ऐ रूपहले चाँद
ऐ रूपहले चाँद,
तुझे जुल्कों के बादल ने घेरा है,
यही मेरी तफसील है
कि तू आज तक बदनाम है/
मैंने सिर्फ तेरे होंठों पर, तेरी नजाकत पर
ऊँगली रखी थी,
और इसी बात का तूने बना दिया अफसाना/
ये थी मजबूरी मेरी,
सिर्फ तुझी को चाहता था
किसी और को नहीं,
क्यूँकि दिल में मुहब्बत तेरी थी
तुझी से था मेरा याराना/
बात बढ़ी तो गालों को सहलाया,
होंठों को कई-कई बार चूमा/
और बतौर साहिर
' मेरे गीत तुम्हारे हैं '
गीत और गजल तुझ पर निसार दिया/
लुधियानवी ने और कुछ पाया न पाया,
पर मैं तो तेरा दिया जख्म खा गया/
मुझे ठीक से मालूम नहीं,
मैंने तुझे पाया भी तो किस हाल में,
औरों को सुपुर्द ऐश- ट्रे किया,
मुझे ढंढ़ी कुल्फी तक न खिलाई/
यही तो अफसोस मुकद्दर से है,
साथ न तेरा-मेरा लिखा था,
आखिर छेड़ा तुमने जुदाई का तराना/
बाप तुम्हारा मरा जाता था,
चार दिन की उसे जिंदगी मिली थी,
वो भी उधार माँग कर लाया था/
मैं कुछ समझ न पाया
कैसा बनाया तुमने बहाना/
मैं जानता था उसके दिल में
उसकी विरासत में मेरा हिस्सा जरा भी न था/
बाब- कट में निखरा तेरा,
कार्तिक- पूर्णिमा के चाँद सा चेहरा,
ऐ दिलनशी! किसके सर बँधा सेहरा
वो मंजर मैने देखना न चाहा,
बस चाट खाकर तेरी शादी से लौट आया/
तेरे बाप ने डायरी निकाली,
बराती- घराती की लिस्ट बना डाली
एक लिस्ट मुझे भी दी थी
पर उसमें मेरा नाम शामिल न था,
और मेरे नाम से कार्ड भी न दिया था,
ये वो चाल थी उसकी,
जिससे कभी पाला न मेरा पड़ा था/
तुम्हें बाहों में ले पाने की तमन्ना पुरजोर थी,
इसमें सिर्फ तेरी नीयत का दखल था,
तुझी से करता था प्यार,
बस तुझी पर नजर थी/
सलामत हो घर- द्वार तेरा तुझे,
इबादत तो मेरी आदत हो गई है/
सुब्हो- शाम राधेकृष्ण न कहूँ,
तो वक्त मेरा गुजरता नहीं,
तुमसे बिछड़ कर अब तो
मेरी बिल्कुल फुर्सत हो गई है/
ख्वाब तेरा था, नींद भी तेरी थी,
बड़ी मुश्किल से कटती थी रात,
हमें नहीं आता था,
दिल दे के किसी को,
फिर उसे भुलाना/
व्याकरण तेरा क्या था,
दर्शन था कि अजूबा,
बस फलसफा यही था पुराना,
दिया था तुझे दिल नजराना/
तुम्हारी मम्मी ने मुझे बताया था,
कि तुम अहसान किसी का रखा नहीं करते/
ये बात और है,
हमने कभी तुमसे तगादा नहीं किया/
पैमाना मेरा भर कर जाम मेरे होठों से लगाया तुमने,
हर हाल में तुझे चाहा, तुझे दिल में बसाया हमने/
आ जाओ अब एक बार पास भी मेरे,
न तुम अब दूर जाओ,
मुहब्बत की चाहत से परखा है तुमको,
न तुम मुझको यूँ भूल जाओ/
याद आएगी तेरी हर महफिल में,
दिल ने सदा तुझे ही पुकारा है,
दूर से ही आकर सुन जाओ,
हाले- दिल जो हमारा है/
बरबाद हुए तुम
तो अपनों की चाहत से,
तुझे दिल में बसाया था
तो बस हम्हीं ने/
आ जाओ तो कसम से,
सारा मालिकाना तुम्हारा है,
वरना हो जाएगा हर कोई दूर,
कहीं न कोई तुम्हारा है/
हम तुमसे दूर हो के भी क्या करेंगे,
इसलिए पास तुझे बुलाया है,
नजर- ए- खास से देखा है तुम्हें
और अपना बनाया है/
न दूर अब तुम जाओ
परवाह- ए- मुहब्बत करो,
अपनी महफिल में लौट आओ/
जमाना हमेशा तुम्हारा मुद्दई रहेगा,
पास हमारे तुमको आना ही होगा/
हर कोई तुम्हारा न होगा,
कोई पीछे न चलेगा/
आगे चलने वाले कम होंगे,
कोई पीछे मुड़ के न देखेगा/
शादी तुम्हारे वालदैन ने,
कहीं और कर दी/
हर हाल ' रतन ' तो तुम्हारा है,
आ जाओ और करीब,
चाहत का यही इशारा है
राजीव रतनेश
