तेरे लिए साहिल को ठिकाना बनाया ( कविता)
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मेरी मिल्कियत में नहीं ये चाँद-सितारे,
न ही समंदर की मौज, न ये किनारे,
मैंने किया था सच्चा वायदा तुमसे,
कि दूँगा साथ तुम्हारा हर ठिकाने/
मैंने तुझसे हुस्नो- वफा की आरजू की थी,
तुम्हें अपना जानकर ही तुम्हारी जुस्तजू की थी,
कौन जानता था, राहे- वफा से कभी डगमगाएँगे,
हमको बस तमन्ना, तेरे जुड़े के फूलों की खुशबू की थी/
मैं तेरी राह में आया, तू मुझसे चहक कर मिली,
कौन जानता है तूने मुझे छला या खुद गई छली,
तेरी तड़प लिए किस- किस दौर से न गुजरा,
ऐ शोख तमन्ना! तू है छैल- छबीली थोड़ी मनचली/
मेरे तसब्वुर में तो तू ही तू थी, तेरे सिवा नहीं कोई और,
परवा न की किसी की, और भँवरों के भी तुझे इशारे,
नजाकतो- अदा तेरी, मुझको चमन से खींच लाई,
हटाया किस- किसको मेरी राहों से तूने बेरहम जमाने/
दिल लगाने के पहले ही दिल टूट गया,
तुझसे मिलने का आसरा भी छूट गया,
जाने किसने किए सारे मेरे जतन लूट लिए,
तुझसे मिलने आगे बढ़ा, जाने क्यूँ फिर ठिठक गया/
चला आया तो हूँ, तुझसे मुलाकात के बाद,
तू मेरी जाने- वफा, कैसा लगा फिराक के बाद,
मैं तेरा तो क्या, किसी का भी सहारा नहीं,
तुम भी तो आगे नबढ़ीं, दुआ सलाम के बाद/
चला तो हूँ, पर तेरी- मेरी राह अनजानी,
पहल मिलने की करनी होगी तुझे नाजनी!
हो सके तो जमुना किनारे फिर से आना,
हो जाएगी पूरी, रह गई है जो बात अधूरी/
दूर गगन में विहँसते हैं सितारे,
टूट जाते कितने हमारे आस के सहारे,
तू मिलना तो कोई कसक नरखना,
हम मिलेंगे किसी रोज तुझे शाम के झुटपुटे/
गर्दिशे- जहाँ से मुझे सरोकार न था कोई,
ख्याल था बस, तेरे रास्ते न आए दूसरा कोई,
मैं जानता था कि तू भले ही है अलबेली,
चूस न डाले पराग तेरा, तू कोमल नाजुक कली/
मुझसे तेरा इरादा कभी भी तो छिपा न था,
मेरे बिना तेरा भी इस जहाँ में गुजारा नथा,
साथ- साथ तलाशे- मंजिल को हम बढ़े थे,
हमें न किया कभी, राहे- मंजिल ने कोई इशारा/
गंगो- जमन की वादियों में घूमे, बैठे रहे तट पर,
आए कोई कश्ती जो मुसाफिरों को यहाँ उतारे,
हमें मिले मौका, हों सवार हो के मुसाफिर,
करें पार दरिया तेरी मुहब्बतों के सहारे/
अन्जान तू थी गर्दिशे- अइय्याम से अभी तक,
रास्ते का पत्थर तूने देखा न सुना था अभी तक,
तेरी मस्तीभरी, नशीली आँखों का नक्शा दिल में था,
तू कोई सुलझी हुई पहेली भी न थी अभी तक/
मुहब्बत तुझसे की तो हर दस्तूर निभाया मैंने,
तेरी गुस्ताखियों पर भी सीने से तुझे लगाया मैंने,
तु मेरी राहों में फूलों से भरी रहगुजर ही तो थी,
काँटों पर चलना तुझे भी सिखाया मैंने/
समंदर की मौज धी तू, साहिल पे न ठहरी,
आवाज तुझे दी, बाहों में मेरे तू आ समाई,
दूर का मंजर तो सुहाना, सफर था मस्ताना,
दिल की धड़कन बढ़ गई, जब तू जिंदगी में आई/
बहारों से मैंने कभी कोई वायदा नहीं किया था,
कि हर मौसम में आकर करूँगा रैन- बसेरा,
मुझे तो बस तेरे साथ का ही आसरा था,
चाहे काँटों पे चलाए, चाहे फूलों पर पग बढ़ाए/
तेरी झिलमिल सितारों वाली ओढ़नी जगमगाती थी,
कुछ बात थी कि तू अंदर ही अंदर कसमसाती थी,
तुझे खफा जानकर मेरे दिल पर क्या गुजरती थी,
मुझे मनाने को तेरी बाँकी चितवन ही काफी थी/
देखो सनम अब तुम दूर मुझसे जाने की न सोचना,
क्योंकि तुम मेरे ख्वाबों की हूर, परीजाद साकी हो,
आस्मान से उतरी हो या सात समंदर पार की हो,
मैंने तेरी जात कभी पूछी नहीं, मेरी बस सब्जपरी हो/
वायदा भी तो चाँद-सितारों किया न तुमने कभी,
आकर सीधे बन गई मेरे दिल का सहारा ही,
हर जनम में मैं गया था छला, तू कहाँ थी?
इस जनम में मिली तो हुआ दिल का ठिकाना ही/
तेरे लिए समंदर को ही अपनी जिंदगी का सहारा बनाया,
तेरे लिए मतस्यगंधा! साहिल को ही अपना ठिकाना
बनाया,
' रतन' ने कभी तुझको अपने से दूर न जाना- समझा,
तुझे ही अपने दिल की रानी और बाहों का सहारा पाया//
राजीव रत्नेश
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