क्या मेरा पहला वादा ( नज्म )
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तुझे अपना अब बताऊँ कैसे?
दर्दे- दिल तुझे दिखाऊँ कैसे?
तू मुझसे दूर- दूर ही तो रही,
दिल में तुझे समाऊँ कैसे?
अर्जे- दिल को न समझा तूने,
मुझको अपनी गरज दिखाया तूने/
वो चोट लगाई है दिल पे तूने,
किधर जाऊँ? न बताया तूने/
समंदर की क्या गरज,
जो कश्ती डूबने से बचाए/
एक पतवार का ही सहारा है,
वो भी न कहीं छूट जाए/
तू मुझसे दूर गई है, किसी को फर्क नहीं,
गिला करने का रहा वक्त नहीं/
हम मुसाफिर ही तो थे तेरी कश्ती के,
तू ही कश्ती अपनी डुबोए तो क्या?
जुदाई में तेरी कौन सा गम न सहा,
कौन सी चोट है, जो न मैंने सहा/
तेरा तमाशा देखना भी छूट गया,
लगता है, मेरा भी हौसला न रहा/
कैसे तेरे गम को ठिकाने लगाऊँ,
तेरे आने से पतझड़ में बहार आए/
गुलजार हों फिर से उपवन,
सुबह की निकली, जो शाम को लौट आए/
समझता हूँ मुहब्बत तेरे लिए आम बात थी,
किसी को जलाना प्यार में, आम बात थी/
पतंगा जल क्षार होगा, जानती थी,
फिर भी शमअ जलाया तूने/
अब तेरे मिलने की कोई बात नहीं,
इतनी दूर गई है, जहाँ से लौटना नहीं/.
समझ्- समझ के भी न समझा तुझे,
तू मेरे पास आई क्यूँथी? तू जाने/
कभी आवारा मुसाफिर था तेरी राह का,
मयकदे में फिरता था, मारा एक जाम का/
तूने तो प्यार को कभी सहारा न दिया,
बस समझा नाकारा, दुश्मन बिना अनाज का/
गड़बड़झाला ही रहा ये प्यार तेरा,
तुझे गँवा दिया है तुझे पाने के बाद/
तू मेरी राह का पत्थर तो न थी,
कि हर कोई हटा दे, ठोकर खाने के बाद/
सहरा- सहरा, बस्ती- बस्ती तेरी याद,
किस तरह भुलाऊँ तुझे, तू ही बता/
जमुना किनारे का सन्नाटा तो अब,
बस तेरी बीती बातें ही याद दिलाता/
जानता हूँ, तू कभी लौट कर न आएगी,
न आएगी, तो दिल को और तड़पाएगी/
मजबूर न कर अब ज्यादा मुझको,
क्या अब मुझे खुद के अश्कों में नहलाएगी/
एक तरफ तो बस तू ही तू है,
एक तरफ सिर्फ तेरी याद ही याद है/
वक्त ने तेरा खुमार उतार दिया,
क्या मेरा तेरे साथ का पहला वादा याद है/
राजीव रत्नेश
