तेरी नजरों का निशाना ( गजल )
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महरुमे- वफा हूँ, वफा चाहता हूँ/
क्या कह रहा हूँ, ये क्या. चाहता हूँ/
रैन-बसेरा ढूंढ़ता, जग में फिरता हूँ,
तेरे तो दिल नहीं है, मैं ठिकाना चाहता हूँ/
हमसाया बने, कोई हमसफर तो हो,
बाकी का सफर, मैं सुहाना चाहता हूँ/.
तुम बन के रह सको तो रहो, नहीं तो,
किसी और ठौर किस्मत आजमाना चाहता हूँ/
मुहब्बत मेरी मजबूरी का ही नाम हो तो हो,
मैं तेरे ही गले में बाहें डालना चाहता हूँ/
जिसकी मर्जी, चाहे तो मुझे आजमाए,
मैं मील का पत्थर हूँ, तेरा पता चाहता हूँ/
लुटाने को मेरे पास बचा कुछ तो नहीं,
पाने को सारा आस्मां चाहता हूँ/
दरवेश हूँ तेरी रहगुजर का मैं, बस तुझे,
अपनी दुआओं से नवाजना चाहता हूँ/
मिल जा मुझसे सदाबहार चमन सी,
तुझे सौंपना रहमते- खुदा चाहता हूँ/
घायल न कर सका ' रतन ' को कोई,
बस तेरी नजरों का निशाना चाहता हूँ
राजीव रत्नेश
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थाम लिया हो वक्त ने रेल का पहिया जैसे,
और रेल तेरे घर के मुहाने पे उड़ी है/
तेरे आ जाने का इंतजार है उसको शायद,
तुआए तो वक्त चले, रेल आगे बढ़े/
राजीव रत्नेश
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