रतन को दिलकश लगी थीं ( गजल )
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मुझे खटकती रहती हैं शहर की जगमगाहटें/
याद आती हैं गाँव की पगडंडियाँ और चौबारे/
लहलहाती खेतियाँ गन्ने, मक्के और बाजरे की,
कुएँ की जगत पर बैठे, रहट उलीचते पानी के धारे/
सुबह-सबेरे भींगे चने के साथ वो ताड़ी की सुड़कनें,
मुझे याद आते चंदा! रात में सितारों के रंगीं रशारे/
तुम यूँ न समझना कि कायनात अँधेरों की पसंद मुझे,
मैं तो बस समझता हूँ , चंदा की शीतल चाँदनी के नजारे/
मैंने की न कभी सीनाजोरी, न दुश्मनी किसी से निबाही,
मुझे मिला भरपूर तेरा साथ, हुए जिंदगी के सहारे/
सरयू की शीतल शांत रेती और तेरी बाहों का सहारा,
और कुछ मुझे न चाहिए, सिवा तेरी मुहब्बत के सहारे/
मंजर वो रात का, थक के हमारा मचान पर ही सो जाना,
उठ जाते थे नींद से, सुन खेतिहरों की दुलारी बातें/
सुबह उठते ही घर को चल देना और नहा-धोकर,
आराम से नाश्ता करना और छक के टकराते पैमाने/
दिन में अपने बगीचे में जाकर फालसा और जामुन खाना,
मरी बाल्टी से आम चूसते हुए, तेरी भीनी मुस्कराहटें/
शहर की ओर तब मुड़े, जब घर से बुलावा आ गया,
" रतन" को दिलकश लगी थीं, वो चाँदनी में तेरी बातें/
राजीव रत्नेश
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शहर की रोशनियों में तो बस समझौते पलते हैं/
रतन और चंदा के अरमान तो आज भी मचान पर जलते हैं//
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