लगा फिर से दरबार साकी ( कविता)
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तुझसे दूर अब रहा नहीं जाता/
तेरा दर्द दिल से फना नहीं होता/
किस तरह तुझे मैं अब भुलाऊँ,
तेरे बिना मुझे शिफा नहीं होता//
तुझे दुनिया का क्या अब भी डर है,
मेरे हाथ में जबकि तेरा हाथ है,
समझने वाले समझ जाएँ,
रतन आज हर फिक्रोगम से आजाद है/
दुनिया के तिलस्म में भटक नजाना,
न मेरा हाथ छुड़ा जाना साकी,
हम तुम एक ही मंजिल के दो राही है,
हमारे लिए खुला जन्नत का द्वार है/
शरबते- दीदार छान के पिलाने की क्या बात है,
घूंघट हटा प्याला पिला जाम का,
कर अदब थोड़ा शेख जी का भी,
मेरी जिन्दगी का तू तो बहार है/
इश्क में तय कर चुके हर रास्ता,
आजा करीब, मुहब्बत का वास्ता,
माथे पे चमके चमकीला सितारा,
तेरी नथ ही तो तेरा असली श्रृंगार है/
संवरेगी जिन्दगी, बदलेगी जिन्दगी,
अब बवाल न उठा कोई होके शरीके- जिंदगी,
वो देख पास आ गया साहिल भी,
चंदा- लहर का तू बेमिसाल प्यार है/
डर जमाने का तुझी को हुआ था,
मैं तो हरफनमौला था सफर का,
कैसे सोच लिया, छोड़ दूँगा तेरा साथ,
तेरे आँचल पे बेल-बूटों का संसार है/
कश्ती ले आया आगे और भी,
पाकर मंजिल के निशानात,
देख कर हमारी मशरूफियत,
जमाना अब तो शर्मसार है/
बीच सफर तू ही तो मेरे साथ थी,
और कोई आया न तूफां से बचाने,
तेरे भरोसे किनारे पे आए,
जमाने से अब क्या तकरार है/
अहले- जमाने ने ही तेरे- मेरे लिए जतन बनाए ,
भंवर से कश्ती साहिल पे लाए,
जमाने ने समझा, तभी तो साथ में आए,
एक तरह से हम जमाने के कर्जदार है/
तुझे जाने- जिगर, दिलो- जान बनाया,
बरबादियों के रास्ते से तुझे खींच लाया,
तू समझे तो जमाना ही संभालता है राहे- इश्क,
फिर भी मुझे जमाने का कोई बंधन स्वीकार है/
साथ देगी तो दुनिया नई बसाऊँगा,
तेरे रुखे- रोशन से रास्ता नूरानी बनाऊँगा,
चले जो हमनफस हो कर मेरी ताज,
समझ ले साथ जगत- व्यवहार है/
मेरी मंजिल, सपनों की रानी तो तू ही है,
तेरे सिवा न मुझे किसी से कोई लगाव है,
आजा फिर से एक बार मुकाबिले- बज्म,
सारी अला- बला से दूर, हर शय का माकूल जवाब है/
आज भी नहीं है तेरा कोई तोड़ महफिल में,
सफर में सितारा- सितारा तुमको राह दिखाता है,
तेरे नूरे- चश्म से जगमग हर राह नजर आता है,
मेरे गजलों की मुजस्सिम तू किताब है/
हर हाल में तू मेरे दिल में पोशीदा हर राज है,
मेरे साथ रहकर तू आज भी लाजवन्ती है,
तेरे अब्बू की निगरानी से तुझे निकाल लाया था,
यही कैफियत है, यही तहरीर- ए- रतन है/
तुझे जमाने से छीन कर ही तो पाया था,
तेरे लिए अदावत सारे जहां से ठाना था,
उसके लिए जुगनुओं की कतार ले आया था,
मुझ पर तेरा ही तो बस अधिकार है/
मुहब्बत में मुझे बस एक तेरा ही तो सहारा है,
तू ही मेरा वजूद, तूही मेरा ठोस इरादा है,
आज फिर तेरे हाथों से जाम की दरकार मुझे,
अंगूरी का प्याला होठों से लगा, लगा फिर से दरबार साकी//
राजीव रत्नेश
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एक वक्त जब सब छोड़ कर जाना होगा,
तुमे भी रोता- तड़पता छोड़ अपनी राह जाना होगा/
बदल जाएगा वहाँ मौसम का भी अपना इरादा,
न मस्तूल, न पतवार, न कश्ती, न कोई किनारा होगा//
राजीव रत्नेश
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