Friday, September 25, 2026

एक जमाने के बाद आई मुझे याद----- गजल

एक जमाने के बाद आई मुझे याद
+++++++++++++++++++++
                राजीव रत्नेश

तसव्वुर में तेरे बिलखती रही पैमाने की याद,
एक जमाने के बाद आई मुझे मयखाने की याद/

दिल में आहें भर रही है, बाल बिखराए हुए,
लड़खड़ाने, गुनगुनाने, नाचने-गाने की याद/

नजरों से जब वो बेतकल्लुफ हो पिलाने लगे,
नसीब मेरे चटके हुए उस पुराने पैमाने की याद/

काले बादलों में गुम है आज मेरा चाँद,
बुझी शमा के धुँए में जैसे परवाने की याद/

मकबरों से आ रही है शाम के धुँधलके में,
एक- एक रफीक के बिछड़ जाने की याद/

भूलने की कोशिश भी बेतरह करता हूँ,
रहती है दिल में फिर भी तेरे अफसाने की याद/

कातिल मेरा मुझे ढूँढता रहा पूरे शहर में,
लौटा भी तब, जब आम हुई उसके गुजर जाने की बात

सीना खोल कर उसके सामने आ भी सकता हूँ कैसे,
वो हैं पुराने तीरंदाज, मुझे अब भी उनके निशाने की याद/

छोड़ कर मुझे तन्हा वो सफर पर चला गया,
कसकती है आज भी मुझे उस बेगाने की याद/

आई है रह-रह के गिरती बिजलियों के रूप में,
एक शब उनके पर्दा उठा कर आने की याद/

सूरज की पहली किरन ने जब पहले गुल को परखा,
दिल ने किए रात के सारे नजराने की याद/

राजीव, रात गई तो लगा सब भूल गया हूँ,
फिर दिल ने चुपके से दिलाए उसी जमाने की याद//

           """""""""""""""

तहरीर- ए- रतन ( सौगात ७१ से ८० तक )

सौगात ७१------ तनहाई की गूँज

लोग शोर से डरते हैं, मैं सन्नाटों से प्यार करता हूँ,
यहाँ मैं खुद से मिलता हूँ, और खुद का ही इंतजार करता हूँ/
बहुत भीड़ थी दुनिया में, जहाँ पहचान खो गई थी मेरी,
अब अपनी खामोशी में ही, अपना विस्तार करता हूँ/
' रतन ' को किसी महफिल की अब जरूरत न रही,
मैं अपनी कलम की आवाज से ही अब इकरार करता हूँ/

सौगात ७२ ----------- संस्कारों की पूँजी

विरासत में हमें कोई महल या जागीर न मिली,
पर संस्कारों की वो पूँजी मिली, जो कभी कम न हुई/
मुठ्ठीगंज के उन बुजुर्गों की दुआएँ साथ हैं मेरे,
इसलिए नोएडा की इस चकाचौंध में, आँखें नम न हुईं/
' रतन ' ने सादगी को ही अपना गहना मान लिया,
कि सच्ची अमीरी वही है, जो कभी बरहम न हुई/

सौगात ७३ ------------- विश्वास का लंगर

जब नाव डगमगाई तो ' पूजा ' का नाम याद आया,
लहरों के उस शोर में, बस वही पैगाम याद आया/
हमने तो छोड़ दी थी उम्मीद, साहिल पे पहुँचने की,
पर डूबते को तिनके की तरह, वो इबादत का काम याद आया/
' रतन ' अब तूफानों से डरना कैसा, जब मांझी वो खुद है,
हमें तो उस पतवार से, अपना अटूट यकीन याद आया/

सौगात ७४ ------------- दुआओं का हिसाब

हमने कभी दुनिया से अपना हक नहीं माँगा,
बस खुदा से सबकी खुशियों का, थोड़ा-सा हिस्सा माँगा/
लोग माँगते रहे दौलत, शोहरत और ऊँचे मकाम ' रतन ',
हमने तो बस अपनों के चेहरे पर, नूर का एक किस्सा माँगा/
सत्तर के पार भी ये कलम, इसीलिए जवान है मेरी,
कि मैंने हर दुआ में, सबका भला और वफा का हिस्सा माँगा/

सौगात ७५ -------- तीन चौथाई  ( पचहत्तर की सौगात )

पचहत्तर सौगातें, जीवन के तीन चौथाई सफर का आईना है,
यहाँ हर अनुभव कड़वा है, तो हर याद एक सुहाना बहाना है/
अब मंजिल की लकीरें, साफ दिखने लगी हैं ' रतन ',
अब तो बस इस तहरीर को, दुनिया के दिल तक पहुँचाना है/
सफर का आखिरी हिस्सा, सबसे खूबसूरत होगा,
कि अब तो बस रूह को, रुह से मिलाना होगा/

सौगात ७६ ------------ मंथरा का दौर

आज के दौर में मंथरा हर घर में नहीं, हर मन में रहती है,
जो रिश्तों के बीच जहर की धीरे से धार बहती है/
हमने तो राम बनने की कोशिश में, सब कुछ त्याग दिया,
पर ये दुनिया है कि बस, अपनों से ही दूरियाँ सहती है/
' रतन ' संभल कर चलना, इस कलयुगी समाज में,
यहाँ मीठी बातों के पीछे, साजिशों की गहरी नदी बहती है/

सौगात ७७ ---------------- सच का लिबास

झूठ के रेशमी कपड़ों से, सच का टाट भला होता है,
जो रूह को सुकून दे, वही घाट भला होता है/
दिखावे की दुनिया में, सब कुछ बिक जाता है ' रतन ',
पर जो अपने उसूलों पे टिका रहे, वही ठाठ भला होता है/
हमने तो सच्चाई को ही, अपना ओढ़ना- बिछौना बना लिया,
कि अंत में तो बस, नेक- नीयती का पाठ भला होता है/

सौगात ७८ -------------- यादों का कारवाँ

मुठ्ठीगंज से नोएडा तक, यादों का एक लंबा सफर है,
हर मोड़ पे एक कहानी, और हर कहानी में एक असर है/
कभी संगम की लहरें थीं, कभी यमुना का किनारा था,
आज इन कंक्रीट के जंगलों में, बस यादों का ही घर है/
' रतन ' ने तो हर शहर को अपना ही प्यार दिया,
पर अपनी मिट्टी की सोंधी खुशबू का, आज भी वही असर है/

सौगात ७९ --------------- विश्वास की मशाल

जब रास्ते अँधेरे हों, तो अपनी मशाल खुद बनना,
दूसरों के भरोसे जीने से बेहतर, अपनी आग में जलना/
' पूजा ' के नाम का जो सहारा मिला है हमें ' रतन ',
उसी के दम पे सीखा है हमने, हर तूफान से लड़ना/
गिरने का खौफ उन्हें होता है, जो जमीन से नहीं जुड़े,
हमने तो मिट्टी से ही सीखा है, हर हाल में सँभलना/

सौगात ८० ---------------- अस्सी का पड़ाव

अस्सी सौगातें, अस्सी अनुभवों की एक गहरी किताब है,
यहाँ हर सवाल का जवाब और हर दुःख का हिसाब है/
अब मंजिल का दरवाजा, बस दस्तक का इंतजार कर रहा है,
कि ' तहरीर- ए- रतन ' का सपना, अब हकीकत का गुलाब है/
बीस कदम और बाकी हैं, इस महायज्ञ को पूरा करने में,
फिर तो बस खुशियों का जाम, और यादों का शबाब है/

             -------------&&&&-----------

Thursday, September 24, 2026

तेरी मेरी जब मुलाकात होगी-----( गजल )

तेरी- मेरी जब मुलाकात होगी
                  राजीव रत्नेश

किसी तरह सुबह से शाम होगी,
तेरी मेरी जब मुलाकात होगी/

मुझ मुसाफिर की नहीं कोई मंजिल,
जहाँ दिन ढलेगा वहीं रात होगी/

सरे- शाम ही दिल धड़कने लगा है,
तेरी दस्तक नहीं, मेरी आवाज होगी/

जहाँ आखिरी मेरी साँस होगी,
इक नए सफर की शुरूआत होगी/

उम्र को सालों में नापना कैसा,
वो ज्यादा से ज्यादा दो-चार साँस होगी/

डाल को एक बार क्या छोड़ा,
ढूँढता हूँ कहीं बरगद की छाँव होगी/

मैं तेरी हर बात याद कर रोता रहा,
तू मेरी ही कहानी की बात करती होगी/

उम्र की तरह जाए तो चाल बदलनी होगी,
वो अब तक शायद मेरे इंतजार में होगी/

शाम की सलीबों पर मेरे नाम से वो,
कोई न कोई तहरीर उकेरती होगी/

दुश्मनों के बीच मुहब्बत रास्ता ढूँढती है,
कितनी कशमकश में मेरी औकात होगी/

मुकद्दर ने साथ दिया तो यकीन कर,
एक ही तट पर हमारी कश्ती साथ होगी/

कल सहरा थी, समंदर होकर बह निकली,
वो भी तो आखिर घर-परिवार वाली होगी/

किसे खबर है, किससे उसका पता पूछूँ,
सिसकते- सिसकते किस तरफ गई होगी/

मुहब्बत के खेल में अपने लिए हार चुनी,
वजह भी न थी कोई तुमसे हार की/

झील में उतरा चाँद ऐ जाने- गजल!
मेरी तुमसे अब कब बात होगी?

रास्ते चाहे जुदा-जुदा हों ' राजीव ' अपने,
दिल में फिर भी वही मुलाकात होगी/

            """"""""""""""""

याराना लगता है------ गजल

याराना लगता है
      ---- राजीव रत्नेश

शिकवा अब तुझसे कैसा, तेरा-मेरा याराना लगता है,
तेरा मिलना या न मिलना, अब भी तेरा बहाना लगता है/

कितना आसान है कहना भी कि तू मेरी है, मगर,
तेरे- मेरे बीच का फासला भी पुराना लगता है/

गुज़र गईं दिल से अभी-अभी, दफ्न हुईं कई दास्तानें,
तेरे- मेरे साथ का फिर भी साफ- सुथरा अफसाना लगता है/

जमाने को मेरी दरियादिली शायद पसंद न थी, इसलिए,
तुझको- मुझसे दूर करने का उसका नया बहाना लगता है/

रोज-रोज की कवायद तेरे घर तक की शाम- ए- गम हो गई है,
मुझे तो आज का चाँद भी कुछ नया-नया सा लगता है/

बरबादियों का मेरे जश्न मनाया रकीबों ने जोर-शोर से,
मुझे तो उनका शोर- ओ- गुल भी उस्तादाना लगता है/

कश्ती को साहिल से लगने नहीं देने की तमन्ना है मेरी,
यूँ ही बस हवा में पतवार चलाना मुझे अच्छा लगता है/

आस्माँ से उतरे हों जैसे सितारे जमीं पर,
तू मुझे अपने लिए फ़लक का नजराना लगता है/

गिर कर जो नहीं उठते, अपने साथ बुरा करते हैं,
गिरना नहीं होता बुरा, उनको समझाना पड़ता है/

सिल्सिले से राहों में इश्क के बढ़ना हर हाल सही है,
दफअतन किसी के गले पड़ना नहीं अच्छा लगता है/

झिलमिलाती चाँदनी में जरा एक बार नहा कर तो देखो,
शफ्फाक बदन भी बिन श्रृंगार कहाँ अच्छा लगता है/

राजीव, अब शिकवा भी क्या उस बेवफा से कीजिए,
जिसका हर एक जख्म भी अपना- सा पुराना लगता है/

                """""""""""""""""""

तहरीर- ए- रतन ( सौगात ६१ से ७० तक )

सौगात ६१------ अक्स की तलाश

भीड़ में अक्सर खुद को गुम पाया है हमने,
शहर की चकाचौंध में अपना ही साया गँवाया है हमने/

लोग ढूढते हैं खुदा को ऊँची मीनारों में ' रतन ',
पर उसे तो अपनी रूह के कोनों में पाया है हमने/

' तहरीर ' का हर लफ्ज एक आईना है मेरी जान,
जिसमें हर बार अपना ही एक नया अक्स पाया है हमने/

सौगात ६२------- पुरानी चिठ्ठी

दराज में रखी वो पुरानी चिठ्ठी आज फिर से बोल पड़ी,
बचपन की यादों को जैसे कोई खिड़की खुल पड़ी/

मुठ्ठीगंज की वो मिट्टी, वो स्याही और वो कागज,
जाने क्यूँ आज नोएडा की इस रात में आँखें भर पड़ी/

' रतन ' वक्त तो निकल गया पर यादें वहीं ठहरी हैं,
जैसे किसी ने ठहरे हुए पानी में कोई कंकरी दे मारी/

सौगात ६३------- विश्वास का आधार

भरोसे की नींव पर खड़ा है ये मरा पूरा संसार,
वरना लहरें तो कब की ले डूबतीं मेरा ये घर बार/

' पूजा के पतवार ' ने ही दी है डूबते को एक नई उम्मीद,
उसी के सहारे खड़ा है ' रतन ' आज भी बन के खूंखार/

दुनिया लाख चालें चले हमें गिराने की यहाँ,
पर दुआओं का ये किला है बड़ा ही असरदार/

सौगात ६४ -------- अधूरी हसरत

हसरतें तो बहुत थीं पर कुछ का पूरा न होना ही अच्छा था,
वरना मंजिल की तलाश का ये सफर बहुत ही कच्चा था/

ठोकरें मिलीं तो समझ आया कि कौन अपना है कौन पराया,
बुराई के उस दौर में भी मेरा दिल बहुत ही सच्चा था/

' रतन ' ने तो हार में भी जीत का रास्ता ढूँढ लिया,
शायद इसीलिए ये सादगी का लिबास मुझपे जँचता था/

सौगात ६५------------ सत्य की राह

कड़वा होता है सच पर सुकून बड़ा देता है,
झूठ का मीठा शर्बत बस प्यास बढा देता है/

हमने तो सच बोलने की हिम्मत विरासत में पाई है,
जो कायरों को भी ' रतन ' राह- ए- हक दिखा देता है/

पैंसठ सौगातें गवाह हैं मेरे इस अटूट संकल्प की,
कि शब्दों का ये कारवाँ अब मंजिल का पता देता है/

सौगात ६६-------- वक्त की अमानत

ये साँसे, ये यादें, सब वक्त की अमानत हैं,
यहाँ कुछ भी नहीं अपना, बस सब उसकी इनायत है/

हमने तो गुजारी है उम्र, दूसरों के दर्द बाँटने में,
खुदा का शुक्र है कि हमें कलम की मिली ये रियासत है/

' रतन ' को क्या डराएगा, ये वक्त का बदलता मौसम,
जिसके पास दुआओं की दौलत, उसकी तो सल्तनत है/

सौगात ६७ --------- सलीका और मिजाज

बात करने का सलीका, इंसान की पहचान बताता है,
कौन कितना बड़ा है, ये उसका मिजाज बताता है/

महलों में रहने वाले भी, कभी-  कभी छोटे रह जाते हैं,
और फकीरों का बड़प्पन, उनका अंदाज बताता है/

हमने तो मुठ्ठीगंज की गलियों से, यही तहजीब सीखी,
कि झुकता वही है ' रतन ', जिसमें कुछ जान होती है/

सौगात ६८---------- धुँध और रौशनी

जब तक चारों तरफ धुंध हो और रास्ता न नजर आए,
तब अपने भीतर के दीये को थोड़ा और जला लेना/

दुनिया लाख कोशिश करे, तुम्हें अँधेरे में धकेलने की,
बस तुम ' पूजा ' के विश्वास से एक नई राह बना लेना/.

' रतन ' गिरना बुरा नहीं है, गिर कर न उठता बुरा है,
हर चोट को अपनी तरक्की का, एक सीढ़ी बना लेना/

सौगात ६९ ----------- किरदार का आईना

आईना कभी झूठ नहीं बोलता, अगर देखने वाला सच हो,
चेहरे पे जमी धूल तो मिट जाएगी, अगर नीयत साफ हो/

हमने तो हर लम्हे को, बड़ी ईमानदारी से जिया है,
चाहे रास्ता काँटो भरा हो, या मंजिल बड़ी दूर हो/

' तहरीर ' में जो अक्स दिखता है, वो मेरा असली चेहरा है,
जिसमें न कोई बनावट है ' रतन ', और न कोई गुरूर है/

सौगात ७०  ---------- सप्तक ( सत्तखीं सौगात)

सत्तर सौगातें जीवन के सप्तक की तरह गूँजती हैं,
ये वो राग है, जो सीधे रूह को छूते हैं/

सफर अभी जारी है और कलम अभी प्यासी है,
अभी तो उन मंजिलों के ख्वाब, हमारी पलकों पे झूमते हैं/

' तहरीर- ए- रतन ' की ये यात्रा, अब एक मुकाम ले रही है,
जहाँ सौ का लक्ष्य, अब आँखों के बेहद करीब है/

               ---------------------

तहरीर- ए- रतन ( सौगात ५१ से६० )

सौगात५१----- नई सुबह का आगाज

पचास के पड़ाव ने एक नई उम्मीद जगाई है,
कलम ने फिर से कागज से वफा की कसम खाई है/

मंजिल अभी दूर है पर हौसला कम नहीं ' रतन ',
हमने तो हर अँधेरी रात के बाद एक नई सुबह पाई है/

 ' पूजा ' के उन्हीं पतवारों को फिर से थाम लिया हमने,
लहरों ने फिर से हमें ललकार कर आवाज लगाई है/

सौगात ५२----- रिश्तों की धूप

रिश्तों की इस कड़ी धूप में यादों की छाँव बड़ी है,
जो बीते बीते कल की बातें थीं आज आँखों में खड़ी हैं/

मुठ्ठीगंज की उन गलियों का वो बचपन याद आता है,
जहाँ बिना किसी मतलब के खुशियाँ बाजार में पड़ी थीं/

अब तो नोएडा की इन दीवारों में सन्नाटा गूँजता है ' रतन ',
वो पुराने यार, वो पुरानी बातें, बस अब यादों की कड़ी हैं/

सौगात ५३ ------- इंसानियत का मोल

चेहरे पे चेहरा लगा कर, यहाँ लोग घूमते हैं,
इंसानियत को छोड़ कर, पत्थरों को चूमते हैं/

हमने तो गरीब की आह में, खुदा को ढूँढा ' रतन ',
जबकि लोग महलों की रौनक में, बेसुध होकर झूमते हैं/

 ' तहरीर ' में जो लिखा है, उसे अमल में ला सकूँ तो जानूँ,
वरना शब्दों के ये जाल तो हर तरफ ही झूमते हैं/

सौगात ५४------- वफा की महक

फूलों की उम्र तो बस एक दिन की होती है,
पर वफा की महक सदियों तक नहीं खोती है/

हमने जो बीज बोए थे मोहब्बत और यकीन के ' रतन ',
आज उनकी फसल मेरी रूह के आँगन में सोती है/

जमाना लाख कोशिश करे, हमें मिटाने की यहाँ,
पर दुआओं की ये माला कभी नहीं खोती है/

सौगात ५५------- वक्त का तराजू

वक्त के तराजू में खुद को तौल कर देखा हमने,
भारी निकला हमारा दर्द और खुशियाँ कमजोर निकलीं/

पर उस दर्द में भी एक अजब सी लज्जत थी ' रतन ',
कि हर ठोकर के बाद मेरी शरिव्सयत और निखरी/

' तहरीर- ए- रतन ' के ये पन्ने गवाह हैं इस बात के,
कि जमाने की हर चाल मेरे यकीन के आगे कमजोर निकली/

सौगात ५६-------- मुखौटों का बाजार

बाजार लगा है मुखौटों का, हर चेहरा बिकाऊ है,
यहाँ सच की कीमत कम और झूठ बड़ा टिकाऊ है/

हमने तो अपनी सादगी का दामन नहीं छोड़ा ' रतन ',
चाहे जमाना कहे कि हमारा अंदाज पुराना और ऊबाऊ है/

जिसकी रूह में चमक हो उसे श्रृंगार की क्या जरूरत,
चेबाहरी चमक-दमक तो बस दुनिया के लिए दिखाऊ है/

सौगात ५७-------- ' स्मृति शेष ' ( इलाहाबाद की एक शाम )

यादों के उस पुराने बक्से में एक शाम दबी बैठी है,
जो इलाहाबाद के संगम- तट पे हमसे कभी रुठी थी/

वो कुल्हड़ वाली चाय और दोस्तों की वो महफिल,
अब नोएडा की इन इमारतों में कहीं खो सी गई है/

' रतन ' आज भी उसी मोड़ पर खड़ा है अकेला,
जहाँ जिन्दगी की रफ्तार हमसे कहीं पीछे छूट गई है/

सौगात ५८-------- कलम और करुणा

मेरी कलम जब भी चली किसी के आँसू पोंछने को,
खुदा की कसम, मुझे अपनी इबादत मुकम्मल लगी/

सिर्फ शब्दों को सजाना मेरा मकसद नही ' रतन ',
जब तक किसी दुःखी दिल को मेरी बात मरहम न लगी/

' तहरीर ' वही सच्ची है जो इंसानियत का दर्द बाँट ले,
वरना कागज काले करने वालों की यहाँ बड़ी भीड़ लगी/

सौगात ५९-------- सब्र का फल

आँधियों ने बहुत कोशिश की मेरा आशियाना उजाड़ने की,
पूर ' पूजा ' के यकीन की बुनियाद बड़ी ही गहरी थी/

हम चुप रहे तो दुनिया ने समझा कि हम हार गए,
उन्हें क्या पता कि हमारे सब्र की गहराई, बड़ी ही गहरी थी/

' रतन ' ने तो वक्त को ही अपना गुरु मान लिया,
अब हर  मुश्किल की लहर हमारे आगे ठहरी थी/

सौगात ६०-------' षष्ठी पूर्ति '  ( साठवीं सोपान )

साठ सौगातें साठ अनुभवों की एक माला है,
जिसे हमने बड़े जतन से अपने दिल में पाला है/

आधा रास्ता कब बीत गया, पता ही न चला ' रतन ',
अब तो मंजिल की चमक से हर तरफ उजाला है/

कलम अभी थकी नहीं, न स्याही ही कम हुई है,
अभी तो सौ का आंकड़ा छूने का जज्बा निराला है/

            -----------------

Tuesday, September 22, 2026

तुझसे दूरी अब अखरती है----- गजल

तुझसे दूरी अब अखरती है
        ---- राजीव रत्नेश

तुझसे दूरी अब अखरती है,
खामोशी तेरी मुझे खलती है/

तेरे लिए दिल में हसरतें हैं,
कोई तमन्ना नहीं सँवरती है/

सावन के पड़े झूले हैं, लेकिन,
साथ आकर तू पेंग बढ़ाती नहीं है/

बारिश में जंगली फूल खिले हैं,
कली दिल की मगर खिलती नहीं है/

फस्ल- ए- आरजू लहलहा रही है,
आजा, मिलने की बारी तेरी है/

रात ढलती है, नींद आती नहीं,
तेरी यादों में रात कटती है/

तेरे बिन मेरा मकाँ भी सूना है,
हर तरफ एक उदासी रहती है/

लिखता हूँ कि अबकी अकेला हूँ,
तुझसे दूरी समझदारी नहीं है/

रतन, इतना तो अब समझ ले तू,
दूर रहना भी कोई मजबूरी नहीं है//
          """""""""

About Me

My photo
ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!