Tuesday, April 28, 2026

वो लहरों पे चलते-चलते ( गजल)

वो लहरों पे चलते चलते  ( गजल)
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एक निगाह में हजारों सवाल कर गया/
आखिरकार वह अपनी हद से गुजर गया/

कारवां अपना धीरे- धीरे आगे बढ़ता गया,
साथ छोड़ गया, कुछ पलों का जो हमसफर रहा/

हाथ छुआ था उसका, सिहरन पूरे बदन में हुई,
आखिर दर्द भी उसका शिद्दत से बढ गया/

नक्शा खिंचा दिल पे उसके नयनो- नक्स का,
बादलों की गर्जना की तरह मुकम्मल दर्द दे गया/

वो तो आखिर रहबर ही था, जो रहजन बन गया,
लूट कर मालो- असबाब सारे जाने किधर निकल गया/

उसके दिल लूट कर चले जाने से हैरानी न हुई,
गया था आखिर, जो था पहले से जाने वाला/

पपड़ी जम गई थी आखिरकार खरोंचों पर सारे,
लौट के आ गया फिर पपड़ी खुरचने वाला/

राख पड़ गई थी जलते दिल के अंगारों पर
आ गया लकड़ी से फिर राख कुरेदने वाला/

मुहब्बत यकीनन बदस्तूर निभाता रहा वो,
छाले दिल पर पड़ गए था, आया न सहलाने वाला/

मर्जी उसकी थी , रहे महफिल में या पैंतरा बदल जाए,
हुनरमंद था, ऐब सारे आस्तीन में छिपाए निकल गया/

तमाम अधिकार उसे सौंप दिए थे अपना जान कर,
पहले तो दिल को घर बनाया, फिर आँखों से निकल गया/

छनकते थे पाजेब उसके मखमली गलीचे पे,
शोर-शराबों के बीच, हाथों से मेरे वह फिसल गया/

बरसे बादल झकझोर कर, धरती की प्यास न बुझी,
आया था बादल भी, तपन दिल की बढ़ाने वाला/

समंदर से आया था' रतन', कश्ती पे सवार होकर,
वो लहरों पे चलते-चलते पार पार समंदर कर गया//

                 राजीव रत्नेश

रतन से क्यूँ रूठा है ताज ( गजल)

रतन से क्यूँ है रूठा है ताज  ( गजल)
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राह- रस्म छोड़ दी तुमने मुझसे तिलमिलाते- तिलमिलाते/
मेरी ओर फिर न देखा नजर झुका के शरमाते- शरमाते/

बिजली न चमकी आस्मां में आखिर बरसते-
बरसते,
जुल्मत में भी तुझे न पुकारा हमने, थे जुगुनुओं
की रोशनी के सहारे/

जमाना तो मुद्दई था पहले ही, सही वक्त पे सही
दोस्त पहचाना,
यूँ ही मिल गया था तू मुझे सही वक्त पर पैर मेरा
फिसलते- फिसलते/

एक मुसव्विर ने बिजली की कौंध में तस्वीर तेरी
उतारी थी,
उसे सिरहाने अपने रखी मैंने, तुझसे बातें करते
करते/

चैन नसीब कहाँ था आखिर भींगी हुई ठंडी बरसाती
रात में,
छाजन से टपकती बूँदों से हमने मर्तबा सुनाया सिसकते- सिसकते/

कहाँ अब वो रातें थीं, सितारों के ही तब हर तरफ
नजारे थे,
मात खा गए उसी दुश्मन से, जो अब शेर बना था
मुझसे पिटते- पिटते/

गुलाबी आँचल का तेरे हमने एक बार पस्चम भी
बनाया था,
भटक गई थी जब कश्ती अपनी, लगी थी किसी
अनजान टापू के सहारे/

मिजगां की कालिमा, रोशनी में तेरी , मुझे चमकते
नजर आती थी,
हम उसी से बाबस्ता थे सरे- जिन्दगी, दागे- दिल
दिखाते- दिखाते/

चाक गरेबां हो गई थी मुहब्बत अपनी, जाने किस
मोड़ पर,
हम जानते थे कि सदा देने पर भी तुम पलट कर
न आते/

तेरे लिए दैरो- हरम- गुरुद्वारे जा जाकर हर जगह
दुआ माँगी,
तेरी राह का दरवेश तक बना, फिर भी तुम सितम
ही ढ़ाते रहे/

कैलेन्डर में अप्रेल छब्बीस भी अब बीतने- बीतने
को ही है,
जज्बात रुठे रहे, कलम रुक गई, दो हजार पच्चीस
बिताते- बिताते/

तेरी महफिल के रक्स में लग्जिशें ही लरिजिशें थीं
बेतहाशा,
हर बार तुझे गिरते-गिरते बचाया, तेरी नजाकतों
को सहते-सहते/

चाँद- चँदनियाँ भी खुश हैं, मोर- मोरनी भी मस्त हैं
अपने आप में ही,
' रतन' से ही क्यूँ रूठा है ताज, मौसम के बदलाव
समझते- समझते//

              राजीव रत्नेश

लगा फिर से दरबार साकी( नज्म)

लगा फिर से दरबार साकी  ( कविता)
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तुझसे दूर अब रहा नहीं जाता/
तेरा दर्द दिल से फना नहीं होता/
किस तरह तुझे मैं अब भुलाऊँ,
तेरे बिना मुझे शिफा नहीं होता//

तुझे दुनिया का क्या अब भी डर है,
मेरे हाथ में जबकि तेरा हाथ है,
समझने वाले समझ जाएँ,
रतन आज हर फिक्रोगम से आजाद है/

दुनिया के तिलस्म में भटक नजाना,
न मेरा हाथ छुड़ा जाना साकी,
हम तुम एक ही मंजिल के दो राही है,
हमारे लिए खुला जन्नत का द्वार है/

शरबते- दीदार छान के पिलाने की क्या बात है,
घूंघट हटा प्याला पिला जाम का,
कर अदब थोड़ा शेख जी का भी,
मेरी जिन्दगी का तू तो बहार है/

इश्क में तय कर चुके हर रास्ता,
आजा करीब, मुहब्बत का वास्ता,
माथे पे चमके चमकीला सितारा,
तेरी नथ ही तो तेरा असली श्रृंगार है/

संवरेगी जिन्दगी, बदलेगी जिन्दगी,
अब बवाल न उठा कोई होके शरीके- जिंदगी,
वो देख पास आ गया साहिल भी,
चंदा- लहर का तू बेमिसाल प्यार है/

डर जमाने का तुझी को हुआ था,
मैं तो हरफनमौला था सफर का,
कैसे सोच लिया, छोड़ दूँगा तेरा साथ,
तेरे आँचल पे बेल-बूटों का संसार है/

कश्ती ले आया आगे और भी,
पाकर मंजिल के निशानात,
देख कर हमारी मशरूफियत,
जमाना अब तो शर्मसार है/

बीच सफर तू ही तो मेरे साथ थी,
और कोई आया न तूफां से बचाने,
तेरे भरोसे किनारे पे आए,
जमाने से अब क्या तकरार है/

अहले- जमाने ने ही तेरे- मेरे लिए जतन बनाए ,
भंवर से कश्ती साहिल पे लाए,
जमाने ने समझा, तभी तो साथ में आए,
एक तरह से हम जमाने के कर्जदार है/

तुझे जाने- जिगर, दिलो- जान बनाया,
बरबादियों के रास्ते से तुझे खींच लाया,
तू समझे तो जमाना ही संभालता है राहे- इश्क,
फिर भी मुझे जमाने का कोई बंधन स्वीकार है/

साथ देगी तो दुनिया नई बसाऊँगा,
तेरे रुखे- रोशन से रास्ता नूरानी बनाऊँगा,
चले जो हमनफस हो कर मेरी ताज,
समझ ले साथ जगत- व्यवहार है/

मेरी मंजिल, सपनों की रानी तो तू ही है, 
तेरे सिवा न मुझे किसी से कोई लगाव है,
आजा फिर से एक बार मुकाबिले- बज्म,
सारी अला- बला से दूर, हर शय का माकूल जवाब है/

आज भी नहीं है तेरा कोई तोड़ महफिल में,
सफर में सितारा- सितारा तुमको राह दिखाता है,
तेरे नूरे- चश्म से जगमग हर राह नजर आता है,
मेरे गजलों की मुजस्सिम तू किताब है/

हर हाल में तू मेरे दिल में पोशीदा हर राज है,
मेरे साथ रहकर तू आज भी लाजवन्ती है,
तेरे अब्बू की निगरानी से तुझे निकाल लाया था,
यही कैफियत है, यही तहरीर- ए- रतन है/

तुझे जमाने से छीन कर ही तो पाया था,
तेरे लिए अदावत सारे जहां से ठाना था,
उसके लिए जुगनुओं की कतार ले आया था,
मुझ पर तेरा ही तो बस अधिकार है/

मुहब्बत में मुझे बस एक तेरा ही तो सहारा है,
तू ही मेरा वजूद, तूही मेरा ठोस इरादा है,
आज फिर तेरे हाथों से जाम की दरकार मुझे,
अंगूरी का प्याला होठों से लगा, लगा फिर से दरबार साकी//

               राजीव रत्नेश
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एक वक्त जब सब छोड़ कर जाना होगा,
तुमे भी रोता- तड़पता छोड़ अपनी राह जाना होगा/
बदल जाएगा वहाँ मौसम का भी अपना इरादा,
न मस्तूल, न पतवार, न कश्ती, न कोई किनारा होगा//

             राजीव रत्नेश
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Friday, April 24, 2026

बिना पतवार चला आया है रतन ( गजल)

बिना पतवार चला आया है रतन  ( गजल)
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सोचता हूँ चाँदनी रात में क्या करती होगी/
क्या मेरी तरह याद अब भी मुझे करती होगी/

निशानियाँ प्यार की क्या संभाल के रखी होंगी,
या ख्याले- याद से भी आजाद उन्हें करती होगी/

बहुत दूर हूँ तुमसे, तुम तक आ नहीं सकता,
क्या मेरे लिए अब भी रहगुजर पे आँखें बिछाती होगी/

मैं समंदर की मौज था, तू साहिल की ठंडी रेत,
तेरा मेरा महकमा एक था, मुझ बिन कैसे सुकूं पाती होगी/

मैं तुझमें समा जाऊँ, तू मुझ में, छूट जाए बिछड़ने का गम,
भले समंदर से मिल मेरे खिलाफ बिसातें बिछाती होगी/

मुकद्दर ही मिलाता है और दूर भी रखता है हमें,
अपना भी क्या जल्वा है, सबको अपनी ही फिकर रहती होगी/

बिना गुनाह दूर- दूर रहने की सजा पाई है हमने,
आ मिलो, फिजूल मेरी राह में सितारे बिछाती होगी/

मुझे तुमसे रूठना न था कि बार- बार मनाना पड़ा मुझे ही,
एक बार ऐसा मिलो कि फिर मुझसे बिछड़ने की न नीयत तुम्हारी होगी/

बिना पतवार कश्ती में चला आया है' रतन', हिम्मत तो देख जरा,
सुकूने- जिंदगी शायद नहीं मिटाने को उसे न सिफत आरजू तुम्हारी होगी//

             राजीव रत्नेश

Wednesday, April 22, 2026

यही सोच मछेरे ने दरिया में जाल डाला( गजल)

यही सोच मछेरे ने दरिया में जाल डाला  ( गजल)
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सुना कि महफिल में वो आने वाला है,
वो रुख से नकाब उतार के/
आ गए झलक एक उसकी पाने को,
हम भी पिछला कर्जा उतार के/
उसके हुनर ऐब पे कहीं भारी हैं,
बताया उसने, चलाओ निशाना संभाल के/
मरमरी बदन पे मखमली लिबास हैं उसके,
माथे पे बिन्दी है उसके अनुराग के/
उसकी चमकीली नथ को देख हो गए फिदा,
जाना न जख्म दिए जो मुझे बहार ने/
बला की तपिश है आज के मौसम में,
ठंढ़क पहुँची नहीं पालिका के छिड़काव से/
हम उसी से दिल लगा बैठे हैं अहले करम,
जाके कह दे कोई मेरे सारे अहबाब से/
उसी को चुना था हमने शेरो- सुखन के वास्ते,
अब दिल पे छुरियाँ चलाता है वो किस शान से/
जाने किस किनारे लगे कश्ती, बिना पतवार के,
अभी तो है तेज हवा औ' तूफान के दबाव में/
किस मोड़ से वो मोड़ मुड़ गया था,
शायद मंजिल का रास्ता पहचान के/
भँवर में कैसे तुम्हें अकेला छोड़ दूँ,
तुम तो मेरे ही सहारे निकल पड़े थे तूफान में/
तुम्ही तो अकेले हो मेरे, गैरों की जमात में,
तुम्हें खो दिया तो कौन निकलेगा मेरी तलाश में/
मछलियाँ बड़ी होंगी यही सोच मछेरे ने जाल डाला,
तुमको तो फंसा नसका, उल्झा' रतन' से बिना बात के

               राजीव रत्नेश

सारे रतन माँग आया ( गजल)

सारे रतन माँग आया  ( गजल)
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टुकड़ा- ए- माहताब था या मुकम्मल चाँद मेरी नजरका,
देख उन्हें अहबाब संग मैं ईद मना आया/

कुछ न था लुटाने को पास अपने,
खुदा से अपना पुराना आस्मां माँग आया/

उनके मुँह का खाकर, मुँह के अपने पान खिला आया,
झील के पानी में, मैं चाँद उतार लाया/

बिगड़ा शहर था, आबो-हवा खराब थी,
साथ उनके नैनीताल चला आया/

भर के बाहों में हरारत- ए- बदन मिटा,
उनको हमने हमसफर माना, मसीहा माना/

चोट खाई थी दिल से गरेबान तक,
कोई न मिला दिलदार, उनकी वफा माँग लाया/

तसब्बुर में हमेशा वो जोहराजबीं ही तो रहा,
आज उसे मुकाबिले- महफिल उठा लाया/

अजमतें थीं उसकी पाक, शीशा- ए- दिल सी,
मैं पैमाने में जाम भर के उठा लाया/

वो बाहों में थे मेरे, सर सीने पे था,
उनके होठों पे चुंबनों को बरसा आया/

सितारे टंके थे उनके आँचल पे,
घड़ी भर में सारे" रतन" उनसे माँग लाया//

            राजीव रत्नेश

तुम्हारी हकीकत जान कर आज ( कविता)

अपने शब्दों के व्यर्थ जाल में,
तुम मुझे उल्झा नहीं सकते,
अपने आडम्बरजाल में मुझे,
किसी तरह फँसा नहीं सकते,
दिखा-दिखा कर मृगमरीचिका,
तुम मुझे भरमा नहीं सकते/
क्यूंकि,
तुम्हारी अगली- पिछली हर चाल से,
भलीभाँति अनावृत अवगत हूँ,
नयन मेरे अश्रुपूरित हैं पहले ही,
मेरी जराओं से तुम गंगा बहा नहीं सकते,
किसी तरह भी अब तुम मुझे,
अपने और समीप बुला नहीं सकते/

अनवरत संघर्ष का ऐलान कर निकला हूँ,
तूफानों से मैं करते पैमान अब निकला हूँ,
तुम्हें अपनी ही चाल से मैं मात दूँगा,
क्या सुब्ह क्या शाम, कभी भी तुम्हें घात दूँगा,
मेरे सिरहाने का तकिया तुम खींच नहीं सकते,
कितना भी चाह कर तुम मेरे करीब आ नहीं सकते/

मछली हूँ सरोवर का, हाथ तुम्हारे आ नहीं सकता,
अपना लगाया जाल क्या तुम्हें दृष्टिगत नहीं होता,
चलते-फिरते कीट-पतंगों पे निशाना लगाते हो,
पर एक भी निशाना सही बैठा नहीं सकते,
तुम डाल- डाल तो मैं अब रहूँगा पात- पात,
मुझे तुम अपने शर से बींध नहीं सकते/

हजारों सन्नाटे गुजर गए दिल से,
क्यूँकर तुम्हें अभी भी यकीन नहीं आता,
प्यार के आँगन की नागफनी हो तुम,
फूलों से तुम सूरत पार पा नहीं सकते,
अजमतें तुम्हारी किसी काम की नहीं,
मुझे तसलीम अपनी नदामतें ही सही,
मंजिल- दर- मंजिल चलता अक्सों के सहारे,
तुम मुझसे ऐलान- ए- जिरह कर नहीं सकते/

जहाँ ठहरा पानी समझते हो वही तो,
अस्ल- दरअस्ल सरोवर की गहराई है,
तुम्हारी हकीकत जानकर आज,
सितारों को भी अब तो शरम आई है,
तुम मुझसे ऐलाने- बगावत कर नहीं सकते,
वफाई तुम अपनी शुमारे- अदावत कर नहीं सकते//

               राजीव रत्नेश

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!