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पन्ने पलटता हूँ तो पुरानी यादें मुस्कराती हैं,
कुछ धूल जमी है उन पर, पर महक वही आती है/
जिन्दगी की इस किताब का हर अध्याय अनोखा है,
कोई रुलाता है बहुत, तो कोई जीना सिखाती है/
' रतन ' ने तो बस वही लिखा, जो जिया है उसने,
ये कोरी कल्पना नहीं, हकीकत की थाती है/
सौगात (३२ ) ( मौन का अर्थ )
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जुबां खामोश हो तो लोग उसे कमजोरी समझते हैं,
उन्हें क्या पता कि मौन में कितनी गहराइयाँ होती हैं/
शोर मचा कर तो दुनिया को जीता जा सकता है ' रतन '
पर खुद को जीतने के लिए, सन्नाटों की दुआएँ होती हैं/
हमने भी सीखी है खामोशी, मुठ्ठीगंज की उन गलियों से,
जहाँ बातों से ज्यादा, निगाहों में वफाएँ होती हैं/
सौगात (३३ ) ( नेकी की राह )
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मंजिल की चाह में, अपनों को मत पीछे छोड़ देना,
ये वो रास्ते हैं, जहाँ साथ चलने में ही शान है/
दौलत तो आएगी और जाएगी एक दिन ' रतन '
पर जो दुआएँ कमा लीं, वही असली पहचान है/
" पूजा के पतवार" ने यही सबक सिखाया है हमें,
कि डूबते को सहारा देना ही, सबसे बड़ा पुण्यदान है/
सौगात (३४ ) ( बदलते मौसम )
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धूप-छाँव तो आती-जाती रहेगी हर मोड़ पर,
तुम बस अपनी रूह के चिराग को जलाए रखना/
मौसम बदलेंगे यहाँ हर पल, हर घड़ी ' रतन '
पर अपनी सादगी के उसूलों को बचाए रखना/
जो वक्त के साथ, अपनी जड़ें भूल जाते हैं अक्सर,
वो सूखे पत्ते की तरह, हवाओं में उड़ जाया करते हैं/
सौगात (३५ ) ( कलम की पुकार )
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ये स्याही नहीं है, मेरे दिल का लहू है,
जो कागज पे बिखर कर, कविता बन जाता है/
हर अक्षर में छिपी है एक गहरी वेदना ' रतन '
जिसे कोई बिरला ही पढ़ और समझ पाता है/
' तहरीर- ए- रतन' के ये पन्ने गवाह बनेंगे एक दिन,
कि कोई था, जो शब्दों में अपनी रूह छोड़ जाता है/
सौगात ( ३६ ) ( किरदार की सादगी )
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बहुत महँगे लिबास पहने हैं यहाँ लोगों ने,
पर अंदर का इंसान, कौडियों में बिक जाता है/
हमने तो अपनी सादगी का जेवर ही पहना ' रतन '
यही वो लिबास है, जो हर मौसम में साथ निभाता है/
चमक-दमक तो बस दो दिन की चाँदनी है हुजूर,
अंत में तो बस बेदाग किरदार ही याद आता है/
सौगात (३७ ) ( . दुआओं का लंगर )
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किसी का पेट भरा हो, तो दुआ अपने आप निकलती है,
ये वो लंगर है ' रतन ', जो रूह को तृप्त कर देता है/
मंदिर की सीढियों पे बैठ के, जो सुकूं मिला हमें,
वो महलों की मखमली दीवारों में कहाँ मिलता है/
' पूजा ' की थाली में सिर्फ फूल नहीं होते ' रतन '
उसमें भूखे कीतृप्ति और बेसहारा का आसरा होता है/
सौगात (३८ ) ( यादों का मुसाफिर )
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मैं वो मुसाफिर हूँ, जो यादों के शहर में रहता है,
मुट्ठीगंज मेरा कल था, और आगरा वर्तमान है/
संगम के पानी में धोई थी जो अपनी हसरतें हमने,
आज उन्हीं लहरों की गूँज, मेरा रुहानी साज है/
जमाना कहता है कि मैं वक्त के पीछे चल रहा हूँ,
उन्हें क्या पता कि मेरा अतीत ही मेरा आगाज है/
सौगात (३९ ) ( खामोश इबादत )
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जरूरी नहीं कि हर दुआ जुबां से ही अदा हो,
कुछ इबादतें तो सिर्फ आँखों के आँसुओं में होती है/
जब दिल टूटता है, आवाज बाहर नहीं आती ' रतन '
पर उस सन्नाटे की गूंज आसमान तक पहुंचती है/
हमने भी सीखी है ये कला, वक्त के थपेड़ों से,
कि सबसे सच्ची बातचीत, अक्सर खामोशी में होती है/
सौगात (४० ) ( अधूरा सच )
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दुनिया जिसे हकीकत समझती है, वो सिर्फ एक परदा है,
असली चेहरा तो अक्सर, तन्हाई के आईने में दिखता है/
बहुत कोशिश की लोगों ने हमें आजमाने की ' रतन '
पर उन्हें क्या पता कि हमारा जमीर, कहाँ बिकता है/
चालीस सौगातें तो बस प्यार के समंदर की लहरें हैं,
गहराई में तो अभी, बहुत कुछ लिखा जाना बाकी है/
राजीव रत्नेश
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