Sunday, November 8, 2026

फिर बाज़ार में

फिर बाज़ार में

कविता: राजीव रत्नेश ‘रतन’

भूमिका

“फिर बाज़ार में” एक अचानक हुई मुलाक़ात की कविता है। भीड़ भरे बाज़ार में नज़रें चार होती हैं और शायर को लगता है जैसे वह ख़ुद से मिल रहा हो। महबूब की याद, उसके बहाने, उसकी काली झिलमिल ओढ़नी और उसकी अदाएँ, सब मिलकर शाम के बाज़ार को रोशन कर देते हैं।
कविता में छेड़छाड़ और तंज़ भी है, तड़प और इंतज़ार भी। मुहब्बत चार रोज़ा है, दो दिन बीत चुके हैं, और शायर इस शहर में भी बस कुछ दिन का मेहमान है। वह नहीं जानता कि पाँचवें दिन महबूब आएगी या न मिलने की क़सम खा लेगी। फिर भी वह उम्मीद नहीं छोड़ता, और अंत में बस इतना चाहता है कि आँखों-आँखों में बात हो और बाज़ार रोशनियों से जगमगाता रहे।

कविता

बीच बाज़ार तुझसे नज़रें चार हुईं,
लगा ख़ुद से अपनी मुलाक़ात हुई,
सुबह से अब शाम होने को आई,
दिल के चमन में ख़ुशियों की बारात आई।

तुझसे मिलने की तड़प दिल में समाई,
आज भी आ जा, जैसे पिछले इतवार आई,
ज़िंदगी भर तेरी याद न जाएगी भुलाई,
तू अँधेरों की बस्ती में रोशनी बन छाई।

फिर तेरा बहाना कि अब तू न आ पाएगी,
जानता हूँ, बाज़ार में फबन दिखाने आएगी,
काली झिलमिल ओढ़नी ओढ़कर लहराएगी,
हसरत-ए-दिल होगी तो मुलाक़ात कर जाएगी।

कहाँ रहती है, किस शहर से तू आई,
कुछ ख़ास बात तूने न हमको बताई,
किस गली से निकलकर बाज़ार तक आई,
हम समझते-बूझते हैं सारी तेरी पारसाई।

फ़लक से सितारा टूटा कि तेरी याद आई,
जानेमन, क़िस्मत मेरी जगाने तू फिर आई,
हम ख़ुशियों के सागर में डूबते-उतराते रहे,
तू चाँद को झील में कैसे उतार लाई।

चार रोज़ा थी मुहब्बत, दो दिन गुज़र गए,
पाँचवें दिन आने की ठानी, या क़सम न मिलने की खाई?
इतना न तड़पा कि याद तेरी धुँधली हो जाए,
बाज़ार के हर दुकानदार ने तेरी राह में नज़र बिछाई।

तेरे शहर में कुछ दिन और है ठिकाना मेरा,
फिर किस ठौर तू होगी, किस ठौर अफ़साना मेरा,
मुझ नाचीज़ से दिल लगाने की भूल तुझसे हुई,
मैं बिस्मिल था, फिर भी ये ख़ता तुझसे कैसे हुई।

अब न और दूर रह, पास आ जा,
मोतियों की झालर से तेरी माँग सजाऊँ,
किसी तरह तेरे पास उड़कर आऊँ,
आरज़ुओं की गंगा में एक बार फिर नहाऊँ।

कहने को तू ग़ैर भी नहीं,
पर अभी तक मेरी अपनी भी नहीं,
आँखों में तेरे अश्क हैं, पलकों पे जुगनू,
माथे पे काली बिंदी है, गालों पे फागुन।

दिल दे न दे, हम खिलौनों से ही बहलते हैं,
तेरे नाम पर हर शाम मचलते हैं,
तेरी मस्तनिगाही का आलम ख़ुशगवार है,
आ जा सजनी, मुझे तुझी से प्यार है।

तेरे रुख़सारों की लालिमा क्या कहती है?
क्या तेरे नशेमन में मेरी कोई हिस्सेदारी है?
तू मेरा दिल, मैं तेरा दिलदार सनम,
आ जा आज, फिर कल शाम सनम।

तेरी-मेरी आँखों-आँखों में बात हो,
फिर बाज़ार में रोशनियों की बात हो।

शब्दार्थ

चमन: बाग़
बारात: विवाह-जुलूस (यहाँ ख़ुशियों का उमड़ आना)
फबन: शोभा, सजीली छवि
हसरत-ए-दिल: दिल की इच्छा
ओढ़नी: दुपट्टा, चुनरी
पारसाई: पवित्र दिखने का भाव (यहाँ भोलेपन का हल्का तंज़)
फ़लक: आसमान
जानेमन: प्राणप्रिय
चार रोज़ा: चार दिन की, क्षणभंगुर
क़सम: शपथ
नज़र बिछाना: बहुत उत्सुकता से राह देखना
ठिकाना: रहने की जगह, पड़ाव
ठौर: जगह, स्थान
अफ़साना: कहानी, क़िस्सा
नाचीज़: तुच्छ व्यक्ति (विनम्रता में ख़ुद के लिए)
बिस्मिल: घायल
ख़ता: भूल, चूक
झालर: लड़ियों की सजावट
आरज़ू: इच्छा, कामना
अश्क: आँसू
जुगनू: आग का कीड़ा (यहाँ आँखों की चमक)
फागुन: बसंत का महीना, गालों की गुलाबी रंगत
मस्तनिगाही: मस्त नज़र
आलम: दशा, माहौल
ख़ुशगवार: सुहावना
रुख़सार: गाल
नशेमन: घर, घोंसला
दिलदार: प्रेमी
सनम: प्रियतम

Saturday, November 7, 2026

दीवाली आई है

दीवाली आई है

नज़्म: राजीव रत्नेश ‘रतन’
भूमिका
“दीवाली आई है” दीवाली की रौनक और बिछड़ने की टीस को एक साथ बुनने वाली नज़्म है। एक तरफ़ रंग-ओ-नूर है, छतों की मुँडेरों पर दीये हैं, डाल-डाल पर झिलमिल रोशनी है, और गलियों-बाज़ारों में पटाख़ों का शोर है। दूसरी तरफ़ शायर अपने महबूब के शहर से दूर है और उसकी याद जबरन चली आती है।
हर बंद के अंत में लौटती टेक-पंक्ति इस विरोधाभास को गहरा करती है। जश्न के बीच दिल का दरवाज़ा महबूब के लिए खुला है, पर शायर जानता है कि वह किसी और की होने वाली है। फिर भी नज़र-ए-अदावत में उसे मेहरबानी दिखती है, और रचना उसी ख़ैरात के ज़िक्र पर लौट आती है जिससे शुरू हुई थी।

नज़्म

हर तरफ़ रंग-ओ-नूर, मुक़द्दर की लाली छाई है,
तमाम ख़ुशियों की ख़ैरात लेकर दीवाली आई है।

जगमग जलेंगे दीये तेरी-मेरी छत की मुँडेरों पर,
डाल-डाल पर झिलमिल होगा रोशनी का चराग़ाँ भी,
अटकलों का बाज़ार गर्म होगा तेरी महफ़िल में,
हम भी मशग़ूल होंगे, और तेरा दीवाना भी।
तेरे शहर से दूर होकर ये कैसी उदासी छाई है।

गलियों-बाज़ारों में छूटेंगे अनार-पटाख़े भी,
कहीं आतिशबाज़ी होगी तो कहीं नाख़ुशी भी,
दिल का दरवाज़ा खुला रहेगा सदा तेरे लिए,
तू आए न आए, फ़िज़ा में शामिल होगी मर्ज़ी भी।
नूर से दमकते चेहरों पे कैसी बेहिजाबी छाई है।

कहाँ की सड़क, कहाँ का मुहल्ला, ये कैसा शहर,
तिलस्म-सी लगती है मुझको तेरी जवानी भी,
आबरू-ए-त्योहार रौशन होगा तेरे ही आने पर,
हम लिख जाएँगे फ़लसफ़ा, शामिल तेरी कहानी भी।
हम मौत को भी मात देंगे, ये कैसी ज़िंदगानी पाई है।

दीवाने सँवरते हैं नया आईना पा लेने से,
ये शाम-ए-ग़ज़ल है, तेरी महफ़िल की निशानी भी,
सभी मस्त हैं, ख़ुश हैं, मदमस्त है तेरा दीवाना भी,
हम दोपहर समझते रहे, ले गई ये शाम मस्तानी भी।
हर पल तेरी ख़बर हमको तेरी ही ज़बानी आई है।

निगाहों का गिला होगा तेरा, लबों का शिकवा भी,
गुलों का मौसम होगा, तेरा हर लहजा भी,
हम मतवालों की मस्ती का ही आलम होगा,
तेरी आहों से उठता होगा मिलन का लम्हा भी।
हमसफ़र बने न बने, याद तेरी जबरन आई है।

तेरे कबूतरख़ाने में ही तुझको ये बात समझानी है,
अलमस्त है तू, अलमस्त तेरी मचलती जवानी है,
हमसफ़र उसी का बन, जो बन जाए तेरा,
हमको ये बात तुझे हर हाल में बतानी है।
आज नहीं तो कल तू किसी और की होने वाली है।

हम नहीं तेरा मुक़द्दर, तुझे कैसे समझाएँ,
तू किसी और की है, तुझे कैसे बताएँ,
हर मौसम में मस्त फूलों की बहार है, जवाब नहीं तेरा,
वही मुसाफ़िर हूँ मैं तेरा, याद कैसे दिलाएँ।

नज़र-ए-अदावत में भी कैसी मेहरबानी छाई है,
तमाम ख़ुशियों की ख़ैरात लेकर दीवाली आई है।

शब्दार्थ
रंग-ओ-नूर: रंग और रोशनी, चमक-दमक
मुक़द्दर: भाग्य, क़िस्मत
लाली: रौनक, सुर्ख़ी
ख़ैरात: दान, उपहार
मुँडेर: छत की किनारी की दीवार
चराग़ाँ: दीयों की कतार, दीपमाला
अटकल: अनुमान, कयास
महफ़िल: सभा, जमावड़ा
मशग़ूल: किसी काम या आनंद में डूबा हुआ
दीवाना: प्रेम में पागल
बेहिजाबी: बेपर्दगी, खुलापन
आतिशबाज़ी: पटाख़े और आग की रोशनी का खेल
नाख़ुशी: अप्रसन्नता, उदासी
फ़िज़ा: वातावरण
तिलस्म: जादू, रहस्य
आबरू: मान, गरिमा
फ़लसफ़ा: दर्शन, जीवन-चिंतन
शाम-ए-ग़ज़ल: ग़ज़ल की शाम, काव्य-संध्या
मस्ताना: मस्ती में डूबा
ज़बानी: मुँह से कही गई बात
गिला / शिकवा: शिकायत, उलाहना
लहजा: बोलने का ढंग
आलम: माहौल, दशा
मतवाला: मस्ती में चूर
लम्हा: पल, क्षण
जबरन: ज़बरदस्ती
कबूतरख़ाना: कबूतरों का दड़बा (यहाँ महबूब का घर)
अलमस्त: अपनी मस्ती में मगन
हमसफ़र: साथ चलने वाला
नज़र-ए-अदावत: दुश्मनी भरी निगाह
मेहरबानी: कृपा, अनुग्रह

Friday, November 6, 2026

फ़र्ज़-ए-मयकदा

फ़र्ज़-ए-मयकदा

ग़ज़ल: राजीव रत्नेश 'रतन'

भूमिका

"फ़र्ज़-ए-मयकदा" एक शिकायत-भरी ग़ज़ल है, जिसमें शायर अपने महबूब से कहता है कि जो निभाना था, वह निभाया नहीं गया। मयकदे का फ़र्ज़ है पिलाना, और अगर साग़र न हो तो आँखों से ही पिला दिया जाता। यहाँ मयकदा प्रेम का प्रतीक है और पिलाना अपनापन देने का।
पूरी ग़ज़ल में "होता" की रदीफ़ एक अधूरी हसरत की तरह लौटती है: काश किसी ने सहारा दिया होता, दीया जलाया होता, गले लगाया होता। शिकायत के बावजूद कड़वाहट नहीं है। सितम के दौर में भी चाहत कम नहीं हुई, और मक़्ते में शायर बिछड़कर भी वफ़ा के एक सिलसिले की उम्मीद रखता है।

ग़ज़ल

पिलाना फ़र्ज़ था, कुछ तो पिलाया होता,
सागर नहीं था तो आँखों से पिलाया होता।

नज़र के जाम से छलकती रहीं ये रातें,
किसी ने तो आँख से दरिया बहाया होता।

तर्कों में उलझकर उम्र गुज़ारी हमने,
तकरार के सिवा काश! कोई पैग़ाम आया होता।

चराग़-ए-शाम पलकों पर रखा था हमने,
हवा के रुख़ से किसी ने तो बचाया होता।

अँधेरे घर में बस जुगनू की आस रही हमको,
किसी ने एक दिया तो जलाया होता।

सितम के दौर में भी चाहत तेरी कम न हुई,
फ़ासला भूलकर हमें गले लगाया होता।

ज़िंदगी से बढ़कर भी तुझको तरजीह देते हम,
घड़ी भर के लिए तूने तरस खाया होता।

ज़माने भर के सब ज़ुल्म भुला देते हम,
ज़रा सहारा देकर तूने अपना बनाया होता।

'रतन' यूँ न उदास होता तुझसे बिछड़कर भी,
वफ़ा का कोई तो सिलसिला निभाया होता।

शब्दार्थ
फ़र्ज़: कर्तव्य
मयकदा: मदिरालय, मधुशाला
साग़र / जाम: प्याला, मदिरा का पात्र
नज़र: निगाह, दृष्टि
दरिया: नदी
तर्क: दलील, बहस
तकरार: झगड़ा, वाद-विवाद
पैग़ाम: संदेश
चराग़-ए-शाम: शाम का दीया
रुख़: दिशा, ओर
जुगनू: आग का कीड़ा (यहाँ रोशनी की हल्की-सी उम्मीद)
सितम / ज़ुल्म: अत्याचार, अन्याय
दौर: समय, काल
फ़ासला: दूरी
तरजीह: प्राथमिकता, वरीयता
वफ़ा: निष्ठा, निभाने का भाव
सिलसिला: क्रम, लगातार चलने वाली कड़ी
मक़्ता: ग़ज़ल का अंतिम शेर, जिसमें शायर का तख़ल्लुस आता है
तख़ल्लुस: शायर का उपनाम (यहाँ "रतन")

तेरे बाद ही ख़ुदा का ख़याल

तेरे बाद ही ख़ुदा का ख़याल
ग़ज़ल: राजीव रत्नेश ‘रतन’

भूमिका
“तेरे बाद ही ख़ुदा का ख़याल” एक ऐसे आशिक़ की ग़ज़ल है, जिसने महबूब को इबादत की हद तक चाहा। उसकी याद से ग़ज़ल का उबाल उठता है, उसके ज़िक्र से चेहरे पर रौनक आती है, और उसकी बेरुख़ी पर सफ़ाई देते-देते वह थक जाता है।
ग़ज़ल का केंद्रीय भाव यह है कि महबूब को ही पूजा गया, इसलिए ख़ुदा की याद उसके बाद ही आती है। मलाल है, पर शिकायत में भी समर्पण है। मक़्ते में शायर कहता है कि महबूब के दर से उठकर अब कोई राह नहीं बची, उसके बाद तो बस मौत का सवाल है।

ग़ज़ल
दिल में मेरे जब ग़ज़ल लिखने का उबाल आता है,
नज़र में तेरी चितचोर जवानी का जमाल आता है।

अक़ीदत-ए-मुहब्बत अब सिखाने से क्या होगा,
तुझे पूजा था, तेरे बाद ही ख़ुदा का ख़याल आता है।

सजदों में जिसके उम्र तमाम कर दी हमने,
उसे देखकर अब ख़ुद पे ही मलाल आता है।

दौर-ए-जुनूँ में तेरा कोई पैग़ाम जो पहुँचे,
लगता है साल बीतने के बाद नया साल आता है।

दुनिया की नज़रों में तो हम गुमनाम ही सही,
मगर तेरे ज़िक्र से चेहरे पर जलाल आता है।

किस-किस को सफ़ाई दें तेरी बेरुख़ी पर हम,
समझने वालों के लब पर बस मेरा ही हाल आता है।

‘रतन’ अब तेरे दर से उठने की राह क्या देखें,
कि तेरे बाद तो बस मौत का ही सवाल आता है।

शब्दार्थ
उबाल: जोश, भावनाओं का उमड़ना
चितचोर: मन चुराने वाली
जमाल: सौंदर्य, ख़ूबसूरती
अक़ीदत: श्रद्धा, गहरी आस्था
मुहब्बत: प्रेम
सजदा: माथा टेककर किया गया नमन, इबादत
मलाल: पछतावा, खेद
दौर-ए-जुनूँ: दीवानगी का समय
पैग़ाम: संदेश
गुमनाम: जिसे कोई न जाने
ज़िक्र: चर्चा, बात
जलाल: तेज, चमक, रौनक
सफ़ाई: स्पष्टीकरण
बेरुख़ी: उपेक्षा, बेपरवाही
लब: होंठ
दर: दरवाज़ा, चौखट
मक़्ता: ग़ज़ल का अंतिम शेर, जिसमें शायर का तख़ल्लुस आता है
तख़ल्लुस: शायर का उपनाम (यहाँ “रतन”)

नशा नहीं होता गजल

नशा नहीं होता
गजल--- राजीव रत्नेश' रतन'

जो साकी के पिलाने में अजब- सा नशा होता है,
किसी और के पिलाने में, जाने क्यों वो नशा नहीं होता/

तेरी आँखों से पी ले, उसे पैमाने की क्या चाह,
निगाहों के मयकदे में कोई प्यासा नहीं होता/

तुमको देख कर हम तो अपना होशो-हवास भुला बैठे,
तुमको अपनी नजर का भी शायद नशा नहीं होता/

तेरे रुख्सार की रंगत से बहारें मुस्कराती हैं,
हर गुलशन में ऐसा रंगो- बू नहीं होता/

तेरी बेरुखी को भी हम तेरी अदा ही समझ बैठे,
हर एक दीवाना मगर इतना बावफा नहीं होता/

जाम हाथों में रहा, फिर भी तिश्नगी बाकी रही,
तेरे बिना मयकदे में भी मजा नहीं होता/

हमने चाहा है तुझे, चाहत की हद से भी आगे,
हर किसी के दिल में ऐसा हौसला नहीं होता/

" रतन" को पूछते हो, इश्क में हासिल क्या हुआ,
तेरे जैसा मिले तो फिर कोई गिला नहीं होता/

            राजीव रत्नेश' रतन'
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तेरे रुख्सार पर झूलता काकुल गजल

तेरे रुख़सार पर झूलता काकुल

ग़ज़ल: राजीव रत्नेश "रतन"

भूमिका

यह ग़ज़ल यादों के संदूक से निकले सवालों की एक लड़ी है — रुख़सार पर झूलता काकुल, राह का पुराना शजर, घूँघट की शर्म, नाम की सुपारी देने वाली शोख़ी, होंठों की बेताबी, खंडहर, बवंडर और रक़ीब। हर शेर एक खोई हुई चीज़ के पीछे खड़ा है और अंत में लौटता है उसी मीठे तंज़ पर: "क्या हुआ?" हँसी, ताने और कसक तीनों इसी एक सवाल में घुले हैं।

रदीफ़ "क्या हुआ" है और क़ाफ़िया "-अर" (अंबर, शजर, डर, बिस्तर, ख़बर, दर-ब-दर, खंडहर, बवंडर, बराबर, समर, समंदर) है। मक़्ते में शायर "रतन" कहता है कि नाकामियों से उसे कोई गिला नहीं, क्योंकि उसके दिल में तो समंदर लहराता है।

ग़ज़ल

मतला
तेरे रुख़सार पर झूलता वो काकुल-ए-अंबर क्या हुआ,
तेरी राह का वो पुराना आख़िर शजर क्या हुआ।

२.
तुम्हारे सर का घूँघट सरक आया दोश पर,
बेख़ता न थे तुम, कहो, शर्म-ओ-हया का वो डर क्या हुआ।

३.
सौंपा था जिसे तुमने, मेरे नाम की सुपारी देकर,
कहाँ गया वो, उसका बोरिया-बिस्तर क्या हुआ।

४.
चूमने को बेताब रहा करती थीं तुम मेरे होठों को,
दो दिन में हो जाओगी पराई, वो ख़बर क्या हुआ।

५.
थे न हम तुम्हारी नसीहतों के जो बिल्कुल क़ाबिल,
अरमान-ए-दिल, बेदख़ल होकर, दर-ब-दर क्या हुआ।

६.
घास चरा करते थे जिसकी बाउंड्री में चौपाये,
आज शहर का वो पुराना खंडहर क्या हुआ।

७.
कश्ती बाँध रखी थी मैंने तो समंदर के साहिल से,
आने वाला था जो आख़िर वो बवंडर क्या हुआ।

८.
आए हो मेरी बस्ती में बिन बुलाए, बिन बताए,
रक़ीब के मुँह पर तमाचा बराबर क्या हुआ।

९.
तुम्हारी आँखों से अश्क दम-ब-ख़ुद लुढ़के,
गिरा जो आके तुम्हारी गोद में, वो समर क्या हुआ।

मक़्ता
"रतन" को ज़िंदगी की नाकामियों से नहीं कोई गिला,
जब दिल में लहराता है उसके समंदर क्या हुआ।

शब्दार्थ

  • रुख़सार: गाल, चेहरा
  • काकुल: लंबी लट, झूलती ज़ुल्फ
  • अंबर: सुगंधित पदार्थ; काली, ख़ुशबूदार लटों की उपमा
  • शजर: पेड़, वृक्ष
  • घूँघट: सिर पर ओढ़ने का पल्लू
  • दोश: कंधा
  • बेख़ता: बिना अपराध का, निर्दोष
  • शर्म-ओ-हया: लाज, संकोच
  • सुपारी: किसी का काम तमाम करने का ठेका (हास्य में)
  • बोरिया-बिस्तर: सामान, गृहस्थी का पूरा लवाज़मा
  • बेताब: अधीर, बेचैन
  • पराई: सींव से दूसरे का हो जाने वाली
  • नसीहत: सीख, सलाह
  • क़ाबिल: योग्य
  • अरमान: अधूरी इच्छा
  • बेदख़ल: अधिकार से बाहर, निकाला हुआ
  • दर-ब-दर: हर द्वार पर भटकता हुआ
  • चौपाये: गाय-भैंस जैसे चार पैरों वाले पशु
  • खंडहर: उजड़ी हुई इमारत
  • साहिल: तट, किनारा
  • बवंडर: तेज़ गोल आँधी
  • रक़ीब: प्रतिद्वंद्वी, प्रेम में साथी-दावेदार
  • तमाचा: थप्पड़
  • अश्क: आँसू
  • दम-ब-ख़ुद: हक्का-बक्का, स्तब्ध
  • समर: फल
  • नाकामियाँ: असफलताएँ
  • गिला: शिकायत
  • समंदर: सागर
  • मतला: ग़ज़ल का पहला शेर, जिसके दोनों मिसरों में क़ाफ़िया-रदीफ़ आता है
  • मक़्ता: ग़ज़ल का अंतिम शेर, जिसमें शायर का तख़ल्लुस आता है
  • क़ाफ़िया: तुक वाले शब्द
  • रदीफ़: हर शेर के अंत में दोहराया जाने वाला पद
  • तख़ल्लुस: शायर का उपनाम

साकी के पिलाने में गजल

साक़ी के पिलाने में

ग़ज़ल: राजीव रत्नेश "रतन"

भूमिका

यह ग़ज़ल हल्की शोख़ी और मीठी शिकायत का मिला-जुला रंग लिए हुए है। शायर कहता है कि साक़ी के हाथ के नशे का कोई दूसरा नहीं, और महबूब के नाज़-ओ-अंदाज़ तो उसकी कमज़ोर अक्ल के परे हैं। अटैची रख कर स्टेशन तक पहुँचने वाले नख़रे भी, अंत में, बस नख़रे ही रह जाते हैं। हर शेर का अंत इसी सवालिया लहजे पर होता है: "कहाँ होता है"।

रदीफ़ "कहाँ होता है" है और क़ाफ़िया "-आना" (पैमाना, मस्ताना, खाना, जाना, समझाना, दीवाना, बहाना, ठिकाना, लगाना, आना) है। मक़्ते में शायर "रतन" अपने साक़ी के मयख़ाने से बाहर किसी और दर पर न जाने की बात करता है।

ग़ज़ल

मतला
साक़ी के पिलाने में दम-ब-ख़ुद कर दे जो, वो पैमाना कहाँ होता है,
किसी और के पिलाने में वैसा मस्ताना कहाँ होता है।

२.
नाज़-ओ-अंदाज़ उनके समझ में बिल्कुल आते नहीं,
बिना बात जीने-मरने की क़सम खाना कहाँ होता है।

३.
नख़रे तेरे बाहर-ए-बयान हैं, मेरी कमज़ोर अक्ल से,
अटैची रख, स्टेशन पहुँच, फिर भी उनका जाना कहाँ होता है।

४.
दिल को लाख समझाया उनसे बचकर रहने को,
इश्क़ में दिल का समझाना कहाँ होता है।

५.
उनकी हर अदा पर मरना कोई नई बात नहीं,
उन पर मर मिटने वाला, हम-सा दीवाना कहाँ होता है।

६.
रूठना और मान जाना बस उनकी इक अदा है,
वरना उनके पास कोई और बहाना कहाँ होता है।

७.
सारी दुनिया घूम आए हम, पर तेरे दर के सिवा,
अपना कोई और ठिकाना कहाँ होता है।

८.
लुटा दिया इक नज़र पर हमने सारा ख़ज़ाना,
इश्क़ में नफ़ा-नुक़सान का हिसाब लगाना कहाँ होता है।

मक़्ता
साक़ी, तेरे मयख़ाने के बाद ऐ "रतन", किसी और दर पर,
मेरा और किसी महफ़िल में आना कहाँ होता है।

शब्दार्थ

  • साक़ी: महफ़िल में शराब पिलाने वाला/वाली
  • दम-ब-ख़ुद: हक्का-बक्का, स्तब्ध
  • पैमाना: शराब का प्याला
  • मस्ताना: मस्ती से भरा, नशीला
  • नाज़-ओ-अंदाज़: नख़रे और अदाएँ
  • क़सम: शपथ
  • नख़रे: नाज़-नख़रा, अदाओं का दिखावा
  • बाहर-ए-बयान: बयान से परे, वर्णन से बाहर
  • अक्ल: बुद्धि, समझ
  • अटैची: सूटकेस, यात्रा का बक्सा
  • अदा: नाज़-ओ-अंदाज़
  • ठिकाना: अड्डा, आश्रय
  • ख़ज़ाना: कोष, भंडार
  • नफ़ा-नुक़सान: लाभ और हानि
  • मयख़ाना: शराबख़ाना
  • महफ़िल: सभा, जमघट
  • मतला: ग़ज़ल का पहला शेर, जिसके दोनों मिसरों में क़ाफ़िया-रदीफ़ आता है
  • मक़्ता: ग़ज़ल का अंतिम शेर, जिसमें शायर का तख़ल्लुस आता है
  • क़ाफ़िया: तुक वाले शब्द
  • रदीफ़: हर शेर के अंत में दोहराया जाने वाला पद
  • तख़ल्लुस: शायर का उपनाम

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!