अबदुल्ला हुआ दीवाना
----- राजीव रत्नेश
महफिल बिखर गई थी आखिरी दौर था,
वो आया, मुझे उठा कर मेरा प्याला गटक गया/
अपनी बहन-बेटियों के दरम्याँ से मुझे उठाया,
लड़ने वो मुझसे ही आया था, मैं समझ गया/
मुझे देख हाफ- बुश्शर्ट की आस्तीनें चढ़ाने लगा,
वह सरकारी रजिस्टर्ड पागल था, मैं सरक गया/
बेगाने की शादी में अब्दुल्ला हुआ दीवाना,
देखा दुल्हन तो दुल्हे का हटा खुद सनक गया/
शामियाने के पंखे को रंचमात्र हिला न सका,
जाकर खुद वह पंखे से लटक गया/
पंखा भार उसका सह न सका और नीचे आ गया,
और वह सोफे के नीचे आकर दुबक गया/
पाँच मिनट अनुलोम-विलोम के बाद भस्त्रिका किया,
बिगड़ैल साँड़ की तरह वह फिर से मेरी तरफ लपका/
मैं पैतरा बदल गया और लड़की वालों पे बिगड़ गया,
दुल्हा भी था मौजी, दाँव लगा कर उसे पटका/
तब कहीं जाकर रस्मे- शादी पूरी हो सकी,
वह लारी से अपनी बहन-बेटियों के साथ विदा किया गया/
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