Wednesday, May 20, 2026

नई- नई राहें ईजाद होंगी ( कितआत)

अब तो जहाँ भी जाएँगे, चंदा साथ होगी
उसकी चाँदनी में हर चीज साफ होगी
यही हार्दिक इच्छा, वो हर कहीं मेरे साथ हो
आगे बढ़ने के लिए नई- नई राहें ईजाद होंगी

              राजीव रत्नेश

एक पंथ दो काज होगा ( कविता)

एक पंथ दो काज होगा  ( कविता)
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याद तेरी बरबस आती है 
कभी ज्यादा तो कभी कम आती है
इस जिन्दगी का क्या भरोसा
सांस जबकि थम के आती है

यादों की घटा घनघोर है
बादलों का गर्जन झकझोर है
हम तुझे अब क्या समझाएँ
मुझे बस तेरी बातों का जोर है

जैसे-जैसे मैं बढ़ता जाता हूँ
तू कोमल कमनीय होती जाती है
समंदर से निकली प्यार की मोती है तू
स्फटिक चाँदनी है, बड़ी रमणीक है तू

गीत मनोहर, स्वर वीणा के मंद हुए
मंद-मंद तू मुस्कराती है
सुन मेरे गीत मधुर
हिय में ही हरषाती है

मघुबन में तो राधा थिरके
तू संग सखियों के राग अलापे
मृगछौने इधर- उधर भागे
कान्हा की वंशी जब गूँजे

बरसाने में उत्सव है
आज यहाँ कन्हैया पधारे
गोकुल में हो जैसे त्यौहार
हर तरफ बहते दूध के धारे

मक्खन, दही आज नबचेगा
ग्वाल- सरवा को छक के भोग लगेगा
मंदिर- मंदिर गोपियाँ दर्शन करेंगी
कान्हा अब द्वारिकाधीश कहाएंगे

गोपियाँ पकड़ राह आगे-आगे चलेंगी
दूध बिकेगा, दर्शन भी कान्हा के होंगे
एक पंथ दो काज होगा
दूध के दाम, दर्शन बेदाम मिलेंगे

चलो सखी एक बार हम भी
घूम आएँ मथुरा और बरसाने
नैन- चकोर, कृष्ण दर्शन को प्यासे
लगेगी जीवन- नैया तभी किनारे//

         राजीव रत्नेश
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गजल पर कमेंट्स

ख्याल था जो कभी, वो अब वजूद बन गया/
रतन की अकीदत का, चंदा का( सुजूद) सजदा बन गया


शिकारे सी खामोशी है, जमुना का विस्तार है/
रतन की इस गजल में, बस चंदा से अटूट प्यार है//

              कमेंट्स
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हम जिसे मुहब्बत का गुमान समझे थे( कितआत)

शिद्दत की इबादत हो तो वही अकीदत बन जाती है/
दिल का खुलूस आगे चल कर मुहब्बत बन जाती है/
हम तुम्हें क्या बतायें, तुम्हारे साथ ऐसा लगता है,
हम जिसे मुहब्बत का गुमान समझे थे, वो हकीकत बन जाती है//

                    राजीव रत्नेश
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तेरे सिवा किससे प्यार का इरादा करूँ ( गजल)

तेरे सिवा किससे प्यार का इरादा करें  ( गजल)
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देखा तुझे, चाहा तुझे, अपना भी बनाया तुझे/
तेरी खुशी और गम में, कलेजे से लगाया तुझे/

तूने अपना समझा जहेनसीब! तेरी वफा के कद्रदां,
जब-जब तू रूठी, सारी- सारी रात मनाया तुझे/

मुहब्बत की बारीकियाँ और लाचारियाँ तू जाने,
जहाँ समझ न पाए, सोते से हमने जगाया तुझे

जब जब प्यार तेरे लिए दिल में ज्यादा उमड़ा,
बाहों में भरकर ओ बेखबर! चूमा बेतहाशा तुझे/

प्यार दिया तूने भरपूर, आँखों के वो लबरेज पैमाने,
सारी रात तुझे अपने सामने ही संवारा तुझे/

नशा चढ़ा तेरा कभी मुझ पर से उतरा ही नहीं,
जब तेरी जरूरत महसूस हुई, लगाया आवाजा तुझे/

पेड़ों को शाखें, शाखों को पत्ते, अता जिसने किया,
मेरे चमन के हर शजर को, मौसम का मिला सहारा तुझे/

समंदर में जिसके सहारे मौजें उठती-गिरती रहीं
उसी की इबादत में, मिले समंदर का किनारा तुझे/

कभी भी तुम मुझसे नजरओट होकर कहीं दूर जाना,
हमेशा मेरे सर पर तू अपने आँचल का सायबां संभाले

मौजों के सहारे, जिन्दगी की कश्ती न छोड़ देना,
हम मिल गए हैं, फिर भी साहिल का आसरा तुझे/

अब भला बता किस मछली का हम शिकार करें,
जब भी मेरे करीब तू आती है, लगता मिला कश्मीर का शिकारा मुझे/

खूबसूरत तेरी बाँकी अदा, दिल का तू पक्का यकीं है,
दिल से उठी सरगम से हमेशा बहलाया तुझे/

सात जनम में किस जनम की तू तो मेरी चंदा है,
दिल की आवाज को रतन ने हमेशा सुनाया तुझे

                राजीव रत्नेश
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तुम न होते तो हम किससे अपनी बात कहते/
आस्मां के चाँद-सितारों से भी क्या पैमान करते/
दुःख-दर्द अपना बाँटते किससे, तुम्हारे बगैर,
अपनी मुहब्बत का तुम्हारे सिवा किससे ऐलान करते/

              राजीव रत्नेश
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गुजर गया सो गुजर गया ( शेर)

लड़कपन का वो किस्सा गुजर गया सो गुजर गया/
नजर में अब तो' चंदा' का अक्स ठहर गया/


            लौट आए वो खुद ही
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हम तो महफिल में बैठे थे,
अपनी सूरत छुपाए हुए/
लौट आए वो खुद ही,
दामन में काँटें सजाए हुए//

तेरा इंतजार भी नहीं है ( कविता)

तेरा इंतजार भी नहीं है    ( कविता)
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तेरे इंतजार में होकर तैय्यार,
बज्म में अजनबियों के बीच बैठे हैं/
आ जाओ दिल में बसाए तेरी सूरत,
बेकरार- ए- महफिल होकर बैठे हैं/

सूरते-हाल ये है, खस्ताहाल हुई तुम,
बाप का तुम्हारे अजब हाल हुआ/
सब्र की लाठी हाथों से छूट गई,
दामन तुम्हारा काँटों से भर गया/

चाहते नहीं थे, तुमसे दूर जाना,
पर प्यार में ब्रेक-अप तुमने किया/
निशाना तो हमारा पहले ही और था,
क्या तुमने कोई बड़ा तीर मारा/

तरजीह जिन्दगी पर तुम्हें दिया,
तुम जैसी पर मर- मिटने को दिल न माना/
बाप तुम्हारा चिता पे भी था जिन्दा,
पुआल की तरह धू-धू कर जला/

एक लाठी पे टिकी जिन्दगी,
आखिर कब तक साथ निभाती/
अकेले कब तक सहारा दे पाती,
कितने दिन जिन्दगी खींचती/

दो ही बार नजरे- इनायत तुम्हारी हुई,
तीसरी बार तू बन गई परजाई/
अपनी मम्मी से शायद सीखा हुनर ये तुमने,
अर्जे- दिल पर तुम ठिठकी और मुस्कराई/

हम तुम्हें अपना समझ पाए होते,
तो फिर तेरी- मेरी नई बात होती/
तुमने हमेशा तो हमें अपना ही समझा,
फिर भी लौट कर शहर में न आई/

हाले- दिल का ब्यौरा ज्यादा क्या देते,
तुम्हीं ने थी सारी जब आग लगाई/
न थी तुमसे दिल को लगावट,
न थी तुमसे कोई मेरी आशनाई/

तुम राजी थे पर चेहरे पे था यास का नक्शा,
बिना आए महफिल में कैसे पहचानी जाती/
सांस थम सी गई, धड़कने दिल की बढ़ गईं,
मेरे सामने बनी तुम एक अलबेली हरजाई/

मम्मी ने तुम्हारी क्या क्या न चाल चली,
कैसी-कैसी न की लगाई- बुझाई/
मेरी मर्जी में तो तुम कभी चल न सकी,
न याद ही तुमको कभी मेरी आई/

मैंने भी खुद से तुमको न याद किया,
ख्वाबों में तुमसे रोजो- रोज मिला/
और लड़कपन की मुहब्बत की,
बस तुमको हमेशा याद दिलाई/

मुझे तुमसे कोई लैला-मजनूं सा प्यार नहीं था,
दरकार मुझे तेरा किसी तरह इमदाद नहीं था/
तुमने मुझे धोखा दिया, तुमसे इसरार क्या करता,
तुमने तीरे- नजर दिल पे मारा, पर हुआ मैं घायल नहीं था//

                  राजीव रत्नेश
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किसी को मजबूर करना मेरी आदत में शुमार नहीं/
समझ लो दिल में मेरे तुम्हारे लिए कोई प्यार नहीं/
सोच-समझ कर ही बार- बार तुझसे कहता हूँ,
' रतन' को पसंद तेरा यह धंधा और रोजगार नहीं/

              राजीव रत्नेश
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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!