तेरी घुमावदार गलियों का ( गजल )
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आजा कि तेरे- मेरे बीच दुनियादारी नहीं है/
वैसे तो मुझ पर तेरी जिम्मेदारी नहीं है/
अक्ल मेरी गुम हो गई थी जाने कहाँ,
मुझे तन्हां छोड़ जाने में तेरी समझदारी नहीं है/
दिलदार हूँ तेरा, तुझे अपनी मानता हूँ,
तेरी मेरे लिए क्या कोई जवाबदारी नहीं है?
अकेली पौध नहीं तू अपने वालिदैन की,
उनकी फसल पे मेरी कोई जमींदारी नहीं है/
कहाँ तक गिनाऊँ तेरे अहसानात मुझ पर,
कभी तो सोच, क्या लौट आने की तैय्यारी नहीं है?
किफायतशारी की आदत तेरी, बुजदिल बना देगी,
क्या मेरी पनाह में तेरी पनाहगारी नहीं है?
चाँद-सितारों के साये तले, तूने किया था पैमाने- वफा,
मुझे भुला पाने की क्या कोशिश तुम्हारी नहीं है?
अजनबियों की सूरत, मुझसे खफा- खफा रहती हो,
प्यार की राह की क्या शातिर खिलाड़ी नहीं हो?
जलजले उठेंगे, समंदर से शोले भड़क उठेंगे,
अब जिद छोड़ आ जाओ, मेरे लिए अजनबी नहीं हो/
खुद ही लौट कर आ, तुझे साहिल पुकारता है,
तेरे बाप के आगे, जरूरी मेरी हाजिरी नहीं है/
तेरी घुमावदार गलियों का मैं तो मुसाफिर,
तेरे सफर- ए- हयात में मेरी हिस्सेदारी नहीं है//
राजीव रत्नेश
