Thursday, July 2, 2026

तहरीर- ए- रतन : सौ सौगातें ( पूजा के पतवार से ) .(१ से १०) सौगातें

सौगात (१)
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मेरी कश्ती है जर्जर, लहरों का है शोर,
दिखता नहीं दूर तक, कोई साहिल या छोर/
थाम के बैठे हैं हम ' पूजा ' का ये पतवार,
ले जाएगा हमें जो, उस पार की ओर/
जमाने की लहरें गिराना चाहें हमें,
पर श्रद्धा की डोर है, बड़ी ही जोर/

सौगात (२ ) ' साहिल का इंतजार--- अटूट यकीन '
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तुझे तो साहिल पे इंतजार रहता है मेरा,
तूफान में फँसी कश्ती देख तू क्यूँ घबराता है/
' पूजा के पतवार ' से थामी है जो ये लहर,
वही तो मुसाफ़िर को मंजिल तक पहुंचाता है/
किनारे पर खड़े होकर तमाशा देखने वालों,
समंदर की गहराई का अंदाजा किसे हो पाता है//

सौगात (३ ) ' गजल की बेईमानी--( इश्क का वास्ता ) '
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गजल हो जाती बेइमां जैसे,
तेरा मुझसे रूठना काम कर गया/
बादी- ए- इश्क में हम भी तो थे ' रतन ',
जाने क्यूँ जमाना हमें बदनाम कर गया/
हम तो चले थे साहिल की तलाश में,
तेरा भटकाव ही हमें मंजिल के पार कर गया//

सौगात (४ ) : दिल की तख्ती  --( अमिट छाप )
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लिखा है नाम तेरा, दिल की इस तख्ती पर,
जैसे कोई इबादत, लिखी हो पत्थर पर/
दुनिया मिटाना चाहे, तो क्या हुआ ' रतन ',
निशान गहरे हैं, जो उतरे हैं रुह पर/
वक्त की गर्द इसे धुंधला न कर पाएगी,
ये वो तहरीर है, जो गूंजेगी हर दर पर//

सौगात (५ ) ' इबादत का सफर ' ( सच्ची पहचान )
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मेरी इबादत में कोई खोट न था ' रतन ',
पर तेरे दर तक पहुँचने में जमाना बीत गया/
हमने तो हर पत्थर को खुदा मान लिया था,
पर असली मूरत को पहचानने में जमाना बीत गया/
अब जो तुम मिले हो, तो लगता है ऐसा,
खुद को ढूंढ़ने के बहाने, तुम्हे पाने में जमाना बीत गया//

सौगात (६ ) ' खामोश गवाही '  ( इंतजार का आलम )
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ये दर- ओ-दीवार गवाह हैं मेरी तन्हाई के,
कितनी रातें यहाँ बैठ कर गुजारी हैं हमने/
तुम तो आए नहीं, पर तुम्हारी आहटों के इंतजार में,
अपनी ही धड़कनें कई बार पुकारी हैं हमने/
कहने को तो बहुत कुछ था, इस दिल में दबा,
पर तेरी खामोशी की इज्जत ही संभाली हमने//

सौगात (७ ) ' वक्त का पहिया ( मुठ्ठीगंज की यादें ) '
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वक्त का पहिया घूमता है अपनी ही लय में,
कभी हम ऊपर थे, कभी जमाना नीचे है/
इश्क की बाजी में, हमने जो दाँव लगाया था,
उसका हिसाब आज भी अधूरा और पीछे है/
तुमने तो भुला दिया, मुठ्ठीगंज का वो मंजर,
पर मेरी यादों की बस्ती आज भी वहीं पीछे है//

सौगात (८ ) ' उम्मीद का दीया ' ( धैर्य की लौ )
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तूफान कितना ही गहरा हो, डरना कैसे,
जब हाथ में तेरी वफा का दीया है/
अँधेरे रास्तों पे भटके हैं कई राही यहाँ,
पर हमारे नसीब में तेरी यादों का दिया है/
अब बुझने न देंगे इस लौ को ' रतन ',
कि हमने इसे अपने ही लहू से संवारा है//

सौगात (९ ) ' दिल की जमीन ' ( प्रेम का वसंत )
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बड़ी बंजर थी ये दिल की जमीन पहले,
तेरे आने से यहाँ चाहत के फूल खिले हैं/
मुद्दतों बाद नसीब हुई है ये हरियाली,
जाने कितने मौसमों के बाद हम मिले हैं/
तेरी मुस्कराहट की एक किरन ही काफी थी,
मेरे गमों के बादल जैसे कहीं गुम हो गए हैं//

सौगात (१० )' आखिरी फैसला '  ( खुद्दारी का पैगाम )
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फैसला जो भी हो, हमें मंजूर होगा,
बस एक बार अपनी नजरों से कह तो दिया होता/
हम तो खुद ही अपनी महफिल उठा लेते,
तूने बेगाना समझने की जहमत तो न की होती/
चले जाएँगे तुम्हारी महफिल से चुपचाप ' रतन ',
बस एक आखिरी पैगाम तो सुन लिया होता //

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!