Tuesday, November 3, 2026
तहरीर- ए- रतन ( सौगात ९१ से१०० तक)
होश आया तो नजर नज़्म
होश आया तो
नज़्म: राजीव रत्नेश "रतन"
भूमिका
ग़ज़ल के हर शेर की अपनी अलग दुनिया होती है, जबकि नज़्म एक ही ख़याल को शुरू से आख़िर तक एक धारा की तरह बहाती है। यह नज़्म क़ाफ़िये और रदीफ़ की बंदिश से आज़ाद है। इसकी ख़ूबसूरती इसके मंज़र में है: मदहोशी का एक लम्हा, उसके बाद की ख़ामोशी, और फिर होश आने पर वही एहसास, जो पलकों पर ठहरा रह जाता है।
नज़्म का पहला बंद शायर की मूल पंक्तियाँ हैं और आगे के बंद उसी भाव को विस्तार देते हैं। आख़िरी बंद में नज़्म उसी "पलकों पर" के एहसास पर लौटती है, जहाँ से उसने शुरुआत की थी।
नज़्म
१.
मैं मदहोश हुआ कैसे, ख़बर नहीं,
देखा तो तेरे लब थे मेरे लबों पर,
होश आया तो पाया, तू
झुकी थी मेरी पलकों पर।
२.
वो कौन-सी घड़ी थी, जब वक़्त थम गया,
साँसों में साँसें घुल गईं,
और रात ने चुपके से
अपना आँचल हम पर डाल दिया।
३.
न कोई सवाल था, न कोई जवाब,
बस ख़ामोशी की एक मीठी-सी सरगोशी थी,
तेरी ज़ुल्फ़ों की ख़ुशबू
मेरी रूह तक उतर आई थी।
४.
अब जब सुबह की पहली किरन
खिड़की से झाँकती है,
मैं सोचता हूँ,
वो ख़्वाब था या हक़ीक़त?
५.
बस इतना जानता हूँ,
तेरे लबों की नमी अब भी मेरे लबों पर है,
और तेरी नज़र की ठंडक
अब भी मेरी पलकों पर।
शब्दार्थ
- नज़्म: एक विषय या भाव पर लिखी गई कविता, जिसमें ग़ज़ल की तरह क़ाफ़िये-रदीफ़ की पाबंदी ज़रूरी नहीं
- आज़ाद नज़्म: बिना तुक और बिना बंधे छंद की नज़्म
- बंद: नज़्म का एक खंड, यानी पद
- मदहोश: नशे या ख़ुमारी में डूबा हुआ
- लब: होंठ
- पलकें: आँख के ऊपर-नीचे के पर्दे
- घड़ी: पल, क्षण
- वक़्त: समय
- आँचल: पल्लू, ओढ़नी का किनारा; यहाँ रात की चादर
- ख़ामोशी: चुप्पी, मौन
- सरगोशी: कानों में धीमे से कही गई बात, फुसफुसाहट
- ज़ुल्फ़ें: लंबे घने बाल
- रूह: आत्मा
- किरन: रोशनी की रेखा
- ख़्वाब: सपना
- हक़ीक़त: सच्चाई, वास्तविकता
- नमी: हल्की गीलापन, तरावट
- ठंडक: शीतलता, सुकून
- तख़ल्लुस: शायर का उपनाम
शम्अ जलती रही गजल
शम्अ जलती रही
ग़ज़ल: राजीव रत्नेश "रतन"
भूमिका
शम्अ और परवाने की कहानी उर्दू-हिंदी शायरी का सबसे पुराना और सबसे प्यारा रूपक है। इस ग़ज़ल में शायर उसी कहानी के सामने एक चुभता हुआ सवाल रखता है: जब शम्अ जलती रही और परवाना जल बुझा, तो आख़िर क़ातिल कौन है? मुहब्बत का हासिल क्या रहा, और इस तबाही का दोषी किसे ठहराएँ?
हर शेर के आख़िर में लौटता हुआ "ये क्या हुआ" हैरानी, दर्द और बेबसी तीनों को एक साथ समेटता है। क़ाफ़िया "-इल" (हासिल, क़ातिल, साहिल, महफ़िल…) और रदीफ़ "ये क्या हुआ" है। मक़्ते में शायर अपने तख़ल्लुस "रतन" के साथ ख़ुद को भी इसी दर्द का हिस्सा बना लेता है।
ग़ज़ल
मतला
शम्अ जलती रही, मुहब्बत का हासिल ये क्या हुआ,
परवाना जल बुझा, किसे कहें क़ातिल ये क्या हुआ।
२.
हर क़दम पर इम्तिहाँ था, हर नज़र में आग थी,
डूबने वाले को भी न मिला साहिल, ये क्या हुआ।
३.
रौशनी करते रहे चुपचाप जलकर रात भर,
सुबह होते ही सूनी रह गई महफ़िल, ये क्या हुआ।
४.
जो मिटा वो इश्क़ में कहलाया सबसे ही कामिल,
जो बचा वो रह गया बस ग़ाफ़िल, ये क्या हुआ।
५.
चाँद तकता रह गया और रात ढलती ही रही,
दूर तक दिखती न थी कोई मंज़िल, ये क्या हुआ।
६.
रौशनी देने चला था जो, उसी का घर बुझा,
देखने वाला भी था उसमें शामिल, ये क्या हुआ।
७.
उम्र भर पाला किए जिसको वफ़ा के नाम पर,
वो निकला बेरुख़ी के क़ाबिल, ये क्या हुआ।
८.
हमने सौंपा था जिसे अपना सभी कुछ प्यार से,
उसी ने तोड़ दिया दिल, ये क्या हुआ।
मक़्ता
हर तरफ़ देखा "रतन" तो ख़ुद को पाया ज़ख़्म में,
अपना ही हूँ आज मैं बिस्मिल, ये क्या हुआ।
शब्दार्थ
- शम्अ: दीपक, मोमबत्ती, ज्योति
- परवाना: पतंगा, जो शम्अ पर जल मरता है; सच्चे आशिक़ का प्रतीक
- हासिल: प्राप्ति, नतीजा
- क़ातिल: हत्यारा, जान लेने वाला
- इम्तिहाँ: परीक्षा
- साहिल: किनारा
- महफ़िल: सभा, जमघट
- कामिल: पूर्ण, सिद्ध
- ग़ाफ़िल: बेख़बर, अनजान, जो होश में न हो
- मंज़िल: गंतव्य, ठिकाना
- शामिल: सम्मिलित, हिस्सेदार
- क़ाबिल: योग्य
- बेरुख़ी: उपेक्षा, बेपरवाही
- वफ़ा: निष्ठा, निभाने का भाव
- बिस्मिल: घायल, ज़ख़्मी
- ज़ख़्म: घाव
- मतला: ग़ज़ल का पहला शेर, जिसके दोनों मिसरों में क़ाफ़िया-रदीफ़ आता है
- मक़्ता: ग़ज़ल का अंतिम शेर, जिसमें शायर का तख़ल्लुस आता है
- क़ाफ़िया: तुक वाले शब्द
- रदीफ़: हर शेर के अंत में दोहराया जाने वाला पद/
पैमाने में तुझे उतार कर गजल
पैमाने में तुझे उतार कर
ग़ज़ल: राजीव रत्नेश "रतन"
भूमिका
यह ग़ज़ल हुस्न और इश्क़ की उस कैफ़ियत को बयान करती है, जहाँ महबूब की मौजूदगी ख़ुद शराब बन जाती है और आशिक़ हैरान है कि इस नशे को लफ़्ज़ों में, इबादत में और अदब में कैसे समेटे। हर शेर एक ही सवाल पर लौटता है, "करूँ कैसे?", और यही बेबसी इसकी रूह है।
क़ाफ़िया "-अब" (लब, शब, अदब…) और रदीफ़ "करूँ कैसे" है। मक़्ते में शायर अपने तख़ल्लुस "रतन" के साथ महबूब से मुख़ातिब होता है।
ग़ज़ल"
१.
पैमाने में तुझे उतार कर जाम-ब-लब करूँ कैसे,
पहलू में पाकर तुझे, रंगीन अपनी औक़ात-ए-शब करूँ कैसे।
२.
तेरे नैन-नक़्श अक़्स बनकर मेरे दिल में उतर गए हैं,
ये सुहानी शाम तुझपे सदक़े, पेश तुझे दिल का अदब करूँ कैसे।
३.
इक झलक ने तेरी कर दिया है मुझे बेसुध,
अब तुझसे बढ़कर और कोई तलब करूँ कैसे।
४.
दिल का हाल तुझे देखकर हो गया है अजब,
होश में रहने का कोई सबब करूँ कैसे।
५.
तेरी ज़ुल्फ़ों की घटा में खो गया हर रास्ता मेरा,
अब भटकने के सिवा कोई और मतलब करूँ कैसे।
६.
चाँद भी शर्मा के बादल की ओट में जा छुपा,
तेरे आगे चाँद की मैं बात अब करूँ कैसे।
७.
तेरे लबों पे जो तबस्सुम है, वही मेरी इबादत है,
इस इबादत में किसी और को रब करूँ कैसे।
८.
तेरी हर अदा क़यामत है, तेरी हर नज़र सितम,
इस हुस्न की तारीफ़ मैं ग़ज़ब करूँ कैसे।
मक़्ता
तुझ बिन बेनाम हूँ मैं, अब तू ही बता ऐ "रतन",
अपना कोई दूसरा मैं लक़ब करूँ कैसे।
शब्दार्थ
- पैमाना: शराब का प्याला
- जाम-ब-लब: होंठों से लगा हुआ जाम
- औक़ात-ए-शब: रात के पहर या घड़ियाँ
- पहलू: बग़ल, पास
- नैन-नक़्श: आँखें और चेहरे की बनावट
- अक़्स: प्रतिबिंब, छाया
- सदक़े: न्योछावर, क़ुर्बान
- अदब: आदर, शिष्टाचार, सम्मान
- बेसुध: होश खो बैठा
- तलब: चाहत, माँग
- अजब: विचित्र, अनोखा
- सबब: कारण, वजह
- घटा: घने बादल
- मतलब: प्रयोजन, उद्देश्य
- ओट: आड़, परदा
- तबस्सुम: मुस्कान
- इबादत: पूजा, उपासना
- रब: ईश्वर
- क़यामत: प्रलय; यहाँ ग़ज़ब ढाने वाली
- सितम: ज़ुल्म, सताना
- ग़ज़ब: अनोखा, असाधारण
- लक़ब: उपाधि, उपनाम
- बेनाम: जिसकी कोई पहचान न हो
- मक़्ता: ग़ज़ल का अंतिम शेर, जिसमें शायर का तख़ल्लुस आता है
- क़ाफ़िया: तुक वाले शब्द
- रदीफ़: हर शेर के अंत में दोहराया जाने वाला पद
