Wednesday, August 19, 2026

बस मेरी तस्वीर ( नज्म )

बस मेरी तस्वीर  ( नज्म  )
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मेरी एक- एक निशानी मुझे वापस कर तो रही हो,
पर हृदय- मंदिर में समाई, मेरी तस्वीर भी वापस करना/

वरना एक टीस हमेशा के लिए तुम्हारे सीने में दफ्न न
हो पाएगी,
रह- रह के जो तुम्हें तड़पाएगी, मन को कचोटती रहेगी/

याद आएँगे वो दिन, जो हमने- तुमने साथ- साथ हैं गुजारे,
हर कशमकश में हम- तुम साथ थे, रूठी हुई किस्मत
के मारे/

तुम्हें क्या सूझी, तुम क्यूँ हाल-बेहाल हुई, क्या बरबाद
हुई,
हया की राह छोड़ क्यूँ आज तुम बेहयाई पर उतर आई/

मुहब्बत किया था तो आगा-पीछा सोच कर न किया था,
कि एक दिन अलगाव का गम भी सहना पड़ेगा, बेमौत
मरना पड़ेगा/

तेरी मुहब्बत में दुनिया छोड़ी थी, फिर उसी से नजरें मिलाना पड़ेगा,
तुमसे ये सोच कर सामना कर लूँगा, मेरी है भले हरजाई ही सही/

नदी का किनारा, तुझे रह- रह कर मेरी याद दिलाता रहेगा,
जहाँ मिल बैठ कर हमने- तुमने मछलियाँ काँटे में थीं
फँसाई/

जिंदगी तुमसे दूरी की मुस्तहक न थी, न ही जिंदगी
अजाब बनी थी,
क्या सोच कर तुमने नाहक हमारे- तुम्हारे बीच की दूरी बढ़ाई/

लौटा न सको मुझे तुम, मेरी दी हुई सौगातें, अपनी पुरानी यादें,
बस मेरी तस्वीर कम से कम मुझे अपनी तस्वीर के साथ वापस करना//

                 राजीव रत्नेश

Monday, August 17, 2026

फिर भी उसे मैंने ( नज़्म )

फिर भी उसे मैंने
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कृश गात, पीत वर्ण, कोमलांगी, सब्ज वसन,
का आडम्बर लिए वह मेरे समीप खड़ी थी/

जाने किस मनोरथ की पूर्णाहुति हेतु,
वह मुझे अपलक देखती मूक खड़ी थी/

मैं जान न सका, कुछ समझ न सका,
कि उसको मुझसे अब क्या चाहिए था/

मेरी लुटी जवानी के बरसों बाद आई थी,
कभी की मेरे गीतों की वह नायिका थी/

वे गीत जिसमें मिलन से ज्यादा जुदाई थी,
अगणित शोलों के बीच नाचती उसकी रानाई थी/

मैंने पूछा भी नहीं, मिलने अब क्यूँ आई थी,
कौन सा भाव हृदय में था, क्या जरूरत थी/

अपने हाथ मेरे ओर बढ़ा, मुझे प्रतिबंधित कर,
अपने होंठ मेरे होठों पे बिठा , हर्षित थी/

आँखों में तरल प्रवाह के साथ, एक सवाल था,
" मुझे क्या भूल गए या वक्त ने तुम्हें भी छला है"/

मैं उसको प्रत्युत्तर भी भला क्या दे सकता था?
मेरे पास अपना कहने को कुछ भी तो नहीं था/

फिर भी उसे मैंने अपने हृदय में स्थान दिया,
जिसमें पहले ही कोई अवस्थित था//

                  राजीव रत्नेश

Wednesday, August 12, 2026

शेर

देखिए अभी वक्त क्या- क्या इम्तहां लेता है,
मिल के बिछड़ने का भी अंदाज नया होता है/
             राजीव रत्नेश

शेर

कुछ इस तरह उसके अहसास से मैं तो गुजरा हूँ,
खुद गुम सा हो गया हूँ, या खुद ही एक सपना हूँ/

           राजीव रत्नेश
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शेर

कुछ इस तरह उसके अहसास से मैं तो गुजरा हूँ,
खुद गुम सा हो गया हूँ, या खुद ही एक सपना हूँ/

कभी की मुहब्बत थी उससे, तभी तो

मैंने तो उसे अपने कदमों से उठा के सीने से लगाया था,
सिर्फ इतना ही कह पाया था कि उसकी जगह तो मेरे
दिल में है/
और कहा उसने भी, मैं तो बस तुम्हारे कदमों की खाक
ही हूँ,
अपने माथे पर मुझे चंदन की तरह न लगाओ/
एक बार ही टूट चुकी हूँ, दुबारा बिखर जाऊँगी,
मुझे सिर्फ आगोश में ही रख लो, सर पे न बिठाओ//

मुक्तक

हम तुम्हारे ही तो हैं, कम से कम अदब से बातें करो,
अदब से न कर सको तो कम से कम शरम से बातें करो/
तोड़ा है तुमने जो अहदे- वफा कई-कई बार,
दिल की चोट न दिखाओ, शिकस्ता बदन की बातें करो/

              राजीव रत्नेश

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