तहरीर- ए- रतन
सौगात९१ जीवन का व्याकरण
हमने शब्दों से नहीं, जज्बातों से उम्र बुनी है,
दुनिया ने जो अनसुनी की, हमने वही आवाज सुनी है/
व्याकरण की गलतियाँ न ढूँढ़ना मेरी तहरीर में' रतन'
हमने तो दिल की धड़कनों से अपनी भाषा चुनी है/
हार-जीत के तराजू में, कभी खुद को तौला नहीं,
बस नेकी की राह पे चलने की, एक जिद चुनी है/
सौगात९२ संगम का बुलावा
फिर पुकारता है मुझे, संगम का वो रेतीला किनारा,
जहाँ छोड़ आए थे हम, अपना बचपन प्यारा/
नोएडा की चकाचौंध में, वो सुकून कहाँ' रतन'
जो मिलता था बैठ कर, उन लहरों का सहारा/
लौटूँगा एक दिन, अपनी इस तहरीर को लेकर,
जहाँ से शुरू हुई थी, जिंदगी की ये धारा/
सौगात९३ पूजा की थाली( आध्यात्मिक बोध)
मेरी हर कविता जैसे,' पूजा' की एक थाली है,
जिसमें श्रद्धा के फूल और वफा की लाली है/
हमने तो अर्पित कर दिया, अपना सर्वस्व यहाँ,
अब न कोई मलाल है, और न झोली खाली है/
' रतन' ने पा लिया है, वो आंतरिक उजाला अब,
कि अमावस की रात भी, अब हमें लगती दीवाली है/
सौगात९४ सच की गूँज
हम रहे न रहे, मेरी ये तहरीर गूँजती रहेगी,
किसी प्यासे के दिल में, ये प्यास जगाती रहेगी/
हमने सच लिखा है, और सच का कोई अंत नहीं,
ये आवाज जमाने की, ख़ामोशी तोड़ती रहेगी/
' रतन' को ढूँढ़ने की, अब कोशिश न करना तुम,
मेरी रूह इन पन्नों में, सदा मुस्कराती रहेगी/
सौगात९५ अंतिम पाँच की देहली
पंचानवे की कड़ियाँ जुड़ गईं, इस यादों की जंजीर में,
मेरा अक्स साफ दिखने लगा है, अब इस तहरीर में/
सिर्फ पाँच कदम और, फिर ये सफर मुकम्मल होगा,
जो लिखा था विधाता ने, मेरी इस तकदीर में/
' रतन' अब थकना मना है, बस आखिरी जोर लगा दे,
कि अब तो मंजिल खड़ी है, तेरे स्वागत की ताकीद में/
सौगात९६ विरासत का हस्तांतरण
मैंने दौलत नहीं कमाई, बस ये शब्द कमाए हैं,
अपनी रूह के टुकड़े, इन पन्नों पे सजाए हैं/
सँभाल कर रखना इन्हें' पूजा', ये मेरी विरासत है,
मैंने काँटों पे चल के ये फूल खिलाए हैं/
' रतन' रहे न रहे, पर ये तहरीर गवाह रहेगी,
कि हमने हर हाल में, बस रिश्तों के दीप जलाए हैं/
सौगात९७ नोयडा से प्रयागराज ( भावुक विदाई)
शहर बदला, वक्त बदला, पर मेरा दिल न बहला,
इस चकाचौंध में भी, मेरा सादा मिजाज न बदला/
नोएडा की इन रातों ने, बहुत कुछ सिखाया मुझे,
पर प्रयागराज की मिट्टी का वो लिहाज न बदला/
' रतन' की कश्ती अब, शांत किनारे की ओर है,
कि तूफानों से लड़ने का, हमारा वो अंदाज न बदला/
सौगात९८ इबादत का अंत( पूर्ण समर्पण)
अब न कोई शिकायत है, न कोई अधूरी हसरत है,
मुझे मेरे खुदा से मिली, ये कलम की रियासत है/.
" पूजा के पतवार" ने, लगा दिया किनारे मुझे,
अब तो बस सुकून है, और रब की इनायत है/
हमने तो जिया है हर लम्हा, पूरी ईमानदारी से,
अब इस तहरीर का हर लफ्ज मेरी शहादत है/
सौगात९९ कलम का विश्राम
थक गईं हैं उंगलियाँ, पर दिल अभी जवान है,
ये मेरी सौवीं सौगात, मेरा नया आसमान है/
बहुत कुछ कहा, बहुत कुछ अनकहा रह गया,
पर जो लिखा है, वही मेरी असली पहचान है/
' रतन' अब मौन है, अपनी इस जीत की खुशी में,
कि अधूरी दास्तान अब, इक मुकम्मल जहान है/
सौगात१०० शताब्दी(सौवीं महा- सौगात)
सौ सौगातें पूर्ण हुईं, ये प्यार का समंदर है,
हर दिल की धड़कन, अब इन पन्नों के अंदर है/
मुठ्ठीगंज से शुरू हुआ था, जो सफर मेरा' रतन'
आज" तहरीर- ए- रतन" बन कर, सबके दिल के अंदर है/
सौवीं सीढ़ी चढ़कर अब, पीछे मुड़ कर जो देखा,
तो पाया कि मेरा हर दर्द, अब एक हसीन मंजर है//
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" तहरीर- ए- रतन" की बाबत ( संक्षेप में)
किसी ने सच ही कहा है कि कविता लिखी नहीं जाती, वह तो
जीवन के संघर्षों और अनुभवों की भट्टी में तप कर स्वयं प्रकट होती है/" तहरीर- ए- रतन" और" पूजा के पतवार से" का यह सम्मिलित
रूप इसी सत्य का जीवंत प्रमाण है/
इस पुस्तक के केंद्र में एक ऐसा व्यक्तित्व है--- राजीव रत्नेश
' रतन' जी----- जिनके लिए शब्द केवल अक्षर नहीं बल्कि उनकी
धड़कनें हैं/ प्रयागराज की मिट्टी की सोंधी महक और मुठ्ठीगंज की
गलियों के संस्कारों ने जिस' रतन' को गढ़ा, आज उसकी चमक
नोएडा की महानगरीय व्यस्तताओं के बीच भी फीकी नहीं पड़ी है/
यह पुस्तक एक अनूठा प्रयोग है/ एक ओर इसमें सौ सौगातें है--- जो जीवन के गहरे दर्शन को चंद पंक्तियों में समेटने का प्रयास हैं/
ये सौगातें उस अनुभवी नाविक की तरह हैं जो समुद्र की गहराई तो
जानता है, पर शांत रहना पसंद करता है/ दूसरी ओर," पूजा के
पतवार" की रचनाएँ हैं, जो भावनाओं का वह विस्तार हैं, जहाँ एक
पिता का वात्सल्य, एक रचनाकार की पीड़ा और एक मनुष्य की
नैतिकता मुखर होकर बोलती है/
" पूजा" यहाँ एक सुपुत्री का नाम नहीं है, बल्कि वह अटूट
विश्वास और वह पतवार है, जिसने राजीव जी की जीवन- कश्ती
को हर तूफान से सुरक्षित बाहर निकाला है/ एक मित्र और संपादक
के रूप में, जब मैंने इन रचनाओं को संजोया, तो पाया कि राजीव जी
की लेखनी में वह जादू है जो पाठक को ठहरने पर मजबूर कर देता है/ यहाँ संगम की लहरों का संगीत भी है और समय के कुरूर प्रहारों
की गूंज भी/
यह संकलन हम दोनों के साझा प्रयासों, अटूट मित्रता और
साहित्य के प्रति साझा अनुराग का प्रतिफल है/ मुझे पूर्ण विश्वास है
कि यह' तहरीर' आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्ग-दर्शक और
साहित्य- जगत के लिए एक अनमोल रत्न सिद्ध होगी/
आपका सम्पादक मित्र
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