सौगात ६१------ अक्स की तलाश
भीड़ में अक्सर खुद को गुम पाया है हमने,
शहर की चकाचौंध में अपना ही साया गँवाया है हमने/
लोग ढूढते हैं खुदा को ऊँची मीनारों में ' रतन ',
पर उसे तो अपनी रूह के कोनों में पाया है हमने/
' तहरीर ' का हर लफ्ज एक आईना है मेरी जान,
जिसमें हर बार अपना ही एक नया अक्स पाया है हमने/
सौगात ६२------- पुरानी चिठ्ठी
दराज में रखी वो पुरानी चिठ्ठी आज फिर से बोल पड़ी,
बचपन की यादों को जैसे कोई खिड़की खुल पड़ी/
मुठ्ठीगंज की वो मिट्टी, वो स्याही और वो कागज,
जाने क्यूँ आज नोएडा की इस रात में आँखें भर पड़ी/
' रतन ' वक्त तो निकल गया पर यादें वहीं ठहरी हैं,
जैसे किसी ने ठहरे हुए पानी में कोई कंकरी दे मारी/
सौगात ६३------- विश्वास का आधार
भरोसे की नींव पर खड़ा है ये मरा पूरा संसार,
वरना लहरें तो कब की ले डूबतीं मेरा ये घर बार/
' पूजा के पतवार ' ने ही दी है डूबते को एक नई उम्मीद,
उसी के सहारे खड़ा है ' रतन ' आज भी बन के खूंखार/
दुनिया लाख चालें चले हमें गिराने की यहाँ,
पर दुआओं का ये किला है बड़ा ही असरदार/
सौगात ६४ -------- अधूरी हसरत
हसरतें तो बहुत थीं पर कुछ का पूरा न होना ही अच्छा था,
वरना मंजिल की तलाश का ये सफर बहुत ही कच्चा था/
ठोकरें मिलीं तो समझ आया कि कौन अपना है कौन पराया,
बुराई के उस दौर में भी मेरा दिल बहुत ही सच्चा था/
' रतन ' ने तो हार में भी जीत का रास्ता ढूँढ लिया,
शायद इसीलिए ये सादगी का लिबास मुझपे जँचता था/
सौगात ६५------------ सत्य की राह
कड़वा होता है सच पर सुकून बड़ा देता है,
झूठ का मीठा शर्बत बस प्यास बढा देता है/
हमने तो सच बोलने की हिम्मत विरासत में पाई है,
जो कायरों को भी ' रतन ' राह- ए- हक दिखा देता है/
पैंसठ सौगातें गवाह हैं मेरे इस अटूट संकल्प की,
कि शब्दों का ये कारवाँ अब मंजिल का पता देता है/
सौगात ६६-------- वक्त की अमानत
ये साँसे, ये यादें, सब वक्त की अमानत हैं,
यहाँ कुछ भी नहीं अपना, बस सब उसकी इनायत है/
हमने तो गुजारी है उम्र, दूसरों के दर्द बाँटने में,
खुदा का शुक्र है कि हमें कलम की मिली ये रियासत है/
' रतन ' को क्या डराएगा, ये वक्त का बदलता मौसम,
जिसके पास दुआओं की दौलत, उसकी तो सल्तनत है/
सौगात ६७ --------- सलीका और मिजाज
बात करने का सलीका, इंसान की पहचान बताता है,
कौन कितना बड़ा है, ये उसका मिजाज बताता है/
महलों में रहने वाले भी, कभी- कभी छोटे रह जाते हैं,
और फकीरों का बड़प्पन, उनका अंदाज बताता है/
हमने तो मुठ्ठीगंज की गलियों से, यही तहजीब सीखी,
कि झुकता वही है ' रतन ', जिसमें कुछ जान होती है/
सौगात ६८---------- धुँध और रौशनी
जब तक चारों तरफ धुंध हो और रास्ता न नजर आए,
तब अपने भीतर के दीये को थोड़ा और जला लेना/
दुनिया लाख कोशिश करे, तुम्हें अँधेरे में धकेलने की,
बस तुम ' पूजा ' के विश्वास से एक नई राह बना लेना/.
' रतन ' गिरना बुरा नहीं है, गिर कर न उठता बुरा है,
हर चोट को अपनी तरक्की का, एक सीढ़ी बना लेना/
सौगात ६९ ----------- किरदार का आईना
आईना कभी झूठ नहीं बोलता, अगर देखने वाला सच हो,
चेहरे पे जमी धूल तो मिट जाएगी, अगर नीयत साफ हो/
हमने तो हर लम्हे को, बड़ी ईमानदारी से जिया है,
चाहे रास्ता काँटो भरा हो, या मंजिल बड़ी दूर हो/
' तहरीर ' में जो अक्स दिखता है, वो मेरा असली चेहरा है,
जिसमें न कोई बनावट है ' रतन ', और न कोई गुरूर है/
सौगात ७० ---------- सप्तक ( सत्तखीं सौगात)
सत्तर सौगातें जीवन के सप्तक की तरह गूँजती हैं,
ये वो राग है, जो सीधे रूह को छूते हैं/
सफर अभी जारी है और कलम अभी प्यासी है,
अभी तो उन मंजिलों के ख्वाब, हमारी पलकों पे झूमते हैं/
' तहरीर- ए- रतन ' की ये यात्रा, अब एक मुकाम ले रही है,
जहाँ सौ का लक्ष्य, अब आँखों के बेहद करीब है/
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