Thursday, September 17, 2026

दूर देश जाकर भी काश! ( नज्म )

दूर देश जाकर भी काश!
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नज्म--- राजीव रत्नेश

दुनिया में अगर
मुहब्बत और खुलूस न होता,
तो जर्रे से जुड़े जर्रे का
कोई फसाना न होता/

पृथ्वी अपनी धुरी से
गर जरा सा हट गई होती,
तो सोचो-----
इस दुनिया का
क्या ठिकाना होता/

मुहब्बत ने ही तो
हमको तुमसे,
और तुमको हमसे
बाँधे रखा है;
वरना
हम, हम न होते,
तुम, तुम न होते/

मैंने माँगा ही क्या था तुमसे---
फिर क्यों खफा हो बैठे?
क्या चाहा था मैंने,
जो तुम
बदगुमां हो बैठे?

जिंदगी का गुलशन
शांत था,
अपनी ही लय में साँस ले रहा था,
तुमने जोर- ओ- सितम से
मुझे आजमाया न होता,
तो उसमें
बगुला भी न उठता/

मुहब्बत दुश्मन नहीं होती,
जमाना भी दुश्मन नहीं होता---
अगर तुमने
किसी और से मिल जाने का
इरादा न किया होता/

देखो,
सागर की उत्ताल तरंगे भी
एक दूसरे से बँधी रहती हैं;
ज्वार न आता
तो कश्ती भी
साहिल से न टकराती/

यह जमाना
आज भी मुहब्बत का दीवाना है,
मैं यह जानता हूँ____
मगर तुम दूर हुए
तो तुम्हारी याद ही
मेरा सहारा बन गई/

मुहब्बत बरगलाती नहीं
बस हर बार
आवाज भी नहीं उठाती,
मैं जानता हूँ----
तुम साथ रहते
तो शायद
मेरा गुजारा न होता
फिर भी....

काश!
तुम मेरी महफिल में आ गए होते,
एक जाम की बस
इतनी-- सी कसक थी-----
तुम मेरे थे,
मैं तुम्हारा था,
अपने हाथों से तुमने
मुझे जाम पिलाया होता/

मछली तटबंध से
क्यों उलझी-----
तुम जानो, तुम समझो
काश!
उस काँटे में
तुमने चारा लगाया न होता/

अब किसी की उलझनों में,
खुद को उलझाता नहीं हूँ,
ऐसे मौकों पर
खामोशी ही
अख्तियार करता हूँ/

लेकिन ' रतन '
तेरी मुहब्बत से
कभी गाफिल न था----
न तब,
न आज/

बस एक बात
दिल में रह गई है---
दूर देश जाकर भी,
काश!
तुमने निभाया तो होता/

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Wednesday, September 16, 2026

दर्शन तेरे सुलभ होते ( कविता )

दर्शन तेरे सुलभ होते
   --- राजीव रत्नेश

कैसे उतारूँ तेरी आरती, मेरे जीवन के कर्णधार,
एक जगह सीमित नहीं तू, तेरी महिमा अपरंपार/
तव दर्शन को प्यासा मनवा, कितना भोला औ' नादान,
दर्शन तेरे सुलभ होते, मूर्ति क्यों गढ़ता इंसान/

रात्रि गगन में सितारों की जब टिमटिम ज्योति जगाती,
दिवस चढ़े तो सूर्य-किरण जब धरती को नहलाती/
तेरी सृष्टि का अपार वैभव हर पल झलक दिखाता,
अद्भुत रचना में संचित तेरा सामर्थ्य नजर आता/
देख-देख कर तेरा वैभव, विस्मृत होता मेरा प्राण,
तेरा ही रूप निहारूँ--तृषित रहे मनवा नादान/

फूलों में तेरी मुस्कान है, पत्तों में तेरी हरियाली,
नदियों के कल-कल निनाद में, तेरी वाणी मतवाली/
पवन चले तो स्पर्श तेरा, बादल बरसे तेरी कृपा,
पर्वत की गंभीर शिला में तेरी ही अटल शक्ति देखा/
कण- कण में जब तू विद्यमान, कैसे करूँ गुणगान,
दर्शन तेरे सुलभ होते, मूर्ति क्यों गढ़ता इंसान/

सब ओर तेरा मुख है, हर दिशा तेरे चरण,
किधर झुकाऊँ शीश अपना, किस ओर करूँ नमन?
मंदिर में तू, मस्जिद में तू, गुरुद्वारे में तू ही तू,
नाम भले हों अलग- अलग पर एक ही सत्ता है तू/
एक सत्य के रूप अनेक, एक ज्योति के रूप महान,
तू एक है, पर नाम अनेक-- तेरी महिमा अपरंपार/

भूत, भविष्य और वर्तमान----- तीनों का आधार तू,
कालचक्र की गति में छिपा हुआ, हर क्षण का विस्तार तू/
जिसको समझ न पाया जग यह, उसका भी तू ही विधान,
दर्शन तेरे सुलभ होते, मूर्ति क्यों गढ़ता इंसान/

मेरे पास तेरा दिया सब है, एक तू ही नहीं है,
तेरी देन से भरा जगत है, फिर भी मन में चैन नहीं है/
धन- दौलत की चाह न मुझको, न पद का कोई अभिमान,
बस अटल भक्ति का दे दान, यही मेरी अरदास महान/
कुछ और नहीं माँगू तुझसे, इतना समझ देना वरदान,
तेरे नाम में बीते जीवन, तुझमें ही हो प्राण- विसर्जन/

भूखे के मुख में तू ही है, प्यासे के जल में तू,
रोते हुए नयन में तू है, हँसते हुए पल में तू/
जिस हाथ ने गिरते को थामा, वह भी तेरा हाथ,
जिस हृदय ने क्षमा कर दी, उसमें तेरा ही वास/
यदि सेवा ही पूजा तेरी, तो फिर कैसा पूजा- विधान?
हर जीव में जब तू ही तू है, किसका करूँ गुणगान?

आधार नहीं कोई तेरा, फिर भी सकल जग जाहिर है,
तेरी सत्ता से ही तो यह सारा संसार संचारित है/
जितनी वस्तुएँ मेरे उपयोग में आतीं जीवन में,
उनमें तेरी कृपा दिखाई देती मुझे हर क्षण में/
जाने-अनजाने कभी तेरा तिरस्कार किया न जान,
फिर भी भूल हुई हो मुझसे, क्षमा कर देना भगवान/

तू ही मेरे हृदय- मंदिर में, बाहर भी तू ही विद्यमान,
तू ही मेरा आदि- अंत है, तू ही मेरा जीवन- प्राण/
दूर गगन में ढूँढ़ रहा था, तू तो मेरे ही पास था,
जिसको जग में ढूँढ़ रहा था, वह मेरे ही साथ था/
आँख खुली तो जान लिया-- तू मुझ में ही विद्यमान,
दर्शन तेरे सुलभ होते, मूर्ति क्यों गढ़ता इंसान/

मैं तो ससीम, तू दिग्- दिगन्त में व्यापक असीम,
तेरी करुणा में नहाते जलचर, नभचर और थलचर सभी/
प्रार्थना करूँ किस विधि तेरी, कोई तो राह दिखा,
मैं अज्ञानी, तू सर्वज्ञानी, मुझको अपनी राह लगा/
चरण पकड़ना चाहूँ तेरे, चरण मिलें किस ओर,
जिस ओर देखूँ, तू ही तू है---- हर दिशा, हर ठौर/

तेरी लीला व्यापक प्रभु, हर कहीं तेरा ही नूर,
जहाँ न पहुँच सके इंसान, वहाँ भी तू भरपूर/
नदियों के उत्फुल्ल निनाद में, सागर की गहराई में,
रेगिस्तान की तपती रेत में, वर्षा की तरुणाई में/
तेरी ही इच्छा से चलता यह जीवन का सारा विधान,
तेरी ही शक्ति से कंपित, मेरा क्षुद्र- सा सामर्थ्य महान/

अब न मंदिर दूर लगेगा, न मस्जिद से दूरी है,
जिस हृदय में तेरा प्रेम जगा हो, वह जगह तो पूरी है/
पत्थर में भी तुझे प्रणाम, मानव में तेरा ही भान,
जीव- जगत का कण- कण तेरा, तुझसे ही इसकी पहचान/
बाहर तुझको खोज रहा था, भीतर तू मुस्कान बना,
अपने ही अंतर में पाया---- तू मेरा भगवान बना/

अब आरती कैसे उतारूँ, तू ही दीपक, तू ही बाती,
तू ही पूजा, तू ही पूजा का भाव, तू ही आराध्य- प्रभाती/
तू ही स्वर है, तू ही शब्द है, तू ही मेरा गान,
तू ही भक्त और तू ही भगवन, तू ही मेरा प्राण/
कुछ माँगू तो भक्ति माँगू, कुछ चाहूँ तो तेरा ध्यान,
मेरी अंतिम साँस भी निकले लेते-लेते तेरा नाम/

जीवन मेरा तेरे अर्पण, तन मन मुझको तेरा दान,
दर्शन तेरे सुलभ होते-- अब समझा मेरा मन नादान//
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कुछ इस तरह तेरा इंतजार करता हूँ ( गजल )

कुछ इस तरह तेरा इंतजार करता हूँ
         ---- राजीव रत्नेश

कुछ इस तरह तेरा इंतजार करता हूँ,
जैसे पाँव के नीचे जमीन तलाश करता हूँ/

तेरी आहट का यकीं दिल में लिए हर पल,
बंद आँखों से तेरा दीदार करता हूँ/

रात ढ़लती है मगर नींद नहीं आती,
चाँद से बैठा हुआ तेरा सवाल करता हूँ/

तू मिले या न मिले, ये बात अपनी है,
हर घड़ी तेरा ही मैं इंतजार करता हूँ/

दूरियाँ बढ़ती गईं, कम न हुई चाहत,
फासलों में भी तेरा इंतरवाब करता हूँ/

जिस तरफ देखूँ, तेरा ही अक्स मिलता है,
आईने से भी तेरा इकरार करता हूँ/

जिंदगी जब भी मुझे तन्हां खड़ी मिली,
तेरी यादों को गले लगा कर प्यार करता हूँ/

राह मुश्किल है मगर हौसला नहीं टूटा,
तेरी उम्मीद में खुद को तैय्यार करता हूँ/

कभी खामोश हवाओं से तेरा पता पूछूँ,
कभी सितारों में तेरा इंतजार करता हूँ/

' रतन ' ये इश्क का कैसा सिलसिला है,
खुद से पहले तेरा इंतजार करता हूँ/
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Monday, September 14, 2026

अबदुल्ला हुआ दीवाना ( नज्म )

अबदुल्ला हुआ दीवाना
        ----- राजीव रत्नेश

महफिल बिखर गई थी आखिरी दौर था,
वो आया, मुझे उठा कर मेरा प्याला गटक गया/

अपनी बहन-बेटियों के दरम्याँ से मुझे उठाया,
लड़ने वो मुझसे ही आया था, मैं समझ गया/

मुझे देख हाफ- बुश्शर्ट की आस्तीनें चढ़ाने लगा,
वह सरकारी रजिस्टर्ड पागल था, मैं सरक गया/

बेगाने की शादी में अब्दुल्ला हुआ दीवाना,
देखा दुल्हन तो दुल्हे का हटा खुद सनक गया/

शामियाने के पंखे को रंचमात्र हिला न सका,
जाकर खुद वह पंखे से लटक गया/

पंखा भार उसका सह न सका और नीचे आ गया,
और वह सोफे के नीचे आकर दुबक गया/

पाँच मिनट अनुलोम-विलोम के बाद भस्त्रिका किया,
बिगड़ैल साँड़ की तरह वह फिर से मेरी तरफ लपका/

मैं पैतरा बदल गया और लड़की वालों पे बिगड़ गया,
दुल्हा भी था मौजी, दाँव लगा कर उसे पटका/

तब कहीं जाकर रस्मे- शादी पूरी हो सकी,
वह लारी से अपनी बहन-बेटियों के साथ विदा किया गया/
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Saturday, September 12, 2026

रतन किससे करे गिला ( गजल )

रतन किससे करे गिला  (  गजल )
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कब से तू जाने मेरा हमनवा हो गया/
तेरा दिया दर्द ही अब मेरी दवा हो गया/

जिसको समझा था कभी दिल का बड़ा दुश्मन,
वही जाने कब मेरे दिल की सदा हो गया/

तेरी महफिल में मेरा जिक्र हुआ जबसे,
मेरी तनहाई का हर पल भी नया हो गया/

तेरी आँखों ने जो खामोश इशारा कर दिया,
मेरे कहने को रहा क्या, सब बयाँ हो गया/

हमने चाहा था जिसे भूल के जीना लेकिन,
वही चेहरा मेरी साँसों की हवा हो गया/

दर्द देता रहा तू उम्र भर इतना मुझको,
दर्द सहते- सहते दिल भी खुदा हो गया/

मैंने माँगा था तुझसे प्याला शराब का,
तुझे देख कर ही मुझे नशा हो गया/

जलती- बुझती रोशनियाँ तेरी कोठी सजाती रही,
तेरे चीखते जख्मों की मैं दुआ हो गया/

जो गुजर गया फसाना, उसको कुरेदें ही क्यूँ,
जख्म वो भर गया, इक नया दर्द पैदा हो गया/

मस्जिद से अजान सुनाई देती रही,
तेरी चाहत कुबूल हुई, हर सज्दा दुआ हो गया/

फैसला हुआ तो ये हुआ, तू ही मेरी चंदा थी,
तुझसे खुल्लम खुल्ला मिलने का रास्ता हो गया/

कमरे से मेरे गई तो हर तरफ अँधेरा हो गया,
बैठे-बिठाए मेरा तो खसारा हो गया/

तू बिछड़ी क्यों थी मुझसे, इतने दिन मायके रही,
तेरे- मेरे दरमियाँ कहाँ से ये जमाना हो गया/

' रतन ' अब किससे करे अपने फसाने का गिला,
जिससे शिकवा था वही दिल की दुआ हो गया/

              राजीव रत्नेश
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Friday, September 11, 2026

रतन कैसे भुला दे तुझे ( गजल )

रतन कैसे भुला दे तुझे
     --- राजीव रत्नेश

तेरे इंतजार में आँख मेरी नम है,
आ जा कि अब जिंदगी कम है/

तेरे बिना साँस लेना भी क्या साँस लेना,
हर साँस में तेरी कमी का गम है/

जिस राह पे तेरे कदमों के निशाँ थे,
वही राह अब तक मेरी हमदम है/

तू सामने हो तो खानोश हो जाएँ लब,
तेरी आँखों में ही मेरा हर मौसम है/

रात भर कहकशाँ से पूछता रहा तेरा पता,
मेरी तनहाई के चंदा, तुझे किस बात का गम है/

तू लौट आए तो फिर से बहारें आएँ,
तेरे बिन तो ये दिल भी कहाँ हरदम है/

इतना न आजमा मेरी मोहब्बत को,
तेरे नाम से ही अभी दम में दम है/

हमने तो सब कुछ तेरे नाम कर दिया,
अब तेरी सोच में ही मेरा ये जनम है/

तेरी तस्वीर से करता हूँ अक्सर गुफ्तगू,
मेरी खामोशियों में आज भी तेरा भरम है/

तू नहीं है तो हर खुशी लगती है अधूरी,
तेरे आने का यकीन ही मेरा मरहम है/

जिस तरफ देखता हूँ तेरा ही चेहरा दिखता है,
ये मोहब्बत है या आँखों का कोई वहम है/

' रतन ' कैसे भुला दे तुझे इस उम्र के बाद,
तेरी यादों से ही आबाद मेरा ये उपवन है//

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तुझे आजाद परवाना देखता हूँ ( गजल )

     तुझे आजाद परवाना देखता हूँ
             --- राजीव रत्नेश

तेरी नजरों का सधा निशाना देखता हूँ/
हर अदा तेरी कातिलाना देखता हूँ/

बिछी है प्यार की शतरंज की ये बिसात,
तेरी हर चाल को शातिराना देखता हूँ,

चली आ एक बार मेरी महफिल में,
तेरी खामोशी में सिमटा जमाना देखता हूँ/

कल रात आई थी मस्जिद में सज्दा करने,
तेरी इबादत में कुछ हक अपना देखता हूँ/

इक तूफान उठा था मेरे एक मिसरे से,
तेरे गाल के तिल में इक फसाना देखता हूँ/

जरा खोल अपने होठों के ये चुंबक,
मैं अपने होठों को तेरी ओर आता देखता हूँ/

अब मौन न रह, मुहब्बत का तूफान उठा दे,
वरना जलता हुआ ये आशियाना देखता हूँ/

तेरी दिलेरी तेरे बाप ने भी सहन न की,
मैं तो बस तेरे लबों का कहा देखता हूँ/

इश्क के दरबार में अनारकली भी थी कभी,
मुहब्बत के आगे कब दौलत को टिका देखता हूँ/

किस शय से आकर तू उलझ गया ' रतन ',
तुझे तो हमेशा से आजाद परवाना देखता हूँ//

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!