Friday, October 2, 2026

दर्द- ए- दिल का आराम पूछो--------- गजल

दर्द- ए- दिल का आराम पूछो
          राजीव रत्नेश

कलेजे से यूँ ही नहीं लगाया था तुमको,
आ गए हो तो दर्द- ए- दिल का आराम पूछो/

रंगीनियों में सबा का आलम न पूछो,
तू मोहतरिम है, हमसे दिल का दाग न पूछो/

आके इक बार नजर के सामने सूरत तो दिखाओ,
अपनी महकती साँसों से नगमा- ए- दिल सुनाओ/

हम सारे जहाँ से छुपा कर तुमको दिल के गोशे में
रखेंगे,
हम कुछ न कहेंगे तुम्हें, तुम शिकवा कर के देखो/

जिस तरह पहली बार पैगाम- ए- उल्फत भेजा था मुझे,
उसी उम्मीद में जी रहे हैं, दुबारा पेश आकर देखो/

एक तस्वीर ही अपनी, छिपा कर देखने को भेज देना,
ख्वाबों से कब तक दिल बहलेगा, खुद साथ आकर देखो/

अपना ख्याल रखना, हाल-ए- दिल मेरा किसी से न
कहना,
गर्दिश में है मुकद्दर, अपनों से अब न लजाओ/

आता क्या है तुम्हें इक शर्मीली, हठीली मुहब्बत के सिवा,
हमारी खातिर अपने से, अपनों से तो न शरमाओ/

हो सके तो अकेली आना, छोटी बहन को न साथ लाना,
वो भाँड़ा तुम्हारा फोड़ देगी, खुद से जरा समझो/

मेरी सदियों की तुम चाहत हो, अब अजनबी न बनो,
रतन, सब जानते हैं--- आज खुल कर हाल- ए- दिल
बयान करो/

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बड़ी देर से दर पे आँखें लगी थीं------ गजल

बड़ी देर से दर पे आँखें लगी थीं
           राजीव रत्नेश

बड़ी देर से दर पे आँखें लगी थीं, हमसे गफलत हो गई,
मौसम के परिंदे थे तुम, हमको तुमसे उल्फत हो गई/

बगीचे में अबकी पौधा एक अमरूद का लगाया था,
सैर- ए- गुल्शन को चले तो हर शजर से उल्फत हो गई/

चाहत न थी कोई चाँद का टुकड़ा ही जीनत बने मेरी शाम का,
जिसके पैरहन में सितारे जड़े थे, उसी से चाहत हो गई/

सू- ए- मंजिल जाते थे और भी रास्ते पर परवाह न की,
बस उनकी खूबियों को देखा, हमसे कुछ हिमाकत हो
गई/

बौर बनके कब तक पत्तों में छुपोगी, कभी तो घूँघट
उठाओगी,
पूछेंगे तब तुमसे तुम्हारा हाल, दिल में अभी से हलचल हो गई/

जिंदगी में एक मोहब्बत ही तो है, इसी आस पे जिए जा रहे हैं,
अजल ने दी सदा- ए- शिरकत, हमारी भी क्या जुर्रत हो गई/

महकमा था ये मुंसिफी का, हम तो कब के बेजार हो
गए,
काजल आँखों में लगाया तुमने, तुमसे आरजू- ए-वस्ल हो गई/

कब के निकले थे घर से, मंजिल पर कैसे पहुँच पाते,
निकले थे सज-धज के, रास्ते में ही मय्यत हो गई/

किसने कहा था महफिल से हमेशा के लिए चले जाने
को,
समझ न पाए तुमको, दिल को तुम्हारी हसरत हो
गई/

बरबादी- ए- किस्मत का तमाशा देखा, शोहदों को भी
परखा,
न जाने मुहब्बत की कायनात में, किधर से क्यामत हो
गई/

तुम कहो तो मान लेता हूँ, जहान में बाकी इज्जत न रही,
साथ हमारे न किसी का खौफ, न चाहत--- बस सबसे
अदावत हो गई/

तुम्हारा साथ पाकर ही तो जुगनू से आफताब हुआ
था,
रतन, तुम्हारे आँचल की छाँव मिली तो सबकी रहमत
हो गई/

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उल्टा हो गया गंगा का बहाव------ गजल

उल्टा हो गया गंगा का बहाव
------- राजीव रत्नेश

कज़रारी आँखें, बोझिल पलकें, माथे पे बिंदी का आलम,
पुरजोर चली जब आँधी, नाक में झूलती नथ का
आलम/

मेरी तरह थोड़ी सी बची होती तुझ में अहसास-ए- गैरत,
तुझे अपना बना लेता, छोड़ कर दुनिया का सारा
जंजाल/

मीठी-मीठी मिठाई से भी मीठी तेरी जिक्र-ए- जवानी,
कहाँ का मुसाफिर मैं, किस ओर गया तेरा बालम/

ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया, करके तेरा ख्याल,
आ भी जाओ मुकाबिल दुनिया के, अब न करो मलाल/

सँवारेंगे तुझे, गले से लगाएँगे, समझ अपनी जान,
रोशनी में नहाएगी कोठी, गूंजेगा मंगलगान/

पैंतरा बदलना भी कोई तुमसे सीखे, होओगी हलकान,
बह जाओगी दूर कहीं, दरिया में बचा नहीं जाल/

खता दीवानों की क्या, तुम्हें ही थी बस उन्हीं की पड़ी,
हमने तो सिर्फ आईना दिखाया, फरार हुआ साजन/

मोल न करो मेरी कलम का, संभाल लो अपनी तलवार,
चुन-चुन कर एक- एक को पकड़ा, बगुले ने साधा
ध्यान/

रतन को अब भी आस, छोड़ कर न जाओगी उदास,
जाओगी भी तो लौट के आओगी, उल्टा हो गया गंगा का बहाव/

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Thursday, October 1, 2026

आ जाओ दिल में------- गजल

आ जाओ दिल में
      --- राजीव रत्नेश

आ जाओ दिल में, दो तर्ज- ए- बयानी को रास्ता,
हक में तुम्हारे अच्छा है, दो मेहरबानी को रास्ता/

समंदर फिर भी गरजेगा, तूफान भी राह में आएँगे,
न दो अब फिर से तुम किसी नातवानी को रास्ता/

कदम-कदम पे हौसले पस्त होंगे, न होंगे मरहले आसान,
हम तो बस राह- ए- मंजिल दे शगुफ्ताख्याली को रास्ता/

जिस गली में तुम रहते हो, वहाँ तक हमारी पहुँच नहीं,
फरिश्ते वुजू करते हैं, इंसान से ही खुदा को वास्ता/

ये आबशार के साथ उमड़ती है तेरी जुल्फ- ए- बरहम,
खिदमत में तेरी खुद मंजिल चलेगी, तुम तो बनाओ रास्ता/

नमाज भी अदा हो जाएगी, उड़ते रहें भले रुख पे गेसू
तुम दिल में बस दे दो अपनी मेहरबानी को रास्ता/

फना हो जाएँगे हम, तुझे खबर होने तक,
चाहते हैं तेरी किसी निशानी से वास्ता/

हम तो अब अपनी मुहब्बत को तमाशा बनाने से रहे,
चमन के फूलों में ढूँढ़ते रहे तेरी रानाइयों का वास्ता/

मजबूरियाँ मुहब्बत की, ' रतन ' हैं बावस्ता,
न दो अब मुहब्बत में फिर किसी नादानी को रास्ता/

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Wednesday, September 30, 2026

कहाँ डरते हैं जलजलों से----- गजल

कहाँ डरते हैं जलजलों से
     ---- राजीव रत्नेश

जिन्दगी को हसरत की निगाह से निहारने वाले,
एक- दूसरे का होकर ही मौत को समझने वाले/

कड़वे घूँट भी एक दिन मौत के पीने होंगे,
सफर में शोलों के दरिया से गुजरने वाले/

ज़िन्दगी फूलों की सेज थी, काँटे भी निकल आए,
अल्लाह के रहमो- करम को पहचानने वाले/

आदत थी गुलमोहर की छाँव में शौक से सोने की,
बागबाँ की नजर पड़ते ही नजर से उतरने वाले/

जिंदगी मिली है तो बस चार दिन की, समझो तो सही,
संघर्ष ही तेरा दुर्घष प्रयास है, ओ नींद से जागने वाले/

आश्वासन न दो कि मौत से भी तुम बचा लोगे,
हम तो तूफानों में भी समंदर पार करने वाले/

मौसम का बेखौफ परिंदा भी सहम जाता है,
हम हैं मौत के फंदे को भी पीछे छोड़ने वाले/

यकीन मानो, कोई साथ न देगा, न कोई साथ जाएगा,
सुख के साथी कहाँ दुःख में नजर आने वाले/

बदलते मौसम का इरादा था कि हमें भी साथ ले ले,
हम खुद चल दिए उसके साथ, कहाँ थे सहमने वाले/

रतन, कहाँ डरते हैं ऐसे जलजलों से,
हम तो हैं अपनी मौत को खुद बुलाने वाले//
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Tuesday, September 29, 2026

अलविदा मेरे इश्क अलविदा----- गजल

अलविदा मेरे इश्क अलविदा
          ----- राजीव रत्नेश

तेरा-मेरा प्यार क्या सचमुच ही बिल्कुल एकतरफा था,
खुदा का खौफ करो और बताओ, क्या तुमने मुझे नहीं चाहा था/

मेरी नादान वफा ने तेरे सिवा किसी को न पूछा,
तू ही एक मेरी थी, मेरी मुहब्बत को तेरा ही आसरा था/

जज्ब हुए अरमान सीने में, दम घुटा तेरी छिछली चाहत में,
खुदा की इतनी बड़ी कायनात में एक तू ही तो मेरा था/

आँधी- अंधड़ चले, तूफान भी आए मेरी राहों में,
दिल में तेरी मुहब्बत का दीप जलाए मुझे सिर्फ इंतजार तेरा था/

कौन जाने अब तू कहाँ भटक रही होगी, किस हाल में होगी,
बिना किसी बात के तो तेरा अफसाना न मैंने लिखा था/

बादल बरस के निकल गया, चाँद भी आस्मान में खिल गया,
तेरा ही झूठा वादा था आने का, मैं जानता था, तुझे तो
न आना था/

फलसफा- ए- इश्क तेरा-मेरा क्या यूँ ही आधा-अधूरा
ही रहेगा,
जमीन- आसमान के कुलाबे मिलाने वाली बता, किस बात का झगड़ा था/

फरमान तेरे बाप का ही था, मुझे तेरी शादी में न बुलाने का,
पर मुझे तो आखिरी बार ही सही, तुझसे मिलने तो
आना था/.

गम को फरहत दिखाने की तेरी कोशिश भी भरपूर
थी,
नकहते- गुल भी था, दरिया की लहरें भी झूमती गाती, सुनसान बस किनारा था/

शहर के किसी ब्यूटी- पार्लर में कसमसाती बैठी रही
होगी घंटों,
तेरी दिखावटी शादी में हलाल हो गए कितने बकरे, अम्मा के खैर मनाते/

जानता था, मुँह अँधेरे ही तू कल निकल जाएगी, इंतजार किसका करेगी,
मेरे पहुँचने से पहले ही तेरी बस को शहर से निकल
जाना था/

सुबह-सवेरे सूरज की पहली किरन ने जब झकझोर
कर मुझे जगाया,
तू ही मेरा ख्वाब भी थी, हकीकत में भी तुझे ही जाना था/

दम घुटता था मेरा तेरी घनी जुल्फों की कड़ी गिरफ्तारी में,
तुमने जुल्फ छटवा दी तो मुझे भी अब आजाद ही हो
जाना था/

जमुना बहाव पे थी और तेरा भी शहर से गुजर जाना
था,
मेरे पास बचा क्या था, मुझे तो दरिया में बस कूद ही
तो जाना था/

अब फिर कब और किन हालात में मिलना होगा, अलविदा मेरे इश्क अलविदा,
रतन, जानता था, जमाने को तो तेरे खिलाफ हो ही
जाना था/

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Monday, September 28, 2026

जन्म- दिन की मुबारकबाद

जन्मदिन की मुबारकबाद  ५ , सितंबर ( शिक्षक- दिवस )
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                -------- राजीव रत्नेश

खुशी ज्यादा लेकिन गम भी थोड़ा दिल में है,
उतर जाएगा ये नशा भी तेरा सबेरा होने तक/

बस आस में दिल आज भी मेरा धड़क रहा है,
ये खुशी की रात भी ढल जाएगी सबेरा होने तक/

तेरे आने की महफिल में घड़ियाँ बस अब थोड़ी हैं,
हर मुश्किल आसान हो जाएगी सबेरा होने तक/

नया सबेरा आएगा, खुशियाँ तमाम लेकर आएगा,
हर तूफान का निशान मिट जाएगा सबेरा होन तक/
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मुहब्बत की तस्करी करते हमसे न बना,
आ गई थी तबीयत उसपे, इंकार करते हमसे न बना/
जज्ब हो गए दिल में ही दिल के अरमाँ,
आग लगी थी दिल में मेरे, उससे बुझए न बना/
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दिल में बाकी सभी अरमान सारे क सारे यूँ ही,
हम दिलाते रहेंगे याद सदा पुराने वादे यूँ ही/
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अजनबी होकर भी वो पुकारते ही रह गए,
बेताब हम भी थे, मगर जाते-जाते ही रह गए/
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इंतरवाब कर ले मुझसे, छेड़ मुहब्बत भरा नगमा,
पेश कर जाम- ए- लब एक बार सुबह, शाम को दुबारा/
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दिल में जगह दी, अपना समझा, तेरा बारंबार शुक्रिया,
आके मेरी पलकों पे बैठ जा मेरे साकी तेरा शुक्रिया/
अजनबी शहर में अनजान सभी से तू होजा शामिल- ए- जिंदगी,
साँस से साँस मिल जाए, आजा बाहों में तेरा शुक्रिया/
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मय- ए- निगाह ही पिलाती रहेगी या कुछ आगे भी बढ़ेगी,
थाम के दामन मेरा, कोई मुझसे सवाल भी करेगी/
जमाना बने मुद्दई, इसके पहले मेरी हमकदम बन जा,
फिर न मिलेगा मौका, रुबरू मेरे अपनी सूरत कर जा/
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तूने नजर मिलाई इस तरह, दिल तुझ पर फिदा हो गया,
आ गए जो आगोश में, मुहब्बत का हक पूरा अदा हो गया/
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तीखे हैं नयन- तीर उसके, बसे हैं दिल में वो मेरे,
दिल से करता याद उसे, कब आएँगे पास वो मेरे
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बन के कजा आज ये बहार आई है,
लगता है मेरी मौत का सामान लाई है/
हम तो खामोश ही रहे उल्फत में,
वो है कि राज- ए- इश्क जुबाँ पर लाई है/
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तुम प्यार से खिलाओ तो क्या न खा लूँ,
दवा ही तो है, तुम्हारे हाथों जहर भी खा लूँ/
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मैं मदहोश हुआ तो कैसे,
देखा तो तेरे लब थे मेरे लबों पर/
होश जो आया तो पाया,
तू झुकी हुई थी मेरी पलकों पर/

हर साल सबको जन्म- दिन की मुबारकबाद भेजता रहा,
पर किसी ने आज तक न भेजा, लाल कागज में लिपटा पीला गुलाब/

डाक- विभाग अभी बंद न हुआ, आजकल कोरियर का रिवाज,
कीमत चुका न सका, ब्लैक में मिल रहा था नाज़नीन का गुलाब/

इंतजार में खाक कर दी अपनी दुनिया, कोई फरिश्ता बन कर न आया,
समंदर से नायाब रत्न निकले पर विश्वमोहिनी को हर ले गया छलिया/

गुलाब का आदान-प्रदान होता खूब वैलेन्टाइन-डे पर,
एक फूल भी भेजते न बना किसी से मुझे ' शिक्षक- दिवस ' पर/

न चाहिए कलम, न चाहिए तलवार, न अब कोई बहार ही,
मेरे दिल में तो अटका बस तेरा वैलेन्टाइन-डे का व्यापार/

तुझे इतर- ए- गुलाब कहूँ या गुलदस्ता, भीनी खुशबू से मुअत्तर बदन,
एक बार पेश- ए- नजर हो जाए, गुलाबों भरा जो गुलदस्ता/

अब न पहले सी बहार रही, वो रौनक न रही किसी त्यौहार में,
हर बार की तरह अबकी बरस भी करता रहा इंतजार कासिद का/

शादियाँ हो जाती हैं, विदाइयाँ तक हो जाया करती हैं,
निमंत्रण-पत्र भी मिल जाते हैं, पर अब चिठ्ठियाँ नहीं आतीं/

अब तो बस मोबाइल से ही फूल झड़ा करते हैं,
चमेली, बेला और जूही की खुशबू बात से ही आ जाती है/

इसके पहले कोई मेरे मोबाइल को नजर लगाए,
' रतन ' उन्हें एडवान्स में दुआ- ए- नववर्ष देते हैं//
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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!