Monday, September 28, 2026

जन्म- दिन की मुबारकबाद

जन्मदिन की मुबारकबाद  ५ , सितंबर ( शिक्षक- दिवस )
++++++++++++++++++++++++++++++++++
                -------- राजीव रत्नेश

खुशी ज्यादा लेकिन गम भी थोड़ा दिल में है,
उतर जाएगा ये नशा भी तेरा सबेरा होने तक/

बस आस में दिल आज भी मेरा धड़क रहा है,
ये खुशी की रात भी ढल जाएगी सबेरा होने तक/

तेरे आने की महफिल में घड़ियाँ बस अब थोड़ी हैं,
हर मुश्किल आसान हो जाएगी सबेरा होने तक/

नया सबेरा आएगा, खुशियाँ तमाम लेकर आएगा,
हर तूफान का निशान मिट जाएगा सबेरा होन तक/
                   ----------------

मुहब्बत की तस्करी करते हमसे न बना,
आ गई थी तबीयत उसपे, इंकार करते हमसे न बना/
जज्ब हो गए दिल में ही दिल के अरमाँ,
आग लगी थी दिल में मेरे, उससे बुझए न बना/
                 --------&&&&&-------

दिल में बाकी सभी अरमान सारे क सारे यूँ ही,
हम दिलाते रहेंगे याद सदा पुराने वादे यूँ ही/
                --------&&&&&------

अजनबी होकर भी वो पुकारते ही रह गए,
बेताब हम भी थे, मगर जाते-जाते ही रह गए/
                ---------&&&&&-------

इंतरवाब कर ले मुझसे, छेड़ मुहब्बत भरा नगमा,
पेश कर जाम- ए- लब एक बार सुबह, शाम को दुबारा/
                ----------&&&&&--------

दिल में जगह दी, अपना समझा, तेरा बारंबार शुक्रिया,
आके मेरी पलकों पे बैठ जा मेरे साकी तेरा शुक्रिया/
अजनबी शहर में अनजान सभी से तू होजा शामिल- ए- जिंदगी,
साँस से साँस मिल जाए, आजा बाहों में तेरा शुक्रिया/
                ---------++++++-----------

मय- ए- निगाह ही पिलाती रहेगी या कुछ आगे भी बढ़ेगी,
थाम के दामन मेरा, कोई मुझसे सवाल भी करेगी/
जमाना बने मुद्दई, इसके पहले मेरी हमकदम बन जा,
फिर न मिलेगा मौका, रुबरू मेरे अपनी सूरत कर जा/
               ------------+++++---------

तूने नजर मिलाई इस तरह, दिल तुझ पर फिदा हो गया,
आ गए जो आगोश में, मुहब्बत का हक पूरा अदा हो गया/
               -----------++++---------

तीखे हैं नयन- तीर उसके, बसे हैं दिल में वो मेरे,
दिल से करता याद उसे, कब आएँगे पास वो मेरे
              -----------+++++-------

बन के कजा आज ये बहार आई है,
लगता है मेरी मौत का सामान लाई है/
हम तो खामोश ही रहे उल्फत में,
वो है कि राज- ए- इश्क जुबाँ पर लाई है/
              ----------++++--------

तुम प्यार से खिलाओ तो क्या न खा लूँ,
दवा ही तो है, तुम्हारे हाथों जहर भी खा लूँ/
               ----------++++--------

मैं मदहोश हुआ तो कैसे,
देखा तो तेरे लब थे मेरे लबों पर/
होश जो आया तो पाया,
तू झुकी हुई थी मेरी पलकों पर/

हर साल सबको जन्म- दिन की मुबारकबाद भेजता रहा,
पर किसी ने आज तक न भेजा, लाल कागज में लिपटा पीला गुलाब/

डाक- विभाग अभी बंद न हुआ, आजकल कोरियर का रिवाज,
कीमत चुका न सका, ब्लैक में मिल रहा था नाज़नीन का गुलाब/

इंतजार में खाक कर दी अपनी दुनिया, कोई फरिश्ता बन कर न आया,
समंदर से नायाब रत्न निकले पर विश्वमोहिनी को हर ले गया छलिया/

गुलाब का आदान-प्रदान होता खूब वैलेन्टाइन-डे पर,
एक फूल भी भेजते न बना किसी से मुझे ' शिक्षक- दिवस ' पर/

न चाहिए कलम, न चाहिए तलवार, न अब कोई बहार ही,
मेरे दिल में तो अटका बस तेरा वैलेन्टाइन-डे का व्यापार/

तुझे इतर- ए- गुलाब कहूँ या गुलदस्ता, भीनी खुशबू से मुअत्तर बदन,
एक बार पेश- ए- नजर हो जाए, गुलाबों भरा जो गुलदस्ता/

अब न पहले सी बहार रही, वो रौनक न रही किसी त्यौहार में,
हर बार की तरह अबकी बरस भी करता रहा इंतजार कासिद का/

शादियाँ हो जाती हैं, विदाइयाँ तक हो जाया करती हैं,
निमंत्रण-पत्र भी मिल जाते हैं, पर अब चिठ्ठियाँ नहीं आतीं/

अब तो बस मोबाइल से ही फूल झड़ा करते हैं,
चमेली, बेला और जूही की खुशबू बात से ही आ जाती है/

इसके पहले कोई मेरे मोबाइल को नजर लगाए,
' रतन ' उन्हें एडवान्स में दुआ- ए- नववर्ष देते हैं//
                ---------&&&&---------

Sunday, September 27, 2026

एक जमाने के बाद आई मुझे याद____ गजल

एक जमाने के बाद आई मुझे याद
+++++++++++++++++++++
                राजीव रत्नेश

तसव्वुर में तेरे बिलखती रही पैमाने की याद,
एक जमाने के बाद आई मुझे मयखाने की याद/

दिल में आहें भर रही है, बाल बिखराए हुए,
लड़खड़ाने, गुनगुनाने, नाचने-गाने की याद/

नजरों से जब वो बेतकल्लुफ हो पिलाने लगे,
नसीब मेरे चटके हुए उस पुराने पैमाने की याद/

काले बादलों में गुम है आज मेरा चाँद,
बुझी शमा के धुँए में जैसे परवाने की याद/

मकबरों से आ रही है शाम के धुँधलके में,
एक- एक रफीक के बिछड़ जाने की याद/

भूलने की कोशिश भी बेतरह करता हूँ,
रहती है दिल में फिर भी तेरे अफसाने की याद/

कातिल मेरा मुझे ढूँढता रहा पूरे शहर में,
लौटा भी तब, जब आम हुई उसके गुजर जाने की बात

सीना खोल कर उसके सामने आ भी सकता हूँ कैसे,
वो हैं पुराने तीरंदाज, मुझे अब भी उनके निशाने की याद/

छोड़ कर मुझे तन्हा वो सफर पर चला गया,
कसकती है आज भी मुझे उस बेगाने की याद/

आई है रह-रह के गिरती बिजलियों के रूप में,
एक शब उनके पर्दा उठा कर आने की याद/

सूरज की पहली किरन ने जब पहले गुल को परखा,
दिल ने किए रात के सारे नजराने की याद/

राजीव, रात गई तो लगा सब भूल गया हूँ,
फिर दिल ने चुपके से दिलाए उसी जमाने की याद//

           """""""""""""""

फैसला तुझ पर छोड़ा है_____ गजल

फैसला तुझ पर छोड़ा है
+++++++++++++++
------ राजीव रत्नेश

तू कुछ इस तरह से मुझसे बगलगीर होकर बात करती है,
कि तेरे बदन की बास मेरे नथुनों में आकर सिमटती
है/

मैं अनजान तो नहीं तेरे इश्क के फैलाए गए झूठे अफसाने से,
सरोवर की मछली जैसे काँटे का चारा हजम कर किनारे मचलती है/

मैंने तेरे पहले किसी से कहीं कोई वायदा निभाने का
इकरार नहीं किया था,
एक तू है कि वादाखिलाफी के लिए मुझे आज भी
मजबूर करती है/

जिन सहारों का तुझे यकीन था एक जमाने से, अपने
कारनामों के लिए,
वो सब तेरा भरम ही निकला, पूछती है अब हवा तू
क्या महसूस करती है/

रंगीन- मिजाजी तेरी सिर्फ दिखने भर की चीज है, कोई खासियत नहीं तुझमे,
तेरे उपवन में घूम-घूम ऐ गुलचीं देखा मैंने, वो तेरी
अहमियत नहीं समझती है/

दो खिले गुलाब थे तेरी निगहबानी में, तेरी होशियारी
काम न आई,
एक खुद-ब-खुद दूर चली गई, दूसरी मुझसे तेरा झूठा
किस्सा कहती है/

मुँहजोर नहीं तू, पर तेरी ये तो काबलियत मेरे समझ
नहीं आती है,
तुझे क्या समझा था और तू अपने को मेरे कदमों की
धूल समझती है/

अनवरत- संघर्ष तेरा मेरे जीने-मरने के भी किसी तरह
काम न आया,
नीली छतरी वाले की सौगात समझ कर ही तुझे 
जगह दिल में दी है/

एक घरौंदा जो बचपन में हमने- तुमने अपने हाथों से
तामीर किया था,
उसमें रहने वाली गुड़िया क्या इतनी बड़ी हुई कि मक्खी नाक पर बैठने नहीं देती है/

इकरार किया था तुझसे, प्यार किया था तुझसे ही कहीं मैंने,
किस डाल पर तुमने नशेमन बनाया अपना, किसी को
पता नहीं बताती है/

ढूँढ लेगा ' रतन ' तुझे घोर- घने- जंगल के अंधियारे
में भी,
फैसला तुझ पर छोड़ा है, मेरे पास आती है या जंगल
का रास्ता अपनाती है//

                  """"""""""""""

दास्तान- ए- गम ------- गजल

दास्तान- ए- गम
++++++++++
---- राजीव रत्नेश

महफिल में उसकी हर बात पे सजा,
लब खामोश थे, राह रोके थी हया/

कुछ तो बात न थी हमारे दरमियाँ,
बिना बात ही सर पे उठा लिया आस्माँ/

नवाजिश- ओ- खैर कम हमसे करते न बना,
दूर होता गया वो, हम देते रहे सदा/

पहले नहीं था वो मिसाल- ए नकहत- ए- जाँ,
बन सका न कभी वो अच्छा राजदाँ/

तीर- ए- नजर से ही सबको कर गया घायल,
और भी असलहे उसके पास थे जमा/

सुनाते- सुनाते अपनी दास्तान- ए- गम,
पहलू में ही मेरे वो लंबा हो लिया/

कुछ तो बात है, जो चुप लगाए बैठी है,
खामोश होने वाली न थी उसकी जुबाँ/

नतीजा कुछ न निकला, हो गया अलविदा,
राब्ता हमसे भी न था, हो गया खुद से जुदा/

एक टीस थी दिल में, वो बरकरार है अभी तक,
वरना सब कुछ तो हमने कर दिया है बयाँ/

राजीव, दास्तान तो पूरी हुई मगर ये सच है,
दिल की बात रह गई, बाकी सब था बयाँ/

      """""+++++""""

Saturday, September 26, 2026

अपने से पराया बना रखा है_____ गजल

अपने से पराया बना रखा है
_______ राजीव रत्नेश

अपने हुस्न का तुमने दीवाना बना रखा है,
न जाने किस हसरत से अपना बना रखा है/

मेरे होश की पूछो तो मुझे होश नहीं है,
तुमने मुझे अपनी महफिल का परवाना बना रखा है/

याद करो जमुना किनारे, हम- तुम साथ बैठे थे,
तुमने मेरे पहलू में आँचल ढलका रखा है/

तुम थीं दिलनशीं, तभी दिल में ठिकाना बना रखा है,
तेरी आँखों का जाम कब का चढ़ा रखा है/

मुझे हसरत- ए- आगोश का दीवाना समझ कर,
न जाने किस सूरत मुझे अपना बना रखा है/

तेरी खामोशी भी जाने क्या- क्या कहती है,
तुमने हर राज आँखों में छुपा रखा है/

मैंने चाहा था उम्र भर तेरा होकर रहना,
तुमने क्यों मुझसे ये फासला बना रखा है/

तेरे दर से लौट कर भी तेरा ख्याल आया,
दिल ने तुझे जाने क्या- क्या बना रखा है/

रतन, अब अपने पास बचा ही क्या है,
तुमने मुझे अपने से पराया बना रखा है/
            """"""""""""""""

कर सितम जाओ-------- गजल

कर सितम जाओ
+++++++++++
   राजीव रत्नेश

दूर न बैठो, मेरे करीब--- आ जाओ,
सरशाद हो दिल जागे नसीब-- आजाओ/

तेरी गली से गुजरता हूँ तो दिल कहता है,
आज फिर लौट के मेरे हबीब-- आ जाओ/

मेरी दुनिया से जाकर भी अगर तुम पलट आओ,
तहे-दिल से कहूँगा शुक्रिया---- करीब आ जाओ/

तेरी यादों ते मुझे चैन से रहने न दिया,
अब तो आज, मेरे दिल के नसीब-- आ जाओ/

शिकवा तुमसे नहीं, बस इतनी-सी गुजारिश है,
रूठना छोड़ दो, मेरे करीब--- आ जाओ/

बहुत दिनों से तुम्हें देखने की तमन्ना है,
मेरी आँखों का बन कर नसीब-- आजाओ/

तेरी खूबसूरत- सी याद सताती है मुझे,
मेरी तनहाई के बन जाओ रकीब-- आ जाओ/

तुझसे मिलने की तमन्ना में गुजरती है ये शाम,
मेरी साँसों में उतर कर मेरे करीब-- आ जाओ/

तेरे आने से ही महकेगा मेरा सूना चमन,
मेरी दुनिया के बन के तुम नसीब-- आ जाओ/

रतन, तेरी मेहरबानी रहेगी मुझ पर सदा,
करीब आके मेरे दिल पर कर सितम--- जाओ/

            """"""""""""""""""

Friday, September 25, 2026

तहरीर- ए- रतन ( सौगात ७१ से ८० तक )

सौगात ७१------ तनहाई की गूँज

लोग शोर से डरते हैं, मैं सन्नाटों से प्यार करता हूँ,
यहाँ मैं खुद से मिलता हूँ, और खुद का ही इंतजार करता हूँ/
बहुत भीड़ थी दुनिया में, जहाँ पहचान खो गई थी मेरी,
अब अपनी खामोशी में ही, अपना विस्तार करता हूँ/
' रतन ' को किसी महफिल की अब जरूरत न रही,
मैं अपनी कलम की आवाज से ही अब इकरार करता हूँ/

सौगात ७२ ----------- संस्कारों की पूँजी

विरासत में हमें कोई महल या जागीर न मिली,
पर संस्कारों की वो पूँजी मिली, जो कभी कम न हुई/
मुठ्ठीगंज के उन बुजुर्गों की दुआएँ साथ हैं मेरे,
इसलिए नोएडा की इस चकाचौंध में, आँखें नम न हुईं/
' रतन ' ने सादगी को ही अपना गहना मान लिया,
कि सच्ची अमीरी वही है, जो कभी बरहम न हुई/

सौगात ७३ ------------- विश्वास का लंगर

जब नाव डगमगाई तो ' पूजा ' का नाम याद आया,
लहरों के उस शोर में, बस वही पैगाम याद आया/
हमने तो छोड़ दी थी उम्मीद, साहिल पे पहुँचने की,
पर डूबते को तिनके की तरह, वो इबादत का काम याद आया/
' रतन ' अब तूफानों से डरना कैसा, जब मांझी वो खुद है,
हमें तो उस पतवार से, अपना अटूट यकीन याद आया/

सौगात ७४ ------------- दुआओं का हिसाब

हमने कभी दुनिया से अपना हक नहीं माँगा,
बस खुदा से सबकी खुशियों का, थोड़ा-सा हिस्सा माँगा/
लोग माँगते रहे दौलत, शोहरत और ऊँचे मकाम ' रतन ',
हमने तो बस अपनों के चेहरे पर, नूर का एक किस्सा माँगा/
सत्तर के पार भी ये कलम, इसीलिए जवान है मेरी,
कि मैंने हर दुआ में, सबका भला और वफा का हिस्सा माँगा/

सौगात ७५ -------- तीन चौथाई  ( पचहत्तर की सौगात )

पचहत्तर सौगातें, जीवन के तीन चौथाई सफर का आईना है,
यहाँ हर अनुभव कड़वा है, तो हर याद एक सुहाना बहाना है/
अब मंजिल की लकीरें, साफ दिखने लगी हैं ' रतन ',
अब तो बस इस तहरीर को, दुनिया के दिल तक पहुँचाना है/
सफर का आखिरी हिस्सा, सबसे खूबसूरत होगा,
कि अब तो बस रूह को, रुह से मिलाना होगा/

सौगात ७६ ------------ मंथरा का दौर

आज के दौर में मंथरा हर घर में नहीं, हर मन में रहती है,
जो रिश्तों के बीच जहर की धीरे से धार बहती है/
हमने तो राम बनने की कोशिश में, सब कुछ त्याग दिया,
पर ये दुनिया है कि बस, अपनों से ही दूरियाँ सहती है/
' रतन ' संभल कर चलना, इस कलयुगी समाज में,
यहाँ मीठी बातों के पीछे, साजिशों की गहरी नदी बहती है/

सौगात ७७ ---------------- सच का लिबास

झूठ के रेशमी कपड़ों से, सच का टाट भला होता है,
जो रूह को सुकून दे, वही घाट भला होता है/
दिखावे की दुनिया में, सब कुछ बिक जाता है ' रतन ',
पर जो अपने उसूलों पे टिका रहे, वही ठाठ भला होता है/
हमने तो सच्चाई को ही, अपना ओढ़ना- बिछौना बना लिया,
कि अंत में तो बस, नेक- नीयती का पाठ भला होता है/

सौगात ७८ -------------- यादों का कारवाँ

मुठ्ठीगंज से नोएडा तक, यादों का एक लंबा सफर है,
हर मोड़ पे एक कहानी, और हर कहानी में एक असर है/
कभी संगम की लहरें थीं, कभी यमुना का किनारा था,
आज इन कंक्रीट के जंगलों में, बस यादों का ही घर है/
' रतन ' ने तो हर शहर को अपना ही प्यार दिया,
पर अपनी मिट्टी की सोंधी खुशबू का, आज भी वही असर है/

सौगात ७९ --------------- विश्वास की मशाल

जब रास्ते अँधेरे हों, तो अपनी मशाल खुद बनना,
दूसरों के भरोसे जीने से बेहतर, अपनी आग में जलना/
' पूजा ' के नाम का जो सहारा मिला है हमें ' रतन ',
उसी के दम पे सीखा है हमने, हर तूफान से लड़ना/
गिरने का खौफ उन्हें होता है, जो जमीन से नहीं जुड़े,
हमने तो मिट्टी से ही सीखा है, हर हाल में सँभलना/

सौगात ८० ---------------- अस्सी का पड़ाव

अस्सी सौगातें, अस्सी अनुभवों की एक गहरी किताब है,
यहाँ हर सवाल का जवाब और हर दुःख का हिसाब है/
अब मंजिल का दरवाजा, बस दस्तक का इंतजार कर रहा है,
कि ' तहरीर- ए- रतन ' का सपना, अब हकीकत का गुलाब है/
बीस कदम और बाकी हैं, इस महायज्ञ को पूरा करने में,
फिर तो बस खुशियों का जाम, और यादों का शबाब है/

             -------------&&&&-----------

About Me

My photo
ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!