तेरा इंतजार भी नहीं है ( कविता)
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तेरे इंतजार में होकर तैय्यार,
बज्म में अजनबियों के बीच बैठे हैं/
आ जाओ दिल में बसाए तेरी सूरत,
बेकरार- ए- महफिल होकर बैठे हैं/
सूरते-हाल ये है, खस्ताहाल हुई तुम,
बाप का तुम्हारे अजब हाल हुआ/
सब्र की लाठी हाथों से छूट गई,
दामन तुम्हारा काँटों से भर गया/
चाहते नहीं थे, तुमसे दूर जाना,
पर प्यार में ब्रेक-अप तुमने किया/
निशाना तो हमारा पहले ही और था,
क्या तुमने कोई बड़ा तीर मारा/
तरजीह जिन्दगी पर तुम्हें दिया,
तुम जैसी पर मर- मिटने को दिल न माना/
बाप तुम्हारा चिता पे भी था जिन्दा,
पुआल की तरह धू-धू कर जला/
एक लाठी पे टिकी जिन्दगी,
आखिर कब तक साथ निभाती/
अकेले कब तक सहारा दे पाती,
कितने दिन जिन्दगी खींचती/
दो ही बार नजरे- इनायत तुम्हारी हुई,
तीसरी बार तू बन गई परजाई/
अपनी मम्मी से शायद सीखा हुनर ये तुमने,
अर्जे- दिल पर तुम ठिठकी और मुस्कराई/
हम तुम्हें अपना समझ पाए होते,
तो फिर तेरी- मेरी नई बात होती/
तुमने हमेशा तो हमें अपना ही समझा,
फिर भी लौट कर शहर में न आई/
हाले- दिल का ब्यौरा ज्यादा क्या देते,
तुम्हीं ने थी सारी जब आग लगाई/
न थी तुमसे दिल को लगावट,
न थी तुमसे कोई मेरी आशनाई/
तुम राजी थे पर चेहरे पे था यास का नक्शा,
बिना आए महफिल में कैसे पहचानी जाती/
सांस थम सी गई, धड़कने दिल की बढ़ गईं,
मेरे सामने बनी तुम एक अलबेली हरजाई/
मम्मी ने तुम्हारी क्या क्या न चाल चली,
कैसी-कैसी न की लगाई- बुझाई/
मेरी मर्जी में तो तुम कभी चल न सकी,
न याद ही तुमको कभी मेरी आई/
मैंने भी खुद से तुमको न याद किया,
ख्वाबों में तुमसे रोजो- रोज मिला/
और लड़कपन की मुहब्बत की,
बस तुमको हमेशा याद दिलाई/
मुझे तुमसे कोई लैला-मजनूं सा प्यार नहीं था,
दरकार मुझे तेरा किसी तरह इमदाद नहीं था/
तुमने मुझे धोखा दिया, तुमसे इसरार क्या करता,
तुमने तीरे- नजर दिल पे मारा, पर हुआ मैं घायल नहीं था//
राजीव रत्नेश
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किसी को मजबूर करना मेरी आदत में शुमार नहीं/
समझ लो दिल में मेरे तुम्हारे लिए कोई प्यार नहीं/
सोच-समझ कर ही बार- बार तुझसे कहता हूँ,
' रतन' को पसंद तेरा यह धंधा और रोजगार नहीं/
राजीव रत्नेश
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