प्यार में अक्सर हम सामने वाले को वैसा देख लेते हैं, जैसा देखना चाहते हैं। यह ग़ज़ल उसी सच को स्वीकारती है: कुछ भ्रम मेरा अपना था, और कुछ भरोसा उसका दिया हुआ। टूटने के बाद भी जो भीतर बचा रहा, वह है दृढ़ता।
ग़ज़ल
जिससे प्यार किया था, लगता मुझे वो बेहतरीन था,
कुछ तो गुमाँ था मेरा, कुछ तो वो पक्का यकीन था।
जो भी कहा-सुना था हमने, ख़ुद ही वो भूल गया,
मिलन की रात का वो समाँ कितना रंगीन था।
झूठ भी उसके मुझे सच की तरह लगते रहे,
दिल मेरा उसकी अदा का इस क़दर शौक़ीन था।
सब दिखा था, फिर भी मैंने आँख मूँदी थी, कि बीच
जो हमारे था, वो पर्दा कितना रेशमी, महीन था।
छोड़कर जाना भले ख़ंजर का कोई वार न था,
पर मेरे दिल के लिए वो उससे भी संगीन था।
आज भी दिल पूछता है, क्या वो सच में ऐसा था?
या मेरी ही चाह का हर नक़्श इतना हसीन था?
टूट कर भी इश्क़ में "रतन" रहा फ़ौलाद-दिल,
हर सितम के बाद भी वो और भी मतीन था।
शब्दार्थ
गुमाँ: भ्रम, अनुमान
यकीन: भरोसा
समाँ: माहौल, दृश्य
रंगीन: रंगों से भरा, आनंदमय
अदा: हाव-भाव, अंदाज़
शौक़ीन: चाहने वाला
रेशमी: रेशम जैसा कोमल
महीन: बारीक, पतला
ख़ंजर: कटार
संगीन: गंभीर, भारी
नक़्श: चित्र, छवि
हसीन: सुंदर
सितम: ज़ुल्म
मतीन: दृढ़, मज़बूत
