Wednesday, September 30, 2026

कहाँ डरते हैं जलजलों से----- गजल

कहाँ डरते हैं जलजलों से
     ---- राजीव रत्नेश

जिन्दगी को हसरत की निगाह से निहारने वाले,
एक- दूसरे का होकर ही मौत को समझने वाले/

कड़वे घूँट भी एक दिन मौत के पीने होंगे,
सफर में शोलों के दरिया से गुजरने वाले/

ज़िन्दगी फूलों की सेज थी, काँटे भी निकल आए,
अल्लाह के रहमो- करम को पहचानने वाले/

आदत थी गुलमोहर की छाँव में शौक से सोने की,
बागबाँ की नजर पड़ते ही नजर से उतरने वाले/

जिंदगी मिली है तो बस चार दिन की, समझो तो सही,
संघर्ष ही तेरा दुर्घष प्रयास है, ओ नींद से जागने वाले/

आश्वासन न दो कि मौत से भी तुम बचा लोगे,
हम तो तूफानों में भी समंदर पार करने वाले/

मौसम का बेखौफ परिंदा भी सहम जाता है,
हम हैं मौत के फंदे को भी पीछे छोड़ने वाले/

यकीन मानो, कोई साथ न देगा, न कोई साथ जाएगा,
सुख के साथी कहाँ दुःख में नजर आने वाले/

बदलते मौसम का इरादा था कि हमें भी साथ ले ले,
हम खुद चल दिए उसके साथ, कहाँ थे सहमने वाले/

रतन, कहाँ डरते हैं ऐसे जलजलों से,
हम तो हैं अपनी मौत को खुद बुलाने वाले//
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Tuesday, September 29, 2026

अलविदा मेरे इश्क अलविदा----- गजल

अलविदा मेरे इश्क अलविदा
          ----- राजीव रत्नेश

तेरा-मेरा प्यार क्या सचमुच ही बिल्कुल एकतरफा था,
खुदा का खौफ करो और बताओ, क्या तुमने मुझे नहीं चाहा था/

मेरी नादान वफा ने तेरे सिवा किसी को न पूछा,
तू ही एक मेरी थी, मेरी मुहब्बत को तेरा ही आसरा था/

जज्ब हुए अरमान सीने में, दम घुटा तेरी छिछली चाहत में,
खुदा की इतनी बड़ी कायनात में एक तू ही तो मेरा था/

आँधी- अंधड़ चले, तूफान भी आए मेरी राहों में,
दिल में तेरी मुहब्बत का दीप जलाए मुझे सिर्फ इंतजार तेरा था/

कौन जाने अब तू कहाँ भटक रही होगी, किस हाल में होगी,
बिना किसी बात के तो तेरा अफसाना न मैंने लिखा था/

बादल बरस के निकल गया, चाँद भी आस्मान में खिल गया,
तेरा ही झूठा वादा था आने का, मैं जानता था, तुझे तो
न आना था/

फलसफा- ए- इश्क तेरा-मेरा क्या यूँ ही आधा-अधूरा
ही रहेगा,
जमीन- आसमान के कुलाबे मिलाने वाली बता, किस बात का झगड़ा था/

फरमान तेरे बाप का ही था, मुझे तेरी शादी में न बुलाने का,
पर मुझे तो आखिरी बार ही सही, तुझसे मिलने तो
आना था/.

गम को फरहत दिखाने की तेरी कोशिश भी भरपूर
थी,
नकहते- गुल भी था, दरिया की लहरें भी झूमती गाती, सुनसान बस किनारा था/

शहर के किसी ब्यूटी- पार्लर में कसमसाती बैठी रही
होगी घंटों,
तेरी दिखावटी शादी में हलाल हो गए कितने बकरे, अम्मा के खैर मनाते/

जानता था, मुँह अँधेरे ही तू कल निकल जाएगी, इंतजार किसका करेगी,
मेरे पहुँचने से पहले ही तेरी बस को शहर से निकल
जाना था/

सुबह-सवेरे सूरज की पहली किरन ने जब झकझोर
कर मुझे जगाया,
तू ही मेरा ख्वाब भी थी, हकीकत में भी तुझे ही जाना था/

दम घुटता था मेरा तेरी घनी जुल्फों की कड़ी गिरफ्तारी में,
तुमने जुल्फ छटवा दी तो मुझे भी अब आजाद ही हो
जाना था/

जमुना बहाव पे थी और तेरा भी शहर से गुजर जाना
था,
मेरे पास बचा क्या था, मुझे तो दरिया में बस कूद ही
तो जाना था/

अब फिर कब और किन हालात में मिलना होगा, अलविदा मेरे इश्क अलविदा,
रतन, जानता था, जमाने को तो तेरे खिलाफ हो ही
जाना था/

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Monday, September 28, 2026

जन्म- दिन की मुबारकबाद

जन्मदिन की मुबारकबाद  ५ , सितंबर ( शिक्षक- दिवस )
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                -------- राजीव रत्नेश

खुशी ज्यादा लेकिन गम भी थोड़ा दिल में है,
उतर जाएगा ये नशा भी तेरा सबेरा होने तक/

बस आस में दिल आज भी मेरा धड़क रहा है,
ये खुशी की रात भी ढल जाएगी सबेरा होने तक/

तेरे आने की महफिल में घड़ियाँ बस अब थोड़ी हैं,
हर मुश्किल आसान हो जाएगी सबेरा होने तक/

नया सबेरा आएगा, खुशियाँ तमाम लेकर आएगा,
हर तूफान का निशान मिट जाएगा सबेरा होन तक/
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मुहब्बत की तस्करी करते हमसे न बना,
आ गई थी तबीयत उसपे, इंकार करते हमसे न बना/
जज्ब हो गए दिल में ही दिल के अरमाँ,
आग लगी थी दिल में मेरे, उससे बुझए न बना/
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दिल में बाकी सभी अरमान सारे क सारे यूँ ही,
हम दिलाते रहेंगे याद सदा पुराने वादे यूँ ही/
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अजनबी होकर भी वो पुकारते ही रह गए,
बेताब हम भी थे, मगर जाते-जाते ही रह गए/
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इंतरवाब कर ले मुझसे, छेड़ मुहब्बत भरा नगमा,
पेश कर जाम- ए- लब एक बार सुबह, शाम को दुबारा/
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दिल में जगह दी, अपना समझा, तेरा बारंबार शुक्रिया,
आके मेरी पलकों पे बैठ जा मेरे साकी तेरा शुक्रिया/
अजनबी शहर में अनजान सभी से तू होजा शामिल- ए- जिंदगी,
साँस से साँस मिल जाए, आजा बाहों में तेरा शुक्रिया/
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मय- ए- निगाह ही पिलाती रहेगी या कुछ आगे भी बढ़ेगी,
थाम के दामन मेरा, कोई मुझसे सवाल भी करेगी/
जमाना बने मुद्दई, इसके पहले मेरी हमकदम बन जा,
फिर न मिलेगा मौका, रुबरू मेरे अपनी सूरत कर जा/
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तूने नजर मिलाई इस तरह, दिल तुझ पर फिदा हो गया,
आ गए जो आगोश में, मुहब्बत का हक पूरा अदा हो गया/
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तीखे हैं नयन- तीर उसके, बसे हैं दिल में वो मेरे,
दिल से करता याद उसे, कब आएँगे पास वो मेरे
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बन के कजा आज ये बहार आई है,
लगता है मेरी मौत का सामान लाई है/
हम तो खामोश ही रहे उल्फत में,
वो है कि राज- ए- इश्क जुबाँ पर लाई है/
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तुम प्यार से खिलाओ तो क्या न खा लूँ,
दवा ही तो है, तुम्हारे हाथों जहर भी खा लूँ/
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मैं मदहोश हुआ तो कैसे,
देखा तो तेरे लब थे मेरे लबों पर/
होश जो आया तो पाया,
तू झुकी हुई थी मेरी पलकों पर/

हर साल सबको जन्म- दिन की मुबारकबाद भेजता रहा,
पर किसी ने आज तक न भेजा, लाल कागज में लिपटा पीला गुलाब/

डाक- विभाग अभी बंद न हुआ, आजकल कोरियर का रिवाज,
कीमत चुका न सका, ब्लैक में मिल रहा था नाज़नीन का गुलाब/

इंतजार में खाक कर दी अपनी दुनिया, कोई फरिश्ता बन कर न आया,
समंदर से नायाब रत्न निकले पर विश्वमोहिनी को हर ले गया छलिया/

गुलाब का आदान-प्रदान होता खूब वैलेन्टाइन-डे पर,
एक फूल भी भेजते न बना किसी से मुझे ' शिक्षक- दिवस ' पर/

न चाहिए कलम, न चाहिए तलवार, न अब कोई बहार ही,
मेरे दिल में तो अटका बस तेरा वैलेन्टाइन-डे का व्यापार/

तुझे इतर- ए- गुलाब कहूँ या गुलदस्ता, भीनी खुशबू से मुअत्तर बदन,
एक बार पेश- ए- नजर हो जाए, गुलाबों भरा जो गुलदस्ता/

अब न पहले सी बहार रही, वो रौनक न रही किसी त्यौहार में,
हर बार की तरह अबकी बरस भी करता रहा इंतजार कासिद का/

शादियाँ हो जाती हैं, विदाइयाँ तक हो जाया करती हैं,
निमंत्रण-पत्र भी मिल जाते हैं, पर अब चिठ्ठियाँ नहीं आतीं/

अब तो बस मोबाइल से ही फूल झड़ा करते हैं,
चमेली, बेला और जूही की खुशबू बात से ही आ जाती है/

इसके पहले कोई मेरे मोबाइल को नजर लगाए,
' रतन ' उन्हें एडवान्स में दुआ- ए- नववर्ष देते हैं//
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Sunday, September 27, 2026

एक जमाने के बाद आई मुझे याद____ गजल

एक जमाने के बाद आई मुझे याद
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                राजीव रत्नेश

तसव्वुर में तेरे बिलखती रही पैमाने की याद,
एक जमाने के बाद आई मुझे मयखाने की याद/

दिल में आहें भर रही है, बाल बिखराए हुए,
लड़खड़ाने, गुनगुनाने, नाचने-गाने की याद/

नजरों से जब वो बेतकल्लुफ हो पिलाने लगे,
नसीब मेरे चटके हुए उस पुराने पैमाने की याद/

काले बादलों में गुम है आज मेरा चाँद,
बुझी शमा के धुँए में जैसे परवाने की याद/

मकबरों से आ रही है शाम के धुँधलके में,
एक- एक रफीक के बिछड़ जाने की याद/

भूलने की कोशिश भी बेतरह करता हूँ,
रहती है दिल में फिर भी तेरे अफसाने की याद/

कातिल मेरा मुझे ढूँढता रहा पूरे शहर में,
लौटा भी तब, जब आम हुई उसके गुजर जाने की बात

सीना खोल कर उसके सामने आ भी सकता हूँ कैसे,
वो हैं पुराने तीरंदाज, मुझे अब भी उनके निशाने की याद/

छोड़ कर मुझे तन्हा वो सफर पर चला गया,
कसकती है आज भी मुझे उस बेगाने की याद/

आई है रह-रह के गिरती बिजलियों के रूप में,
एक शब उनके पर्दा उठा कर आने की याद/

सूरज की पहली किरन ने जब पहले गुल को परखा,
दिल ने किए रात के सारे नजराने की याद/

राजीव, रात गई तो लगा सब भूल गया हूँ,
फिर दिल ने चुपके से दिलाए उसी जमाने की याद//

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फैसला तुझ पर छोड़ा है_____ गजल

फैसला तुझ पर छोड़ा है
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------ राजीव रत्नेश

तू कुछ इस तरह से मुझसे बगलगीर होकर बात करती है,
कि तेरे बदन की बास मेरे नथुनों में आकर सिमटती
है/

मैं अनजान तो नहीं तेरे इश्क के फैलाए गए झूठे अफसाने से,
सरोवर की मछली जैसे काँटे का चारा हजम कर किनारे मचलती है/

मैंने तेरे पहले किसी से कहीं कोई वायदा निभाने का
इकरार नहीं किया था,
एक तू है कि वादाखिलाफी के लिए मुझे आज भी
मजबूर करती है/

जिन सहारों का तुझे यकीन था एक जमाने से, अपने
कारनामों के लिए,
वो सब तेरा भरम ही निकला, पूछती है अब हवा तू
क्या महसूस करती है/

रंगीन- मिजाजी तेरी सिर्फ दिखने भर की चीज है, कोई खासियत नहीं तुझमे,
तेरे उपवन में घूम-घूम ऐ गुलचीं देखा मैंने, वो तेरी
अहमियत नहीं समझती है/

दो खिले गुलाब थे तेरी निगहबानी में, तेरी होशियारी
काम न आई,
एक खुद-ब-खुद दूर चली गई, दूसरी मुझसे तेरा झूठा
किस्सा कहती है/

मुँहजोर नहीं तू, पर तेरी ये तो काबलियत मेरे समझ
नहीं आती है,
तुझे क्या समझा था और तू अपने को मेरे कदमों की
धूल समझती है/

अनवरत- संघर्ष तेरा मेरे जीने-मरने के भी किसी तरह
काम न आया,
नीली छतरी वाले की सौगात समझ कर ही तुझे 
जगह दिल में दी है/

एक घरौंदा जो बचपन में हमने- तुमने अपने हाथों से
तामीर किया था,
उसमें रहने वाली गुड़िया क्या इतनी बड़ी हुई कि मक्खी नाक पर बैठने नहीं देती है/

इकरार किया था तुझसे, प्यार किया था तुझसे ही कहीं मैंने,
किस डाल पर तुमने नशेमन बनाया अपना, किसी को
पता नहीं बताती है/

ढूँढ लेगा ' रतन ' तुझे घोर- घने- जंगल के अंधियारे
में भी,
फैसला तुझ पर छोड़ा है, मेरे पास आती है या जंगल
का रास्ता अपनाती है//

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दास्तान- ए- गम ------- गजल

दास्तान- ए- गम
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---- राजीव रत्नेश

महफिल में उसकी हर बात पे सजा,
लब खामोश थे, राह रोके थी हया/

कुछ तो बात न थी हमारे दरमियाँ,
बिना बात ही सर पे उठा लिया आस्माँ/

नवाजिश- ओ- खैर कम हमसे करते न बना,
दूर होता गया वो, हम देते रहे सदा/

पहले नहीं था वो मिसाल- ए नकहत- ए- जाँ,
बन सका न कभी वो अच्छा राजदाँ/

तीर- ए- नजर से ही सबको कर गया घायल,
और भी असलहे उसके पास थे जमा/

सुनाते- सुनाते अपनी दास्तान- ए- गम,
पहलू में ही मेरे वो लंबा हो लिया/

कुछ तो बात है, जो चुप लगाए बैठी है,
खामोश होने वाली न थी उसकी जुबाँ/

नतीजा कुछ न निकला, हो गया अलविदा,
राब्ता हमसे भी न था, हो गया खुद से जुदा/

एक टीस थी दिल में, वो बरकरार है अभी तक,
वरना सब कुछ तो हमने कर दिया है बयाँ/

राजीव, दास्तान तो पूरी हुई मगर ये सच है,
दिल की बात रह गई, बाकी सब था बयाँ/

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Saturday, September 26, 2026

अपने से पराया बना रखा है_____ गजल

अपने से पराया बना रखा है
_______ राजीव रत्नेश

अपने हुस्न का तुमने दीवाना बना रखा है,
न जाने किस हसरत से अपना बना रखा है/

मेरे होश की पूछो तो मुझे होश नहीं है,
तुमने मुझे अपनी महफिल का परवाना बना रखा है/

याद करो जमुना किनारे, हम- तुम साथ बैठे थे,
तुमने मेरे पहलू में आँचल ढलका रखा है/

तुम थीं दिलनशीं, तभी दिल में ठिकाना बना रखा है,
तेरी आँखों का जाम कब का चढ़ा रखा है/

मुझे हसरत- ए- आगोश का दीवाना समझ कर,
न जाने किस सूरत मुझे अपना बना रखा है/

तेरी खामोशी भी जाने क्या- क्या कहती है,
तुमने हर राज आँखों में छुपा रखा है/

मैंने चाहा था उम्र भर तेरा होकर रहना,
तुमने क्यों मुझसे ये फासला बना रखा है/

तेरे दर से लौट कर भी तेरा ख्याल आया,
दिल ने तुझे जाने क्या- क्या बना रखा है/

रतन, अब अपने पास बचा ही क्या है,
तुमने मुझे अपने से पराया बना रखा है/
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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!