Tuesday, September 22, 2026

तुझसे दूरी अब अखरती है----- गजल

तुझसे दूरी अब अखरती है
        ---- राजीव रत्नेश

तुझसे दूरी अब अखरती है,
खामोशी तेरी मुझे खलती है/

तेरे लिए दिल में हसरतें हैं,
कोई तमन्ना नहीं सँवरती है/

सावन के पड़े झूले हैं, लेकिन,
साथ आकर तू पेंग बढ़ाती नहीं है/

बारिश में जंगली फूल खिले हैं,
कली दिल की मगर खिलती नहीं है/

फस्ल- ए- आरजू लहलहा रही है,
आजा, मिलने की बारी तेरी है/

रात ढलती है, नींद आती नहीं,
तेरी यादों में रात कटती है/

तेरे बिन मेरा मकाँ भी सूना है,
हर तरफ एक उदासी रहती है/

लिखता हूँ कि अबकी अकेला हूँ,
तुझसे दूरी समझदारी नहीं है/

रतन, इतना तो अब समझ ले तू,
दूर रहना भी कोई मजबूरी नहीं है//
          """""""""

तुम न होते ( गजल )

तुम न होते
----- राजीव रत्नेश

तुम न होते तो हम किससे अपनी बात करते,
आस्माँ के चाँद-सितारों से क्या पैमान करते/

दुःख-दर्द अपना किससे बाँटते तुम्हारे बगैर,
अपनी मुहब्बत का हम किससे ऐलान करते/

तकदीर रौशन हो तो सितारे भी बात समझते हैं,
तुम्हारे सिवा किससे हम मुहब्बत बयान करते/

तुम सामने होते तो शायद हम कम बयान करते,
दूर रह कर ही तो दिल के राज का इजहार करते/

शिद्दत से इबादत हो तो अकीदत बन जाती है,
तुम्हारे सिवा हम और किसका गुमान करते/

जमाने ने जो साथ दिया तो मेरा यकीं कर,
साहिल पे तेरी कश्ती न अपनी कश्ती से अनजान करते/

मैंने मुहब्बत के खेल में हार अपने लिए चुनी,
तुम्हारे सिवा किसी और से न हार स्वीकार करते/

सितम दुनिया भर के सहे तेरी खातिर हमने,
जमाने को दिखाने को आईने की औकात रखते/

मेरी मुहब्बत अगर तेरी मंजिल न बन सके,
किसे हम अपने अहसासों का मुकाम करते/

मैं शिकायतों को अपने सफर का हासिल न समझूँ,
तुम बस अपनी यादों का एक जाम मेरे नाम करते/

बहुत थक गए हो मुहब्बत के मुसाफिर होकर,
काश! अब तो पहलू में मेरे बैठ कर आराम करते/

दिन बीत जाता है पर रात कटने का नाम नहीं लेती,
मुझे तो बस अपने दिल में बिठा कर सुबह से शाम करते/

' रतन ' तेरे बिना ये दिल किससे अपना हाल कहता,
तू सामने होता तो हम कहाँ ये कलाम करते//

             ----------------

ईश्वर ( कविता )

राजीव जी, यह रचना “ईश्वर” आपके अब तक के लेखन से कुछ अलग धरातल पर है। इसमें ईश्वर को केवल धार्मिक आस्था के रूप में नहीं, बल्कि सृष्टि, परिवर्तन, मनुष्य और प्रेम—इन सबमें व्याप्त एक अदृश्य सत्ता के रूप में देखने का प्रयास है।
मुझे इसमें विशेष रूप से अंतिम दो पद बहुत प्रभावी लगे। वहाँ अमूर्त ईश्वर धीरे-धीरे एक साक्षात, अनुभूत उपस्थिति बन जाता है। यही इस रचना का सबसे सुंदर भाव-परिवर्तन है।
मैंने मूल भावों को बचाते हुए भाषा, प्रवाह और कुछ दोहराव को थोड़ा सँवारकर इसे इस रूप में देखा है—
ईश्वर
— राजीव रत्नेश
कोई तो है जो हम सबका नियमन करता है,
मैं और तुम नहीं, कोई और तो है,
चाँद-तारों को अपनी चाल में चलाता है।
पृथ्वी को एक धुरी पर घुमाता है,
कोई तो है इस सृष्टि का संस्थापक,
जो भले हमें नज़र नहीं आता है।
परिवर्तन के चक्र में वह हर कहीं है,
मौसम बदलता है, वह सामने नहीं आता,
कुछ तो बात है—जो हमें नज़र नहीं आता है।
हममें, तुममें, व्यापक—सबमें संस्थित कोई तो है,
उसको मैं आज तक जान-समझ नहीं पाया,
गाँधी, बुद्ध, ईसा—सब उसी के नज़राने हैं।
आकृति उसी की है, समर्पण भाव से ध्याते हैं,
सब कुछ पाकर ही उसका ध्यान लगाते हैं,
तर्क के सहारे आज तक उसे पहचान न पाए।
माथे से लगाते जिसका तिलक, रोली और चंदन,
वही राम और कृष्ण के रूप में नज़र आता है,
जानकर भी आज तक कोई उसे जान न पाया।
स्वयं कहा है—“सम्भवामि युगे-युगे”, अवतार लेता है,
इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं हूँ, फिर भी मन समझ न पाया,
जीवन-प्राण देकर जो मुझे उद्बुद्ध करता है,
उस रहस्य को मेरा मन आज तक जान न पाया।
भक्ति-भाव से चरणों में बस दो फूल ही तो रखे थे,
प्रेम की बगिया में वह बहार बनकर आया,
नामकरण कर न सका—ईश्वर समझकर ही उसे पूजा।
कठिन वक्त में भी उसने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा,
उसके श्यामल, सुकोमल दर्शन से वंचित भी न रहा,
उसे स्वीकार किया—वह मेरे लिए साक्षात ईश्वर था।
एक बात विशेष रूप से कहूँगा: अंतिम शेर में आपकी रचना का पूरा रहस्य खुलता है। आरंभ में कवि पूछता है—“कोई तो है”, और अंत में उसी खोज का उत्तर किसी दार्शनिक प्रमाण में नहीं, बल्कि अनुभव में मिलता है—“वह मेरे लिए साक्षात ईश्वर था।”
इसलिए मैं इसमें बहुत अधिक कठिन या संस्कृतनिष्ठ शब्द जोड़ना उचित नहीं समझूँगा। आपकी वही सरल, आत्मीय और अनुभव से निकली हुई भाषा इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।

Sunday, September 20, 2026

जन्मदिन का तोहफा

ख़ुशी ज्यादा लेकिन गम भी थोड़ा दिल में है,
उतर जाएगा ये नशा भी तेरा सबेरा होने तक/

बस आस में दिल आज भी मेरा धड़क रहा है,
ये खुशी की रात भी ढल जाएगी सबेरा होने तक/

तेरे आने की महफिल में घड़ियाँ बस अब थोड़ी हैं,
हर मुश्किल आसान हो जाएगी सबेरा होने तक/

नया सबेरा आएगा, खुशियाँ तमाम लेकर आएगा,
हर तूफान का निशान मिट जाएगा सबेरा होने तक/
                """""""""""""""""

मुहब्बत की तस्करी करते हमसे न बना,
आ गई थी तबीयत उसपे, इंकार करते हमसे न बना/ख़ुशी ज्यादा लेकिन गम भी थोड़ा दिल में है,
उतर जाएगा ये नशा भी तेरा सबेरा होने तक/

बस आस में दिल आज भी मेरा धड़क रहा है,
ये खुशी की रात भी ढल जाएगी सबेरा होने तक/

तेरे आने की महफिल में घड़ियाँ बस अब थोड़ी हैं,
हर मुश्किल आसान हो जाएगी सबेरा होने तक/

नया सबेरा आएगा, खुशियाँ तमाम लेकर आएगा,
हर तूफान का निशान मिट जाएगा सबेरा होने तक/
                """""""""""""""""

मुहब्बत की तस्करी करते हमसे न बना,
आ गई थी तबीयत उसपे, इंकार करते हमसे न बना/
जज्ब हो गए दिल में ही दिल के अरमाँ,
आग लगी थी दिल में मेरे, उससे बुझाए न बना/
                 """""""""""""""""

दिल में बाकी अभी अरमान सारे के सारे यूँ ही,
हम दिलाते रहेंगे याद सदा पुराने वादे यूँ ही/
                 """"""""""""""""

अजनबी होकर भी वो पुकारते ही रह गए,
हम भी बेताब थे, मगर जाते जाते ही रह गए/
                   """"""""""""""""

इंतरवाब कर ले मुझसे, छेड़ मुहब्बत भरा नगमा,
पेश कर जामे- लब इक बार सुबह शाम को दुबारा/
                  """"""""""""""""""

दिल में जगह दी अपना समझा तेरा बारंबार शुक्रिया,
आके मेरी पलकों पे बैठ जा मेरे साकी तेरा शुक्रिया/
अजनबी शहर में अनजान सभी से, तू बन जा हमनफस,
साँस से साँस मिल जाए, आजा बाहों में तेरा शुक्रिया/
                   """""""""""""''''''''

मये- निगाह ही पिलाती रहेगी या कुछ आगे भी बढ़ेगी,
थाम के दामन मेरा कोई मुझसे सवाल भी करेगी/
जमाना बने मुद्दई, इसके पहले मेरी हमनफस बन जा,
फिर न मिलेगा मौका, रुबरु मेरे अपनी सूरत कर जा/
                 """"""""""""""""""""""

तूने नजर मिलाई इस तरह, दिल तुझ पर फिदा हो गया,
आ गए जो आगोश में, मुहब्बत का हक पूरा अदा हो गया/
                  """"""""""""""""""""

तुम प्यार से खिलाओ तो क्या न खा लूँ
दवा ही तो है, तुम्हारे हाथों जहर भी खा लूँ/
                    """"""""""""""""""

तीखे हैं नैन-नक्श उसके, बसे दिल में वो मेरे,
दिल से करता याद उसे, कब आएँगे पास वो मेरे/
                    """""""""""""""""

मैं मदहोश हुआ तो कैसे,
देखा तो तेरे लब थे मेरे लबों पर,
होश आया तो पाया तू
झुकी हुई थी मेरी पलकों पर/


हर साल सबको जन्मदिन की मुबारकबाद भेजता रहा,
पर आज तक किसी ने न भेजा, लाल कागज में लिपटा पीला गुलाब/

डाक- विभाग अभी बंद न हुआ, आजकल कोरियर का रिवाज,
कीमत न चुकाई गई मुझ गरीब से, नीलाम हो गया नाजनी का गुलाब/

इंतजार में खाक कर दी अपनी दुनिया, कोई फरिश्ता न बताने आया,
समंदर से नायाब रत्न निकले पर विश्वमोहिनी को हर ले गया छलिया/

गुलाब का आदान-प्रदान होता खूब वैलेन्टाइन-डे पर,
पर एक फूल भी भेजते न बना किसी से मुझे जन्मदिवस पर/

न चाहिए कलम, न चाहिए तलवार, न अब कोई ख़ुशी ज्यादा लेकिन गम भी थोड़ा दिल में है,
उतर जाएगा ये नशा भी तेरा सबेरा होने तक/

बस आस में दिल आज भी मेरा धड़क रहा है,
ये खुशी की रात भी ढल जाएगी सबेरा होने तक/

तेरे आने की महफिल में घड़ियाँ बस अब थोड़ी हैं,
हर मुश्किल आसान हो जाएगी सबेरा होने तक/

नया सबेरा आएगा, खुशियाँ तमाम लेकर आएगा,
हर तूफान का निशान मिट जाएगा सबेरा होने तक/
                """""""""""""""""

मुहब्बत की तस्करी करते हमसे न बना,
आ गई थी तबीयत उसपे, इंकार करते हमसे न बना/
जज्ब हो गए दिल में ही दिल के अरमाँ,
आग लगी थी दिल में मेरे, उससे बुझाए न बना/
                 """""""""""""""""

दिल में बाकी अभी अरमान सारे के सारे यूँ ही,
हम दिलाते रहेंगे याद सदा पुराने वादे यूँ ही/
                 """"""""""""""""

अजनबी होकर भी वो पुकारते ही रह गए,
हम भी बेताब थे, मगर जाते जाते ही रह गए/
                   """"""""""""""""

इंतरवाब कर ले मुझसे, छेड़ मुहब्बत भरा नगमा,
पेश कर जामे- लब इक बार सुबह शाम को दुबारा/
                  """"""""""""""""""

दिल में जगह दी अपना समझा तेरा बारंबार शुक्रिया,
आके मेरी पलकों पे बैठ जा मेरे साकी तेरा शुक्रिया/
अजनबी शहर में अनजान सभी से, तू बन जा हमनफस,
साँस से साँस मिल जाए, आजा बाहों में तेरा शुक्रिया/
                   """""""""""""''''''''

मये- निगाह ही पिलाती रहेगी या कुछ आगे भी बढ़ेगी,
थाम के दामन मेरा कोई मुझसे सवाल भी करेगी/
जमाना बने मुद्दई, इसके पहले मेरी हमनफस बन जा,
फिर न मिलेगा मौका, रुबरु मेरे अपनी सूरत कर जा/
                 """"""""""""""""""""""

तूने नजर मिलाई इस तरह, दिल तुझ पर फिदा हो गया,
आ गए जो आगोश में, मुहब्बत का हक पूरा अदा हो गया/
                  """"""""""""""""""""

तुम प्यार से खिलाओ तो क्या न खा लूँ
दवा ही तो है, तुम्हारे हाथों जहर भी खा लूँ/
                    """"""""""""""""""

तीखे हैं नैन-नक्श उसके, बसे दिल में वो मेरे,
दिल से करता याद उसे, कब आएँगे पास वो मेरे/
                    """""""""""""""""

मैं मदहोश हुआ तो कैसे,
देखा तो तेरे लब थे मेरे लबों पर,
होश आया तो पाया तू
झुकी हुई थी मेरी पलकों पर/


हर साल सबको जन्मदिन की मुबारकबाद भेजता रहा,
पर आज तक किसी ने न भेजा, लाल कागज में लिपटा पीला गुलाब/

डाक- विभाग अभी बंद न हुआ, आजकल कोरियर का रिवाज,
कीमत न चुकाई गई मुझ गरीब से, नीलाम हो गया नाजनी का गुलाब/

इंतजार में खाक कर दी अपनी दुनिया, कोई फरिश्ता न बताने आया,
समंदर से नायाब रत्न निकले पर विश्वमोहिनी को हर ले गया छलिया/

गुलाब का आदान-प्रदान होता खूब वैलेन्टाइन-डे पर,
पर एक फूल भी भेजते न बना किसी से मुझे जन्मदिवस पर/

न चाहिए कलम, न चाहिए तलवार, न अब कोई बहार ही,
मेरे दिल में तो बसा बस सजनी तेरा वैलेन्टाइन-डे का व्यापार/

तुझे इतर- गुलाब कहूँ या गुलदस्ता, भीनी खुशबू से मुअत्तर हो बदन,
एक बार पेशे- नजर जो हो जाए गुलाबों भरा गुलदस्ता/

अब न पहले सी बहार रही, वो रौनक न रही किसी त्यौहार में,
हर बरस की तरह अबकी बरस भी इंतजार था मुझे कासिद का/

शादियाँ हो जाती है, विदाइयाँ तक हो जाया करती हैं,
निमंत्रण-पत्र भी मिल जाते हैं, पर चिठ्ठियाँ नहीं आतीं/

अब तो बस मोबाइल से ही फूल ही फूल झड़ा करते हैं,
चमेली, नर्गिस और जूही की खुशबू बिना बात भी आ जाती है/

इसके पहले कोई मेरे मोबाइल को नजर लगाए,
' रतन ' उन्हें एडवान्स में दुआ- ए- सदाबहार देते हैं//

              राजीव रत्नेश
        """"""""""""""""""'''"""'""" ही,
मेरे दिल में तो बसा बस सजनी तेरा वैलेन्टाइन-डे का व्यापार/

तुझे इतर- गुलाब कहूँ या गुलदस्ता, भीनी खुशबू से मुअत्तर हो बदन,
एक बार पेशे- नजर जो हो जाए गुलाबों भरा गुलदस्ता/

अब न पहले सी बहार रही, वो रौनक न रही किसी त्यौहार में,
हर बरस की तरह अबकी बरस भी इंतजार था मुझे कासिद का/

शादियाँ हो जाती है, विदाइयाँ तक हो जाया में . हैं,
निमंत्रण-पत्र भी मिल जाते हैं, पर चिठ्ठियाँ नहीं आतीं/

अब तो बस मोबाइल से ही फूल ही फूल झड़ा करते हैं,
चमेली, नर्गिस और जूही की खुशबू बिना बात भी आ जाती है/

इसके पहले कोई मेरे मोबाइल को नजर लगाए,
' रतन ' उन्हें एडवान्स में दुआ- ए- सदाबहार देते हैं//

              राजीव रत्नेश
        """"""""""""""""""'''"""'"""
जज्ब हो गए दिल में ही दिल के अरमाँ,
आग लगी थी दिल में मेरे, उससे बुझाए न बना/
                 """""""""""""""""

दिल में बाकी अभी अरमान सारे के सारे यूँ ही,
हम दिलाते रहेंगे याद सदा पुराने वादे यूँ ही/
                 """"""""""""""""

अजनबी होकर भी वो पुकारते ही रह गए,
हम भी बेताब थे, मगर जाते जाते ही रह गए/
                   """"""""""""""""

इंतरवाब कर ले मुझसे, छेड़ मुहब्बत भरा नगमा,
पेश कर जामे- लब इक बार सुबह शाम को दुबारा/
                  """"""""""""""""""

दिल में जगह दी अपना समझा तेरा बारंबार शुक्रिया,
आके मेरी पलकों पे बैठ जा मेरे साकी तेरा शुक्रिया/
अजनबी शहर में अनजान सभी से, तू बन जा हमनफस,
साँस से साँस मिल जाए, आजा बाहों में तेरा शुक्रिया/
                   """""""""""""''''''''

मये- निगाह ही पिलाती रहेगी या कुछ आगे भी बढ़ेगी,
थाम के दामन मेरा कोई मुझसे सवाल भी करेगी/
जमाना बने मुद्दई, इसके पहले मेरी हमनफस बन जा,
फिर न मिलेगा मौका, रुबरु मेरे अपनी सूरत कर जा/
                 """"""""""""""""""""""

तूने नजर मिलाई इस तरह, दिल तुझ पर फिदा हो गया,
आ गए जो आगोश में, मुहब्बत का हक पूरा अदा हो गया/
                  """"""""""""""""""""

तुम प्यार से खिलाओ तो क्या न खा लूँ
दवा ही तो है, तुम्हारे हाथों जहर भी खा लूँ/
                    """"""""""""""""""

तीखे हैं नैन-नक्श उसके, बसे दिल में वो मेरे,
दिल से करता याद उसे, कब आएँगे पास वो मेरे/
                    """""""""""""""""

मैं मदहोश हुआ तो कैसे,
देखा तो तेरे लब थे मेरे लबों पर,
होश आया तो पाया तू
झुकी हुई थी मेरी पलकों पर/


हर साल सबको जन्मदिन की मुबारकबाद भेजता रहा,
पर आज तक किसी ने न भेजा, लाल कागज में लिपटा पीला गुलाब/

डाक- विभाग अभी बंद न हुआ, आजकल कोरियर का रिवाज,
कीमत न चुकाई गई मुझ गरीब से, नीलाम हो गया नाजनी का गुलाब/

इंतजार में खाक कर दी अपनी दुनिया, कोई फरिश्ता न बताने आया,
समंदर से नायाब रत्न निकले पर विश्वमोहिनी को हर ले गया छलिया/

गुलाब का आदान-प्रदान होता खूब वैलेन्टाइन-डे पर,
पर एक फूल भी भेजते न बना किसी से मुझे जन्मदिवस पर/

न चाहिए कलम, न चाहिए तलवार, न अब कोई ख़ुशी ज्यादा लेकिन गम भी थोड़ा दिल में है,
उतर जाएगा ये नशा भी तेरा सबेरा होने तक/

बस आस में दिल आज भी मेरा धड़क रहा है,
ये खुशी की रात भी ढल जाएगी सबेरा होने तक/

तेरे आने की महफिल में घड़ियाँ बस अब थोड़ी हैं,
हर मुश्किल आसान हो जाएगी सबेरा होने तक/

नया सबेरा आएगा, खुशियाँ तमाम लेकर आएगा,
हर तूफान का निशान मिट जाएगा सबेरा होने तक/
                """""""""""""""""

मुहब्बत की तस्करी करते हमसे न बना,
आ गई थी तबीयत उसपे, इंकार करते हमसे न बना/
जज्ब हो गए दिल में ही दिल के अरमाँ,
आग लगी थी दिल में मेरे, उससे बुझाए न बना/
                 """""""""""""""""

दिल में बाकी अभी अरमान सारे के सारे यूँ ही,
हम दिलाते रहेंगे याद सदा पुराने वादे यूँ ही/
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अजनबी होकर भी वो पुकारते ही रह गए,
हम भी बेताब थे, मगर जाते जाते ही रह गए/
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इंतरवाब कर ले मुझसे, छेड़ मुहब्बत भरा नगमा,
पेश कर जामे- लब इक बार सुबह शाम को दुबारा/
                  """"""""""""""""""

दिल में जगह दी अपना समझा तेरा बारंबार शुक्रिया,
आके मेरी पलकों पे बैठ जा मेरे साकी तेरा शुक्रिया/
अजनबी शहर में अनजान सभी से, तू बन जा हमनफस,
साँस से साँस मिल जाए, आजा बाहों में तेरा शुक्रिया/
                   """""""""""""''''''''

मये- निगाह ही पिलाती रहेगी या कुछ आगे भी बढ़ेगी,
थाम के दामन मेरा कोई मुझसे सवाल भी करेगी/
जमाना बने मुद्दई, इसके पहले मेरी हमनफस बन जा,
फिर न मिलेगा मौका, रुबरु मेरे अपनी सूरत कर जा/
                 """"""""""""""""""""""

तूने नजर मिलाई इस तरह, दिल तुझ पर फिदा हो गया,
आ गए जो आगोश में, मुहब्बत का हक पूरा अदा हो गया/
                  """"""""""""""""""""

तुम प्यार से खिलाओ तो क्या न खा लूँ
दवा ही तो है, तुम्हारे हाथों जहर भी खा लूँ/
                    """"""""""""""""""

तीखे हैं नैन-नक्श उसके, बसे दिल में वो मेरे,
दिल से करता याद उसे, कब आएँगे पास वो मेरे/
                    """""""""""""""""

मैं मदहोश हुआ तो कैसे,
देखा तो तेरे लब थे मेरे लबों पर,
होश आया तो पाया तू
झुकी हुई थी मेरी पलकों पर/


हर साल सबको जन्मदिन की मुबारकबाद भेजता रहा,
पर आज तक किसी ने न भेजा, लाल कागज में लिपटा पीला गुलाब/

डाक- विभाग अभी बंद न हुआ, आजकल कोरियर का रिवाज,
कीमत न चुकाई गई मुझ गरीब से, नीलाम हो गया नाजनी का गुलाब/

इंतजार में खाक कर दी अपनी दुनिया, कोई फरिश्ता न बताने आया,
समंदर से नायाब रत्न निकले पर विश्वमोहिनी को हर ले गया छलिया/

गुलाब का आदान-प्रदान होता खूब वैलेन्टाइन-डे पर,
पर एक फूल भी भेजते न बना किसी से मुझे जन्मदिवस पर/

न चाहिए कलम, न चाहिए तलवार, न अब कोई बहार ही,
मेरे दिल में तो बसा बस सजनी तेरा वैलेन्टाइन-डे का व्यापार/

तुझे इतर- गुलाब कहूँ या गुलदस्ता, भीनी खुशबू से मुअत्तर हो बदन,
एक बार पेशे- नजर जो हो जाए गुलाबों भरा गुलदस्ता/

अब न पहले सी बहार रही, वो रौनक न रही किसी त्यौहार में,
हर बरस की तरह अबकी बरस भी इंतजार था मुझे कासिद का/

शादियाँ हो जाती है, विदाइयाँ तक हो जाया करती हैं,
निमंत्रण-पत्र भी मिल जाते हैं, पर चिठ्ठियाँ नहीं आतीं/

अब तो बस मोबाइल से ही फूल ही फूल झड़ा करते हैं,
चमेली, नर्गिस और जूही की खुशबू बिना बात भी आ जाती है/

इसके पहले कोई मेरे मोबाइल को नजर लगाए,
' रतन ' उन्हें एडवान्स में दुआ- ए- सदाबहार देते हैं//

              राजीव रत्नेश
        """"""""""""""""""'''"""'""" ही,
मेरे दिल में तो बसा बस सजनी तेरा वैलेन्टाइन-डे का व्यापार/

तुझे इतर- गुलाब कहूँ या गुलदस्ता, भीनी खुशबू से मुअत्तर हो बदन,
एक बार पेशे- नजर जो हो जाए गुलाबों भरा गुलदस्ता/

अब न पहले सी बहार रही, वो रौनक न रही किसी त्यौहार में,
हर बरस की तरह अबकी बरस भी इंतजार था मुझे कासिद का/

शादियाँ हो जाती है, विदाइयाँ तक हो जाया में . हैं,
निमंत्रण-पत्र भी मिल जाते हैं, पर चिठ्ठियाँ नहीं आतीं/

अब तो बस मोबाइल से ही फूल ही फूल झड़ा करते हैं,
चमेली, नर्गिस और जूही की खुशबू बिना बात भी आ जाती है/

इसके पहले कोई मेरे मोबाइल को नजर लगाए,
' रतन ' उन्हें एडवान्स में दुआ- ए- सदाबहार देते हैं//

              राजीव रत्नेश
        """"""""""""""""""'''"""'"""

चाय के प्याले में धुँआ उठे जैसे ------- गजल

चाय के प्याले में धुँआ उठे जैसे
          --- राजीव रत्नेश

चाय के प्याले में धुँआ उठे जैसे,
मेरी आँखों में भी नशा उठे जैसे/

मुझे दूर से भी पुकारना, मैं तेरे साथ हूँ,
तू दिखे दूर, मगर पास हो जैसे/

हमारी नजदीकी को जमाने ने गलत माना,
तुझे नाम लगा, मेरे लिए रुसवाई हो जैसे/

दरिया किनारे मछलियाँ मिलें भी कैसे,
काँटे में फँसाने वाला बैठा हो जैसे/

मेरा टिफ़िन रोज लाती है साहिल पर,
सोचती है, कश्ती में दूर ले जाऊँ जैसे/

मुहब्बत की गहराई काश! वो समझें,
अफ़साने भी कोई झूठे हुए जैसे/

लोग हाथ की लकीरें यूँ ही पढ़ा करते हैं,
खुद ही लिखा हो, खुद समझें जैसे/

यहाँ तो हर कोई हड़बड़ाहट में है,
हर मकाँ भूतों का बसेरा हो जैसे/

वास्ता देते हो खुदा का तो मुझको,
दिल में तेरे अभी ख़ौफ- ए- ख़ुदा हो जैसे/

सहम- सहम कर इश्क में जीते हैं हम,
जिन्दगी काटना भी अब खता हो जैसे/

          """"""""""""

मैं भी हासिल- ए- वक्त हो जाऊँगा ( गजल )

मैं भी हासिल- ए- वक़्त हो जाऊँगा
           ---- राजीव रत्नेश

ओझल, आँखों की ओट हुआ जब तेरा नूरानी चेहरा,
दिल तड़प उठा, दूर हुआ जब मुहब्बत की निशानी चेहरा/

हथेलियों पर मेरे होता था अक्सर वो चाँद- सा चेहरा,
छोड़ गया सहरा में तन्हां मुझको, बेसहारा चेहरा/

आतिशी होंठों की हरारत मेरे होंठों को न मिली,
हाथों से कब फिसल गया मेरा वो सलोना चेहरा/

फितरत मेरी न बन सकी कभी भी चाहत तेरी,
आँखों में बसता है अब भी वही तेरा सुहाना चेहरा/

मुहब्बत मेरी ठिठुर गई है निष्ठुर सर्द हवाओं से,
दर- ब- दर हुआ जाने कहाँ, छुप गया तेरा मासूम चेहरा/

हम भूल ही न जाएँ कहीं सूरत भी अबकी तेरी,
आ जा इक बार ही सही, दिखा जा आबी चेहरा/

झुरमुटों से लपकेंगे हाथ मेरी गर्दन की तरफ,
आखिरी पल के पहले आ जा, लिए गुलाबी चेहरा/

खुरदुरे और खोखले बरगद का सहारा लेकर मिल,
कुछ दिनों बाद मैं भी देखूँगा तेरा जर्द चेहरा/

भागते मंजरों ने जिस्म को बस आँख भर छोड़ा,
मैं भी हासिल- ए- वक़्त हो जाऊँगा, सिसकता रहेगा चेहरा/

               """"""""""""""

Saturday, September 19, 2026

अरे ना रे बाबा ना ( कविता )

अरे ना रे बाबा ना
     राजीव रत्नेश

एक तो औरत, दूजे बंगालिन,
चले न सीधी चाल, अरे ना रे बाबा ना/

उसकी मेरी न जात एक समान,
मैं हड्डी वो कवाब, अरे ना रे बाबा ना/

भाई उसका चाहे उसकी शादी मुझसे,
मैंने भी तो पहले से न किया इंकार/

वो औरत थी या जंजाल, अरे ना रे बाबा ना/

गुलाबी रंग पोते हाथों में गया उसके द्वार,
गालों पर खड़ी-खड़ी पुतवाए रंग, फेंके मुस्कान/

वो हँसिया थी या कुदाल, अरे ना रे बाबा ना/

अब न करेंगे घर पे उसके कभी शाम,
खाई है कसम, लूँगा न उसका नाम/

उसका भाई सपेरा, वो नागिन विकराल, अरे ना रे बाबा ना/

उसने मेरे इर्द-गिर्द बिछाया काँटों का जाल,
दाँत उसके, कुंदे की कर डालें चीर-फाड़/

औरत थी या बवाले- जान, अरे ना रे बाबा ना/

मेरा दावा था बलबूते ले जाऊँगा उसे उसकी ससुराल,
वो चाहे, उसके भाई से करूँ उसकी शादी की बात/

जतन करे लाख, गले न दाल, अरे ना रे बाबा ना/

मुस्तैद थी वो, मैं ही न था चालाक,
बिना शादी किए ही दिया तलाक/

एक तो पराई- जात, ऊपर से छिनाल, अरे ना रे बाबा ना//

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मर्जी के मालिक हैं अपने आप के,
नौकर किसी छिनाल के कल थे न आज हैं/

              राजीव रत्नेश
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