Thursday, May 28, 2026

बुलाना और मनाना ( कता )

बुलाना और मनाना तो चलता ही रहेगा,
तुम मेरी अंतहीन सफर की हमसफर हो,
तुझे किस बात की कमी, जो' रतन' तुम्हारा है,
सवालों के घेरे में भले जिन्दगी बसर हो/

          राजीव रत्नेश

तेरे लिए साहिल को ठिकाना बनाया ( कविता)

तेरे लिए साहिल को ठिकाना बनाया  ( कविता)
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मेरी मिल्कियत में नहीं ये चाँद-सितारे,
न ही समंदर की मौज, न ये किनारे,
मैंने किया था सच्चा वायदा तुमसे,
कि दूँगा साथ तुम्हारा हर ठिकाने/

मैंने तुझसे हुस्नो- वफा की आरजू की थी,
तुम्हें अपना जानकर ही तुम्हारी जुस्तजू की थी,
कौन जानता था, राहे- वफा से कभी डगमगाएँगे,
हमको बस तमन्ना, तेरे जुड़े के फूलों की खुशबू की थी/

मैं तेरी राह में आया, तू मुझसे चहक कर मिली,
कौन जानता है तूने मुझे छला या खुद गई छली,
तेरी तड़प लिए किस- किस दौर से न गुजरा,
ऐ शोख तमन्ना! तू है छैल- छबीली थोड़ी मनचली/

मेरे तसब्वुर में तो तू ही तू थी, तेरे सिवा नहीं कोई और,
परवा न की किसी की, और भँवरों के भी तुझे इशारे,
नजाकतो- अदा तेरी, मुझको चमन से खींच लाई,
हटाया किस- किसको मेरी राहों से तूने बेरहम जमाने/

दिल लगाने के पहले ही दिल टूट गया,
तुझसे मिलने का आसरा भी छूट गया,
जाने किसने किए सारे मेरे जतन लूट लिए,
तुझसे मिलने आगे बढ़ा, जाने क्यूँ फिर ठिठक गया/

चला आया तो हूँ, तुझसे मुलाकात के बाद,
तू मेरी जाने- वफा, कैसा लगा फिराक के बाद,
मैं तेरा तो क्या, किसी का भी सहारा नहीं,
तुम भी तो आगे नबढ़ीं, दुआ सलाम के बाद/

चला तो हूँ, पर तेरी- मेरी राह अनजानी,
पहल मिलने की करनी होगी तुझे नाजनी!
हो सके तो जमुना किनारे फिर से आना,
हो जाएगी पूरी, रह गई है जो बात अधूरी/

दूर गगन में विहँसते हैं सितारे,
टूट जाते कितने हमारे आस के सहारे,
तू मिलना तो कोई कसक नरखना,
हम मिलेंगे किसी रोज तुझे शाम के झुटपुटे/

गर्दिशे- जहाँ से मुझे सरोकार न था कोई,
ख्याल था बस, तेरे रास्ते न आए दूसरा कोई,
मैं जानता था कि तू भले ही है अलबेली,
चूस न डाले पराग तेरा, तू कोमल नाजुक कली/

मुझसे तेरा इरादा कभी भी तो छिपा न था,
मेरे बिना तेरा भी इस जहाँ में गुजारा नथा,
साथ- साथ तलाशे- मंजिल को हम बढ़े थे,
हमें न किया कभी, राहे- मंजिल ने कोई इशारा/

गंगो- जमन की वादियों में घूमे, बैठे रहे तट पर,
आए कोई कश्ती जो मुसाफिरों को यहाँ उतारे,
हमें मिले मौका, हों सवार हो के मुसाफिर,
करें पार दरिया तेरी मुहब्बतों के सहारे/

अन्जान तू थी गर्दिशे- अइय्याम से अभी तक,
रास्ते का पत्थर तूने देखा न सुना था अभी तक,
तेरी मस्तीभरी, नशीली आँखों का नक्शा दिल में था,
तू कोई सुलझी हुई पहेली भी न थी अभी तक/

मुहब्बत तुझसे की तो हर दस्तूर निभाया मैंने,
तेरी गुस्ताखियों पर भी सीने से तुझे लगाया मैंने,
तु मेरी राहों में फूलों से भरी रहगुजर ही तो थी,
काँटों पर चलना तुझे भी सिखाया मैंने/

समंदर की मौज धी तू, साहिल पे न ठहरी,
आवाज तुझे दी, बाहों में मेरे तू आ समाई,
दूर का मंजर तो सुहाना, सफर था मस्ताना,
दिल की धड़कन बढ़ गई, जब तू जिंदगी में आई/

बहारों से मैंने कभी कोई वायदा नहीं किया था,
कि हर मौसम में आकर करूँगा रैन- बसेरा,
मुझे तो बस तेरे साथ का ही आसरा था,
चाहे काँटों पे चलाए, चाहे फूलों पर पग बढ़ाए/

तेरी झिलमिल सितारों वाली ओढ़नी जगमगाती थी,
कुछ बात थी कि तू अंदर ही अंदर कसमसाती थी,
तुझे खफा जानकर मेरे दिल पर क्या गुजरती थी,
मुझे मनाने को तेरी बाँकी चितवन ही काफी थी/

देखो सनम अब तुम दूर मुझसे जाने की न सोचना,
क्योंकि तुम मेरे ख्वाबों की हूर, परीजाद साकी हो,
आस्मान से उतरी हो या सात समंदर पार की हो,
मैंने तेरी जात कभी पूछी नहीं, मेरी बस सब्जपरी हो/

वायदा भी तो चाँद-सितारों किया न तुमने कभी,
आकर सीधे बन गई मेरे दिल का सहारा ही,
हर जनम में मैं गया था छला, तू कहाँ थी?
इस जनम में मिली तो हुआ दिल का ठिकाना ही/

तेरे लिए समंदर को ही अपनी जिंदगी का सहारा बनाया,
तेरे लिए मतस्यगंधा! साहिल को ही अपना ठिकाना
बनाया,
' रतन' ने कभी तुझको अपने से दूर न जाना- समझा,
तुझे ही अपने दिल की रानी और बाहों का सहारा पाया//

                  राजीव रत्नेश
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Monday, May 25, 2026

दो कितआत

हवा की जिद थी, जहाँ बिजलियाँ गिराने की,
मेरी धुन भी वहीं पर थी शमां जलाने की/
छोड़ दिए कुचाओ- दर, लगी दिल की बुझाने को,
जरूरत क्या थी, मेरे स्वप्न- महल को माचिस दिखाने की//

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हुकूमत की तलवारें भी म्यान में जंग खा गईं,
मेरे हाथ में थमी कलम, सदियों पे छा गई,
तनहाई दूर करने को, किसी का आसरा नहीं,
मेरी हुकूमत तो चंदा से थी, जिंदगी पे जो छा गई//

            राजीव रत्नेश
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कलम बनाम तलवार

आँधियों का भले ही झोंका आए,
या बवंडर नाच-गा कर आए,
जहाँ तलवारें भी कुंद हो जाती हैं,
कलम ने अपना ईमान नहीं छोड़ा//

दो कितआत एक शेर

महलों की पाबंदियों से खुली हवा में निकल आया हूँ,
हवेलियों की निगहबानियों से भी अब निकल आया हूँ,
दिल के चिराग को बार- बार तो जलाया है मैंने,
वक़्त के थपेड़ों को भीतर ही भीतर जज्ब किया है मैंने/

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अहले- दुनिया हमें बार- बार मना करते रहे/
हम हवा के सामने रौशन शमां करते रहे/
कौन कहता है, मुखालफत तुम्हारी की,
तेरे शौक के सामां ही तुझे पेश करते रहे//

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इधर भी है सिवा कुछ, उधर की मजबूरी,
न उनसे बताए बने, न उनसे छिपाए बने/

           राजीव रत्नेश
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Saturday, May 23, 2026

कितआत

वक्त की क्या बिसात
जो उम्र का एहसास दिलाए,
तेरा दिल वो गुले- गुलाब है,
जो रिवजां में भी मुस्कराए//

जमाने के सारे जख्म, सारे दर्द कहीं खो जाते है,
जब हम तेरी मरमरी बाहों के साए में सो जाते हैं,
अरमानों की दुनिया जब दिल में मचलती है,
ठंडक सी मिलती है तेरे दहकते रुख्सारों से//

           राजीव रत्नेश
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देना अपनी मरमरी बाँहों का सहारा ( कविता)

देना अपनी मरमरी बाहों का सहारा  ( कविता)
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तेरी मदभरी आँखों में प्यार भरे अफसाने हैं,
घुंघराली अलकों में झूमते सावन के तराने है,
नजाकत- ओ- अदा में तू सबसे बढ़कर है,
डाल दे गले में जरा अपनी मरमरी तू बाहें/

तुझसे अलगाव मेरा कभी हो न पाएगा,
पीकर जाम तेरे हाथों से, सुरूर मुझे आएगा,
बाली उमर में थकान तुझे खुदारा न हो,
बस तू देना जरा, अपनी मरमरी बाहों का सहारा/

गैरों से बात करती हो, तो दिल जलता है मेरा,
दूर भगाने को उसे, दिल उमगता है मेरा,
कोई तुझे तकलीफ दे, नहीं, मैं नहीं सह सकता,
दिल मेरा हल्का करने को, देना अपनी मरमरी बाहों का सहारा/

दिल न तजवीज किया था, लाखों में तुझे,
दिल ने अपना माना था, लाखों में तुझे,
तू मौज- ए- समंदर थी, अगणित लहरों में,
करीब दिल के आना, देना अपनी मरमरी बाहों का सहारा/

जाने क्या लिख डाला था, औराके- हैरानी पे,
माँग बैठा था क्या तुझसे, प्यार की निशानी में,
तू मेरी है और सदा मेरी ही हो के रहेगी,
वुसअते- सहरा में, देना अपनी मरमरी बाहों का सहारा/

दिलदार तूने कहा था, रतनार तुझे मैंने कहा था,
तेरे लिए जमाने के जख्मों का दर्द मैंने सहा था,
कली-कली शोख- चंचल थी चमनो- गुल्जार की,
नकार कर भौंरों की गुंजन, देना अपनी मरमरी बाहों का सहारा/

आने वाली बहारें आके ही रहती हैं जीवन में,
मिलते ही हैं सहारे, मिलने वाले जीवन में,
पतझड़ के जर्द पत्तों में कोई जीवन नहीं होता,
प्यार के सब्ज गुल देकर, देना मुझे अपनी मरमरी बाहों का सहारा/

कंदीले- कुर्बत जला, पास आ कर रूखे- रौशन दिखा,
दिखा अपने चंपई होंठों से फूलों का झड़ना,
ऐ सुब्हे- सीमी! आकर मुझे सोते से जगा,
मुँह धुलाते हुए, देना अपनी मरमरी बाहों का सहारा/

जीने से चढ़ते- उतरते, निगाह अपनी नीची रखना,
रेलिंग के सहारे, मेरे कमरे में अपना जादू दिखाना,
गुलाब मेरे टेबल के गुलदस्ते में अपने हिसाब से सजाना,
गुले- आरिज देकर, देना मुझे अपनी मरमरी बाहों का सहारा/

कुछ तो बात है गजब की, तेरी सूरते- नूरानी में,
उससे बढ़ कर कशिश है, नीली आँखों की गहराई में,
मुर्झाए गुल खिल उठते हैं, तेरी मीठी- मधुर सदा से,
मुझ खाकसार से मिलना तो, देना मुझे अपनी मरमरी बाहों का सहारा//

                 राजीव रत्नेश
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नूर बरसता है कैसा रुख पे तेरे,
महफिल के उजालों में,
होड़ लग जाती दीवानों में, पहले ही
तुझ तक पहुँच पाने की/
शमां मंद पड़ जाएगी, जानता हूँ,
दिल बिस्मिल है अर्जे- मस्तानी से,
पहले कर मुझे मदहोश,
फिर करना कोशिश शमां के रुबरु होने की//

           राजीव रत्नेश
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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!