Monday, June 22, 2026

दाग तो दिल पर है ( गजल )

दाग तो दिल पर है  ( गजल )
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बच के जमाने की निगाहे- बद से आओ तो समझूँ/
आकर मेरे शरर- ए- दिल को बुझाओ तो समझूँ/

बेइंतहा दिल को तेरे प्यार की प्यास लगी है,
आकर लबों की रूह- अफजा पिलाओ तो समझूँ/

मेरे अफसाने की तू हसीं किरदार है साकी!
जरा अदा- ए- खास अपनी दिखाओ तो समझूँ/

तू हुस्ने- बेमिसाल है, पसीना भी तेरा गुलाब है,
आकर महफिल में पसीना अपना बताओ तो समझूँ/

बातें तेरी सुघढ़- सलोनी, अंदाज तेरा शायराना,
आज फिर से आशिके- दिलदार को पिलाओ तो समझूँ/

मय बहुत पुरानी हो तो पिलाना, न उसमें पानी मिलाना,
पैग पर पैग पिला कर रिन्द को बेहोश बनाओ तो समझूँ/

पास में छदाम नहीं, कुछ सोच कर आया तेरे मयखाने में,
आज तो तुम पहली बार उधार लगाओ तो समझूँ/

आ ही गए नयखाने में आज जब हजरते- वाइज,
मेरे साथ उनको भी दो घूँट पिलाओ तो समझूँ/

रंजो- गम की धूल से गुजर कर तेरे पास आया हूँ,
अंगूर के पानी से मुझे नहलाओ तो समझूँ /

सोचता हूँ कि जामे- नजर हक की छक के पिऊँ,
सुरूर मुझ पर से इस जनम का उतारो तो समझूँ/

गमे- इश्क अगर अश्कों के साथ बह निकलता है,
मेरे साथ ही गम अपना भी हल्का करो तो समझूँ/

जामे- नजर से ही, कुछ यूँ मदहोश हो गया हूँ,
होश में लाने को, जामे- लब लबरेज पिलाओ तो समझूँ/

मुफ्त की पिला-पिला के, दिल हिरासत में ले रखा है,
तुम मेरे पर से बंदिश अपनी हटाओ तो समझूँ /

दिल धड़कता है मेरा, तेरी महफिल के नाम से,
दिल मेरा अपने नर्मो- नाजुक हाथों से सहलाओ तो समझूँ/

दुनिया की नजर लगने का डर था, चेहरे को तो छुपा लेता,
दाग तो दिल पर है ' रतन ', तुम दाग छुड़ाओ तो समझूँ /

              राजीव रत्नेश
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मेरे साकी ऐसा माल दे, उम्र भर की थकान जो उतार दे/
एक बार ऐसी पिला कि उतरे न ह श्र तक, ऐसा लबरेज जाम दे//

              राजीव रत्नेश
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चेहरे का नकाब तो जमाने को धोखा दे देगा,
दिल का दाग तो हर जन्म चंदा का पता दे देगा//

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Sunday, June 21, 2026

दिल पर बस तेरा निशान है ( गजल )

दिल पर बस तेरा निशान है  ( गजल )
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तुझसे मिलने की आरजू तेरी प्यास है/
दिल को तेरी ही जुस्तजू तेरी आस है/

तेरे बगल की महक, मेरे नथुनों में समाई,
जैसे दो जहां की खुशबू मेरे आस- पास है/

कबसे निकला हूँ मैं सफर- ए- हयात में,
दिन कटता नहीं औ' शाम भी उदास है/

इक लग्जिशे- लब ने कयामत ढाई है,
शर्म से झुकी पलकें, चेहरा हुआ लाल है/

किसने कहा कि तुझ बिन परिशान हूँ,
तेरे बिना, तू जानती है, उल्झी हयात है/

खींच लाई है तू रहे- मंजिल की तरफ मुझे,
यही तो दिल को दिया तूने फरेबे- खास है/

खेतों में चरती भेड़ें झुंड में घुस चलती हैं,
डंडों से हांकते उन्हें, चरवाहों के ठाठ हैं/

नहर काट खेतों को सींचते किसान,
कड़ी धूप में अलापते राग मल्हार हैं/

आएगी तू खिंच कर मेरे पास ही,
यही तो मेरे दिल को अहसास है/

लाल रिबन से बँधी तेरी चोटी,
दिल कहता, तू हुस्ने- बेमिसाल है/

अदा तेरी कहती है, ये तो कुछ नहीं,
यही तो असली नजाकते- खास है/

तेरे हुस्न को मेरे इश्क की चाहत,
ये तेरा मुझ पर कितना बड़ा अहसान है/

जीनते- महफिल कोई है तो तू है,
तू ही मेरे धड़कते दिल की शान है/

बिना समझे-बूझे तेरा बाप भड़क गया,
देख कर तुझे मेरी बाहों के पाश में/

नहीं माना, तुझे पकड़कर आखिर ले गया,
लाख समझाया, कि योगा की यही पहचान है/

देख कर मुहब्बत, सुन कर दास्ताने- दिल,
हुआ जमाना आखिर कितना बदहवास है/

तुझे पाकर दिल को नहीं कोई मलाल है,
तू ही मेरी चाहत, मेरे दिल का अरमान है/

पत्थर दिल पे रख के तुझे पुकारा ' रतन ',
मेरे दिल पर पड़ा बस तेरा निशान है//

               राजीव रत्नेश
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Saturday, June 20, 2026

मिलेगा सरे- राह तुमसे ( गजल )

मिलेगा सरे- राह तुमसे  ( गजल)
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तेरी मुहब्बत का मुझे मुकम्मल जहां नहीं मिलता/
कभी जमीं नहीं मिलती, कभी आस्मां नहीं मिलता/

उलझ गई है कुछ यूँ तेरे- मेरे बीच मस्ती की डोर,
कभी गाँठ नहीं खुलती, कभी सिरा नहीं मिलता/

बिना किसी पचड़े में पड़े ही, फूल गया तेरा पेट,
बस कैफियत यही कि मुझे तो कोई मामला नहीं 
लगता/

ससुराल गया था तू, लौट कर खोया- खोया रहता है तू,
बात क्या है, मुझे तो यह कोई फसाना नहीं लगता/

दिल पत्थर, कलेजा मोम, नयन मेरे अश्कबार,
कहीं से तू हद्दे- दिल से मुझे चाक गरेबां नहीं लगता/

तेरा कभी कोई हाल, तेरा कभी कोई हौसला नहीं मिलता,
मुझे तो तेरी ओर से मुहब्बत का कोई संदेशा नहीं
मिलता/

चले थे हम- तुम साथ- साथ, सू- ए- मंजिल तो,
अड़ जाए हमारी राह में, मुझे तो ऐसा जमाना नहीं लगता/

चलो एक दूसरे का हाथ पकड़, हम- तुम कहीं खो जाएँ,
मुझे तो तेरे दर के सिवा, दूसरा कोई ठिकाना नहीं मिलता/

सीरत तेरी कसीदा, मैं मिजाजे- गजल तेरा हूँ तो सही,
रिदा सितारों भरा कोई दरमियां नहीं मिलता/

मिलेगा यूँ ही तुझसे सरे- राह चलते-चलते' रतन '
शामिल उसे कम से कम तुम हाजिरे- मुशायरा करना/

                    राजीव रत्नेश
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" रास्ते में चलते-चलते ही, वो दिल का हाल कह जाता है,
रतन जब चंदा से मिलता है, तो जमाना मुशायरा बन जाता है"

Thursday, June 18, 2026

ट्रेजेडी ( कविता )

           ट्रेजेडी  ( कविता  )
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मेरी जिंदगी के साथ हमेशा ये ट्रेजेडी रही,
जिससे प्यार किया, वो दूसरे के साथ भाग गई,
मेहरबां थी वो कि अपने ही खत सारे ले गई,
मेरे आँगन के मुरझाए गुलाब आँचल भर ले गई/

जमाना खिलाफ था मुहब्बत का, तो क्यूँ डर गई,
मुझसे कुछ कहा भी नहीं, और मेरा घर छोड़ गई,
मेरी तकदीर का सिकुड़ा- सिमटा सा यही अफसाना है
खुशियाँ सारी लूट ले गई, नेरे दामन में सारे गम छोड़ गई/

जिन्दा रहते हैं वही गुलाब, जो खाक से जुड़े रहते हैं,
आबो-हवा खिलाफ हो तो वो खुद सहमे- सहमे रहते हैं
मनचलों के लिए तो, खिले गुलाब भी मुर्झा जाते हैं,
याद हमारी वफा की करके, वो होठों में मुस्कराते हैं/

मौका मिला तो जी भर प्यार किया, बंद कर किवाड़,
जमाना उनका था, पर थे तो वो मेरे दिलबर ही,
दस्तक सुन, छटक कर मेरी बाहों से निकल ही गए,
कुछ भी हो, आखिर थे तो वो मेरे हमसफर भी/

लैला ने साथ छोड़ा तो, मजनूं का जनाजा धूम से निकला,
मेरे शहर की सबसे जमाल नाजनी थी, हर कोई उसका निकला,
मैं वफा- पसंद, उसकी हर इक अदा की कद्र करने वाला,
वो तभी तक मेरी थी, जब तक उसे कोई सहारा न मिला/

वो नाजुक कली गुलशन की थी, चेहरे पे बेनाम गमों के साए थे,
दर- हकीकत बात ये थी, कि मुहब्बत तो मैंने भी उसी
से की थी,
उसकी जान कर उसकी राह में फूल' रतन ' ने बिछाए थे,
मेरी रहगुजर में काबिज वो इक मील का पत्थर भी तो
थी//

                 राजीव रत्नेश
          """"""""""""""""""""

मसखरी नहीं, दरपर्दा ये हकीकत है अहले- जमाने/
यही तो दर्दे- दिल है मेरा, कोई पहचाने न पहचाने/

                राजीव रत्नेश
        """"""""""""""”""""""""""""""

" खत भी ले गई, खुशियाँ भी लूटले गई,
वो शहर की नाजनी,
मगर रतन के सीने में छोड़ गई वो शायरी
की अमर रागिनी/"

लबकुशाई जख्म की तो महसूस की हमने,
खुदारा जख्म के रिसाव का सूखना भी देखें/
चंदा ने वक्त का मरहम लगाया भी तो है,
काश! इस नासूर का वक्त से भरना भी देखें/

             राजीव रत्नेश
         """""""""""""""""""""""""

" अतीत के नासूर को चंदा की वफ़ा ने
सुखा दिया,
रतन के रिसते जख्म पर प्रेम का मरहम
लगा दिया/"

गाफिल नहीं सूझबूझ से उसके,
चंदा का सहारा मिला तो है मुझको/
कितनी यातनाएँ झेली हैं अहले- जमाने,
अब कहीं भरपूर खुशी मिली है मुझको/

               राजीव रत्नेश
          """"""""""""""""""""""""""

" जमाने की हर एक टीस को जिसने
हँस कर भुला दिया,
चंदा की पावन सूझ-बूझ ने रतन को
भरपूर जीना सिखा दिया/"

उतार देते अहसान सभी ( गजल )

उतार देते अहसान सभी  (गजल )
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मुझे याद आने वाले, किस बात का बदला चुकाए/
खुद ही किया घात मुहब्बत में, खुद फैसला सुनाए/

हमको मुहब्बत की बरबादी का मंजर नाकुबूल था,
कहाँ भटक गए हो, मंजिले- मुहब्बत के रखवाले/

देख न अभी से उस पार का मंजर, अगर हासिल सुकूं है,
कश्ती तो पहले उस पार के मुसाफिर उतार के आए/

तेरे पैकर को समझते- समझते ही उम्र तमाम हुई,
नक्श पहले अपने पहले कैनवस पर तो उतरवाए/

जमाने ने हमें नंगी तलवार पर चलने की सजा दी,
तेरी तरह राजसी तामझाम न थे, न कभी जमीं पे सोए

ये दस्तूरे- कुदरत है, गिरते पत्ते साल में इक बार,
एक जमाना बीता, मेरी आँख को आँसू गिराए/

मैं तेरे लिए इक रहगुजर ही तो सिर्फ रह गया,
सदियाँ बीतीं, तुझे इस पर बोझ अपना उतारे हुए/

मुझको दरपर्दा सुनाता रहा तू किस्सा अपना ही,
दादी, नानी के किस्से तो, बीते जमाने सुनाए हुए/

लुटा चुका हूँ अपना सब कुछ, किया तेरे प्यार के हवाले,
मुझ दरवेश के दर आए भी गर, तो अब सिर्फ दुआ ही
पाए/

तूने मेरी खाक तो पहचानी थी, खुशबू न पहचान पाई,
दिल के अरमानों की विरासत किया था तेरे हवाले/

जाना न महफिल से चंदा, तुझे दिल का आस्मां पुकारे,
तुझे पाने के वास्ते, जाने कितने तेरे गुनाह हमने छुपाए/

सब सुलझ जाएगा, सुलझ जाएँगे तेरे- मेरे अफसाने,
इक बार सब भुला कर, मिलने के मुझसे कर इरादे/

आओगे खुद पलट कर, उम्मीद' रतन ' अब भी करता है,
उतार देते अहसान सभी, जो कुछ तुमने थे मुझे गिनाए//

              राजीव रत्नेश
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Wednesday, June 17, 2026

शब को संवारने की खातिर ( गजल )

शब को संवारने की खातिर  ( गजल  )
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मुझे सिरे से नकारने वाले, तेरी याद सताए/
कर कुछ ऐसा धमाका, मेरी आँखों की नींद जाए/

बुलाता हूँ तुझे, पर आना तेरे अधिकार में रहे,
मैं किस तरह तुझे बुलाएँ, बिनआए रहा न जाए/

कहाँ गई वो महफिल, दिन के सब किस्से तमाम हुए,
दिन का' आहा', रात का' ऊहूं सिलसिले से तबाह हुए/

जब से गई हो मेरी जिंदगी से, किस्से तेरे- मेरे बर्बाद हुए,
अरसा गुजरा, अपने फलसफे में तुझे किरदार किए/

मुहब्बत का दर्द कुछ यूँ मेरी नजर से फिसला,
न चाहूँ फिर भी, दिल तेरी सौगात न भुलाए/

छोड़ दिया तुझे, न पूछा कुछ तेरी खस्ताहाली में,
हरचन्द यार तेरा, हर गाम मुझसे दुश्मनी निभाए/

ऐसी भी क्या दुश्मनी मुझसे कि और दूर जाए,
दुपट्टे को संभाले, नजर से मेरी खुद को छिपाए/

मेरी आँखों के सामने, बिजली कौंध- कौंध जाए,
ये कौन है, जो आँधियों में मेरे दिल के चिराग जलाए/

बला की गर्मी है और खामोशी तेरी यूँ इस कदर,
मुझसे तो सब्र होता नहीं, आकर तू ही मुझे समझाए/

मुहब्बत जबसे खिलाफत पे उतारू हुई, खिलाफ हुआ जमाना,
हमसे किसी ने न कहा', आओ, साथ बैठ दो पैग चढ़ाएँ'/

एहतियात बहुत किए, जतन भी मिलने को किए,
मिलने को हुई तैयार तो यार मेरे खिलाफ भड़काए/

सोहबतों के बीच हुई थी, तेरे- मेरे बीच अदावत पैदा,
अब क्या तू एक और चौकड़ी नई- नई बनाए?

जिंदगी भर के साथ का वादा तो तुझी ने किया था,
मैंने कब तेरी बात को किया दरकिनार, तू ही बताए/

पुराने गिले-शिकवे भूल, इक बार तू पलट कर आए,
कम से कम आखिरी बार तो तू मुझे फिर से आजमाए/

मीठे में तु भी जानती है कि चींटे- चीटिंया लगते हैं,
मुहब्बत हद से गुजरती है तो पहचान में न आए/

मेरे दिल पे गुजरती है तो भड़ास कागज पे उतारता हूँ,
तू कैसे वक्त अपना गुजारे, कैसे खुद को बहलाए/

जर्जर कश्ती थी, बीच भंवर में दम आखिर तोड़ गई,
पतवार हाँलाकि नई थी, आस- पास  ही थे किनारे/

लब- कुशाई तो बहुत हमने अपने जख्मे- दिल की देखी,
खुदा वो दिन भी आए, कि तू जख्म का भरना दिखाए/

जाल फेंक कर काली घटाओं में हम भी तमाशा देखें,
हमारी बाहों में चांद हो, हमसे उसका तड़पना न देखा जाए/

शब को संवारने की खातिर' रतन', तुझे तो जाना ही था,
भले ढ़लती शाम में उनको निहारना खुद ही छूट जाए/

               राजीव रत्नेश
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राजे- इश्क आशकार कर, तुमने सोचा,
मशहूर हो जाओगे सारे जमाने में/
खुद ही तुम, अपने हाथों आग लगा बैठे,
अपनी मुहब्बत के आशियाने में//

             राजीव रत्नेश
        """""""""""""""""
 
मेरी जिन्दगी में बाहर के भी तमाम अफसाने हैं,
मेरी बस्ती में जले दिलों की कई दुकाने हैं/
गम को सीने से भींच कर हम तो लगाए बैठे हैं,
पिघलती हुई शाम के बाद के, अपने सारे नजराने हैं//

               राजीव रत्नेश
         """""""""""""""""""""""""

किनारे पास थे, फिर भी भँवर ने कश्ती को डुबा दिया/
रतन ने कागज पर उतार कर, जमाने को अपना हाल सुना दिया//

Monday, June 15, 2026

रतन नहीं निशाना लगाने वाला ( गजल )

रतन नहीं निशाना लगाने वाला  ( गजल  )
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मैं कभी नहीं था, तुझे खोकर खसारा करने वाला/
फिर पाके तुझे नहीं खसारे पे खसारा करने वाला/

जख्म के दर्द ने, कुछ इस तरह झिंझोड़ा मुझको,
कि अब नहीं तुझसे, मुहब्बत का तगादा करने वाला/

वक्त के समंदर में अच्छे- अच्छे बह जाते हैं, खप जाते हैं,
जानता हूँ ये वक्त नहीं किसी का साथ निभाने वाला/

तेरा प्यार और तेरी मेहरबानियाँ, तुझे ही हों मुबारक,
मैं नहीं अब खुद से कोई तेरा इशारा समझने वाला /

नैन-नक्श तेरे कसीदा, उस पर गजल का अंदाज मेरा,
चेहरा तेरा उकेरा है रेत पर, नहीं पैरहन उकेरने वाला/

है फुसूं तेरी हर बात में, इस तिलिस्माते- दुनिया का,
मैं सुखन- ए- अदब से नहीं कोई तमाशा दिखाने वाला/

मैं इस जमाने का मीर नहीं कि लबों को तेरे पंखड़ी- ए-
गुलाब लिखूँ,
आतिशे- लब ने कितनी बार जलाया मुझे, मैं नहीं वो किस्सा सुनाने वाला/

तूने मेरे प्यार को मजाक का हासिल समझ रखा था,
तुझसे साहिल पे मिलने का, अब नहीं इरादा करने वाला/

मेरी बज्म में आए हो, कोई अन्जानी राह पकड़ कर,
दिले- खाकसार का अब, तुझे नहीं खिलौना देने वाला/

रात के ख्वाबों में ही मिलने को तुम तो चले आते हो,
मेरा अरमान, तेरी यादों के बिना ही, सबेरा करने वाला/

तू तो रात भर का मुसाफिर, सिर्फ मेरे जेहन में,
' रतन ' नहीं अँधेरों में कोई निशाना लगाने वाला/

                  राजीव रत्नेश
              """"""""""""""""""""""""

ख्वाबों के मुसाफिर को, अब सुबह का सलाम है/
रतन के दिल में अब सिर्फ खुद्दारी का अहसास है//

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!