दर्शन तेरे सुलभ होते
--- राजीव रत्नेश
कैसे उतारूँ तेरी आरती, मेरे जीवन के कर्णधार,
एक जगह सीमित नहीं तू, तेरी महिमा अपरंपार/
तव दर्शन को प्यासा मनवा, कितना भोला औ' नादान,
दर्शन तेरे सुलभ होते, मूर्ति क्यों गढ़ता इंसान/
रात्रि गगन में सितारों की जब टिमटिम ज्योति जगाती,
दिवस चढ़े तो सूर्य-किरण जब धरती को नहलाती/
तेरी सृष्टि का अपार वैभव हर पल झलक दिखाता,
अद्भुत रचना में संचित तेरा सामर्थ्य नजर आता/
देख-देख कर तेरा वैभव, विस्मृत होता मेरा प्राण,
तेरा ही रूप निहारूँ--तृषित रहे मनवा नादान/
फूलों में तेरी मुस्कान है, पत्तों में तेरी हरियाली,
नदियों के कल-कल निनाद में, तेरी वाणी मतवाली/
पवन चले तो स्पर्श तेरा, बादल बरसे तेरी कृपा,
पर्वत की गंभीर शिला में तेरी ही अटल शक्ति देखा/
कण- कण में जब तू विद्यमान, कैसे करूँ गुणगान,
दर्शन तेरे सुलभ होते, मूर्ति क्यों गढ़ता इंसान/
सब ओर तेरा मुख है, हर दिशा तेरे चरण,
किधर झुकाऊँ शीश अपना, किस ओर करूँ नमन?
मंदिर में तू, मस्जिद में तू, गुरुद्वारे में तू ही तू,
नाम भले हों अलग- अलग पर एक ही सत्ता है तू/
एक सत्य के रूप अनेक, एक ज्योति के रूप महान,
तू एक है, पर नाम अनेक-- तेरी महिमा अपरंपार/
भूत, भविष्य और वर्तमान----- तीनों का आधार तू,
कालचक्र की गति में छिपा हुआ, हर क्षण का विस्तार तू/
जिसको समझ न पाया जग यह, उसका भी तू ही विधान,
दर्शन तेरे सुलभ होते, मूर्ति क्यों गढ़ता इंसान/
मेरे पास तेरा दिया सब है, एक तू ही नहीं है,
तेरी देन से भरा जगत है, फिर भी मन में चैन नहीं है/
धन- दौलत की चाह न मुझको, न पद का कोई अभिमान,
बस अटल भक्ति का दे दान, यही मेरी अरदास महान/
कुछ और नहीं माँगू तुझसे, इतना समझ देना वरदान,
तेरे नाम में बीते जीवन, तुझमें ही हो प्राण- विसर्जन/
भूखे के मुख में तू ही है, प्यासे के जल में तू,
रोते हुए नयन में तू है, हँसते हुए पल में तू/
जिस हाथ ने गिरते को थामा, वह भी तेरा हाथ,
जिस हृदय ने क्षमा कर दी, उसमें तेरा ही वास/
यदि सेवा ही पूजा तेरी, तो फिर कैसा पूजा- विधान?
हर जीव में जब तू ही तू है, किसका करूँ गुणगान?
आधार नहीं कोई तेरा, फिर भी सकल जग जाहिर है,
तेरी सत्ता से ही तो यह सारा संसार संचारित है/
जितनी वस्तुएँ मेरे उपयोग में आतीं जीवन में,
उनमें तेरी कृपा दिखाई देती मुझे हर क्षण में/
जाने-अनजाने कभी तेरा तिरस्कार किया न जान,
फिर भी भूल हुई हो मुझसे, क्षमा कर देना भगवान/
तू ही मेरे हृदय- मंदिर में, बाहर भी तू ही विद्यमान,
तू ही मेरा आदि- अंत है, तू ही मेरा जीवन- प्राण/
दूर गगन में ढूँढ़ रहा था, तू तो मेरे ही पास था,
जिसको जग में ढूँढ़ रहा था, वह मेरे ही साथ था/
आँख खुली तो जान लिया-- तू मुझ में ही विद्यमान,
दर्शन तेरे सुलभ होते, मूर्ति क्यों गढ़ता इंसान/
मैं तो ससीम, तू दिग्- दिगन्त में व्यापक असीम,
तेरी करुणा में नहाते जलचर, नभचर और थलचर सभी/
प्रार्थना करूँ किस विधि तेरी, कोई तो राह दिखा,
मैं अज्ञानी, तू सर्वज्ञानी, मुझको अपनी राह लगा/
चरण पकड़ना चाहूँ तेरे, चरण मिलें किस ओर,
जिस ओर देखूँ, तू ही तू है---- हर दिशा, हर ठौर/
तेरी लीला व्यापक प्रभु, हर कहीं तेरा ही नूर,
जहाँ न पहुँच सके इंसान, वहाँ भी तू भरपूर/
नदियों के उत्फुल्ल निनाद में, सागर की गहराई में,
रेगिस्तान की तपती रेत में, वर्षा की तरुणाई में/
तेरी ही इच्छा से चलता यह जीवन का सारा विधान,
तेरी ही शक्ति से कंपित, मेरा क्षुद्र- सा सामर्थ्य महान/
अब न मंदिर दूर लगेगा, न मस्जिद से दूरी है,
जिस हृदय में तेरा प्रेम जगा हो, वह जगह तो पूरी है/
पत्थर में भी तुझे प्रणाम, मानव में तेरा ही भान,
जीव- जगत का कण- कण तेरा, तुझसे ही इसकी पहचान/
बाहर तुझको खोज रहा था, भीतर तू मुस्कान बना,
अपने ही अंतर में पाया---- तू मेरा भगवान बना/
अब आरती कैसे उतारूँ, तू ही दीपक, तू ही बाती,
तू ही पूजा, तू ही पूजा का भाव, तू ही आराध्य- प्रभाती/
तू ही स्वर है, तू ही शब्द है, तू ही मेरा गान,
तू ही भक्त और तू ही भगवन, तू ही मेरा प्राण/
कुछ माँगू तो भक्ति माँगू, कुछ चाहूँ तो तेरा ध्यान,
मेरी अंतिम साँस भी निकले लेते-लेते तेरा नाम/
जीवन मेरा तेरे अर्पण, तन मन मुझको तेरा दान,
दर्शन तेरे सुलभ होते-- अब समझा मेरा मन नादान//
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