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-------- राजीव रत्नेश
खुशी ज्यादा लेकिन गम भी थोड़ा दिल में है,
उतर जाएगा ये नशा भी तेरा सबेरा होने तक/
बस आस में दिल आज भी मेरा धड़क रहा है,
ये खुशी की रात भी ढल जाएगी सबेरा होने तक/
तेरे आने की महफिल में घड़ियाँ बस अब थोड़ी हैं,
हर मुश्किल आसान हो जाएगी सबेरा होने तक/
नया सबेरा आएगा, खुशियाँ तमाम लेकर आएगा,
हर तूफान का निशान मिट जाएगा सबेरा होन तक/
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मुहब्बत की तस्करी करते हमसे न बना,
आ गई थी तबीयत उसपे, इंकार करते हमसे न बना/
जज्ब हो गए दिल में ही दिल के अरमाँ,
आग लगी थी दिल में मेरे, उससे बुझए न बना/
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दिल में बाकी सभी अरमान सारे क सारे यूँ ही,
हम दिलाते रहेंगे याद सदा पुराने वादे यूँ ही/
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अजनबी होकर भी वो पुकारते ही रह गए,
बेताब हम भी थे, मगर जाते-जाते ही रह गए/
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इंतरवाब कर ले मुझसे, छेड़ मुहब्बत भरा नगमा,
पेश कर जाम- ए- लब एक बार सुबह, शाम को दुबारा/
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दिल में जगह दी, अपना समझा, तेरा बारंबार शुक्रिया,
आके मेरी पलकों पे बैठ जा मेरे साकी तेरा शुक्रिया/
अजनबी शहर में अनजान सभी से तू होजा शामिल- ए- जिंदगी,
साँस से साँस मिल जाए, आजा बाहों में तेरा शुक्रिया/
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मय- ए- निगाह ही पिलाती रहेगी या कुछ आगे भी बढ़ेगी,
थाम के दामन मेरा, कोई मुझसे सवाल भी करेगी/
जमाना बने मुद्दई, इसके पहले मेरी हमकदम बन जा,
फिर न मिलेगा मौका, रुबरू मेरे अपनी सूरत कर जा/
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तूने नजर मिलाई इस तरह, दिल तुझ पर फिदा हो गया,
आ गए जो आगोश में, मुहब्बत का हक पूरा अदा हो गया/
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तीखे हैं नयन- तीर उसके, बसे हैं दिल में वो मेरे,
दिल से करता याद उसे, कब आएँगे पास वो मेरे
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बन के कजा आज ये बहार आई है,
लगता है मेरी मौत का सामान लाई है/
हम तो खामोश ही रहे उल्फत में,
वो है कि राज- ए- इश्क जुबाँ पर लाई है/
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तुम प्यार से खिलाओ तो क्या न खा लूँ,
दवा ही तो है, तुम्हारे हाथों जहर भी खा लूँ/
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मैं मदहोश हुआ तो कैसे,
देखा तो तेरे लब थे मेरे लबों पर/
होश जो आया तो पाया,
तू झुकी हुई थी मेरी पलकों पर/
हर साल सबको जन्म- दिन की मुबारकबाद भेजता रहा,
पर किसी ने आज तक न भेजा, लाल कागज में लिपटा पीला गुलाब/
डाक- विभाग अभी बंद न हुआ, आजकल कोरियर का रिवाज,
कीमत चुका न सका, ब्लैक में मिल रहा था नाज़नीन का गुलाब/
इंतजार में खाक कर दी अपनी दुनिया, कोई फरिश्ता बन कर न आया,
समंदर से नायाब रत्न निकले पर विश्वमोहिनी को हर ले गया छलिया/
गुलाब का आदान-प्रदान होता खूब वैलेन्टाइन-डे पर,
एक फूल भी भेजते न बना किसी से मुझे ' शिक्षक- दिवस ' पर/
न चाहिए कलम, न चाहिए तलवार, न अब कोई बहार ही,
मेरे दिल में तो अटका बस तेरा वैलेन्टाइन-डे का व्यापार/
तुझे इतर- ए- गुलाब कहूँ या गुलदस्ता, भीनी खुशबू से मुअत्तर बदन,
एक बार पेश- ए- नजर हो जाए, गुलाबों भरा जो गुलदस्ता/
अब न पहले सी बहार रही, वो रौनक न रही किसी त्यौहार में,
हर बार की तरह अबकी बरस भी करता रहा इंतजार कासिद का/
शादियाँ हो जाती हैं, विदाइयाँ तक हो जाया करती हैं,
निमंत्रण-पत्र भी मिल जाते हैं, पर अब चिठ्ठियाँ नहीं आतीं/
अब तो बस मोबाइल से ही फूल झड़ा करते हैं,
चमेली, बेला और जूही की खुशबू बात से ही आ जाती है/
इसके पहले कोई मेरे मोबाइल को नजर लगाए,
' रतन ' उन्हें एडवान्स में दुआ- ए- नववर्ष देते हैं//
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