्टा, तेरे बदन पे सजता रहे
गोरी कलाइयों से कंगन की आवाजें आती रहें
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तेरे चेहरे पे मुस्कराहट पाने को दिल तरसता है
तेरी आँखों की बरसती शोखी को दिल तरसता है
पाजेब तेरी छनकती है, हलचल दिल में होती है
तू भी समझ जा, तेरा प्यार पाने को दिल तड़पता है
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नजर झुका के तुम जाने क्यूँ मुझसे बात करती हो
बातों ही बातों में तुम प्यार प्यार का इजहार करती हो
कितनी भोली और मासूम, बड़ी कमसिन हो तुम
सबेरे सूर्यरश्मि तेरे माथे पे छितरा कर तेरा इस्तकबाल
करती है//

               राजीव रत्नेश
           मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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मैंने तेरे प्यार में

मैंने तेरे प्यार में  ( कविता)
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तुमने प्यार पा के क्या पाया, क्या गँवाया?
मैंने तेरे प्यार में सब कुछ दाँव पे लगाया/

चला था सुबह का, रात में तेरे दर पे पहुँचा,
रग-रग में व्याप्त तेरी चेतना ने उठाया/

अंधे- मोड़ के एक्सीडेंट की तरह आ चिपकी थी,
जाने किस अन्जाने ने मुझे अस्पताल पहुँचाया/

तेरी नरगिसी आँखों का झपकाव ही काफी था,
होश में होते हुए भरम तेरी मस्त निगाही का रक्खा/

अन्जाने राहों का राही, आ पहुँचा तेरी बज्म में,
थका-हारा था कब का, तेरी यादों ने कहीं का न रक्खा

बरबस तो कुछ न था, मासूमियत मेरी ही रंग लाई,
तूने अपने साथ अपने बिस्तर पर जो मुझे सुलाया/

बढ़ी उत्तेजना रग-रग में, यूँ ही संचरित होती रही,
मैं तेरे आलिंगन में आया, या बाहों में तूने बाँध लिया/

फुंसू नजारा- ए- हुस्न का कुछ यूँ सर चढ़ कर बोला,
मैं तुझे मना न कर सका, हौले से बस तुझे चूमा/

अलगाव तेरी मस्तानी आँखों से और सह नहीं सकता,
या तो तू मेरी महफिल में आकर मेरे दिल को बहला/

सागरो- मीना से मतलब न रखा, लबे- साकी से निस्बत नहीं,
मैं तेरी राह का दरवेश, कुछ नहीं पास मेरे सिवा दुआ/

किस मोड़ से मोड़ मुड़ कर, तू मेरी राह में आई थी,
मैंने तुझे पहचाना तब ही, जब तूने अपना दुखड़ा 
सुनाया/

कुछ लोगों ने तेरी गलियों का हातिम- ताई समझा मुझे
तेरे शहर के लोगों ने जाने क्या समझ मुझे पत्थर मारा

बदला-बदला सा है ये मौसम, रहनुमाई काम न आई,
सौगाते- सुखन लेकर पहुँचा हूँ, सुनाने को तेरा फसाना

तीरे-नजर की शुआओं से मैं झुलस सा गया हूँ,
लबों से पिला दे साकी, न ले हाथों में जामो- मीना/

सपनों का सौदागर हूँ, मैं बस सपने बेचता हूँ,
तेरी उनींदी आँखों के लिए इक ख्वाब दिखाया/

आज भी महफिल अगर आके तू मेरी आबाद कर दे,
मैं तेरे दर पे लाऊँगा उठा के मयखाने का मयखाना/

बस्ती- बस्ती, जंगल-जंगल, फिरता हूँ तेरी सदा के सहारे,
करता रहा तेरा इंतजार तुफैल कन्दरा- ए- सहरा के सिवा/

शब रूठी, सुबह रुठी, नींदों का सहारा भी झूठा निकला,
हम तुझे क्या बताएँ साकी!, झूठा तेरी नजरों का निशाना निकला/

शबे- मुज्तर में सिर्फ मैंने तेरे आँचल का सायबां चाहा,
इक तुझे ही मैंने सिर्फ जाने- बहारा! खुदा से माँगा/

आज भी जो गर न आएगी, रूठ कर भी क्या करेगा
' रतन',
हालते- पुरशिस में भी बस तेरी नजरों का सहारा चाहा/

                  राजीव रत्नेश
       ट्विन टावर, ग्रेटर नोयडा
                 यू० पी०
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छलकती मय पर मेरा भी हक है

छलकती मय पर मेरा भी हक है  ( कविता)
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मैंने की है मुहब्बत तुमसे, नजरे- इकरार का मुस्तहक हूँ,
तेरी आँखों की छलकती मय पर, आखिर मेरा भी हक है/

वक्ते- माजी का सिलसिला, जेहन पर उभर आता है,
हम तुम्हें बताएँ क्या, क्या समझ में मेरे आता है,
पुरुषोत्तम की दुकान पे रोज जाती मुहल्ले की मौसी,
सुबह देशी घी की कचौड़ी, और लब पे पुरुषोत्तम का पान है

सुबह से शाम तक हमारे कई- कई दौरे- शराब हो गए,
हमारी तो बस तेरे जामे- लब पे ही बस टिकी नजर है/

हम तुझे नजरे- खास पर गुलाब सा सदा रखते हैं,
आजारे- जीस्त है मगर हम मखमली लिहाफ समझते हैं/
मेरी सरफरोशी का गवाह इक तुम्हीं बन जाना,
तेरी महफिल का मिजाज कुछ- कुछ हम समझते हैं/

फुर्कत में बस तेरी याद है, दिल में घुटी - घुटी सी आह है
तेरी चाहत का दीवाना हर बसर, दुआ देने को बेताब हर दरवेश है/

तेरी दर का मैं एक खाकसार, बस तेरा मुलाजिम ही सही,
उनींदी आँखों में, जानता हूँ, है सिर्फ तेरा सपना ही सही,
हर कोई तुम्हारा है, नजरें उठा कर देखो तो इक बार सही,
कुदरत का भूल जाओ करिश्मा, आईने में खुद को देखो तो सही/

सब तुझे हुस्न की मलिका ही जानें और समझे हैं,
इक हमारी ही तेरी अदा- ओ- नजाकत पे नजर है/

जिस जगह अमृत कलश छलका तीर्थ बन गया,
प्रयाग, नासिक, उज्जैन और हरिद्वार बन गया,
सात समंदर पार तेरे साथ जाने की सोची ही थी,
कि रास्ते में हमारे, गंगा- सागर पड़ गया/

तुम्हारे बिना तीर्थ दर्शन न किया, कुछ तुमको खबर है,
तुम पर मेरी बात का क्या थोड़ा बहुत भी असर है/

गुलजार रहता रंगीनियों का मेला, भक्तों की ठेली- ठाला,
तुझ बिन किसी से कौन करे व्यर्थ का झंझट- ओ- झमेला,
हम तो बस तेरा नाम लेकर ही लंबे सफर पे निकले,
आ मिलो बीच राह के छोड़ कर ये तेरा वो मेरा/

किसी से तेरा कोई सानी नहीं, न ही जमाने की फिकर है,
दिल के दरवाजे पर बैठा तेरे इश्क का कोई बीमार है/

गुजरता गया तब्बसुरे- माजी, तेरे ख्यालात से हैरान हो कर,
हम तुझे अपनी बनाने को डोरे डालते थे पशेमानी में आसमान पर,
पीरे- मुगां ने कुछ न सुना, लिखा दिया मयखाने की दीवार पे,
कमजर्फ को शराब देना अब तो बेशक हराम है/

रिन्द को न हो तो न सही, पर मुझे तो हैरानी- ओ- गैरत है,
कौन जाएगा उसकी दुकान पे अब पीने-पिलाने, मुझे तो हैरत है/

हुस्न कायनात है, तो इश्क भी उसका गिर्दाब है,
हमको हमेशा तुझी से मतलब, यह मेरी आदात है,
मनचले राह में तेरे मुझे पत्थर मारें भी तो क्या,
हम तो मुसलसल लेते बस तेरा ही नाम रहे/

कली चटकेगी कोई, तभी तो भ्रमर चमन से नाता जोड़ेगा,
तू क्यूँ जश्ने- बहारां!, कदमों में मेरे तू बिछी- बिछी नजर आए/

दूरी हद से बढ़ी जाती है तेरे-मेरे बीच खलवत में,
किस अफसाने को सराहूँ, किससे दूर रहूँ मन्नत में,
सब कुछ लुटा के होश में आए तो सोचा तो यही सोचा,
चल के कुछ रोज गुजारें हजरते- वाइज की सोहबत में

दिल की बला आखिर हम तो सड़क पे लाए,
बसर वही है, अखबार में जिसकी खबर आए//

                     राजीव रत्नेश
         ट्विन टावर, ग्रेटर नोयडा, यू० पी०/

तुम्हारे जन्म दिन का जश्न

तुम्हारे जन्मदिन का जश्न  ( कविता)
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मुट्ठीगंज की गलियों से, जो उठी एक आवाज है,
वही सुरमई लहर, आज मेरा सबसे बड़ा साज है/
वैसे तो हर लम्हा, हर दिन, बस तुम्हारे नाम है,
पर" फरवरी" की यह चौदह तारीख बड़ी खास है/

नजर की दुआ है, लबों की ये सौगात है,
तुम पूजा हो मेरी इबादत की, मेरा अरमान हो/
तुम्हारे होने से ही, मेरी शायरी की बिसात है,
इस जर्जर कश्ती की, तुम ही तो पतवार हो/

14 फरवरी 1983 की सुबह की पहली रश्मि के साथ
इलाहाबाद के सरकारी डफरिन अस्पताल में प्रगटी नवजात/
बाबा सबेरे-सबेरे अपनी क्यारी का ले के आए गुलाब,
जिसने सबसे पहले बताया, साला बड़ा था, लड़के- लड़की की नहीं पहचान/

फिर भी जिन्दगी के इस छोर तक तुम्हें लड़का ही जाना/
आर्य कन्या स्कूल में पढ़ी, ग्रेजुएशन में टाप कर जाना/
सभी कुछ तो अदभुत लगता है, खुशियों की बेला थी,
दादा-दादी का साथ था, साथ था तुम्हारा अनजाना/

प्रेप में तुम्हें साथ ले के तुम्हारे स्कूल जाना,
बड़ी मुश्किल से जाती थी, मेरे गाल पे दाँत तुम्हारा गड़ा देना/
कभी न मारा, न कभी डाँटा तुमको या किसी बच्चे को,
पाकेट खर्च से खर्च भी करती थी, तो मम्मी से पूछ लेना/

आफिस जाने के पहले तुम्हें एक कचौड़ी दमालू के साथ,
डान्स सीखने जाती तो दो लड्डू बेसन वाले शाम को छुट्टी के बाद/
कुछ बड़ी हुई बाबा- दादी, पापा-मम्मी के अरमानों के
साथ,
ताइकवान्डो में' ब्लैक- बेल्ट' होकर कराया तुमने नाम/

जिस क्षेत्र में कदम रखा, सफलता तुमने पाई है,
एल०टी० में इलाहाबाद डिवीजन टाप किया/
एम० ए०( हिन्दी) में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से फार्म भरा,
कुछ नंबरों से तुम्हारा फर्स्ट डिवीजन आने से रुका/

फिर भी तुमने हार न मानी पढ़ाई के साथ ही,
सिटी चैनल में समाचार और रिपोर्टिंग करती रही/
अपनी पढ़ाई का खर्च खुद वहन किया,
किसी से कुछ न चाहा, अपने पैरों पर हमेशा खड़ी रही

हर कम्पेटेटिव इम्तहान देने मेरे साथ जाती थी,
लौट खुद तुम शाम को घर आ जाती थी/
पी ० सी० एस ० का इंटरव्यू दो - दो बार दिया,
एस० एस ० सी० के इम्तहान में अपने बैच में टाप कर दी/

सर्विस ज्वाइन करने पर पहले घर में कार आई,
जो सम्हौरी भाई- बहनों की जलन का कारण बनी/
मेरे सात भाइयों की औलादों में एक तुम्हीं हो,
गवर्नमेन्ट सर्विस में भी शान से रहने का आगाज कर गई/

तनू को जे० आर० एफ० का इस्तहान दिलाने को,
उसके साथ यूनिवर्सिटी गई, खुद भी इम्तहान दे आई/
तुम पहले अटेम्ट में इम्तहान कलीअर कर आई,
तनू दूसरे अटेम्ट में ही जे० आर० एफ० फाइनल कर पाई/

शादी के रिश्ते तमाम आए, पी ० सी० एस ० कवालीफाइड तक के,
पर तुम्हें रिश्ता कोई पसंद न आया/
धुन थी अपनी शादी खुद करने की,
लव-मैरिज करना ही तुम्हें भाया/

मैं बचपन से कहता रहा हूँ, आर्य- समाज मेरी पसंद है,
वह जाति धर्म नहीं देखता है, उसमें किसकी का सरनेम नहीं होता है/
प्राचीन ग्रंथों से पता लगता है, हम आर्यों की संतान हैं,
वेद हमारा धर्म है,
महाभारत में पत्नी का पति को आर्य कहना कितना
मधुर और सुखद लगता है/

वह शादी का सर्टिफिकेट भी देता है,
और पूरी तरह से दहेज के खिलाफ है,
शादी में वेद- मंत्रों का उद्घोष होता है,
जो शादी की मुनादी करता है/

सनातनी रीति से तुम्हारी शादी संपन्न हुई,
मेरे आर्य- समाजी पन को किसी ने मान्यता न दी/
मैंने तुम्हारे छोटे मामा के सामने कह दिया, कि
मेरा कुछ नहीं लगा, तो वह बोले, दामाद को कटोरा
दिया था/

रिंग- सेरेमनी में उसने हल्ला मचा दिया था,
यहीं पर लगा कि शादी में उसको बुलाना गल्ती थी/
जबकि पाँच सौ बराती आए थे, घराती दो सौ थे,
सबसे ज्यादा चिढ़ उसको इस शादी की थी/

तुम प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में रही,
मनीष हमेशा इलेक्ट्रानिक मीडिया में रिपोर्टर रहा/
सबसे ज्यादा चिढ़ सालों को मुझी से थी,
अपने दामादों को शगुन का भी कटोरा न दिया होगा/
( इसीलिए किसी को बुलाया नहीं, गुपचुप लड़की की
पाताल- लोक में शादी कर दी)

शमशान- घाट के कफनखसोट महाबाम्हन को,
शादी की शिरकत में बड़ी खामी नजर आई/
मम्मी-पापा और भाई- बहन के पास तीन घंटे में पहुंचोगी,
तुम अपना ट्रान्सफर ले के आगरा आई/

हर साल आज तक मनाता रहा यह त्यौहार,
मिलते रहें तुम्हें " वैलेन्टाइन-डे" पर नाना उपहार/
सूरज की तरह उठो क्षितिज से,
फैला कर उजाला कर दो, तिमिर का नाश/

खिलती रहे ये मुस्कान, जैसे चमन में कली,
जन्मदिन की मुबारकबाद, मेरी रूह की दुआओं के साथ/
तुम सलामत रहो और सलामत रहे तुम्हारी गली,
' रतन' की कलम लिखती रहेगी, उम्र भर तुम्हारा साथ//

              राजीव खत्नेश
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सारे चमनो- गुलिस्तां तुझ पर कुर्बान

सारे चमनो- गुलिस्तां तुझ पर कुर्बान  ( गजल)
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अगर तेरे प्यार का मुझे सहारा न होता/
इस जहां में फिर मेरा गुजारा न होता/

गुझिया- पापड़ खिलाती हो अपने हाथ से ही,
कहती हो थाल ये किसी हाल तुम्हारा न होगा/

धौल-धप्पा खुद ही करती हो, ठहराती हो मेरी खता,
और कहती हो ये दिल कभी तुम्हारा न होगा/

सफाई के नाम पर बर्तन चमकवाओगी मुझसे,
घर में तुम्हारे हाल ये हर्गिज हमारा न होगा/

कहती हो भैंस पानी ज्यादा पी गई होगी,
एक दिन भैंस पानी ही देगी, दूध का नजारा न होगा/

मुब्तिला जाने क्यूँ हो गए थे इश्क में तुम्हारे,
तुम हमें समझ न सके, मूक अब तुम्हारा इशारा न होगा/

मिठाइयाँ बनाता हलवाई, खाँड़ फेटफाट कर,
जबां जिस गई, काश! नमकीन भी बनाया न होता/

चले आए समंदर की जानिब, तुमको सदा देते हुए,
न आते, होने को जो मेरी कश्ती पे सवार इरादा न होता

मस्तूल पर लटका देता ढेरों कमल, तुम्हारे कहने से,
भले कोई भारतीय जनता पार्टी का समझा न होगा/

तहरीर- ए- मुहब्बत का इकरारनामा तो तुम्हीं ते था,
काश! मेरा साथ तुम्हें हुआ गँवारा न होता/

फिर फूल खिलने लगे हैं गुल्शन- दर- गुल्शन,
इक बार पलट के देखो, हासिल फिर ये नजारा न होगा

रातरानी की खुशबू तो रात को ही मजा देती है,
काश! रात की उम्मीदों का कोई सवेरा न होता/

तेरे लिए फूलों का गुलदस्ता बना कर ले आए हैं,
तुमसे कोई और मुझे ज्यादा प्यारा न होगा/

बागबां सोकर जाग उठा है, बागबंदी हट गई है,
तेरी जुल्फों के बादल घुमड़ उठे, काश! वीरान गुलसितां न होता/

सुब्ह भी शिकवा, शाम का भी करना गिला तुम्हारा,
मैं न देता तुम्हारा साथ, तुमसे जुड़ा जो मेरा फसाना न
होता/

दिलो- जां हारे ही थे तुम्हारी आरजू में हम तो,
काश! दिल हमारा बना तुम्हारा निशाना न होता/

सारे चमनो- गुलिस्तां तुझ पर कुर्बान" रतन",
कुछ वो दूँ, जो किसी ने किसी को दिया नजराना न होगा/

                """"""""""""""""'

अगर प्यार की चाहिए मेहरबानी,
न कर पूजा- पाठ में कोताही/
कृपा चाहिए तुझे किसी की,
तो भज ले भोले- औघड़दानी//

                राजीव रत्नेश
          ट्विन टावर, ग्रेटर नोयडा,
                     दिल्ली
          """""""""""""""""""""""""

(कृपया आप इसे मेरी दूसरी प्रोफाइल, जा आपने
बनाई है, इस रचना को उसी में स्थान दें)
               राजीव रत्नेश

खेल- खेल में

 खेल- खेल में  ( कविता)
+++++++++++++++++

छोटे- छोटे बच्चे इतना रोते क्यूँ हैं?
मम्मी-पापा आफिस जाते हैं तो,
आसमान सिर पर उठाते क्यूँ हैं?
हलक में प्राण अपने अटकाते क्यूँ हैं?

इतनी सामर्थ्य उनमें आ कैसे जाती है?
कि मम्मी-पापा भारी कदमों आफिस जाते हैं,
दादी-दादा, नानी- नाना में सबल औरतें हैं,
उन्हें न तो ब्ल्ड-प्रेशर है, न ही हार्ट की बीमारी है/

नाना- बाबा अक्सर दिल के मरीज ही होते हैं,
जवानी में बीबी नकेल डाल नचवाती है,
बुढ़ापे में शक अपने खसम पे करती हैं,
और उनको पैरों में बेड़ी डाल के रखती हैं/

मुझे भी तो बच्चों का रोना अखरता है,
उनके लिए टाफी लाना नहीं अच्छा लगता है,
पर बच्चे तो बच्चे ही होते हैं, मानते नहीं,
सबको नाच नचाते, चिल्लाना अच्छा लगता है/

नातिन मेरी चार साला, गले में जोर ज्यादा है,
नहीं मानती किसी की, उससे घर में शोर ज्यादा है,
उसे लेकर पार्क में, मैं कैसे जा सकता हूँ?
मैं भी प्रदूषित हवा में साँस कैसे ले सकता हूँ?

चलने में दिक्कत भी मुझे अब रहने लगी है,
सुब्ह- शाम जोड़ों में दर्द रहता कुछ ज्यादा है,
अटक जाती है साँस मेरी, जरा-जरा सी बात से,
घर में बीबी का जुल्म रहता कुछ ज्यादा है/

अपने शहर में तैनाती स्थल पर टाइम-पास,
करने को, चाय की दुकानों पर,
सिविल- लाइन्स की सड़कों पर,
दोस्तों के साथ टाइम कट जाता था/

फिर घर आकर फिर उसी माहौल में,
अपना बन्दोबस्त करना ही पड़ता था,
मुहल्ले- टोले में बच्चे भी थे, खेलते थे,
बड़े- बच्चे गलियों में अक्सर शोर मचाते थे/

अपने घर में वो अपने को बड़ा मानते,
बूढ़े-बुजुर्गों को घर का नौकर समझते थे,
मान-मनौवल बच्चों की नहीं कर पाते हैं
बुजुर्ग आदत से लाचार, व्यवहार न समझते हैं/

जानते हैं बुढ़ापा खुद ही एक बीमारी है,
इस उमर में कोई न कोई दवाई जरूरी है,
हर चीज पर मार पड़ी मँहगाई की है,
उन चीजों के दाम बढ़ गए, जिनका शौक जरूरी है/

हर मुहल्ले में एक मंथरा होती है,
पूरे टोले का संचालन उसके हाथ होता है,
दिल्ली से दौलताबाद, दौलताबाद से दिल्ली,
तक वह अपना धावा मारा करती है/

अपनी लहर बहाती हर घर में,' मौसी' कहलाती,
किसी की लगी- लगाई शादी रुकवा देती है,
अच्छे-भले, बड़े होटल का इंतजाम रहता है,
पर वह गली के मंदिर में सब निपटवा देती है/

एक तो परेशान मैं अपनी नातिन से,
दूसरे रहता हूँ हैरान मन्थरा डायन से,
कितने घर उजाड़े, खुद का बसा नहीं पाई,
सबके घर में गुल- गपाड़ा मचवा देती है/

हैरान हूँ इस बुजुर्गियत से अपनी भी,
कैसे करूँ मदावा बीबी की अपनी ही,
संत्रस्त रहता हूँ उसके नाम से ही,
वह भी मुझे छोड़, कहीं नहीं जाती है//
             ----------

अपनों को छोड़ कर,
          परायों पर भरोसा रखने वाले/
कट जाते हैं जैसे बकरे,
          अम्मा के खैर मनाते- मनाते//

           राजीव रत्नेश
ट्विन टावर, ग्रेटर नोयडा, दिल्ली/
**************** **********

शमां और परवाना

शमां औ' परवाना  ( कविता)
++++++++++++++++++

एक शमां जलती है महफिल में,
हजारों परवाने कहीं से पहुँच जाते है/
तपिश- ए- बदन की परवा नहीं करते,
चिकनी काया पे शमां की फिसल जाते हैं/

उनके आने के पहले ही पैग़ाम- ए- मुहब्बत,
उनके अधरों के मुस्कराहट बन जाते हैं/
वो कुछ समझें न समझें, हम जानते हैं,
ये वो परवाने हैं, जो बिना शमां ही जल जाते है/

मिटने के पहले कहाँ तस्कीने- वफा होती है,
जलने औ' जलाने के बाद कहीं राज खुलते हैं/
शमां तो होती बेवफा, किसी को नहीं बरसती,
निशाने के पहले कितने उसकी आगोश में आ जाते हैं/

वो मोहतरिम भी है, कमसिन भी किसी से कम नहीं,
उसकी एक झलक पाने को परवाने ललच जाते हैं/
हम महफिल उठा देते हैं, शमां पहले ही बुझा देते हैं,
पसंद नहीं हमें खून- खच्चर, परवाने खुद सिमट जाते हैं/

मेरी नजरों में शमां तो होती है बेवफा,
उसकी मुहब्बत में दोस्त दुश्मन बन जाते हैं/
कोई नहीं समझता फिर भी हकीकत- ए- इश्क,
आसानी से नजाकत हुस्न की हम समझ जाते हैं/

मरसिया- ख्वानी कौन करेगा उनकी,
हिफाजते- जान समझ कर उनकी/
गैर तो गैर, शमां भी करती बेवफाई,
अनजान हो, हम भी सू- ए- मकतल चल देते हैं/

शमां तो दिखाती अपने जौहरे- हुस्न,
दिल वालों के लिए हो जाती आजार जिस्त/
हम पाँखों को गिन आधा करके गिनते लाश,
और मरघट के मंडलेश्वर को सौंप देते हैं/

महफिल के बंद हो जाते हैं जब किवाड़,
थोड़ा सुकूने- दिल होता है, जां में जां आती है/
मुहब्बत के दस्तुर को निभाना जानते हैं,
पर जान-बूझ कर जान देने से गुरेज कर जाते हैं/

मासूमियत तो जरा शमां की हम देखते हैं,
करके हजारों कत्ल बिलकुल खामोश है/
कहती खुद आए परवाने, हमने तो बुलाया नहीं,
दिल लगाने के अंजाम से क्या वो होते बेखबर हैं?

माना मुहब्बत बरबाद करती है,
पर यहाँ परवाह कौन करता है/
हम भी मर-मिटे अपनी महबूब शमां पे,
' रतन' को इंतजार खटकता है, जब वो खुद नहीं आते हैं/


                   राजीव रत्नेश
         ट्विन टावर, ग्रेटर नोयडा, यू० पी०/
         ***************************

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!