Saturday, February 28, 2026

रोज-रोज के वादों का क्या ( गजल)

मेरे दिल की तड़पन को,
एक नया आयाम मिला/

पर अपने खोलने को,
उन्मुक्त आस्मान मिला/

खोजने थे मोती गहराई में,
समंदर का मुझे माप मिला/

अर्थहीन दिल की पगडंडी पर,
खिली बहार का साथ मिला/

दिल के जख्मों के लिए,
मदावा हुआ, तेरा इलाज मिला/

अपने लिए तो कम फिरभी,
तेरे लिए बेअंदाज मिला/

खरोंच लगी थी शीश- ए- दिल पर,
भरने को मरहम ईजाद किया/

फितरत है ये मेरे दिल की,
तुझे पाने को हर तरीका इस्तेमाल किया/

जो तू न मिली साहिल पे,
समंदर में जाकर जाल संभाल लिया/

मोती तो गहरे पानी में ही होता है,
ऊँचाई पर जाकर गहरी छलांग लिया/

हम तो कर मिटे तेरी अदा पे,
फुर्कत में ही याद किया/

एक सिसकारी के साथ बस,
तेरा ही तो एक नाम लिया/

यह भी जोश बस नया-नया है,
जो अदा- ओ- नाज का जाम पिया/

रोज-रोज के वादों का क्या' रतन',
' हीरक जयंती' का तुमसे ही आगाज किया//

                राजीव रत्नेश
            +++++++++++++

फिर शान से जनाजा निकला ( गजल)

तेरी जुल्फों की जद से निकला,
      तो राहों में न कोई सायबां मिला/
जहां कहीं तफ्तीश की, न मिला,
      जो मिला भी सामां, रायगां निकला/

अपना शहर छोड़ते वक्त अहाते में,
     एक पेड़ अपने हाथों लगा आया था,
ट्रेन से लौटा जो तेरे शहर से,
      वही शजर अपना पहचाना निकला/

कद्र की होती जो तूने मोहब्बत की,
      अजनबी शहर जान मैंने छोड़ा न होता,
तू अपने हाल में मस्त, सफर से मैं मस्त,
       सूटकेस से मेरे डायरी के सिवा न सामां निकल

मकतबे- इश्क नसों में खूं बन कर,
       दौड़ता फिरता था मेरे,
डर गई तू, साथ मेरा छोड़ा तुमने,
       तेरी मर्तबा आज तेरा अफसाना निकला/

तुझे चाहा, छक के पिया, लबों के प्याले से,
        वहम- वहम में तुझे क्या न बनाया मैंने,
जो कुछ भी लिखा आज तक,
        लबों से बह कर वो तेरा नगमा निकला/

आजमाने को तुझे तेरा दिल लिया भी,
         अपना दिल तुझे दिया भी,
मेरे अफसाने में मिलन नहीं लिखा,
         जो हुआ भी, वो मोहब्बत का शोरबा निकला/

मोहब्बत में जिल्लत उठाना क्या,
          जरूरी था, दस्तूरे- महफिल था तेरा,
हम तो इंकलाब के लिए निकले थे,
          बज्म में शोर कैसा बरपा निकला/

मदहोश होने को ही हम तेरी,
           महफिल में बरहना- पा चले आए,
पता था सागर था पहले से खाली,
           खाली तेरा अब तो पैमाना निकला/

दावते- जश्न दिया जाता है करीने से,
           लुभा के बुलाया जाता है सलीके से,
पिला-पिला के किया जाता है मदहोश,
           तेरी महफिल का ये उसूल पुराना निकला/

पीकर शैम्पेन तेरी निगाहों का,
            गिरते-गिरते भी हम संभल गए,
तेरे पीछे जो हम निकले,
            तो साथ मेरे सारा जमाना निकला/

बारीकियाँ मोहब्बत की गर समझ लेतीं,
             गैरों के दर पे यूँ न मैं पशेमां होता,
कर दिया पहले तो तेगे- निगह से कत्ल,
             फिर शान से' रतन' का जनाजा निकला//

             राजीव रत्नेश
        *****************

जिन्दगी के मजे ले लें( नज्म)

वो आएँगे और जामे- नजर पिलाएँगे,
इसी इंतजार ने मुझे मरने न दिया/
सौपेंगे वो मुझे अपनी भरपूर जवानी,
इसी बात ने मुझे आँखे मूँदने न दिया/

साथी थे वो बचपन के मेरे,
विछड़ गए थे आँधियों के शोर में/
हम किस कदर चाहते थे उन्हें,
कि लौटेंगे वो बारिशे- झकझोर में/

हाले-दिल और बयां करते किससे,
वही तो हाजिरे- सुकूं थे, सिमटे फासले,
दूर जाकर प्यासे थे वो भी, मैं भी
उनकी चाहत ने मेरे को संभलने न दिया/

कशिश थी कुछ यूँ मेरी सदा में,
लौट आना पड़ा मदमाती अदा से/
हम उन्हें मुला के भी क्या करते,
कोई दूसरा हमसे फांसते न बना/

अंधेरी गलियों से निकल कर,
नई सड़क पे उनसे मिला करते थे/
उस मिलन में बिछड़ना था शामिल,
एक बार ऐसी मिल, फिर बिछड़ना न हो/

तेरा इंतजार है जब तक सांसों का जहां है,
आबाद हमेशा रहेगी दुनिया, तमाशे यही रहेंगे/
लोग तो मिल- मिल कर बिछड़ते रहेंगे,
आजा जिंदगी के भरपूर मजे ले लें//

             राजीव रत्नेश

अशआर

जाने कहाँ गए वो अहबाब
-----------------------------

चांद-सितारों की सदा बात करते, सैर करते थे परिस्तान की,
जाने कहाँ गए वो अहबाब, बन गए थे जो दुश्मन मेरी जान के/
जमीं पर पाँव न पड़ते थे, आस्मानों में उनका ठिकाना था,
आधे से ज्यादा उनमें शामिल थे लोग मेरी ससुराल के/

                  ++++++++++

सोचा न था कि वो नाक भी छिनकते होंगे,
बस हम उनकी तरहदार नाक ही देखते रह गए/
जहाँ-जहाँ नाक छिनकी उन्होंने अपनी अदा से,
वहाँ-वहाँ खुद- ब- खुद तरह- तरह के फूल खिल गए//

                 राजीव रत्नेश
                """""""""""""""""""

अशआर

(१) चूम लिया, चाट लिया, चूस लिया, हर कोने से तेरी तस्वीर को,
      दिल बहला नहीं ऐसी तदबीरों से, हम भला और क्या करते/
      खुद को फुसलाने के लिए क्या था तेरी जुल्फे- तस्वीर के सिवा,
      संभलता नहीं दिल अब तो तुझ बिन, तू ही बता हम क्या करते/
                      ************

(२) तेरी आँखों में चमक, मेरी आँखों में पानी है,
      तू चौदहवीं के चाँद सी जगमग, मेरी रानी है/
      महबूब मेरे! तुझे हर कीमत पर अपना बनाना है,
      तू मेरे अफसाने के किरदार की तर्जे- बयानी है/
                    ***************

(३) आप मुद्दआ समझे, मगर क्या समझे क्या न समझे,
      काश! तफसील से हमें भी कुछ बताया होता/
      अपने ही हाथों जीत औ' मात है, हम भी कुछ करते,
      नसीब में जो हो, काश! सिलसिला आपने बढ़ाया होता/
                    *****************

(४) आखिर तुमने भी वही किया जो औरों ने किया,
      मौका आने पर न गैरत से अपने कोई काम किया/
     ' गिरा अनयन, नयन बिनु बानी' की व्याख्या न बनी,
      समझ नहीं आई मानस, तो तुलसी को क्यों बदनाम किया/
                     *******************

(५) तमन्ना तेरी की थी और त तुझे ही पाया,
      तुम्हें पाने के लिए हमने हर खतरा उठाया/
      तुम पराई थी, अपने से फिर भी दूर न जाना,
      तुम्हें दिमाग से समझा, दिल से अपना बनाया/
                      ***************

(६) एक तरफ तुम हो, एक तरफ मैं हूँ,
      अपना तो मुफलिसी में गुजारा होता है/
      तेरी नजरों का सिर्फ इशारा होता है,
      तेरा हर काम तो बस दिखावा होता है/
                      ************

                  राजीव रत्नेश
               """"""""""*****""""""

मेरी रगों में लहू का( गजल)

बहुत भोली, बहुत सादा ओ' मासूम है वो/
लगता उल्फत की बातों से अंजान है वो/

कितना ही बचें, शौक- ए- मोहब्बत रखते हैं,
आजकल मुझ पर बहुत मेहरबान है वो/

नजदीकियों में भी नजर से काम लेते हैं,
मुझे लगता, खाला- ए- शैतान है वो/

शिकव- ए- मोहब्बत तो बस बहाना है,
पास आने को मेरे बस अरमान है वो/

सुना है दिल के हाथों मजबूर हैं वो भी,
फिजाओं में चमने- इश्क गुल्जार है वो/

दिलनशीं वादियों में गुले- अनार है वो,
विसाल का मेरा खुल्लम खुल्ला इंतजार है वो/

राहे- वफा का मैं तो अदना मुसाफिर हूँ,
मेरे सफर की मंजिल, मेरा मुकाम है वो/

रोजो- रोज करती हुस्न का फसूं जिन्दाबाद,
मेरे गुलो- गुलिस्तां का तिफ्ले- दरबान है वो/

क्या मुझे चाहिए, समझता है ठीक से वही,
मेरे सफर का मुकम्मल इंतजाम है वो/

मेरी रगों में लहू का संचार है वो' रतन'
उसकी परस्तिश, खुदा का फरमान है वो//

            राजीव रत्नेश
         ++++++++++++

पीछे ही हटना था जो( गजल)

खूब तड़पे, चोट खा ली तनहाई में/
बैठा हूँ इंतजार में, पहले मोड़ की अमराई में/

चुभन दिल में होती है, बड़ी गहराई से,
हम भुला न पाए तुमको समझदारी से/

सरफरोशी की तमन्ना दिल में हमारे है,
आजा सू- ए- मकतल तू चतुराई से/

उमंगों से नहीं उछलता अब दिल,
नहीं बजती दिल में खुशी की शहनाई है/

दिल तप कर हो गया है रेगिस्तान,
अब तो आओ सजी धजी चूनर धानी में/.

किधर गए सपने, मंजिल से कहीं दूर,
आती हो याद, साथ हर जम्हाई के/

इश्क का बुखार तेरा दो रोज में उतर गया,
न ढूँढेंगे तुझे अब तेरी गुमशुदगी में/

यही तो कमी है कि तेरे पास दिल नहीं है,
जो था भी लगाया किसी तीरंदाज शिकारी से/

तुमसे बढ़कर एक से एक हैं तेरे मुहल्ले में,
तुम सा जिद्दी न देखा कभी जिन्दगी में/.

पीछे ही हटना था जो चार कदम' रतन',
बढ़ना नथा तुझे दो कदम आशिकी में//

             राजीव रत्नेश
        ******************

About Me

My photo
ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!