Monday, October 26, 2026

गुमाँ और यकीन | रतन की ग़ज़ल

भूमिका
प्यार में अक्सर हम सामने वाले को वैसा देख लेते हैं, जैसा देखना चाहते हैं। यह ग़ज़ल उसी सच को स्वीकारती है: कुछ भ्रम मेरा अपना था, और कुछ भरोसा उसका दिया हुआ। टूटने के बाद भी जो भीतर बचा रहा, वह है दृढ़ता।
ग़ज़ल
जिससे प्यार किया था, लगता मुझे वो बेहतरीन था,
कुछ तो गुमाँ था मेरा, कुछ तो वो पक्का यकीन था।
जो भी कहा-सुना था हमने, ख़ुद ही वो भूल गया,
मिलन की रात का वो समाँ कितना रंगीन था।
झूठ भी उसके मुझे सच की तरह लगते रहे,
दिल मेरा उसकी अदा का इस क़दर शौक़ीन था।
सब दिखा था, फिर भी मैंने आँख मूँदी थी, कि बीच
जो हमारे था, वो पर्दा कितना रेशमी, महीन था।
छोड़कर जाना भले ख़ंजर का कोई वार न था,
पर मेरे दिल के लिए वो उससे भी संगीन था।
आज भी दिल पूछता है, क्या वो सच में ऐसा था?
या मेरी ही चाह का हर नक़्श इतना हसीन था?
टूट कर भी इश्क़ में "रतन" रहा फ़ौलाद-दिल,
हर सितम के बाद भी वो और भी मतीन था।
शब्दार्थ
गुमाँ: भ्रम, अनुमान
यकीन: भरोसा
समाँ: माहौल, दृश्य
रंगीन: रंगों से भरा, आनंदमय
अदा: हाव-भाव, अंदाज़
शौक़ीन: चाहने वाला
रेशमी: रेशम जैसा कोमल
महीन: बारीक, पतला
ख़ंजर: कटार
संगीन: गंभीर, भारी
नक़्श: चित्र, छवि
हसीन: सुंदर
सितम: ज़ुल्म
मतीन: दृढ़, मज़बूत

रास्ता बदल-बदल के

भूमिका: मंज़िल अक्सर उतनी बड़ी नहीं होती, जितना बड़ा उसका रास्ता होता है। यह ग़ज़ल उसी रास्ते की है: गिरने, फिसलने, ठोकरें खाने और फिर भी चलते रहने की। जो लोग काँटों के डर से पीछे रह गए, उनसे कोई शिकायत नहीं; और जो मिला, उसमें सबसे क़ीमती वे तजरबे निकले जो सफ़र ने दिए।
मंज़िल तक आ पहुँचा हूँ रास्ता बदल-बदल के,
गिर-गिर कर उठा हूँ कई बार फिसल-फिसल के।
आगे बढ़ता ही रहा हूँ ठोकरें खा-खा के,
लोग पीछे रह गए काँटों के डर से टल के।
कुछ ने रोका, कुछ ने टोका, कुछ ने कहा "सँभल के",
मैं चला अपनी ही धुन में, हर बार मचल के।
धूप ने जलाया मुझको, पर मैं रुका नहीं हूँ,
सोना बना हूँ अक्सर आग में पिघल के।
अँधेरों से क्या डरना, सुबह इन्हीं में पलती है,
सूरज भी तो उगा है रात से निकल के।
मंज़िल पे आके जाना, दौलत तो रास्ता थी,
कितने मिले हैं मुझको तजरबे असल के।
"रतन" की जीत पर हैरान मत हो लोगो,
हर हार के साँचे में निकला है वो ढल के।
शब्दार्थ
मंज़िल: लक्ष्य, गंतव्य
फिसलना: पैर का डगमगाकर गिरना
ठोकर: चलते हुए पैर का किसी चीज़ से टकराना, ज़िंदगी की चोट
टल जाना: रास्ते से हट जाना, पीछे हट जाना
सँभल के: सावधानी से
मचलना: उमंग या ज़िद में आगे बढ़ना
पिघलना: गर्मी से तरल हो जाना
तजरबा: अनुभव
असल: वास्तविक, सच्चा
साँचा: वह ढाँचा जिसमें ढालकर आकार दिया जाए

तुझ पे सदके

भूमिका: कुछ रिश्ते मंज़िल तक नहीं पहुँचते, पर उनकी याद उम्र भर साथ चलती है। यह ग़ज़ल ऐसे प्रेम की है, जिसमें बिछड़ने वाले के लिए प्रेयसी की शादी की शहनाई भी मातम थी। फिर भी उसके मुँह से न शिकायत निकलती है, न कोई इल्ज़ाम; बस दिल से यही आवाज़ आती है कि जो मेरा था, सब तुझ पर न्योछावर। इस दुख में उसकी इकलौती साथी प्रेयसी की सहेली गुलनार थी, जो रौनक से दूर रहकर उसके ग़म की हमदर्द बनी रही।
जाते-जाते मुड़ के देखा, मेरे दिल-ओ-जज़्बात तुझ पे सदके,
क्या-क्या न निसार दूँ, सारे तजरबाते-हयात तुझ पे सदके।
एक झलक में ठहर गया था सारा जहान,
वो पहली मुलाक़ात तुझ पे सदके।
लफ़्ज़ों में जो कह न सका, आँखों ने जो कही,
ख़ामोशी की हर बात तुझ पे सदके।
जागते रहे हम, चाँद भी थककर सो गया,
तेरी याद की हर रात तुझ पे सदके।
गुज़र गया सो गुज़र गया, उसका मातम क्या,
शहनाई, बैंड-बाजे वाली बारात तुझ पे सदके।
आँगन में तेरे महावर रची गई, बिना मेरे,
गालों की सुर्ख़ी, मेंहदी की बरसात तुझ पे सदके।
रौनक से दूर, बावरी गुलनार, हमदर्द मेरी, फिरी द्वार-द्वार,
चंपई रंग मुबारक, सिंदूर की सौग़ात तुझ पे सदके।
हँस के सह लिए ज़माने के सारे सितम,
बिगड़े हुए हालात तुझ पे सदके।
हार कर भी "रतन" ने कहा हँसकर तुझसे,
जीत भी, मेरी हर मात तुझ पे सदके।
शब्दार्थ
सदके: न्योछावर, क़ुर्बान
निसार: न्योछावर करना
दिल-ओ-जज़्बात: दिल और भावनाएँ
तजरबाते-हयात: जीवन के अनुभव
जहान: संसार
मातम: शोक
महावर: दुल्हन के पैरों में लगने वाला लाल रंग
गुलनार: अनार के फूल जैसा गहरा लाल; यहाँ सहेली का नाम
हमदर्द: दुख में साथ देने वाला
चंपई: चंपा के फूल जैसा हल्का पीला
सौग़ात: उपहार, भेंट
सितम: ज़ुल्म
मात: हार

साँकल लगी है दर पर

भूमिका: कभी-कभी दरवाज़ा भीतर से बंद होता है और बाहर खड़ा चाहने वाला भी हार मानने को तैयार नहीं होता। यह ग़ज़ल उसी ज़िद की है, जिसमें ठुकराए जाने के बाद भी न शिकवा है, न कड़वाहट, बस इतनी चाह है कि किसी भी तरह उसे अपने क़रीब बुला लिया जाए।
मैं हार मान कर भी गीत गाना चाहता हूँ,
हर हाल तू मेरी है, तेरी प्रीत निभाना चाहता हूँ।
साँकल लगी है दर पर अंदर से, तो क्या करूँ?
किसी तरह भी तुझे क़रीब बुलाना चाहता हूँ।
मेरे प्यार की नेमत भी तूने आख़िर ठुकरा दी,
सेहरा बाँध के आना था, वो दिन लौटाना चाहता हूँ।
कहकशाँ से आसमान में आतिशबाज़ी-सी हुई,
बिजली की चकाचौंध में तुझे उड़ा ले जाना चाहता हूँ।
ज़माना लाख रोके, अपने मंसूबे भी आज़मा ले,
तुझे तेरे क़फ़स से दूर ले जाना चाहता हूँ।
कहीं से इक सितारा ज़मीं पर एहसान बन के आया था,
उसको सिर्फ़ अपना ही एहसानमंद बनाना चाहता हूँ।
ग़मज़दा हूँ "रतन", पर इतना नहीं कि तुझे ही हार जाऊँ,
ना सुन के आजिज़ हूँ, तेरी हाँ ही पाना चाहता हूँ।
शब्दार्थ
साँकल: दरवाज़े की कुंडी
नेमत: वरदान, अनमोल देन
सेहरा: दूल्हे के सिर पर बाँधी जाने वाली फूलों की लड़ी
कहकशाँ: आकाशगंगा
आतिशबाज़ी: पटाखों और रोशनी का खेल
मंसूबा: इरादा, योजना
क़फ़स: पिंजरा, क़ैद
एहसान: उपकार
एहसानमंद: आभारी
ग़मज़दा: दुख से भरा
आजिज़: तंग, परेशान

झील में चाँद

भूमिका: रूप को शब्दों में बाँधना हमेशा मुश्किल रहा है। यह ग़ज़ल एक ऐसे सौंदर्य की है जो झील में उतरे चाँद की तरह शांत, ठहरा हुआ और नज़ाकत भरा है। शायर की क़लम बार-बार उसी चाँद पर लौटती है, और अंत में वही रूप उसकी ग़ज़ल बन जाता है।
तेरा रूप-शृंगार है कुछ ऐसे,
उतरा है झील में चाँद जैसे।
पलकों की ओट में कुछ राज़ छुपा है,
कोई चुपके से ख़त रखता हो जैसे।
तुझे देखकर लफ़्ज़ ठहर जाते हैं मेरे,
तारीफ़ करूँ तेरी तो करूँ मैं कैसे?
ज़ुल्फ़ों की घटा, माथे की बिंदिया,
रात ने सुबह को सँवारा हो जैसे।
तेरी हँसी की खनक सुनकर लगा,
मंदिर में घंटियाँ बजी हों जैसे।
तू जैसी है, कोई सँवरे भी तो वैसे,
चाँद भी झील में उतरे तो कैसे?
"रतन" की क़लम में उतर आई है तू ऐसे,
ग़ज़ल कोई पूरी हुई हो जैसे।
शब्दार्थ
शृंगार: सजावट, सजने-सँवरने की कला
ओट: आड़, पर्दा
घटा: बादलों का घना झुंड
बिंदिया: माथे की सजावटी बिंदी
खनक: धातु या हँसी की मधुर गूँज
नज़ाकत: कोमलता, सुकुमारता

गुल भी, नकहत भी

भूमिका: सच्चा प्रेम सिर्फ़ चेहरे का नहीं होता, उसमें स्वभाव की ख़ुशबू भी चाहिए। यह ग़ज़ल एक ऐसे साथी की है जिसमें रूप और गुण दोनों एक साथ मौजूद हैं, जैसे दो नदियों का संगम, और जिसका मिलना ही तीर्थ के दर्शन जैसा है।
गुल भी चाहिए साथ नकहत भी,
सीरत भी चाहिए साथ सूरत भी।
तुझ में दोनों हैं, साथ-साथ मौजूद,
तू ही मेरा संगम, तू ही ज़ियारत भी।
सिर्फ़ चेहरा नहीं, मुझे चाहिए,
दिल की सच्चाई, नेक नीयत भी।
तेरी नज़रों में है शरारत भी,
तेरी नज़रों में है शराफ़त भी।
तेरा मिलना ही है ग़नीमत भी,
और यही है मेरी दौलत भी।
इश्क़ तुझसे हुआ तो बन बैठी,
तेरी ख़ुशबू मेरी आदत भी।
माँगता है "रतन" ख़ुदा से यही,
तू ही उसकी दुआ, इनायत भी।
शब्दार्थ
गुल: फूल
नकहत: ख़ुशबू
सीरत: स्वभाव, चरित्र
सूरत: चेहरा, रूप
संगम: नदियों का मिलन
ज़ियारत: तीर्थयात्रा, पवित्र स्थान के दर्शन
नीयत: इरादा
शरारत: चंचलता, नटखटपन
शराफ़त: भलमनसाहत
ग़नीमत: सौभाग्य, ग़नीमत की बात
इनायत: कृपा, मेहरबानी

दामन में काँटे

भूमिका: कभी-कभी जिसे हमने सबसे ऊपर रखा, वही हमारी क़द्र नहीं करता। यह ग़ज़ल उसी दर्द की है, जिसमें शायर देखता है कि जिसके लिए उसने सब कुछ वारा, उसका अपना दामन काँटों से भर गया, फिर भी उसकी दुआ बाक़ी है।
देखो तो हाल तेरा किस कदर हुआ,
दामन तेरा काँटों से ही भर गया।
ज़िंदगी के फ़लसफ़े में पहला दर्जा तुझे दिया,
ख़ता मुझसे ही हुई, तुझी पे मर गया।
न शिकवा है, न गिला, न मैं हूँ ख़फ़ा,
तेरे हक़ में आज भी बस मेरी दुआ।
जिस मोड़ पर तू मुझसे हुई थी जुदा,
उसी मोड़ पर ठहरा है मेरा पता।
फूल बिछाए थे राहों में मैंने तेरी,
काँटों को तूने ही अपना चुना।
जो दीप जलाया था तूने उम्मीद का,
आँधियों में भी रहा वो रौशन सदा।
हार कर भी "रतन" ने किसी से न कहा,
ज़ख़्म सीने में रखा और हँसकर जिया।
शब्दार्थ
हाल: दशा, हालत
दामन: आँचल, झोली
फ़लसफ़ा: जीवन-दर्शन
तरजीह: प्राथमिकता, ऊँचा स्थान देना
ख़ता: भूल, ग़लती
गिला / शिकवा: शिकायत
ख़फ़ा: नाराज़
जुदा: अलग
रौशन: प्रकाशित

About Me

My photo
ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!