Thursday, September 10, 2026

ये किसके खयालों में गुम हो रतन ( गजल )

ये किसके खयालों में गुम हो रतन
     ----- राजीव रत्नेश

तू आया न आया, दिल को तेरा खयाल हो गया/
हम जज्ब करते रहे, फिर भी मलाल हो गया/

आकर भी तू अब क्या करेगा इस महफिल में,
मेरे जीने-मरने का तू ही सवाल हो गया/

जनाजे में जो नहीं आया, तुरबत पे कैसे आएगा,
जमाना भी मुद्दई हुआ, कहर आसमान हो गया/

चंद लफ्ज तूने क्या कहे, तू हमारा हो गया,
आजा, ये घर तेरा है-- तू कब का मेहमान हो गया/

बरसी घटा बन कर, हर तरफ ये चाँदनी,
चाँद भी देखो, किस तरह मेरा हमनवा हो गया/

दिल के दर्द की सूरत बन कर ही अब तो आजा,
देख, मेरा दर्द भी, अब कितना सस्ता हो गया/

दुश्मन समझा था जिसे, दोस्त बन के घर में घुसा,
मेरे जाते ही न जाने उसका कैसा एहसान हो गया/

जोर-शोर उठी सागर की मौज, और तो और,
चूम कर मेरे कदम लौट गई, कैसा ये माजरा हो गया/

तूने तो न की थी कभी कदमबोसी मेरी,
सागर को जैसे आज मेरा ही आसरा हो गया/

ये किसके खयालों में, अभी तक गुम हो ' रतन ',
वो शख्स तो कब का, दुनिया से विदा हो गया//

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चाहत हद से गुजरने लगी है ( गजल )

चाहत हद से गुजरने लगी है
     --- राजीव रत्नेश

कली दिल की मचलने लगी है/
तेरी आस्जू फिर सँवरने लगी है/

दिल का तुझसे तकाजा है बस यही,
तू खुशी बन के दिल में उतरने लगी है/

मुहब्बत मेरी नाकाम वफा का सुबूत नहीं,
तेरी अदा ही अब चाल चलने लगी है/

तेरी आहट से धड़कन बढ़ी है मेरी,
खामोशी भी कुछ कहने लगी है/

तेरे आने की उम्मीद क्या जगी दिल में,
हर घड़ी अब मुझे खूबसूरत लगी है/

जिसे समझा था, महज एक खयाल,
वही तस्वीर दिल में ठहरने लगी है/

' रतन ' अब दिल को सँभालो अपने,
ये चाहत कहीं हद से गुजरने लगी है//

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Wednesday, September 9, 2026

दिल की बात कहने का अंजाम ( कविता )

दिल की बात कहने का अंजाम
     --- राजीव रत्नेश

फूलों भरी बस्ती में तेरी,
मुझे काँटा चुभ गया,
तुझसे दिल की बात कही और,
मैं तो दरिया में कूद गया/

दिल में जो कुछ छिपा रखा था,
आज तो उससे कह डाला,
सोचा था, वह मुस्कराएगी,
उसने चेहरा लाल किया/

शरमा- शरमा कर खुद भी तो,
लाल- सुर्ख हो गई,
मुझे भी पशेमाँ कर डाला,
जैसे सारी खता मेरी हो गई/

मैंने--'' तुम अच्छी लगती हो ",
वह चुपचाप खड़ी रही,
मेरी धड़कन बढ़ती जाती,
उसकी पलकें झुकी रहीं/

हाले- दिल उसको सुनाया,
मातमी सूरत उसने बनाई,
जैसे मेरी दास्तां सुन कर,
उसकी दुनिया उजड़ गई/

लेकिन उसकी आँखों में,
कुछ और ही कहानी थी,
मेरी तर्ज- ए- बयानी पर,
भीतर ही भीतर मुस्कान थी/

होठों को उसने सी रखा था,
आँखें मगर बोलती थीं,
मेरी सारी प्रेम- कहानी,
चुपके-चुपके तौलती थी/

मैं समझा दिल रख दूँगा,
उसके कदमों के आगे,
वह तब तो बोल पड़ेगी,
या फिर हाथ बढ़ाएगी/

वह तो मेरी हालत देख कर,
और मजे लेती रही,
मैं डूबा था प्रेम-सागर में,
वह किनारे बैठी रही/

अब जब उस दिन को सोचूँ तो,
खुद पर हँसी आती है,
दिल की बात कहने की भी,
कैसी सजा मिल जाती है/

फूलों भरी बस्ती में तेरी,
मुझे काँटा चुभ गया,
तुझसे दिल की बात कही और,
मैं तो दरिया में कूद गया//
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मुद्दतों बाद भी देना मुहब्बत की गवाही ( कविता )

मुद्दतों बाद भी देना मुहब्बत की गवाही
         ---- राजीव रत्नेश

ओ सितारे, चंदा और रात के नजारों,
मुद्दतों बाद भी देना, मुहब्बत की गवाही/

मिले थे मुकद्दर से, साथ गुजारे ये पचासों साल,
आँखों में धुंध छा गई, केश हुए अब श्वेत,
हिलने लगी दंत- पंक्ति, जिह्वा को मिला तालू का सहारा,
याददाश्त अब कम हुई, कौन बाँटेगा महफिल में खुशी/

ऐ बादे- सबा! आस्मां के झिलमिलाते सितारों
मुद्दतों बाद भी देना, मुहब्बत की गवाही/

कौन आया, कौन गया, जान्हवी और सन्ध्या आके चली गई,
बाकी की जिन्दगी कट रही अब बस चंदा के सहारे,
कर देना उनकी भी तकदीर रौशन, जो दूर हमसे हुए,
फरेब किया मुझसे, मालूम नहीं उनकी नैय्या लगी किस किनारे/

जमाने का मिजाज समझ, उनसे दूर खुद भी हम हुए,
ओ चाँद, सूरज और सितारों देना तुम गवाही/

सुब्ह को जब उठाया हमें, सूर्य-रश्मि ने सहला कर,
हम तमतमाए और बोले,' थोड़ा इंतजार कर '
अभी क्या है जरूरत, छेड़ने की दिल के तारों को,
मुस्करा कर चंदा बोली, सुब्ह- सुब्ह न तड़पाया कर/

किस धुन में हो, उठो, जागो, सूरज न देगा कोई निशानी,
हाथ पकड़ चंदा से बोला, मेरे बाद देना मुहब्बत की गवाही/

मौसम आने पर एक कली खिली हमारे आँगन में,
हमने घूम-घूम मिठाई बाँटी, सारे रिश्तेदारों के घर में,
प्यारी सी बेटी को पहले-पहल हमने पुकारा ' पूजा ',
हमारे साथ खुशियाँ मनाई मुहल्ले और सारे चमन ने/

माना कि बेलगाम थी हमारे प्यार के राह की गाड़ी,
ओ धरती के ऊपर चहकते परिंद देना तुम गवाही/

आफातो- मसायब जो आए जीवन में, झेले हम साथ,
हमारी ' कपट- मंत्री ' की विदेश नीति हुई दिल के पार
बैठे-बिठाए तर्के- ताल्लुकात सबसे करवाया ही,
उम्र भर न पाया उस ' गौहर ' ने शौहर का साथ/

हम गहरे पानी से, निकाल लाए बेशकीमती मोती,
ओ खिलखिलाते मंजर, बादे सबा के इशारों देना गवाही/

दो साल बाद फिर चंदा को देवी-दर्शन का लाभ मिला,
घर में पूजा की दुलारी बहन तनू का आगमन हुआ,
वक्त की ताकीद पर, मेरे मम्मी-पापा तक ने खुशियाँ मनाईं,
घर में ' सत्य नारायण की कथा ' का आयोजन हुआ/

कोई भी साल बेटियों की सालगिरह से अछूता न रहा,
देती है चंदा आशिर्वाद उन्हें, दिला कर देवियों की गवाही//
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Tuesday, September 8, 2026

इस बार भी झूला लगाया न होता ( गजल )

इस बार भी झूला लगाया न होता
         --- राजीव रत्नेश

मेरी जिंदगी की कश्ती का जो तू नाखुदा होता/
भँवर में भी मुझे तेरा ही फिर आसरा होता/

तेरे दूर हो जाने का अहसास था मुझको,
तुझे अपना बताता कैसे, जो तू मुझसे खफा होता/

अनजान सफर पे जाना ही था तुझको,
मिल कर मुझसे सफर और तवील न बनाया होता/

जख्म खाए थे तेरी बदौलत कितने हमने,
दूर होकर भी तूने काश! फासला न बढ़ाया होता/

सात फेरों के बंधन में, बाप की मर्जी से बँधी थी,
कैसे तुझे मनाता मैं, कैसे दिल को समझाया होता/

तू अपनी वफा का कैसे अब मुझे सबूत देती,
मेरी भरी महफिल में जो दिल पर न वार किया होता/

तेरी बरबादियों पर भी मैं चुप ही रहा अक्सर,
मेरे किरदार को तूने न यूँ बदनाम किया होता/

जमाना तो चुपचाप सुन रहा था तेरी- मेरी दास्ताँ,
उसे क्या गरज थी जो दरमियाँ हमारे आया होता/

कबसे करता रहा तेरा इंतजार ऐ जिंदगी!
तू और पहले लौट आती तो शायद फिर कुछ बना होता/

सावन आके बीत भी गया तेरे इंतजार में ' रतन, '
इस बार काश! तेरे लिए झूला नलगाया होता//

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Monday, September 7, 2026

तुझसे मिल कर तबीयत ( कविता )

तुझसे मिल कर तबीयत  ( कविता )
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तेरा भी उफनता यौवन है, मेरी भी मचलती जवानी है/
तेरी भी एक निशानी मेरे पास है, तेरी भी जिन्दगी एक कहानी है/

समंदर की मौज थी तू, मेरी कश्ती तो साहिल पे आनी है,
एक तरफ तेरा जोर है, जिससे कश्ती मेरी डगमगाती
है/

एक तरफ लहरों का शोर है, उधर एक जजीरे पर बजती शहनाई है,
मुब्तिला था मैं अपनी ही धुन में, उधर हाव- भाव पर 
तू खिलखिलाती है/

रूप मधुर, मनोहर, लावण्यमयी, चरण सुन्दर लटकाए
बैठी पानी में है,
तेरी नयन- मदिरा पीने को उन्मत्त मैं, परम उद्दीप्त हूँ, तेरी अलसित कहानी है/

नथ नाक की डोलाती एक जजीरे से दूसरे पे अपनी कश्ती में जाती है,
आँखों से मदिर- रस के प्याले छलकाते इस पार कभी
आ जाती है/

आ आजा कश्ती अपनी लेकर, तेरे जजीरे पे जाने की ठानी है,
जाल से क्यूँ निहारती मुझको, तुझे मुझ तक आने की
आजादी है/

तेरी दीदार को तरस रहीं आँखें, क्यूँ तू उन्हें बेवजह तरसाती है,
एक बार पास आ चेहरा दिखा, तू मृगनयनी है, मेरी शहजादी है/

अपनी भाव-भंगिमा का जोर चलाती है, कश्ती पुरजोर बहाती है,
.
आँखों में तिरते तेरे नीले बादल, इक बार रोज मेरे साहिल पे आती है/

मेरी कुटिया में बेधड़क आकर, रोटी- मछली मेरे साथ
खाती है,
प्यासी होती है तो, पानी की बोतल खरीद कर ही ले आती है/

कब होगा तेरा भाव- मनोहर- दर्शन, नयनों से तो खूब बात बताती है,
जीवन- बगिया मेरी आकर सुरभित कर ' रतन '
तुझसे मिल तबीयत खुश हो जाती है//

            राजीव रत्नेश इलाहाबादी
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खर्च की जबाँ की दौलत ( गजल )

खर्च की जबाँ की दौलत  ( गजल )
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सब कुछ गँवा के जागे भी तो क्या किया हमने/
छोड़ दिया तेरे लिए ये जमीं, ये आस्मां हमने/

सिकंदर भी जहाँ से गया, खाली हाथ गया,
देखा है लौटते हुए, हर एक कारवाँ हमने/

पिंजरा मिला तो उसमें ही उम्र कटती रही,
आजादियों के ख्वाब मगर कम न किये हमने/

तुमने भी सोचा होगा-- अब क्या करूँगा मैं,
आँखों में दर्द का सैलाब रख लिया हमने/

नजारों से अपने दिल को बहलाया किस तरह,
इक बात पर ही देखें हैं कितने तूफान हमने/

दरिया के बीच कश्ती अगर डूब जाए तो,
किसी ओर जाने से पहले पकड़े पतवार हमने/

तुरबत पे तेरी फूल चढ़ाने भी कौन आता,
रोने को भी न पाया कोई हमनवा हमने/

क्यामतों में जब भी हिसाब माँगा जाएगा,
किससे था तेरा इश्क-- लिया तेरा नाम हमने/

अपनी सफाई में तुम मेरा नाम लोगी क्या?
तुमसे मिलने का फिर भी ढूँढा रास्ता हमने/

ये बंधन यहाँ रहे, तो वहाँ क्या मलाल है,
उड़ने को फिर बना लिया अपना आस्मां हमने/

प्यार की बगिया में फिर फूल खिलाएँगे,
दुनिया के जख्मों को इस तरह भुलाया हमने/

जो कुछ कह न सके थे, यहाँ उम्र भर कभी,
खर्च की वहाँ, जबाँ की दौलत हमने//

          राजीव रत्नेश

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