करूँ भी कैसे
---- राजीव रत्नेश
तुमसे दूर रहकर जीने की तमन्ना करूँ भी कैसे,
तेरे बिन रंज-ओ-गम का सामना करूँ भी कैसे/
अनजाना तेरा दर्द जबीं पर छलक आया है,
जो जख्म तुमने दिया, उसका अफसाना करूँ भी कैसे/
तेरी खोज में सुनसान सड़क पे निकल आया हूँ,
इस बेनिशाँ सफर को अब वीराना करूँ भी कैसे/
तेरी मुहब्बत को दिमाग का खलल समझूँ भी तो कैसे,
तू जान- ए- महफिल है, तुझे बेगाना करूँ भी कैसे/
हर घड़ी मुसलसल तेरी याद में ही गुजरती है,
तेरे इंतजार का अब बहाना करूँ भी तो कैसे/
तेरे रूप-रंग के मिजाज से ही आहत हूँ जरा सोचो,
अपने शेरों में जिक्र- ए- सनमखाना करूँ भी कैसे/
तेरी किस्मत मेरे मुकद्दर से जो आ मिली,
मुहब्बत को आजमाने का रास्ता करूँ भी कैसे/
खलाओं में भटकती रहेगी आखिर कब तलक,
सजा कर तुझे पेश- ए- जमाना करूँ भी कैसे/
तेरे बिना तो मैं किसी काम का भी नहीं, सोचो तो,
पेश किसी को अपना जिंदगीनामा करूँ भी कैसे/
अलकावली सुरभित जंगल में जैसे मधुमास- मंजरी,
चकित चितवत चकोरी को पेश आसमाँ करूँ भी कैसे/
बहता निर्झर, झील में पुष्पित नील- कमल,
कमल-दल पर सोती शबनम का अफसाना करूँ भी कैसे/
रतन, तेरे ही दर पे रख दिया है दिल भी अपना मैंने,
अब और किसी को अपना सहारा करूँ भी कैसे/
राजीव रत्नेश
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