Wednesday, June 3, 2026

हर हाल देगा रतन साथ तेरा ( गजल)

हर हाल देगा रतन साथ तेरा   ( गजल)
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सौष्ठव काया का तेरे, मन मोह लेता है मेरा/
चपल चितवन तेरी, उमगता है दिल मेरा/

बड़े नाज से तेरे माता- पिता ने तुझे पाला,
बनारस की लोहट्टी की गली में रहा ठिकाना तेरा/

मन जब कभी उद्देलित हुआ, तब गए संकटमोचन,
हनुमत्- दर्शन के बाद खाया, चढ़ाया प्रसाद तेरा/

मोहब्बत जब मेहरबां होती है, रंजो- गम हर लेती है,
कड़ी धूप में रास्ते की, ओढ़नी का करना सायबां तेरा/

सुब्ह- सबेरे अक्सर दशाश्वमेध घाट जा नहाना तेरा,
गंगा मैया को कर प्रणाम, फूल और दूध चढ़ाना तेरा/

शुभ्र, धवल, झीनी साड़ी में तू, और कोयल कमनीय लगती है,
अपलक देखता हूँ जब तुझे, ललचा उठता है दिल मेरा/

मैं तो लूँगा तेरे जबीं का बोसा, भले बरजे तेरी अम्मा,
दूर अपने से तुझे होने न दूँगा, निहारूँगा तुझे शाम हो या सबेरा/

बिना भीड़ के, सुनसान से घाट पर तू दीप मनौती का जलाती,
शाम जब पूरी तरह घिर जाती, दर्शन देती सबको मैया
दुर्गा/

कभी नाव से हम- तुम साथ गंगा पार जाते,
बड़ी खुशी से नाव खेते तेरे केवट भैय्या/

मधुर मोहनी सूरत तेरी, इठलाती-बलखाती तेरी चाल,
रूप तेरा सुंदर सजीला, सावन में लगता जैसे मेला/

रातों के अँधियारे में, जुल्फों को तेरी, उलट-पुलट देता मैं,
सुब्ह एक मादक अंगड़ाई के साथ, छोड़ना बिस्तर तेरा/

मुझे दीवाना कर देती है, ऐसी-ऐसी तेरी भाव-भंगिमाए,
बाँध लेतीं मुझे, अल्हड़ जवानी की वो तेरी गदराई
बाहें/

जब- जब तू नहा कर, शीशे के सामने करती अपना
श्रिंगार,
खिड़की से आती सूर्य-रश्मि, करती स्वागत- गान तेरा/

प्यार की राहों की तू माहिर खिलाड़ी, खेल भी ले इक
बार,
बिना कंधी के सँवार दूँ खुद जुल्फे- मुअम्बर तेरा/

हम तुम मुसाफिर प्यार की नगरी के, चलें साथ- साथ,
दिल में लेकर नई उमंग, दर्शन करें गंगा के घाट सारे/

फिर-फिर आएँगे साथ, बुलाएँगे जब बाबा विश्वनाथ,
लेकर विश्वनाथ गली से सुहाग के सामान, सर टेकना दुबारा/

चलेंगे तुम्हारी यूनिवर्सिटी, जहाँ गुजारे अपने चार साल,
घूम लेंगे लंका, बैठ कर कहीं खाएँगे आमलेट, पिएँगे
कोका-कोला/

चले- चलेंगे, जब कह दोगी, साथ मेरे जाना बाजार,
अपनी पसंद से लेना सामान, हर हाल देगा" रतन" साथ तेरा//

               राजीव रत्नेश
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आइने में देख-देख कर, खुद ही न तुम शरमाओ/
ताब ला न सकेगा आईना, उस पर रहम खाओ//

                 राजीव रत्नेश
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गंगा की लहरें और बाबा विश्वनाथ का साया है
रतन ने चंदा के रूप में बनारस का हर रस पाया है

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गगन का चाँद तो बस दूर से ही मुस्कराता है
रतन का चाँद तो पहलू में बैठ हालेदिल सुनाता है

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मिन्नत की कोई गुंजाइश नहीं इस पावन रिश्ते में
चंदा ने रतन को पा लिया है खुदा के फरिश्ते में

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दिल का धड़कना कहीं रस्मे- पहर तो नहीं
राहते हैं एहसासे- दरियादिली से आज भी
मैंने मिलान किया आस्मां के चंदा का
चंदा को जी भर अपने पहलू में बिठा कर

          राजीव रत्नेश
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नीली जमुना मुझे और क्या देगी
प्रेम के निश्छल निमंत्रण के सिवा
उसको तो बस रतन की आरजू है
सब कुछ करती है वह मिन्नत के सिवा

              राजीव रलेश
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रतन को अपने हक पर पूरी तसल्ली है
वह ही मेरी हमसफर मेरी सारी जिन्दगी है
ऐसा भी नहीं है कहीं कि उसकी चाहत बदले
प्यार को खुदा मानता हूँ, वही मेरी बंदगी है

                   राजीव रत्नेश
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Tuesday, June 2, 2026

रतन को दिलकश लगी थीं ( गजल)


रतन को दिलकश लगी थीं  ( गजल )
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मुझे खटकती रहती हैं शहर की जगमगाहटें/
याद आती हैं गाँव की पगडंडियाँ और चौबारे/

लहलहाती खेतियाँ गन्ने, मक्के और बाजरे की,
कुएँ की जगत पर बैठे, रहट उलीचते पानी के धारे/

सुबह-सबेरे भींगे चने के साथ वो ताड़ी की सुड़कनें,
मुझे याद आते चंदा! रात में सितारों के रंगीं रशारे/

तुम यूँ न समझना कि कायनात अँधेरों की पसंद मुझे,
मैं तो बस समझता हूँ , चंदा की शीतल चाँदनी के नजारे/

मैंने की न कभी सीनाजोरी, न दुश्मनी किसी से निबाही,
मुझे मिला भरपूर तेरा साथ, हुए जिंदगी के सहारे/

सरयू की शीतल शांत रेती और तेरी बाहों का सहारा,
और कुछ मुझे न चाहिए, सिवा तेरी मुहब्बत के सहारे/

मंजर वो रात का, थक के हमारा मचान पर ही सो जाना,
उठ जाते थे नींद से, सुन खेतिहरों की दुलारी बातें/

सुबह उठते ही घर को चल देना और नहा-धोकर,
आराम से नाश्ता करना और छक के टकराते पैमाने/

दिन में अपने बगीचे में जाकर फालसा और जामुन खाना,
मरी बाल्टी से आम चूसते हुए, तेरी भीनी मुस्कराहटें/

शहर की ओर तब मुड़े, जब घर से बुलावा आ गया,
" रतन" को दिलकश लगी थीं, वो चाँदनी में तेरी बातें/

                     राजीव रत्नेश
              """""""""""""""""""""""""'''"
शहर की रोशनियों में तो बस समझौते पलते हैं/
रतन और चंदा के अरमान तो आज भी मचान पर जलते हैं//

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सरगोश फिजां के सारे नजारे तेरे ( गजल)

सरगोश फिजां के सारे नजारे तेरे  ( गजल)
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आई थी गुल्शन से तेरी खुशबू मुझे पुकारने/
आँचल में थे तेरे, मेरे लिए सैकड़ों अफसाने/

मेरी आरजुओं की फेहरिस्त कोई लंबी न थी,
चाहे थे चंद प्यार भरे अल्फाज, चंद मुस्कराहटें/

आँखों में शबनम की लड़ी, दिल में प्यार का सागर,
तुझसे चंद मुलाकातों में दिल सुनाने लगा नगमें/

जनम-जनम का साथ था, शायद हमारा तुम्हारा,
तुम मुझे मिले थे, आँखों के कोरों में भरकर इशारे/

तमन्ना भी तेरी नथ डोलती रहे यूँ ही हमेशा-हमेशा,
अँधेरी काली रातों में चमकते रहें उसके नगीने/

हम तेरी मुहब्बत का, जानते हैं, पार पा न पाएँगे,
तेरे दिल में सैकड़ों अफसाने, मेरे बस चंद इरादे/

लहरों से नैया हिचकोले खाए, बिन साथ तुम्हारे,
तुम्हीं नाखुदा हो, तुम्हीं खिवैय्या, कश्ती तेरे हवाले/

आना हो तो आ जाना , चप्पू सँभालते- सँभालते भी,
हम तेरे इंतजार में पलकें बिछाए, तुझे ही पुकारें/

जीवन के सफर में मिले हो हमसफर बन कर,
सुन चंदा! हर तरफ तेरी चाँदनी, सितारों के सहारे/

" रतन" की आरजू है, हम तुम बस गलबहियां मिलें,
बाकी बचे सरगोश फिजां के ये सारे नजारे तेरे//

            राजीव रत्नेश
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इतना लचीलापन छिपा तेरी इक-इक अदा में है,
कि तरन्नुम में तुझे ढ़ाल सकता हूँ/
तू मेरी बाहों के घेरे में आजा बस इक बार ही,
बेसब्री में मैं चूम तेरा गाल सकता हूँ//

           राजीव रत्नेश
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नैया भी उसकी, समंदर भी उसका,
पतवार भी उसके हवाले/
रतन तो बस खो गया है आज,
चंदा की चांदनी के उजाले//

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Monday, June 1, 2026

राह की मेरी वह रुकावट न था ( गजल)

राह की मेरी वह रुकावट न था  ( गजल)
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देखा उसे, प्यार हुआ, रोजो- रोज उसका इंतजार होने लगा/
जो कल होना था, वही कहीं आज तो नहीं होने लगा/

करीब से करीब आने की कोशिशें होने लगीं,
बेसाख्ता वो दिन- ब- दिन मुझ पर मेहरबां होने लगा/

कभी उससे कहा नहीं मैंने कि उस पर मरता हूँ,
खामख्वाह वो मुझ पर मरने का दावा करने लगा/

मैं क्या कहता, चुप सी लगा रखी थी मैंने भी,
कायनात भर में मुझे उससे बढ़कर कहाँ था मिलने वाला/

कुछ दिनों का मेरा मौन उस पर भारी पड़ गया,
वह रोज ही मुझसे मिलने को बहाने ढूढ़ने लगा/

कितने कितआत उसे नजर में भरकर मैंने लिखे,
दिन पर दिन वो मेरी गजलों का उजाला होने लगा/

वो मेरी खामियों को भी जानबूझ कर हुनर बताने लगा,
बागों में प्यार के झूले पर दम भर पेंग बढ़ाने लगा/

मैं नहीं चाहता था कि प्यार अभी इस कदर परवान चढ़े,
माँग उसकी सिन्दूरी किए बिना, आगे बढ़ने में घबराने
लगा/

. दूर से घंटियाँ बोलने लगीं गाँव के शिवाले की,
पंडे जोशो-खरोश से भाँग घोटने की तैयारी करने लगे/

नहीं चाहता था कि अभी से वो मेरा नाम लेकर पुकारे,
चार दिन बाद ही उसकी माँग सजाने की सोचने लगा/

आगाज तो हमने मुहब्बत का कर ही दिया था अपनी जबानी,
अब वो हथेलियों से मुँह ढाँप खिलिखिलाने लगा/

अब डोली लेकर उसे विदा कराने कब आऊँ, पूछा उससे,
उसका जवाब पाने को उसके आगे-पीछे चक्कर लगाने लगा/

मैं समझा कि पहले मुझे वो मेरे बच्चों का बाप बनाने
पे उतारू है,
फिर बाद में अग्नि के सात फेरों में बंधने का इरादा
समझ आने लगा/

समझने को तो मैं समझता था चालाकियाँ उसकी,
वह रोज हुनर- दर- हुनर, खुद-ब-खुद मुझे आजमाने
लगा/

साफ-साफ मैंने उससे कह ही दिया इक दिन,
बिना मुहिम पूरा किए, मैं किसी फंदे में आने से रहा/

जब भी मिलता वो मुझसे अब काम काम से ही,
मेरे साथ हमेशा रहा, मेरे अभियान से वो जुड़ा हुआ/

आज उसको देखता हूँ कि ठुकरा के उसे गलत किया
मैंने,
वह तो मेरी चाहतों की चाहत था, मेरे अरमानों से जुड़ा हुआ/

ये दिलफरेब रास्ते कब तक मुझे फरेब आखिर देते,
उसके और अपने घरवालों से बात कर, उस अपना बना लिया/

मेरा अभियान तो पूरा हुआ, पर अस्ल तो अधूरा ही रहा,
उसे पूरा करने को मैंने आगे बढ़ने का इरादा किया/

जिसकी आँखों में नीली जमुना तिरती थी,
उसी जमुना में डुबकी लगाने को आमादा हुआ/.

मैंने उससे प्यार किया था, अनजाने झुठला बैठा था,
वह तो मेरी साँसों की साँस था, उससे कैसे जुदा रहा/

घर- बार सब कुर्बान करने की बारी मेरी थी,
वह तो कभी का सब छोड़ कर था निकला हुआ/

" रतन" की वह कमजोरी कभी न रहा, मजबूरी भी न
हुआ,
जिया उसकी फैली थी खलाओं के पार तक, राह की
मेरी वह रुकावट न था//

                   राजीव रत्नेश
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मुहिम देश की पूरी हुई तो लौट आए वतन की ओर
रतन का असल अभियान तो बँधना था चंदा की डोर/

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Sunday, May 31, 2026

लिखने लगे हैं फिर से रतन ( गजल)

लिखने लगे हैं फिर से रतन  ( गजल)
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फिर से जवां हो गईं, मुहब्बत की निशानियाँ/
भुला दीं जब हमने रंजो- गम की सारी परेशानियां/

दस्तूरे- मुहब्बत निभा भी दिया, उनको बुला भी लिया,
रक्स करने लगीं फिर से दिल में अंगड़ाइयाँ/

फिर से घटाओं को बुलाओ, गड़गड़ाहटें सुनो,
भींग जाए बदन, भींग जाएँ गोरियों की चोलियाँ/

मिलना सखियों से जब तो शर्माना किस बात का,
दिखाओ सुर्ख रुख्सार उन्हें, बताओ प्यार की निशानियाँ/

कोरे कागद पे लिख दो कोई तो सलाम पी के नाम,
इस भरी पूरी बारिश ने खोले सारे राजे- मस्तानियाँ/

हम तो संभल कर ही राहे- मुहब्बत में आगे बढ़े थे,
किधर से आईं, छा गईं किस्मत पे काली बदलियाँ/

मौसम से कोई वादा- तगादा, हमने तो न किया,
आई कहाँ से याद उसको हमारी निगहबानियाँ/

लिखते-लिखते भी फलसफा क्या अधूरा रह जाएगा,
हमारे हरम की यादें और बुतों की तीमारदारियाँ/

हम नहीं चाहते राजे- मुहब्बत हमेशा राज ही रहे,
औराक खोल दिए मकतबे- इश्क के, झेले फिकरे- 
फब्तियाँ/

होंगे एक दिन बेकार के अहसासे- गैरत जमाने के जुदा,
बढ़ जाएँगी जब हद से तेरी मुहब्बत की सरगोशियाँ/

फिर से दिखाओ, फिर से सुनाओ मुहब्बत की कहानियाँ,
लिखने लगे हैं फिर से ' रतन' गजल और रुबाइयाँ//

                 राजीव रत्नेश
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वक्त थमता रहेगा, जमाना सुनता रहेगा,
रतन जब तक तेरे नाम की रुबाइयाँ बुनता रहेगा//

मुझे नहीं लगता ( गजल)

मुझे नहीं लगता  ( गजल)
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जाने क्यूँ संशय है, वफा की राह में दूर तलक साथ 
निभाओगी मेरा/
कभी- कभी लगता मुझे, बीच सफर से लौट जाओगी
छोड़ मुझे अकेला/

हम- तुम फ्लैट में ही अबकी कुछ ज्यादा दिन ही रह
लिए,
चलो खुली हवा में घूम आएँ, बुलाता हमें जमुना का
किनारा/

हाथों में थामे पापकार्न, चलो घूम आएँ नदिया के उस
पार,
सैर कराने को नाव से अपने, रोज हमें बुलाता मछुआरा/

रहे शहर की आबादियों में खासे दिन धरना दिए हुए
हम,
चलो अबकी गर्मियों में घूम आएँ फिर बलिया का शहीद पार्क/

याद दिलाते अपने गाँव का घर, खण्डहर वीरानियों
के,
करें आबाद फिर मयकदा, पिएँ फिर से मठ्ठा और
खाएँ भुना बाजरा/

हाथों में हाथ थामे, घूमें रोज सरयू नदी के किनारे हम
दोनों,
लौटते में ले आएँ साथ अपने ककड़ी, खीरा और
हिनमाना/

मुँह अँधेरे हम नहाने जाएँ, बिना घाट की कलकल बहती सरयू मइय्या,
तट पर ही कपड़े बदलें, गहरे में न जा किनारे ही हम
नहाएं/

आकर रसोई में तुम मछली तलना और भर-भर गिलास देना ताड़ी,
हम तुम साथ- साथ खाएँ पिएँ, बाहों में बाहें डाल कर
बेसुध सोएँ/

जागने के पहले हमारे, रख जाएगा हमारे बगीचे का
रखवाला,
हमारे लिए रसीले- सुनहरे आम और पके जामुन
कजरारे/

जब तक घर से बुलावा नआए, मस्त रहें और मस्ती में
घूमें,
जाने को हो शहर तो ऐसे जाएँ, जैसे कुछ भी न हो
हमारा/

तेरा प्यार खुल्लम खुल्ला देता है मेरे डूबते दिल को
दिलासा,
तेरे भीनी सुगंध वाले गेसुओं की कैद से रिहाई का नहीं मेरा इरादा/

यूँ भी तेरी आँखों में बिलकती नीली जमुना देती मुझे
सहारा,
मुझे नहीं लगता' रतन', टूटेगा कभी बंधन, जिसमें तूने
मुझे बाँधा//

                  राजीव रत्नेश
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सरयू की कलकल में आज फिर वो पुराना तराना है,
चंदा ने कह दिया रतन से," ये बंधन तो सदियों पुराना है/


Thursday, May 28, 2026

बुलाना और मनाना ( कता )

बुलाना और मनाना तो चलता ही रहेगा,
तुम मेरी अंतहीन सफर की हमसफर हो,
तुझे किस बात की कमी, जो' रतन' तुम्हारा है,
सवालों के घेरे में भले जिन्दगी बसर हो/

          राजीव रत्नेश

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!