गजल-- राजीव रत्नेश" रतन"
भूमिका:
कुछ रिश्ते जिंदगी में इस तरह शामिल होते हैं कि उनके
बिना अपना वजूद ही अधूरा लगता है/ वह एक शख्स,
जिससे हम दुख बाँटते हैं, अपने ख्वाब सुनाते हैं और
अपनी मुहब्बत का ऐलान करते हैं/ यह गजल उसी एक
सहारे का नाम है, जिसके बगैर चाँद-सितारे भी खामोश
रह जाते हैं/
गजल:
तुम न होते तो किससे हम पूरे अपने अरमान करते,
चाँद-सितारों को भला क्यों कर निगहबान करते/
दुख-दर्द अपना किससे बाँटते तुम्हारे बगैर,
मुहब्बत का तुम्हारे सिवा किससे ऐलान करते/
तन्हा सफर की रात में जब साया भी छूट जाता,
किसके भरोसे हम ये राह आसान करते/
तेरी हँसी न होती तो इस उजड़े हुए दिल को,
कौन से मौसम से हम इसे गुलिस्तान करते/
खुद से भी जो कहना था, तुझसे ही कहा हमने,
वरना किस आईने को अपना हमजबान करते/
तेरी नजर के सदके, मिली हर खुशी हमें,
वरना गम बरकरार रहता, किसे मेहरबान करते/
ऐ" रतन" इस दुनिया में कोई हमसफर न होता,
तो किसके दम पर हम खुद को इंसान करते//
शब्दार्थ:
अरमान: इच्छा, हसरत
निगहबान: रखवाला, निगरानी करने वाला
ऐलान: घोषणा, सार्वजनिक कथन
गुलिस्तान: बाग, उपवन
हमजबान: एक ही भाषा बोलने वाला, हमराज
सदके: न्यौछावर, कुर्बान
मेहरबान: कृपालू, दयालू
हमसफर: साथ चलने वाला
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