Sunday, November 8, 2026
फिर बाज़ार में
Saturday, November 7, 2026
दीवाली आई है
Friday, November 6, 2026
फ़र्ज़-ए-मयकदा
तेरे बाद ही ख़ुदा का ख़याल
नशा नहीं होता गजल
तेरे रुख्सार पर झूलता काकुल गजल
तेरे रुख़सार पर झूलता काकुल
ग़ज़ल: राजीव रत्नेश "रतन"
भूमिका
यह ग़ज़ल यादों के संदूक से निकले सवालों की एक लड़ी है — रुख़सार पर झूलता काकुल, राह का पुराना शजर, घूँघट की शर्म, नाम की सुपारी देने वाली शोख़ी, होंठों की बेताबी, खंडहर, बवंडर और रक़ीब। हर शेर एक खोई हुई चीज़ के पीछे खड़ा है और अंत में लौटता है उसी मीठे तंज़ पर: "क्या हुआ?" हँसी, ताने और कसक तीनों इसी एक सवाल में घुले हैं।
रदीफ़ "क्या हुआ" है और क़ाफ़िया "-अर" (अंबर, शजर, डर, बिस्तर, ख़बर, दर-ब-दर, खंडहर, बवंडर, बराबर, समर, समंदर) है। मक़्ते में शायर "रतन" कहता है कि नाकामियों से उसे कोई गिला नहीं, क्योंकि उसके दिल में तो समंदर लहराता है।
ग़ज़ल
मतला
तेरे रुख़सार पर झूलता वो काकुल-ए-अंबर क्या हुआ,
तेरी राह का वो पुराना आख़िर शजर क्या हुआ।
२.
तुम्हारे सर का घूँघट सरक आया दोश पर,
बेख़ता न थे तुम, कहो, शर्म-ओ-हया का वो डर क्या हुआ।
३.
सौंपा था जिसे तुमने, मेरे नाम की सुपारी देकर,
कहाँ गया वो, उसका बोरिया-बिस्तर क्या हुआ।
४.
चूमने को बेताब रहा करती थीं तुम मेरे होठों को,
दो दिन में हो जाओगी पराई, वो ख़बर क्या हुआ।
५.
थे न हम तुम्हारी नसीहतों के जो बिल्कुल क़ाबिल,
अरमान-ए-दिल, बेदख़ल होकर, दर-ब-दर क्या हुआ।
६.
घास चरा करते थे जिसकी बाउंड्री में चौपाये,
आज शहर का वो पुराना खंडहर क्या हुआ।
७.
कश्ती बाँध रखी थी मैंने तो समंदर के साहिल से,
आने वाला था जो आख़िर वो बवंडर क्या हुआ।
८.
आए हो मेरी बस्ती में बिन बुलाए, बिन बताए,
रक़ीब के मुँह पर तमाचा बराबर क्या हुआ।
९.
तुम्हारी आँखों से अश्क दम-ब-ख़ुद लुढ़के,
गिरा जो आके तुम्हारी गोद में, वो समर क्या हुआ।
मक़्ता
"रतन" को ज़िंदगी की नाकामियों से नहीं कोई गिला,
जब दिल में लहराता है उसके समंदर क्या हुआ।
शब्दार्थ
- रुख़सार: गाल, चेहरा
- काकुल: लंबी लट, झूलती ज़ुल्फ
- अंबर: सुगंधित पदार्थ; काली, ख़ुशबूदार लटों की उपमा
- शजर: पेड़, वृक्ष
- घूँघट: सिर पर ओढ़ने का पल्लू
- दोश: कंधा
- बेख़ता: बिना अपराध का, निर्दोष
- शर्म-ओ-हया: लाज, संकोच
- सुपारी: किसी का काम तमाम करने का ठेका (हास्य में)
- बोरिया-बिस्तर: सामान, गृहस्थी का पूरा लवाज़मा
- बेताब: अधीर, बेचैन
- पराई: सींव से दूसरे का हो जाने वाली
- नसीहत: सीख, सलाह
- क़ाबिल: योग्य
- अरमान: अधूरी इच्छा
- बेदख़ल: अधिकार से बाहर, निकाला हुआ
- दर-ब-दर: हर द्वार पर भटकता हुआ
- चौपाये: गाय-भैंस जैसे चार पैरों वाले पशु
- खंडहर: उजड़ी हुई इमारत
- साहिल: तट, किनारा
- बवंडर: तेज़ गोल आँधी
- रक़ीब: प्रतिद्वंद्वी, प्रेम में साथी-दावेदार
- तमाचा: थप्पड़
- अश्क: आँसू
- दम-ब-ख़ुद: हक्का-बक्का, स्तब्ध
- समर: फल
- नाकामियाँ: असफलताएँ
- गिला: शिकायत
- समंदर: सागर
- मतला: ग़ज़ल का पहला शेर, जिसके दोनों मिसरों में क़ाफ़िया-रदीफ़ आता है
- मक़्ता: ग़ज़ल का अंतिम शेर, जिसमें शायर का तख़ल्लुस आता है
- क़ाफ़िया: तुक वाले शब्द
- रदीफ़: हर शेर के अंत में दोहराया जाने वाला पद
- तख़ल्लुस: शायर का उपनाम
साकी के पिलाने में गजल
साक़ी के पिलाने में
ग़ज़ल: राजीव रत्नेश "रतन"
भूमिका
यह ग़ज़ल हल्की शोख़ी और मीठी शिकायत का मिला-जुला रंग लिए हुए है। शायर कहता है कि साक़ी के हाथ के नशे का कोई दूसरा नहीं, और महबूब के नाज़-ओ-अंदाज़ तो उसकी कमज़ोर अक्ल के परे हैं। अटैची रख कर स्टेशन तक पहुँचने वाले नख़रे भी, अंत में, बस नख़रे ही रह जाते हैं। हर शेर का अंत इसी सवालिया लहजे पर होता है: "कहाँ होता है"।
रदीफ़ "कहाँ होता है" है और क़ाफ़िया "-आना" (पैमाना, मस्ताना, खाना, जाना, समझाना, दीवाना, बहाना, ठिकाना, लगाना, आना) है। मक़्ते में शायर "रतन" अपने साक़ी के मयख़ाने से बाहर किसी और दर पर न जाने की बात करता है।
ग़ज़ल
मतला
साक़ी के पिलाने में दम-ब-ख़ुद कर दे जो, वो पैमाना कहाँ होता है,
किसी और के पिलाने में वैसा मस्ताना कहाँ होता है।
२.
नाज़-ओ-अंदाज़ उनके समझ में बिल्कुल आते नहीं,
बिना बात जीने-मरने की क़सम खाना कहाँ होता है।
३.
नख़रे तेरे बाहर-ए-बयान हैं, मेरी कमज़ोर अक्ल से,
अटैची रख, स्टेशन पहुँच, फिर भी उनका जाना कहाँ होता है।
४.
दिल को लाख समझाया उनसे बचकर रहने को,
इश्क़ में दिल का समझाना कहाँ होता है।
५.
उनकी हर अदा पर मरना कोई नई बात नहीं,
उन पर मर मिटने वाला, हम-सा दीवाना कहाँ होता है।
६.
रूठना और मान जाना बस उनकी इक अदा है,
वरना उनके पास कोई और बहाना कहाँ होता है।
७.
सारी दुनिया घूम आए हम, पर तेरे दर के सिवा,
अपना कोई और ठिकाना कहाँ होता है।
८.
लुटा दिया इक नज़र पर हमने सारा ख़ज़ाना,
इश्क़ में नफ़ा-नुक़सान का हिसाब लगाना कहाँ होता है।
मक़्ता
साक़ी, तेरे मयख़ाने के बाद ऐ "रतन", किसी और दर पर,
मेरा और किसी महफ़िल में आना कहाँ होता है।
शब्दार्थ
- साक़ी: महफ़िल में शराब पिलाने वाला/वाली
- दम-ब-ख़ुद: हक्का-बक्का, स्तब्ध
- पैमाना: शराब का प्याला
- मस्ताना: मस्ती से भरा, नशीला
- नाज़-ओ-अंदाज़: नख़रे और अदाएँ
- क़सम: शपथ
- नख़रे: नाज़-नख़रा, अदाओं का दिखावा
- बाहर-ए-बयान: बयान से परे, वर्णन से बाहर
- अक्ल: बुद्धि, समझ
- अटैची: सूटकेस, यात्रा का बक्सा
- अदा: नाज़-ओ-अंदाज़
- ठिकाना: अड्डा, आश्रय
- ख़ज़ाना: कोष, भंडार
- नफ़ा-नुक़सान: लाभ और हानि
- मयख़ाना: शराबख़ाना
- महफ़िल: सभा, जमघट
- मतला: ग़ज़ल का पहला शेर, जिसके दोनों मिसरों में क़ाफ़िया-रदीफ़ आता है
- मक़्ता: ग़ज़ल का अंतिम शेर, जिसमें शायर का तख़ल्लुस आता है
- क़ाफ़िया: तुक वाले शब्द
- रदीफ़: हर शेर के अंत में दोहराया जाने वाला पद
- तख़ल्लुस: शायर का उपनाम
