Sunday, February 1, 2026

रोज-रोज के वादों का क्या?

रोज-रोज के वादों का क्या?
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मेरे दिल की तड़पन को,
एक नया आयाम मिला/

पर अपने खोलने को,
उन्मुक्त आसमान मिला/

खोजने थे मोती गहराई में
समंदर का मुझे माप मिला/

अर्थहीन दिल की पगडंडी पर
खिली बहार का साथ मिला/

दिल के जख्मों के लिए
मदावा हुआ, तेरा इलाज मिला/

अपने लिए तो कम फिर भी
तेरे लिए बिना अंदाज मिला/

खरोंच लगी थी शीश- ए- दिल पे
भरने को मरहम ईजाद किया/

फितरत है ये मेरे दिल की
तुझे पाने को हर तरीका इस्तेमाल किया/

जो तू न मिली मुझे साहिल पे
समंदर में जाकर जाल संभाल लिया/

मोती तो गहरे पानी में ही होता है
ऊँचाई पर जाकर गहरी छलांग लिया/

हम तो मर-मिटे, तेरी इसी अदा पे
न फुर्कत में भी कभी याद किया/

एक सिसकारी के साथ हमने
बस तेरा ही तो इक नाम लिया/

यह भी जोश बस नया-नया है
जो अदा- ओ- नाज का जाम पिया/

रोज-रोज के वादों का क्या" रतन"
" हीरक- जयंती" का तुम्हीं ने आगाज किया/

               राजीव रत्नेश
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तेरी झील सी आँखों में ( कविता)

तेरी झील सी आँखों में  ( कविता)
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तेरी झील सी आँखों में कितने डूबते-उतराते हैं?
तेरे प्यार का सहारा लेकर कितने पार उतर जाते हैं?

तुम जब हँसती हो, बिजलियाँ चमक जाती हैं,
तुम आँख उठाती हो तो मयखाने खुल जाते है/

इश्क की तपन, दिल की जलन लेकर महबूब मेरे
आज फिर से तेरी महफिल हम आबाद करते हैं/

सभी छोड़ कर दुनिया अपनी, आते हैं तेरे मयकदे,
और हम परवाने हैं कि बिन शम्मअ जले जाते हैं/

देख लेते हैं जब गैर के लिए, तेरी आँखों में इंतजार,
जबीं पर दर्द बिचारे रह- रह कर उभर आते हैं/

क्यूँ गैरों के दामन के लिए तरसती रहती हो कभी,
हम भी तो महफिल में तेरी सिर्फ लेकर तड़पन आते हैं

शम्मअ तो रात भर जलती है जब प्यार के मौसम में,
हम देखते हैं हर तरफ हजारों परवाने निकल आते हैं/

आकर पहलू में इक बार, कर दो जिंदगी भर को 
गुनहगार,
हम भी बिना मकसद तो नहीं महफिल में सुलट जाते हैं/

आज मेरे लिए भी अपने मयकदे को रंगी मिजाज कर
लो,
बोतल नहीं चाहिए, जाम भी नहीं, नजरे- खास से ही
हम बहक जाते हैं/

ये शाम नहीं औरों के लिए, इत्मीनान तो रखो साकी- ए- महफिल,
किया तुमसे वादा, एक हमीं हैं, जो निभाने चले आते हैं/

फिर किसी तूफां का, खौफ नहीं होता हम दीवानों को
जब मरुस्थल में इक बार आकर सावन बरस जाते है .    --------+++----------

           उनकी महफिल में गुजरी है रात,
                     जिन्दगी थोड़ी मुस्कराई भी है/
           दिल में आरजुओं की प्यास,
                     आज हर हद से गुजर आई भी है//
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             बहुत खूब यह बात भी,
                        हम पर उधार रही/
             तुम्हीं ने चाहा और,
                        मेरी फरियाद रही//
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              जिंदगी मेरी एक जख्म है,
               आरजू तेरी एक नज्म है/
               तू आज भी छनकाती पायल,
               अदा तेरी सरे- बज्म है//
                      --------

                अभी कमसिन हो, नादां हो
                       खो दोगी कहीं दिल मेरा/
                ले लेना जवान होकर,
                       यह दिल है सिर्फ तेरा//

           देखा वो था तुमने भर नयन मुझको,
           सहला गई थी मस्त पवन मुझको/
           साँसों में तरंगित थी तेरी भंगिमा,
           मस्त बना गई थी तेरी गजल मुझको//

                      राजीव रत्नेश
              मुठ्ठीगंज, इलादाबाद/
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बड़ा निराला मुहब्बत का व्यापार ( कविता)

बड़ा निराला मुहब्बत का व्यापार  ( कविता)
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बड़ा निराला मुहब्बत का व्यापार
घड़ी-घड़ी में दिल टूटा करते हैं
कभी उल्फत मिली, कभी मायूस हुए
कभी सनम खुश तो कभी रूठा करते हैं

नजरों में मायूसियों का ज्वार मगर
दिल में जज्बातों का बाजार गरम होता है
कभी भूले से जो नाम वफा का लिया
बात की बात में हौसला ठंडा होता है

नहीं अच्छा होता रखना किसी पे एतबार
असमय ही सहारे छूटा करते हैं
बड़ा निराला मुहब्बत का व्यापार
घड़ी-घड़ी में दिल टूटा करते हैं

मुहब्बत की सब्ज बागिया में
कुछ रंग खिजा के भी होते हैं
कली की नयन- मदिरा पी कर फूटे
कुछ ऐसे भँवरे भी होते हैं

चटक-मटक तो रहती है, हर कली में
अक्सर उनके दिल में खोट हुआ करते हैं
बड़ा निराला मुहब्बत का व्यापार
घड़ी-घड़ी में दिल टूटा करते हैं

सर्द हवाओं का मौसम हो तो क्या?
उनकी रंगीन जफाओं का जल्वा न हो
दिल की प्यास जवान हो तो क्या?
कहीं भूले से भी बलवा न हो

कहीं गिरती है कली जो शाख से
उठाने वाले हर कहीं मिला करते हैं
बड़ा निराला मुहब्बत का व्यापार
घड़ी-घड़ी में दिल टूटा करते हैं//
          ---------

मेरे शाने पर सर रख के
        मुस्करा के न आँखें मिला सपना!
न बढ़ा उंगलियाँ मिरे होंठों की तरफ
        कहीं आ न जाए तुझपे दिल अपना//
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दिलो- जां से मैं तुमको चाहता हूँ/
तुम्हारी खुशी, मुझको चाहो न चाहो/
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पूछने गए हम तो उनकी तारीफ/
मगर वो भी उनका आशिक निकला//
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जाने किस कदर सूरत तुम्हारी
               दिल में समा गई
हम तो कुछ न समझे और
               बात यहाँ तक आ गई//
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नीमबाज आँखे तौबा ये भोली चितवन
हुस्न से तेरे शरमाती चंदा की किरन
बहारों का समा तेरे दम से है सनम
तुझी से खुशगवार है सारा ये आलम//
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मैंने जग को भुला दिया
                 पुरानी यादों से/
तिरी याद नहीं भूली मगर
                 ऐसी बातों से//
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जाने क्यूँ तरसती है
            मुहब्बत के लिए दुनिया/
हमें मालूम है, मुहब्बत
             कुछ नहीं रुस्वाई के सिवा//
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रंजो-गम जमाने भर के भूल गया/
तुम याद रहे, तुम्हारा सितम याद रहा//

                  राजीव रत्नेश
           मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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क्या है तुम्हारी राजे- बेरुखी? ( कविता)

क्या है तुम्हारी राजे- बेरुखी?  ( कविता)
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दिल में बढ़ जाएगी क्या यूँ ही बेकसी?
तुम्हीं बताओ, क्या है तुम्हारी राजे- बेरुखी?

मैं तो न गया था तुमसे करने इजहार
जानता था बना दोगी तुम प्यार को व्यापार
बढ़ेगी दिल में कसक, जब चलेगी बादे- सबा
तुम न निभाओगी जब करके वादा- ए- इकरार

गर्दिश में लगने लगी है अब तो ये जिन्दगी
तुम्हीं बताओ, क्या है तुम्हारी राजे- बेरुखी?

फूल महकते हैं चमन में, बरसती फिजा है
आ जाओ तो बड़ी खुशनुमा ये घटा है
आग दिल की सावन से बुझती भी नहीं
तुम न आओगी तो समझो बस कजा है

किस तरह से करूँ अब बुतों की बंदगी?
तुम्हीं बताओ, क्या है तुम्हारी राजे- बेरुखी?

तुम्हीं ने तो कहा था बड़ी भोली अदा से
आँखों में भर कर अश्क उसी मीठी सदा से
' अब तो चले जाना पड़ेगा, डैडी लेने आ रहे हैं,
अब मिलन होगा कैसे, बड़ी दूरी है यहाँ और वहाँ में'

सुन के दिल में हो गई बड़ी धुकधुकी
तुम्हीं बताओ, क्या है तुम्हारी राजे- बेरुखी?

फिर मैंने तुमसे वहाँ का पता पूछा था
दिल में तुम्हारे क्या, तुम्हारी रजा पूछा था

मिलन की कोशिशों के बावजूद जो न मिल सके
ले फिर गुनहगारे- मुहब्बत की तुमसे सजा पूछा था

तुम बोलीं तो प्यार की बगिया महकी
तुम्हीं बताओ, क्या है तुम्हारी राजे- बेरुखी?

तुम्हीं ने दिया था खत, तुम्हीं ने जवाब माँगा था
तुम्हीं ने दिया था दिल, तुम्हीं ने प्यार माँगा था
तुमने बुलाया था अपनी बर्थ-डे पार्टी में, देर से आया
तो तुम्हीं ने मुझसे दिन भर का हिसाब माँगा था

तुमने खफा हो के मुँह फेरा, मची खलबली
कुछ- कुछ समझ तो आया, क्या है राजे- बेरुखी

फिर क्यूँ कर के वादा फिर खत तुमने लिखा नहीं
करके प्यार तुमने कभी पैगामे- मुहब्बत भेजा नहीं
तुम क्या जानो, दिल में मेरे कसक किस बात की है बिन तुम्हारे दिल को भी तो कभी करार मिला नहीं

तुम्हारी भी बदली दुनिया, मेरी भी दुनिया बदली
तुम्हें बताओ, क्या करूँ, ओढ़ रखी है नकाबे- बेरुखी

अब आई भी पलट के दुबारा मेरे ही शहर में फिर से
दिखाने को मुझको, दुश्मनों से रिश्ता जोड़ लेती हो
खता हो मेरी माना लाख मगर, सनम तुम्हीं तो
बसा के मूरत मेरी दिल में, खुद ही तो तोड़ लेती हो

तुम कहो तो मैं भी बना के बीच बाजार फूँक दूँ तुम्हारी पुतली/
खुल के तो बताओ, क्या है तुम्हारी राजे- बेरुखी//
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मुझे आती है याद रह- रह के वो रात
कभी तेरा दिल न जलाया मैंने
सारी रात गुजारी कभी पलकों में
तो कभी ख्वाबों में तुझे बुलाया मैंने
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मिलेंगे तुझे मचलते अरमां इस दिल में/
हसरत की नजर से इक बार तो देखो/
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अब तो इक बार जरा सा बोल दो
फिर कोई खता होने से रही
लाख कसूरवार हूँ तेरा सनम
कुछ भी हो, मैं तुम्हारा दीवाना सही
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गम से घायल है मेरी मासूम तमन्ना
और मजबूरी कुछ कहने नहीं देती
तुम होते हो सामने तो ऐसा लगता है
आँखों में हों आँसू, पलक बहने नहीं देती//

               राजीव रत्नेश
          मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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पीछे ही हटना था जो

पीछे ही हटना था जो
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तड़प-तड़प के दिल पे चोट खाई तनहाई में/
बैठा हूँ तेरे इंतजार में, वो पहले मोड़ की अमराई में/

चुभन दिल में होती है, क्या जाने तू कितनी गहराई से,
हम भुला न पाए तुमको अपनी दिमागी समझदारी से/

सरफरोशी की तमन्ना अब तो मेरे दिले- मासूम में है,
आ जा तू भी सू- ए- मकतल, बहाना बना चतुराई से/

उमंगों से दिल भी अब तो उतना उछलता भी नहीं है,
नहीं बजती दिल में अब तो प्यार की कोई शहनाई है/

हाँलाकि दिल तप कर हो गया है अब तो रेगिस्तान,
अब तो आ जाओ सजनी सजी-धजी साड़ी धानी में/

किधर निकल गए हम तो सपनों की महफिल से दूर,
सुबह-सवेरे आती हो तुम याद साथ- साथ जम्हाई के/

इश्क का बुखार तेरा दो रोज में ही आखिर कैसे उतरा,
क्यूँ अब भी ढूँढ़ेंगे तुझे हम फिर से तेरी गुमशुदगी में/

यही तो कमी है, दिमाग तो है पास, पर दिल ही नहीं है
जो था भी, लगाया किसी घनघोर चित्तचोर शिकारी से

तुम से बढ़ कर एक से एक हसीन है तुम्हारे मुहल्ले में,
तुम सा जिद्दी न हमने पाया किसी को अपनी जिन्दगी में/

अगर पीछे ही हटना था तुझे, चार कदम पहले मंजिल के,
बढ़ना ही न था तुझे कदम- दर - कदम मेरी आशिकी में
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हाले-दिल बेकरारी का ये आलम है,
           तू न मगरमच्छ के आँसू बहा,
दामने- दिल तार-तार हुआ, दिया था
           गुल तुझे जूड़े में सजाने के लिए/
अब तुनुकमिजाजी छोड़ कर,
           पूछ तो लो इक बार तबीयत का हाल,
हम तुझे आखिरी छोर तक सदा देंगे,
           भेजेंगे कासिद को तुझे समझाने के लिए//
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क्या पूछें तुमसे, उल्टा जवाब मिलता है
वैसे बाजार में सेहरा बेहिसाब मिलता है
लगता मर्जी तुम्हारी नहीं, साथ निभाने की
वक्त-बेवक्त खरा तुम्हारा जवाब मिलता है

             राजीव रत्नेश
         मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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उनकी फसल पे क्या तुम्हारी?

उनकी फसल पे क्या तुम्हारी?
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इश्क करने की गालिबन मनाही भी नहीं है/
इश्क तजरबाते- जिन्दगानी भी नहीं है/

कल परसों की नहीं आज की बात कहता हूँ,
इश्क का ये फलसफा, ये कहानी पुरानी भी नहीं है/

हम और वो चले थे साथ- साथ, हाथों में हाथ लेकर,
उनके चुंबन के सिवा आज कोई निशानी भी नहीं है/

हम तुम्हें क्या बताएँ, किस मोड़ से तुम मुड़ जाओगे,
अभी तो हो हमकदम, ये किसी की मेहरबानी भी नहीं है/

एक से बढ़ कर फिलास्फर मिले मुझे वफा की राह में,
इश्क समंदर नहीं, इसमें समंदर की मेजबानी भी नहीं है/

गुजर जाती है जिंदगी यूँ ही, रोजमर्रा के खेलों में 
उलझ कर,
जो तुम मुझे मिल जाओ, इस खेल में आसानी भी नहीं है/

मेरी गजलों की फेहरिस्त इतनी लंबी, तुम सरापा समा
जाओ,
कल की दुनिया की उसमें कोई बदगुमानी भी नहीं है/

इधर मेरे करीब आ जाओ, ओ कजरारे नयनों वाली,
तेरी नथ झूलती है हवाओं से, किसी की कारस्तानी भी नहीं है/

पहले तुझे सौम्य गुले- गुलाब जानता था अब शोख
चटकीली अदा काबिज है,
किसी की इसमें, किसी तरह की जररानवाजी भी
नहीं है/

इस मौसम में भी जो नहाए नहीं, रगड़ दिए बस गाल,
क्या आज की फुहारे- घटा कुछ खास मस्तानी भी नहीं है/

मुहब्बतों के इस आज के दौर में, तुझसे लिपट रो तो हम लेंगे,
फिर ये न कहना आजकल की मुहब्बत में रुलाई भी
नहीं है/

आवाजें देता रहा हूँ सदा से तुम्हें, तुम्हें कद्र ही कहाँ
करना आया,
लहरों के शोर में कुछ कही- सुनी और कुछ अनसुनी
भी नहीं है/

दिल की कहता हूँ, दिले- आश्नां भी तुम्हीं, आईना भी
तुम्हीं हो,
दिल के नगमों के नगीनों में, वो चमक, वो ताबानी भी
नहीं है/

मशहूर हो तुम जमाने में, मेरी वसीयत की राजकुमारी
तुम्हीं हो,
प्यार के रंगों की बहार हो तुम, कहीं खिली रातरानी
भी नहीं है/

सजदा करता हूँ मस्जिदों में, घंटे-घड़ियाल बजाता
मंदिरों में,
नहीं सुनता कोई खुदा, मुझ पर किसी की मेहरबानी
भी नहीं है/

हम कहते हैं, मुहब्बत की राह इतनी आसां नहीं ऐ
मुसाफिरों!
रात- दो रात रुकने से क्या होता है, इसमें किसी खास
की तीमारदारी भी नहीं है/

हासिल क्या हुआ, उनकी नाजों भरी महफिल में तुम्हें
भी' रतन',
उनकी फसल पे क्या तुम्हारी कोई जमींदारी भी नहीं
है/
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जी चाहता है रोज तुझसे बातें होती रहें
रोज-रोज, तेरी-मेरी मुलाकातें होती रहें
झीना काला दुपट्टा, तेरे बदन पे सजता रहे
गोरी कलाइयों से कंगन की आवाजें आती रहें
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तेरे चेहरे पे मुस्कराहट पाने को दिल तरसता है
तेरी आँखों की बरसती शोखी को दिल तरसता है
पाजेब तेरी छनकती है, हलचल दिल में होती है
तू भी समझ जा, तेरा प्यार पाने को दिल तड़पता है
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नजर झुका के तुम जाने क्यूँ मुझसे बात करती हो
बातों ही बातों में तुम प्यार प्यार का इजहार करती हो
कितनी भोली और मासूम, बड़ी कमसिन हो तुम
सबेरे सूर्यरश्मि तेरे माथे पे छितरा कर तेरा इस्तकबाल
करती है//

               राजीव रत्नेश
           मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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तुम कहती हो इंतजार न करूँ ( कविता)

तुम कहती हो इंतजार न करूँ  ( कविता)
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तुम मेरा दिल चुरा ले गई हो, और कहती हो
                                तुम्हारा इंतजार न करूँ/
प्यार के अफसाने में ऐसी तपिश लाई हो
                         क्यूँ पर्दाफाश- ए- राज न करूँ?

तुम्हारे बिना उकताहट हद से बढ़ी जाती है,
                         तुम्हीं बताओ क्या करूँ?
जमाने के सामने, चाहती हो न तुम्हारे
                        बयाने- अल्फाज करूँ/

साजे- मुहब्बत छेड़ने से किस तरह रोकूँ
                       अपने आप को मैं,
कैसे अफसाने को तूल न दूँ, तेरे बिना भी
                       कैसे सरगमे- आलाप न करू

तेरी मगरूर मुहब्बत का नजारा किया मैंने,
                       फिर भी किनार न किया मैंने,
छेड़ कर दर्दे- एहसास को कैसे तुझे मैं अब,
                       जुदा- ए- कारसाज न करूँ/

जगमग जलती- बुझती रोशनियों तले भी,
                       तेरा ही इंतजार रहता है मुझको,
कैसे तुझे भूल जाऊँ और कैसे तेरा अब,    
                        और इंतजार न करूँ/

जानता हूँ प्यार में इक दिन जान भी जा सकती है,
                     चुहलबाजियाँ तेरी असर ला सकती हैं
चाहे तो मेरी महफिल में तू खुद आ भी सकती है,
                   तेरी तस्वीरे- मासूम दिलो-दिमाग में है/

किस हाल तुझे अपने से दूर समझ सकता हूँ,
                   तेरी छवि आफताबो- माहताब में है,
नजरअंदाज तुझे किस तरह मैं कर सकता हूँ,
                   रक्स करती तू सरोवर- ताल में है/

जमाने की नजर कहीं अकेले तुझे ही न लग जाए,
                   इसीलिए हिचकता हूँ,
तुझे हिदायत देते भी कंपकपी छूटती है मेरा,
                  इक कड़क छिपी तेरी आवाज में है/

कितनी रातों की सुबह भी हो गई पर
                  तकदीर का अँधेरा कायम है,
वो मेरी जोहराजबीं कहती है, देखूँ न उसे,
                  जबकि सारा नशा उसके दीदार में है/

तुम मेरा दिल चुरा ले गई हो और कहती हो,
                  तुम्हारा इंतजार न करूँ,
न कुछ बोलूँ भी तुमसे और न ही पास आऊँ,
          पर कोई खतरनाक इरादा भी ईजाद न करूँ//
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दूरी हद से बढ़ी जाती है अब तो
        तेरे-मेरे बीच खल्वत की,
कैसे मैं सिर्फ़ तुझे देखूँ, समझ कर
        भी तुझे चालबाज न कहूँ/
बागों में जब कुहुकती है कोयल,
         हूक दिल में अन्जानी उठती है,
किस हाल तुझसे दूर रह सकता हूँ,
         क्या उम्मीदे- इल्तफात न करूँ?
           -------------

कलियाँ चटकती हैं बागों में, बागबां पूछता है मुझसे
                         कि मेरी बुलबुल कहाँ है?
जिससे चमन था गुलजार वो कली कहाँ है, मेरे ख्वाबों
                     की परी किस हाल में है?
सोचता हूँ, उससे सारी बात बता ही हूँ कि अभी तक
                     तू अंजुमने- नाज में है,
समंदर की लहरें शांत हो गईं, पर तू अभी तक भी
                    मेरे दिलो-दिमाग में है //
             -------------------

वो मिली मुझसे, क्या जलव- ए- खुदाई है?
कल मेरे ही शहर में फिर से ताज आएगी,
बागों में बुलबुल भी होगी, गुले- अनार भी होगा,
वो मुझे भी नगमा- ए- खुशगवार सुनाएगी,
शिकवा भी होगा उसका तो टनटनाता हुआ,
हँसी से अपने खुशियों की आबशार लाएगी,
रूत हसीं बहेगी, मेरी पेशकश पर वो शरमाएगी,
सावन होगा तो मेरी जिंदगी में वो बहार लाएगी//

               राजीव रत्नेश
            मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
            ****************/

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!