नावाकिफ नहीं तू मेरे ( गजल )
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अगर तेरी नजर का इशारा मिल गया होता/
मेरी एक ठोकर में ये सारा जमाना होता/
तेरी आँखों की नीली जमुना बहाव पे गर न होती,
कई गोते तेरी ठुड्डी को उठा के लगाया होता/
तुझसे ही जहनों में रौशनी है, सुकूने- दिल है,
तेरे आरिजों में तपिश सूरज की, कौन इनसे बावस्ता होता/
तुझे प्यार करता न करता, इकरार करता न करता,
कुछ भी न होता, मगर तेरा चाहने वाला होता/
कश्ती लेकर साहिल पे न आता, अगर तेरा आसरा न होता,
कैसे मिलता सिर्फ समंदर होता, न किनारा होता/
दिलचस्प हैं किस्से, कसमें गंगो- जमन के खाना,
क्या होता न तेरी कसम होती, न प्यार का सहारा होता/
मौजूद तू किरन में, चमके शबनम की तरह बागों में,
तुझसे दूर रह कर भी आखिर मेरा भला क्या होता/
नावाकिफ नहीं तू मेरे इश्क के उसूलों से,
क्या करता, हर हाल जो कश्ती को किनारे पे लाना होता//
राजीव रत्नेश
