Saturday, June 13, 2026

रतन लड़खड़ा कर भी सँभलते रहे ( गजल )

रतन लड़खड़ा कर भी संभलते रहे  (  गजल  )
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बस्ती में नहीं किसी से हम कोई याराना रखते रहे/
अपनी इक ठोकर में हम सारा जमाना रखते रहे/

कौन कहता है कि दुनिया में मेरा कोई भी नहीं,
सितारे लोगों ने चुने, हम चाँद अपने साथ रखते रहे/

हाँलाकि मिस्मार कर दिया गया , मेरे ख्वाबों का महल,
हम सीने में छुपाए कितने-कितने शुकराना रखते रहे/

तेरी मेहमान- बाजियां तुझे ही मुबारक अहले- जमाने,
हम मेजबानी में मुकम्मल, वरक- वरक मकतबे- इश्क
सुनाते रहे/

किस- किस ने अपना दाँव हम पर नहीं आजमाया,
हम अपनी नजर में, हमेशा दास्ताने- दो जहाँ रखते रहे/

जबां बंदी तो लगाने की कोशिशें तो लोग करते रहे,
खोलने के पहले कुफ्ले- दहन, जुल्फों का सायबां रखते रहे/

किस- किस ने न कोशिशें की, अपना पाबंद करने की,
हम उनकी गली में रोज जाते रहे, इशारे से उन्हें बुलाते रहे/

कभी खुल के आए, कभी छुपते- छुपाते वो आए,
हम बन के नगीना उनके नथ का, करते रहे सजदा मजारों पे/

उन रफीकों को, जो मेरे जनाजे तक में नआ सके,
हमने बुलाया था उनको, फातिहा तुरबत पे सुनाने को/

नजरों ने लाख घेराबंदी की उनके शबाबो- हुस्न की,
वो चमकते- दमकते ही रहे, रात के अँधियारों में/

किस तरह हम बहे हम मौजे- दुनिया में, किस ने न जाना,
कहीं आग का गोला था, कहीं शोलों की तरह भड़कते रहे/

चैन मिला मुझे तो आकर उसके आगोश में ही,
वैसे होकर बेचैन, वो रातभर करवटें बदलते रहे/

मेरे दिल में था चैन तो नींद आ गई दहकते रुखसारों पे,
तसल्ली देने को मुझे वो सारी- सारी रात जागते रहे/

मोहब्बत जवां हुई है, फिर लेने लगे हैं वो अँगड़ाइयाँ,
हम उनके रूख को निशाना कर अफसाना लिखते रहे/

इक शानदार एन्ट्री चंदा की, मेरे मसाफतों के इज्न की,
मैं अन्जान कब रहा उसके प्यार से, बन कर वो रहनुमा मेरी राह में मिलते रहे/

चंदा का चाँदनी में नहाया हुआ उसका बेकाबू शफ्फाक बदन,
' रतन ' के बोझल कदम, लड़खड़ा कर भी संभलते रहे//

                  राजीव रत्नेश
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जमाना आजमाता रहा हर पैंतरे से
' रतन ' के सब्र को,
वो चंदा की आगोश में आकर हर बार
सँभल- सँभल गया//

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आँखें बिछीं रहगुजर पे थीं ( गजल )

आँखें बिछीं रहगुजर पे थीं   ( गजल  )
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मैं भी खोल दूँ तेरे हर राज, दिल समझाए/
फिक्र है, यार तेरा कहीं तिलमिला न जाए/

तुझसे तेरी जिंदगी के राज पूछ शक जताए,
मैं मुतमईन हूँ औ' तैय्यार भी, जो वो खंजर उठाए/

मुझे डर है, कहीं याददाश्त अपनी वो खो न दे,
लड़ने- भिड़ने के पैंतरे कहीं वो भूल न जाए/

तू मेरी पुरातन महबूब, बात तुम्हीं तुम जानती हो,
याद आ जाए मेरी, तो कहीं तुझे गले न लगाए/

तेरी अश्कबार, भींगी बातें मेरा दिल कचोटती हैं,
रोज आने को कहकर, हर दिन तू भूल जाए/

यकलख्त आँचल उलट तू घूंघट में आ गई बेवफा!
गैर की हो गई कैसे? बिना मुझसे पूछे, बिना बताए/

काँटों भरा तेरा हर अहसास, गुलाब कभी का झर गया,
समझ कर तुझे' विश्वमोहिनी', कौन फंदे में आए?

दिल का करार गया, तेरी जुदाई का विष पिया मैंने,
इंतजार में तेरे क्या- क्या न मैंने सदमे उठाए/

मुझे यकीं दिला के, कि तुम सिर्फ मेरी ही थीं,
चोट कोई खाई नहीं, सिर्फ मुझे चोट पहुँचाए/

दूर तक फैली हुई, अगन बरसाती दोपहर थी,
सदियों की प्यास थी दिल को, तू और प्यास बढ़ाए/

गर्मियों की धूप का तेरे आँगन में कुछ ऐसा नजारा था,
पाने को निजात, सहन में तूने उतार कपड़े बिछाए/

अब गर्द भरे रास्तों पे, है मेरा अनजाना सा सफर,
वो दिन गए, जब राहों में मेरी, राह देखती थी फूल बिछाए/

मेरे मकां के दरो-दीवार कब से बुला रहे हैं तुझे,
तू अपने शहर से मेरे शहर को गाड़ी भी न चलवाए/

जब तक आया नहीं था सामने, वो इक अजाब था,
आए जब- जब मेरे सामने, बेदस्तो- पा हो- हो जाए/

उदासी तेरी इक अदा, सरासर तेरा तकल्लुम है,
पीठ पीछे जबान तू कैंची की तरह चलाए/

समझते रहे तुझे बहुत मासूम हमेशा" रतन"
आँखें बिछीं रहगुजर पे थीं, कब तू पलट आए//

                 राजीव रत्नेश
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खुदा करे जीना चढ़ते वक्त तेरे कदम लड़खड़ाएँ/
और तू सीधे, मुझ नीचे खड़े की आगोश में समाए//

                 राजीव रत्नेश
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सीढ़ियों से लड़खड़ा कर ही सही, उसे आना तो
रतन के ही पास है,
जमाना चाहे जितना बदले, इस दिल को चंदा की
ही प्यास है/

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Thursday, June 11, 2026

मेरे रंजो- गम को मेहमां करो तो सही ( गजल)

मेरे रंजो- गम को मेहमां करो तो सही  ( गजल )
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हम तेरे साथ- साथ चलेंगे, अपनी जुल्फों का सायबां
करो तो सही/
मेरे रंजो- गम को अपना समझो, उन्हें अपना मेहमां
करो तो सही/

भ्रमर बन कर तुझसे मैं मिलूँ, तू कली बन कर रौशन
चमन तो करो,
मैं एहसास तुझे दर्दे- दिल का कराऊँ, तू इस्तकबाल
मेरा, पराग उड़ेल करो तो सही/

रिन्दों का रिन्द हूँ, भर-भर जाम मेरे पास लाओ तो सही,
मैं तेरी मदभरी आँखों से पहले पिऊँ, फिर अपने सामने पिलाओ तो सही/

पंख खोल आस्मान में, ऊँची उड़ान मैं लगा के जब लौटूँ,
तुम मुझसे श्वेतपरी बन कर साहिल- तट पर मिलो तो
सही/

मेरी कश्ती की पतवार तुम, दरिया पार का एकमात्र
मेरा सहारा हो,
जजीरे पर जा रैन- बसेरा करेंगे, चप्पू चला उस पार
पहुँचो तो सही/

मैं रिमझिम सावन बन कर, झमाझम यक लख्त बरस
तो जाऊँ,
तुम सब्जा का पैरहन पहन, किसी शजर से पहले लिपट जाओ तो सही/

प्यासी धरती की अगन, जब ठंडी हो जाएगी पूरी तरह यकीनन,
तुम समझो बागो- चमन तुझे बुलाएँगे, फल-फूल चुनो तो सही/

चंदा की बिन्दी, सितारों के झुमके, मांग में कहकशां,
नथ में रत्न जड़े हुए,
सब तुम्हारे लिए हैं, तुम अपना हुस्न पहले संभालो
तो सही/

तुम गुजरिया गाँव की, नित नया प्रयास करती हो मेरी
सुध-बुध भुलाने की,
तुम्हारे बिना नहीं मेरा गुजारा, चलो साथ मेरे, संभालो
पहले मेरे चौबारे तो सही/

मैं चलता चला आया हूँ सदियों से, तेरे गेसुओं के साये
के सहारे,
इस जन्म तो मिली हो" रतन" से, अगले जन्म का भरोसा दिलाओ तो सही//

                 राजीव रत्नेश
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इस जन्म की कश्ती तो साहिल पे लग ही जाएगी,
रतन की रूह तो हर जन्म चंदा को ही चाहेगी/

मौत की क्या बिसात, जो इस दास्तां को मिटा पाए,
रतन की रूह तो हर जन्म, चंदा की जमुना में मुस्कराए//

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अच्छे भले थे ( गजल)

अच्छे भले थे  ( गजल)
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दिल ही दिल में तुझे प्यार कर बैठे/
अच्छे भले थे, दिल को आजार लगा बैठे/

सुना है गालिब, आदम का खुल्द से निकलना,
बहुत बेआबरू होकर, तेरे मयखाने से गए निकाले/

कहाँ तो पीरी में, कहा लोगों ने हरि भजन को,
बेखुदी में हो गए हम हुस्न के हवाले/

अगम- अगोचर उसे बताया संतो- महंतों ने,
बिना नैन-नक्श के, बेहतर हैं नैन-नक्श उसके/

छोटा सा खानुमा बनाया था, हमने मिल कर,
चारों ओर से बढ़ने लगे हैं तूफानों के दायरे/

बाहों के घेरे में मिलता, ब्रह्मांड का सारा सुख,
रात में चंदा की चाँदनी, दिन सूरज के उजाले/

अच्छा तो अपना चमन ही सब कुछ था हमारा,
ख्वामखाह पशेमां हुए और के दर पे जाके/

मेजबानी में सबके, अपना तो दम निकल गया,
कोई मेहमां न आया दो फूल तुरबत पे चढ़ाने/

सोचा था हम मुहब्बत की मिसाल कायम करेंगे,
मियाद के पहले ही, गए मुहब्बत निभाने वाले/

जब तक पास में पैसा था, सभी थे पिलाने वाले,
अब पास नहीं जब कुछ, दूर हुए संगी-साथी सारे/

कोई मुँह धुलाने, पास तक न आया,
प्यार में जब हम अश्कबार हुए बैठे/

नदामत का एहसास भी उसे न हुआ,
उठ आए मैकदे से जब बिना बताए/

मुहब्बत का हम परवान चढ़ाते अभी और,
गर तुम साथ देते, साथ मेरे जो आते/

हम बागी हो गए तेरे प्यार के वास्ते,
काश! मुहब्वत के दो बोल तुम बोल पाए होते/

तेरा हर तीर सामने से झेलेंगे, पैंतरा बदल कर,
पीठ न दिखाएँगे, तेरे याद की ढाल उठाए/

तेरा रास्ता था फूलों से बिछा हुआ, तू क्यूँ रुक गया?
मेरा गुजरना आसां नहीं, बैठी है नागिन फन फैलाए/

मेरे दिल से, अपनी याद समेट ले दिलबर!
चल न पाऊँगा रहे- सफर, बार तेरी याद का उठाए/

तेरे प्यार में क्या- क्या न सहे सितम" रतन",
खफा हो गया जमाना, खिलाफ हुए जमाने वाले//

              राजीव रत्नेश
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जमाने ने बहुत तीरों से आजमाया' रतन' के हौसले को,
मगर वो हर बाजी जीत गया, चंदा की याद को ढाल बना कर/

महफूज हैं हर खौफो- खतर से हम
तेरी बाहों के दायरे में हैं जबसे हम
बेसहारा नहीं हूँ, अभी है दम-खम
जाएँगे महफिल से, तुझे साथ ले हम

            राजीव रत्नेश
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दुनिया समझती रही तन्हा और बेसहारा रतन को,
वो तो महफिल से उठ गया, चंदा की रूह के साथ/

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Saturday, June 6, 2026

मुझसे भारी मेरा बस्ता (०८ नवंबर २०२५ )

" मुझसे भारी मेरा बस्ता" विषय( जीवन की विडंबनाएँ और
यथार्थता के अंतर्गत) अत्यंत महत्वपूर्ण, समसामयिक और संवेदनशील है/ यह विषय सीधे शिक्षा- व्यवस्था, बचपन के खो जाने और महत्वाकांक्षाओं के बोझ को दर्शाता है/ हम इसे निम्न बिंदुओं द्वारा समझने की चेष्टा करेंगे/
(१) शिक्षा व्यवस्था की विडंबना
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           बच्चों के स्वस्थ एवं शुद्ध प्राकृतिक शिक्षा- निकेतनों का आधुनिक युग में अभाव सा हो गया है/१००-१५० वर्षों में पहले देश
में गुरुकुलों में पढ़ाई का उन्मुक्त वातावरण हुआ करता था/
            प्राचीन वैदिक युग के गुरुकुलों में फूल, तितली, गिलहरी और
खरगोश तथा मृगशावकों के साथ खेल-खेल में पढ़ाई होती थी/
गुरुकुलों में किसी के नाम के साथ जातिसूचक शब्द नहीं होते थे/
प्राचीन भारत में वर्ण-व्यवस्था जाति- आधारित न होकर कर्मप्रधान हुआ करती थी/
(२) सह- शिक्षा और उससे नुकसान
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              आजकल सह- शिक्षा का दौर है/ पहले बालक-बालिकाओं के विद्यालय और अध्यापक अलग- अलग होते थे/ लड़कियों के
विद्यालय से लड़कों के विद्यालय दो कोस दूर होते थे/
      माता- पिता की महत्वाकांक्षाओं का दबाव
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आजकल के माता- पिता जो खुद कुछ न कर पाए , वो बच्चों से
वो सब कुछ चाहते हैं और उन पर मानसिक और शारीरिक रूप से
दबाव बनाते हैं, जिनमें निम्न हैं-------
        मेरा बच्चा सबसे आगे: माता- पिता द्वारा बच्चों पर सामाजिक
प्रतिष्ठा और अपनी अधूरी महत्वाकांक्षाओं का भार डालना/
        प्रतिस्पर्धा की दौड़: बच्चों को बचपन से ही' चूहा दौड़' में
धकेलना / यह सोचे बिना कि उनकी अपनी रुचि क्या है/
         महंगे स्कूल और बस्ते: भारी-भरकम फीस और डिजाइनर
बस्तों का चलन, शिक्षा को एक विलासिता बना देता है/ आजकल म्यूनिस्पल और सरकारी स्कूलों की संख्या नाममात्र की रह गई है,
जिसकी जगह प्राइवेट पब्लिक स्कूल गली-गली में खुलते जा रहे हैं/
           किताबों की बाढ़: पाठ्यक्रम में हर छोटी चीज के लिए अलग-
अलग किताबें थोपना, जिससे बस्ते का वजन गैर- जरूरी रूप से बढ़ जाता है/ यही नहीं वे किताबें, बस्ते आदि स्वयं ही देते हैं, जिसमें उनका कमीशन अन्तर्हित होता है/
          स्वास्थ्य और शारीरिक प्रभाव
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                 शारीरिक विकृति: भारी बस्ते के कारण बच्चों में कमर दर्द, रीढ़ की हड्डी में समस्या और कंधों का झुक जाना( जो बचपन में
पढ़ाई से लेकर ताउम्र कंधों पर लैपटाप, टिफिन और पानी की बोतल लादे रहते हैं/ अब तो शुद्ध पानी भी बिकाऊ है और टंकियों का पानी
बीमारियों का गढ़) जैसी स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा होना/
                   मानसिक तनाव: लगातार दबाव के कारण बच्चों में तनाव, चिंता और चिड़चिड़ापन बढ़ना/ जिसकी वजह से वो मनोरोगी हो जाते हैं और कम उम्र में ही साइकेट्री के शिकार तक हो सकते हैं/
बस्ते का वजन वास्तव में बचपन की मासूमियत और सहजता का
हनन कर रहा है/
                बहुमुखी विकास की अनदेखी
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                     पाठ्यक्रम में कला, संगीत, शारीरिक शिक्षा( पी ० टी०) और नैतिकता जैसे विषयों को कम महत्वपूर्ण मानना, जबकि
विज्ञान और गणित को ही भविष्य का निर्णायक समझना/
                     खेल का मैदान बनाम ट्यूशन: वह समय जो बच्चों को
खेलने, कल्पना करने और प्रकृति के साथ बिताने चाहिए, वह अब
होमवर्क के भारी शेड्यूल में कैद है/
                      जेल की उपमा: स्कूल की दिनचर्या एक" रूटीन जेल"
की तरह बन गया है, जहाँ बच्चे अपनी स्वाभाविक जिज्ञासा खो देते हैं/
                       खोई हुई मुस्कान: बच्चों के चेहरे पर सुब्ह- सुब्ह थकान और बोझिलता का दिखना, न कि उत्साह का/
                        ज्ञान नहीं अंक: शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि सर्वाधिक अंक प्राप्त करना बन गया है/ बस्ता रटने की
सामग्री से भरा है/
( 3) शिक्षा में धर्म और राजनीति का प्रवेश
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               धर्म से धार्मिक सौहाद्र बनने की बजाय, देखा जा रहा है और बिगड़ रहे हैं, जो थोड़ी बहुत सहनीय है पर शिक्षा में राजनीति तो
अक्षम्य है/ पहले के जमाने में शिक्षक चाहता तो विद्यार्थियों को
अनुचित व्यवहार पर दंड भी दे सकता था/ राजनीति के प्रवेश शिक्षालय, अखाड़े की मर्यादा संभालने में लगे हैं/ स्कूलों- कालेजों में
स्टूडेन्ट यूनियनें बन गई हैं/ लड़कों को मास्टर जी पसंद न आए तो वे
हड़ताल कर देते हैं और जिन्दाबाद और मुर्दाबाद के नारों के साथ मास्टर साहब को सस्पेंड करा देते हैं अथवा स्कूल- कालेज से निकलवा ही देते हैं/ पहले विद्यार्थी अध्यापक से डरते थे अब
अध्यापक विद्यार्थियों से डरते रहते हैं/ जो शिक्षा के मर्यादित क्षेत्र में
उथल-पुथल मचाने के लिए एक दंडनीय अपराध है/
                प्राचीन भारत के इतिहास में आरुणी और एकलव्य जैसे
विद्यार्थी हो गए हैं जो अपने- अपने गुरु में निष्ठा रखते थे और उनके
कथन को ब्रह्मवाक्य समझते थे/
                दुनिया में जीते हैं वो कीड़े-मकोड़ों की तरह/
                जिन्हें न बढ़ने की तमन्ना, न घटने का गम/.
                गरीब परिवार के बच्चे तो स्कूल का मुख भी नहीं देख पाते क्यूँकि यह महंगी शिक्षा- व्यवस्था बच्चों से समानता का
अधिकार छीन लेती है/ जिनके पास दो वक्त की रोटी का अभाव हो,
वे शिक्षा के बारे में सोचें भी तो आखिर कैसे? वे अपने परंपरागत
हस्त- लाघव से उपार्जन को महत्व देते हैं और आधुनिकता को दूर से
ही नमस्कार करते हैं/
                  किताबों के बोझ तले दब गया बचपन/
                  किसकी खता है, गरीबों के लिए हैं सारे बंधन/
                  हमने न जाना, आजाद खुली हवा में साँस लेना,
                  बोझ लदे हैं हम पर जमाने के अनर्गल/

                   किताबों के बोल तले बचपन किस कदर झुक गया है
                   बचपन में बुढ़ापा आ गया, कंधा किस तरह झुक गया है
                   हमने तो ये भी न सोचा, पापा कैसे काम करते होंगे,
                   उनका सर जमाने के आगे कब का झुक गया है/
               गरीब युवक-युवतियाँ, बहुमंजिला इमारतों में दास-दासियाँ
यथा( ड्राइवर, घर की सफाई और खाना बनाने से लेकर स्त्रियां बच्चों की आया होकर, सभी कुछ न कुछ काम करते हैं/ उनका बचपन
किसने छीना? कहीं वर्तमान महंगी शिक्षा- व्यवस्था ने तो नहीं/
(४) शिक्षा- व्यवस्था और अश्लील साहित्य का प्रकाशन
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                 हिन्दी उपन्यास और अंग्रेजी नावेल तथा फिल्मों में जहाँ-तहाँ अश्लीलता को परोसा गया है, जो उच्च- शिक्षा में चरपरे और
मसालेदार बना कर, हींग- अजवाइन का तड़का देकर प्रकाशित की
जाती हैं/ ऐसे साहित्यों को शिक्षा- सुधार के मद्दे- नजर तुरंत प्रबंधित करना समाज के ठेकेदारों तथा सरकार की नियति होनी चाहिए/ एक
सभ्य समाज के संस्थापन के लिए इन आसुरी- सम्पत्ति वालों का
मूलोच्छेदन तत्काल अनिवार्य है/
(५) सह- शिक्षा विष की जड़
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                   हमारे ऋृषियों- महर्षियों ने शिक्षा के जो नियम बनाए थे,
उनमें पहली व्यवस्था सह- शिक्षा के अभाव की थी/ विश्व- विद्यालयों या डिग्री- विद्यालयों में संभवतः यह व्यवस्था आधुनिक काल में विकसित देशों की देखा-देखी या विश्व की अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं, पाठशालाओं से आई/
                    भारत में पहले ब्रह्मचर्य और सत्य का बोलबाला था/
ऋषियों ने ब्रह्मचर्य को जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं में एक
माना था/ विवाह की उम्र सरकारी गजट में इस समय लड़कियों की
१८ साल और लड़कों की२१ साल है/ पर पहले लड़कियों की उम्र२०
और लड़कों की उम्र४० साल में शादी करने का प्रावधान था/
                      पर मोबाइल और फिल्म- जगत ने हमारे ऋृषियों की
पुरातन सारी अवधारणाओं पर पानी फेर दिया है/ घरों में हर हाथ में
मोबाइल दे दिए जाते हैं/ रात में बंद घर के बाहर भी मोबाइल की
दुनिया तो खुली ही रहती है/ बच्चे मोबाइल- एक्सपर्ट बनते जा रहे हैं
और साथ में जुए की लत का शिकार हो रहे हैं/ आधुनिकता तो
देखिए बच्चों और अभिभावकों तथा स्कूल- टीचर्स को भी एक ऐप से
जोड़ने की तैयारी की जा रही है/ मोबाइल से कम उम्र में ही चैट और
डेटिंग का प्रचलन दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है/ प्रकारान्तर में आत्महत्या और हत्या तथा सारबर- ठगी जैसे प्रकरणों से आए दिन
समाचार-पत्र भरे रहते हैं/ मोबाइल के फायदे कम हैं तो नुकसान
ज्यादा/ विभिन्न ऐप, विज्ञापन तथा अश्लीलता का प्रचार- प्रसार करने
में जितनी भूमिका मोबाइल की है, उससे अधिक कहीं घर- घर मे
 शाम से लेकर रात गए तक टी०वी० कार्यक्रमों की भी भागीदारी है/
                      कारण साफ है लड़के-लड़कियाँ---- ब्रह्मचर्य नाम की
कोई चिड़िया भी इसी भारत देश में हुआ करती थी----- भुला बैठे हैं/
आधुनिकता के नए परिप्रेक्ष्य में वो अपनी हानि को भी लाभ मानने
के लिए मानसिक तौर पर पंगु हो गए हैं/ ब्रह्मचर्य का पालन कोई नहीं कर पा रहा है, जो कि अर्वाचीन भारत की पहली अनिवार्यता है/       
(६) यथार्थ और समाधान का आह्वान
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                         क्या हम सब अपने बच्चों को यथार्थ से परिचित करा, उन्हें मानसिक रूप से परिपक्व बनाने में ऋषियों- महर्षियों के
दिए हुए मूलभूत सुझाओं का आदर करेंगे और टी०वी तथा मोबाइल
जैसे अनावश्यक समय- खाऊ संसाधनों से छुटकारा दिलाएँगे तथा
कम से कम अपने बच्चों को भविष्य में कुछ अच्छा कर गुजरने योग्य
बनाने की महत्वाकांक्षाओं से राष्ट्र को अनुग्रहित करेंगे/ दुनिया आपके
ही इंतजार में, टकटकी लगाए आपकी ओर देख रही है कि आप एक
कदम इस दिशा में आगे बढ़ाएँ तो लाखों कदम आपके पीछे निकलेंगे/
                             विश्वास मानिए विकसित देश इस आधुनिकता
से ऊब चुके हैं और शान्ति पाने के लिए विश्व- गुरु भारत की ओर
उत्सुक्ता से देख रहे हैं/ मेरा शाश्वत प्रश्न अभी भी यही है कि आधुनिक
बस्ता बच्चों को उड़ान भरने के लिए पंख मुहैय्या करा रहा है अथवा उन्हें जमीन से और भी बाँध रहा है?
                       राजीव रत्नेश
                   """"""""""""""""""""""""

डिजिटलाइजेशन और भारत का विकास ( ७ नवंबर२५ )

औरों को सौंपा फूलों का विस्तर,
मेरे हिस्स में रखे सिर्फ खार- बबूल/

              बीते हुए करीब १२ सालों में भारतीय सरकार ने भारत के
डिजिटलाइजेशन का जो सपना देखा है, उसको साकार करने में
सरकार ने येन केन प्रकारेण अपनी सारी ताकत झोंक दी है/ सरकारी आदेश से आफिसेज में पेपरलेस काम किए जा रहे हैं/ यहाँ तक
असर पड़ा है कि सरकारी और गैर सरकारी बैंकों में भी एक, दो, पाँच के नोट नहीं दिखाई पड़ते हैं/ मारकेट से सिक्के भी गायब हैं/ हर कोई डिजिटल लेन-देन में व्यस्त है/
              पिछले जमाने में जबकि भारत में पुराने राजे-रजवाड़े थे/
मुद्रा के नाम पर मुहरों के नाम पर मुहरों का आदान-प्रदान होता था/
उसके भी पहले कृषी- प्रधान भारत में अनाज के बदले सामान की
व्यवस्था थी/ विदेशी आक्रांताओ--- महमूद गजनवी द्वारा सत्रह बार
और मोहम्मद गोरी द्वारा इक्कीस बार की लूट से सोमनाथ आदि
मंदिरों की सांस्कृतिक विरासत अथाह मणि-माणिक- मुक्ताएँ और
सोने-चाँदी तथा हीरे-जवाहरात बड़ी बेदर्दी से लूटे गए/ मंदिरों को
तोड़ा गया/ उनकी दीवारों और खंभों, यहाँ तक कि मूर्तियों तक को
विदेश ले जाया गया/ पर भारत की अथाह संपदा खत्म नहीं हुई/
                डिजिटल लेन देन ने सबसे अधिक इस युग के बुजुर्गों यथा
किसानों, मजदूरों तथा सरकारी, गैर-सरकारी कर्मियों को हैरान किया है, जिनके पास न मोबाइल है न मोबाइल से संबंधित डिजिटल लेन-
देन की कोई जानकारी/
                 सरकार भी शायद यही समझती है कि बुजुर्गों की यह
खेप आखिर कब तक जीवित रहेगी/उनके जीने-मरने से सरकार को
कोई नुकसान भी नहीं है/ वो तो भारत को मार्डर्न- डिजिटलाइजेशन से जोड़कर बिटक्वाइन का प्रचलन करने में अपने को सिद्धहस्त करने
की आकांक्षा संजोए वर्तमान पुरानी खेप की अर्थी सजाने में ही अपना
हस्त- लाघव समझती है/
                    महर्षियों तथा विद्वानों ने मनुष्य की औसत आयु सौ वर्ष मानी है/ सरकारी आंकड़ों में औसत आयु सत्तर मानी है/ आज के पेपर में पाया कि सरकारी रिटायर्ड कर्मचारी की यदि मृत्यु सड़सठ
साल(६७ वर्ष) के पहले हो जाती है तो उसकी फैमिली को पेंशन, उसके जन्म से६७ वर्ष बाद बढ़ी हुई पेंशन नहीं दी जाएगी बल्कि
सामान्य पेंशन ही दी जाएगी/ इस आदेश ने तो अपने कर्मचारियों की
मौत की औसत क्या अधिकतम आयु६७ वर्ष हर हालत में निर्धारित
कर दी है/
                  सबसे बड़ी बात जो खटकने वाली यह है कि पेंशनभोगी
अब बचे ही कितने हैं, उन्हें भी यह सरकार मिटाने के लिए प्रयत्नशील
है/ गौरतलब बात यह है कि जीवन- सीमा नेताओं पर लागू नहीं होती/ वे जीवन भर रिटायर होने पर भी पेंशन के हकदार होते हैं/ भले वे८०-१०० साल जियें या शायद कभी मृत्यु को ही प्राप्त न हों/
                   जनवरी १४,२००० को सबसे पहले उ ० प्र ० राज्य
विद्युत परिषद उ ० प्र ० पावर कारपोरेशन निगम बनाया गया/ जिसकी मूलभूत यथार्थता ये थी कि निगम में नौकरी पाने वालों को
पेंशन नहीं मिलेगी/जो डिसीज्ड कर्मचारी आएँगे, उनकी भी पेंशन नहीं
होगी/ इसके बाद अन्य डिपार्टमेंट्स में भी सन२००४ से लागू हो चुकी
है/
                      भावी पीढ़ी का यह देखना दिलचस्प होगा कि उनके
बुजुर्ग कब तक रिहाइश महसूस करते हैं/ सरकारी नौकरी मिलना अब एक अजूबे के सिवा कुछ नहीं है/ बेरोजगार नवजवान डिग्रियों की फाइल और लैपटाप कंधे पर ढोते हुए, जूते के फीते कसे हुए नौकरी की तलाश में दर- दर ठोकरें खाते हुए भटक रहे हैं/
                       आजकल कैशलेश इलाज का बड़ा बोलबाला है पर
कितने इसका लाभ उठा पाते हैं या यह केवल अफवाह मात्र है, जो मर्ज को भी मार देते हैं और मरीज को भी शायद/
                        आजकल रिटायरमेंट की उम्र सरकारी कर्मचारियों के लिए६० वर्ष, इंटर तक के शिक्षक वर्ग के लिए६२ वर्ष तथा डिग्री
कालेज अथवा यूनिवरसिटीज लेक्चरर्स और प्रोफेशर्स केलिए
अधिकतम ६५ वर्ष है/ सरकार की मंशा २ वर्ष, पाँच वर्ष और अधिकतम सात वर्ष तक ही उनको पेंशन देने की है, जो पुराने हैं और पेंशन के हकदार हैं/ बाद में उनकी फैमिली का भले ही सवा- सत्यानाश हो जाए/ जब तक जिओ काम करो उसके बाद तो 
मतदाता- सूची से नाम ही काट दिया जाएगा और भारतीय होने की अपनी नागरिकता ही खो देना होगा/ जब तक सरकारी तंत्र भुष्ट है तब तक तो यही कुछ होने वाला है/
                          कहाँ तो सरकार बेरोजगार युवाओं के लिए कृषि-
प्रधान देश में बेहतर कृषि का कार्यक्रम चलाती पर यहाँ परिपाटी ही
उल्टी है/ नगरों और महानगरों में कृषियोग्य जमीन ही नहीं बची है जो है भी, बहुमंजिली इमारतों ने वह जगह हथिया ली है/ कहाँ तो जंगल
उगाए जाते, झील- झरनों, तालाबों और नदियों को संरक्षित किया जाता पर यहाँ पर तालाबों और झीलों को भी पाट कर व्यवसाय-
योग्य तथा रिहायशी रिजार्ट में तब्दील किया जा रहा है/
                             इस खबर से ही कि कल मंत्री जी पौधारोपण
करेंगे, रातों-रात जंगल काट कर समतल किया जाता है/ भले ही मंत्री जी आम, कटहल अथवा नीम आदि न लगाकर वे ही पौध लगाएँ, जो
पृथ्वी को ऊसर( बंजर) बनाते हैं/
                              फुटपाथों पर पेड़ लगा कर उनको घेरा जा रहा
है कि राहगीरों का पैदल चलना भी मुहाल हो जाए/
 
                 " वृद्धों की सेवा व सत्कार करने वाले दीर्घायु, विद्या, यश
और बल के अधिकारी होते हैं/"
                    ------ महर्षि मनु

वृद्धों के अनुभवों से लाभ उठाना सर्वथा उचित है/

                                     कहाँ तो यह सरकार वृद्धाश्रमों की संख्या
में इजाफा करती और उनकी सुविधाएँ बढ़ाने की सोचती/ पर मुझे तो
ऐसा प्रतीत होता है कि सरकारी तंत्र इस बात की मुनादी कर रहा है उसकी मंशा यही है कि---
               मिट जाएँगे हम, भले जां से भी जाएंगे/
               हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे//

                                 राजीव रत्नेश
                               """""""""""""""""""'

Friday, June 5, 2026

चुनाव एक नजर में ( ७-११-२५ )

यूँ तो लोक- सभा चुनाव में ज्यादा शोर-शराबा होता है पर अंतर्राज्यीय- चुनावों में भी कम झमेला नहीं होता है/ आजकल
बिहार में ४ और ७ नवंबर को दो चरणों में चुनाव होना है/ मेनिफेस्टो पहले  INDIA का आया और फिर आज NDA का पर दोनों के वायदों में कोई खास अंतर नहीं है/
          ऊँट के गले में बँधी घंटी तो बजेगी ही, भले ऊँट किसी करवट
बैठे/ SIR का पचड़ा अभी भी फँसा हुआ है/ चुनाव- आयोग में बिहार के साथ- साथ पूरे देश के मुख्य राज्यों में SIR की उद्घोषणा कर रखी
है/ पर इससे क्या सुप्रीम कोर्ट सहमत है अथवा चुनाव- आयोग सबको अनसुना कर अपनी ही हाँके जा रहा है/ विपक्ष ने फिर आस्तीनें चढ़ा ली हैं/ सपा के अखिलेश ने SIR के साथ ही पुरे देश में
जातीय- जनगणना के लिए बिगुल बजाया है/ हो सकता है निकट
भविष्य में उनकी यह माँग जायज मान ली जाए/ राजनीतिज्ञों का
मानना है कि इससे एक पंथ दो काज सिद्ध होंगे/
            बिहार चुनाव का परिणाम देश की दशा और दिशा दोनों ही
तय करेगा/ अभी तक चुनाव- आयोग सुप्रीम- कोर्ट की अवमानना
करता आ रहा था/ बिहार में SIR का क्या हुआ, यह तो बिहार वाले
ही जानें/ चुनाव- आयोग की एक तो चोरी दूसरे सीनाजोरी/ सुप्रीम-
कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बी० आर० गवई ने भी कल नये न्यायाधीश
को मुख्य न्यायाधीश बनाया है/ देखना ये है कि देशव्यापी SIR का
क्या बनता- बिगड़ता है/
            यह मुकाबला दिलचस्प होगा कि महागठबंधन बाजी मारता
है कि NDA/ जब राहुल गाँधी ने बंगलोर के एक सेंटर का रिजल्ट इक्सप्लोर किया था लो अपना दाँव चलाने के चक्कर में सत्तापक्ष के अनुराग ठाकुर ने भी वोट चोरी की बात स्वीकार किया था/ इसी तारतम्य में अन्य कई राज्यों ने वोट- चोरी के सुबूत पेश किए थे पर मुख्य चुनाव आयुक्त..... हीला-हवाली करते हुए राहुल गाँधी से देश से
माफी माँगने और एफीडेविट देने की माँग कर दी थी/ ऐसे में राहुल गाँधी की बिहार पदयात्रा अब क्या रंग दिखाती है यह देखने लायक
होगा/
               हाँलाकि दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है/
उपराष्ट्रपति के चुनाव में महगठबंधन के घटक दल ने क्रास- वोटिंग की
थी/ जिसका परिणाम हुआ कि सत्ता- पक्ष के प्रत्याशी ने थोड़े वोटों से बाजी मार ली थी/
                 मुझे याद पड़ रहा है कि जब मेंढ़कों की तस्करी हो रही थी तो जापानी मेढ़कों को बंद डिब्बे में रखा जा रहा था और हिन्दुस्तानी मेंढ़कों को खुले डब्बों में/ किसी ने कहा," भाई! ऐसे तो ये
भाग जाएँगे"/ तो एक बुजुर्ग ने बताया कि ये हिन्दूस्तानी मेंढ़क हैं---
एक भागेगा तो दूसरा उसका पैर पकड़ के वापस खींच लेगा/ मुझे
महागठबंधन में अंतर्विरोध का डर सता रहा है/ यह हिन्दुस्तान है और
यहाँ मीरजाफरों और जयचंदों की कमी नहीं है/ पर यह तो NDA में
भी हो सकता है/ दोनों तरफ हालत एक सी है/

          एक ही शहर में अनजान तू अनजान मैं
          ठहरने को एक रात को सराय ढूंढ़ते हैं

                        राजीव रत्नेश
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