Monday, October 19, 2026

दरियादिली गजल

दरियादिली ( गजल )
------ राजीव रत्नेश

मुहब्बत दरियादिली का नाम है,
कंजूस दिल वाले मात खा जाते हैं/

मुहब्बत सबकी सरपरस्त होती है,
जो न समझें घात खा जाते हैं/

जो वफा को तौलते रहते हैं, हर बात में,
वो ही अपनी सारी सौगात खा जाते हैं/

इश्क में सूद- ओ- जियाँ गिनते रहे ताउम्र,
वो खुद अपनी बिछाई बिसात खा जाते हैं/

जो रखते हैं दिल को बड़ी हिफाजत से,
वो ही दिल के सारे जज्बात खा जाते हैं/

अना की ऊँची दीवारें, जिनके दरमियाँ उठीं,
वो मिलन की हर मुलाकात खा जाते हैं/

जो वफा के पानी से रिश्ते नहीं सींचते,
सूख कर वो अपनी हयात खा जाते हैं/

रतन, दिल को कर समंदर, बाँट दे सारा प्यार,
सूखते दरिया तो अपनी जात खा जाते हैं/

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सपेरा गजल

सपेरा ( गजल )
----- राजीव रत्नेश

बस्ती में आज फिर कोई सपेरा आया है,
चाँदनी कुंडली मारे बैठी है, दिल पर कैसा साया है/

बीन की धुन पर थिरकते हैं सब ख्वाब मेरे,
नींद पर किसने कोई मंतर पढ़ाया है/

जिस्म बैठा रह गया, रूह मगर उठ कर चली,
कौन है जिसने मुझे अपना बनाया है/

साँप जैसी रात लिपटी है मेरी तन्हाइयों से,
जहर भी इस बार कुछ मीठा-- सा पाया है/

लोग कहते हैं, उतरेगा नशा सूरज के साथ,
मैंने हर सूरज को पहले ही सुलाया है/

सब दवाएँ, सब दुआएँ, सब हकीम आजमा लिए,
दर्द ने हर बार मुझको और गहराया है/

रतन, उसकी बीन का जादू उतरता ही नहीं,
खुद ही मैंने साँप को दिल में बसाया है/

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मयरवाना गजल

मयखाना    ( गजल )
------ राजीव रत्नेश

तेरा शहर परीलोक का हसीं नजराना लगता है,
हर कोई साकी तो सारा शहर मयखाना लगता है/

हर गली में शाम ढलते ही सज जाती हैं महफिलें,
हर कोई तेरे शहर का इक दीवाना लगता है/

चाँद भी छत से उतर कर रात भर रुकता है यहाँ,
रौशनी का हर दिया इक पैमाना लगता है/

हर नजर में है नशा, हर बात में इक शोखी है,
होश वाला भी यहाँ अब तो बेगाना लगता है/

खुशबुओं के बहाव से, हर राह महकी है यहाँ,
हर हवा का झोंका तेरा अफसाना लगता है/

तेरे दर पे आके हर रिन्द पाता है आशियाँ अपना,
मैकदा भी तेरे आगे मुख्तसर इक वीराना लगता है/

रतन, इस शहर में आ कर भी तू बहका जा रहा,
तू भी अब इस शहर में क्या अनजाना लगता है/

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गजलसरा रात नज्म

गजलसरा रात   ( नज्म )
        राजीव रत्नेश

दिल मेरा आज फिर धड़का था,
लहरों के शोर में
जाने कैसी बेताबी जाग उठी थी,
ऐ नाजनी!

किस्मत का ही कुछ जोर रहा होगा,
मुँह-अँधेरे तू मिली थी मुझे/
मैं समझ न पाया
तू किस गली से निकल कर आई थी/

सर्द कोहरे वाली वह रात
खुद भी कितनी बेचैन थी/
मेरे बदन पर अपना चेस्टर डाल कर
तू जाने किधर चली गई------
और मैं देखता रह गया
तेरे जाने की दिशा/

सारी रात कुछ खुशबुएँ
मेरे आस- पास ठहरी रहीं,
तेरे होने का एहसास बनकर,
मेरी साँसों में उतरती रहीं/
सुबह तक उनकी ऐसी आदत पड़ी
कि उनके बिना
कुछ अधूरा-अधूरा-- सा लगने लगा/

एक मुद्दत से मेरा दिल
कहीं ठहरता ही न था,
कोई मौसम भीतर
अपना रंग भरता ही न था/
तुझे देखा तो लगा,
मेरे दिल के सूने चमन में
अचानक बरसात हो गई/

मैंने सोचा------
क्या यही वह मुहब्बत है
जिसे दुनिया बुरा कहती है?
अगर यही है,
तो तुझे शिकायत कैसी-----
तेरे मिलने से ही
मुबारक मेरी शाम हो गई/

मैंने तुझसे कहा,
अब इतने नखरे भी क्या,
जरा मेरे करीब भी आ!
तुझसे जाने कबसे
मेरी पहचान हो गई है/

तुमने घूंघट उठा कर
मेरे सामने आना तो स्वीकार किया,
मगर तेरी झुकी नजरों ने
कितने सवाल अनसुलझे छोड़ दिए/
जमाने का डर था
या दिल की कोई मजबूरी------
मैं अब तक समझ नहीं पाया/

तेरे साथ का अफसाना,
मुकम्मल भी हो सकता था/
मगर तू प्यार में आगे बढ़ आने की
हिम्मत न जुटा पाई,
और मुझे एक अंतहीन सफर पर
जाने को मजबूर किया/
मगर तेरे जाने के बाद भी,
याद तू बेतरह आई,
और मुझे लिखने को,
यह विरह- गीत मिल गया/

अब जब कभी रात उतरती है,
और लहरों का शोर सुनाई देता है,
मैं उस गुजरी हुई मुलाकात को,
फिर अपने अंदर ही महसूस करता हूँ/

दिल मेरा आज भी धड़कता है-----
शायद उस रात के नाम से,
जो गुजरते- गुजरते गुजरी,
मगर मेरे भीतर
आज तक गजल गाती है/

( एक रहस्यमयी मुलाकात और उसकी
शेष रह गई खुशबू के नाम )

         राजीव रत्नेश
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Saturday, October 17, 2026

ऐ रूपहले चाँद कविता

ऐ रूपहले चाँद

ऐ रूपहले चाँद,
तुझे जुल्कों के बादल ने घेरा है,
यही मेरी तफसील है
कि तू आज तक बदनाम है/

मैंने सिर्फ तेरे होंठों पर, तेरी नजाकत पर
ऊँगली रखी थी,
और इसी बात का तूने बना दिया अफसाना/

ये थी मजबूरी मेरी,
सिर्फ तुझी को चाहता था
किसी और को नहीं,
क्यूँकि दिल में मुहब्बत तेरी थी
तुझी से था मेरा याराना/

बात बढ़ी तो गालों को सहलाया,
होंठों को कई-कई बार चूमा/
और बतौर साहिर
' मेरे गीत तुम्हारे हैं '
गीत और गजल तुझ पर निसार दिया/
लुधियानवी ने और कुछ पाया न पाया,
पर मैं तो तेरा दिया जख्म खा गया/

मुझे ठीक से मालूम नहीं,
मैंने तुझे पाया भी तो किस हाल में,
औरों को सुपुर्द ऐश- ट्रे किया,
मुझे ढंढ़ी कुल्फी तक न खिलाई/

यही तो अफसोस मुकद्दर से है,
साथ न तेरा-मेरा लिखा था,
आखिर छेड़ा तुमने जुदाई का तराना/

बाप तुम्हारा मरा जाता था,
चार दिन की उसे जिंदगी मिली थी,
वो भी उधार माँग कर लाया था/
मैं कुछ समझ न पाया
कैसा बनाया तुमने बहाना/

मैं जानता था उसके दिल में
उसकी विरासत में मेरा हिस्सा जरा भी न था/

बाब- कट में निखरा तेरा,
कार्तिक- पूर्णिमा के चाँद सा चेहरा,
ऐ दिलनशी! किसके सर बँधा सेहरा
वो मंजर मैने देखना न चाहा,
बस चाट खाकर तेरी शादी से लौट आया/

तेरे बाप ने डायरी निकाली,
बराती- घराती की लिस्ट बना डाली
एक लिस्ट मुझे भी दी थी
पर उसमें मेरा नाम शामिल न था,
और मेरे नाम से कार्ड भी न दिया था,
ये वो चाल थी उसकी,
जिससे कभी पाला न मेरा पड़ा था/

तुम्हें बाहों में ले पाने की तमन्ना पुरजोर थी,
इसमें सिर्फ तेरी नीयत का दखल था,
तुझी से करता था प्यार,
बस तुझी पर नजर थी/

सलामत हो घर- द्वार तेरा तुझे,
इबादत तो मेरी आदत हो गई है/
सुब्हो- शाम राधेकृष्ण न कहूँ,
तो वक्त मेरा गुजरता नहीं,
तुमसे बिछड़ कर अब तो
मेरी बिल्कुल फुर्सत हो गई है/

ख्वाब तेरा था, नींद भी तेरी थी,
बड़ी मुश्किल से कटती थी रात,
हमें नहीं आता था,
दिल दे के किसी को,
फिर उसे भुलाना/

व्याकरण तेरा क्या था,
दर्शन था कि अजूबा,
बस फलसफा यही था पुराना,
दिया था तुझे दिल नजराना/
तुम्हारी मम्मी ने मुझे बताया था,
कि तुम अहसान किसी का रखा नहीं करते/
ये बात और है,
हमने कभी तुमसे तगादा नहीं किया/

पैमाना मेरा भर कर जाम मेरे होठों से लगाया तुमने,
हर हाल में तुझे चाहा, तुझे दिल में बसाया हमने/
आ जाओ अब एक बार पास भी मेरे,
न तुम अब दूर जाओ,
मुहब्बत की चाहत से परखा है तुमको,
न तुम मुझको यूँ भूल जाओ/

याद आएगी तेरी हर महफिल में,
दिल ने सदा तुझे ही पुकारा है,
दूर से ही आकर सुन जाओ,
हाले- दिल जो हमारा है/

बरबाद हुए तुम
तो अपनों की चाहत से,
तुझे दिल में बसाया था
तो बस हम्हीं ने/

आ जाओ तो कसम से,
सारा मालिकाना तुम्हारा है,
वरना हो जाएगा हर कोई दूर,
कहीं न कोई तुम्हारा है/

हम तुमसे दूर हो के भी क्या करेंगे,
इसलिए पास तुझे बुलाया है,
नजर- ए- खास से देखा है तुम्हें
और अपना बनाया है/

न दूर अब तुम जाओ
परवाह- ए- मुहब्बत करो,
अपनी महफिल में लौट आओ/
जमाना हमेशा तुम्हारा मुद्दई रहेगा,
पास हमारे तुमको आना ही होगा/

हर कोई तुम्हारा न होगा,
कोई पीछे न चलेगा/
आगे चलने वाले कम होंगे,
कोई पीछे मुड़ के न देखेगा/

शादी तुम्हारे वालदैन ने,
कहीं और कर दी/
हर हाल ' रतन ' तो तुम्हारा है,
आ जाओ और करीब,
चाहत का यही इशारा है

    राजीव रतनेश  

ख्यालों को परवाज करूँ कैसे गजल

ख़यालों को परवाज़ करूँ कैसे,
शक्ल-ए-फ़साना करूँ कैसे।
अफ़साना तो अपना मुख़्तसर-सा है,
हर दर्द का बयान करूँ कैसे।
तेरे नैन-नक़्श का अजब उठान,
ऐसे हुस्न का बयान करूँ कैसे।
तेरी हँसी, तेरी शिकायतें भी,
यादों से उनको जुदा करूँ कैसे।
तेरी शादी में मेरा नाम न था,
उस चोट को लफ़्ज़ों में ढालूँ कैसे।
तेरी महफ़िल से चाट खाकर लौटा,
उस मंज़र को दिल से मिटाऊँ कैसे।
ज़माने के सामने हँसता रहा,
दिल का अफ़साना अयाँ करूँ कैसे।
रतन, जो गुज़री वही तो ग़ज़ल है,
उसमें तेरा नाम छुपाऊँ कैसे।

Friday, October 9, 2026

करूँ भी कैसे गजल

करूँ भी कैसे
---- राजीव रत्नेश

तुमसे दूर रहकर जीने की तमन्ना करूँ भी कैसे,
तेरे बिन रंज-ओ-गम का सामना करूँ भी कैसे/

अनजाना तेरा दर्द जबीं पर छलक आया है,
जो जख्म तुमने दिया, उसका अफसाना करूँ भी कैसे/

तेरी खोज में सुनसान सड़क पे निकल आया हूँ,
इस बेनिशाँ सफर को अब वीराना करूँ भी कैसे/

तेरी मुहब्बत को दिमाग का खलल समझूँ भी तो कैसे,
तू जान- ए- महफिल है, तुझे बेगाना करूँ भी कैसे/

हर घड़ी मुसलसल तेरी याद में ही गुजरती है,
तेरे इंतजार का अब बहाना करूँ भी तो कैसे/

तेरे रूप-रंग के मिजाज से ही आहत हूँ जरा सोचो,
अपने शेरों में जिक्र- ए- सनमखाना करूँ भी कैसे/

तेरी किस्मत मेरे मुकद्दर से जो आ मिली,
मुहब्बत को आजमाने का रास्ता करूँ भी कैसे/

खलाओं में भटकती रहेगी आखिर कब तलक,
सजा कर तुझे पेश- ए- जमाना करूँ भी कैसे/

तेरे बिना तो मैं किसी काम का भी नहीं, सोचो तो,
पेश किसी को अपना जिंदगीनामा करूँ भी कैसे/

अलकावली सुरभित जंगल में जैसे मधुमास- मंजरी,
चकित चितवत चकोरी को पेश आसमाँ करूँ भी कैसे/

बहता निर्झर, झील में पुष्पित नील- कमल,
कमल-दल पर सोती शबनम का अफसाना करूँ भी कैसे/

रतन, तेरे ही दर पे रख दिया है दिल भी अपना मैंने,
अब और किसी को अपना सहारा करूँ भी कैसे/

                   राजीव रत्नेश
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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!