++++++++++++++++++++
लिखा था जो कागज पे, वो आँसुओं ने धो दिया,
पर जो दिल पे लिखा है, उसे कौन मिटा पाएगा/
इलाहाबाद की गलियों में जो गूंजी थी सदा,
वो नोयडा के सन्नाटे में भी रंग लाएगा/
मुसाफ़िर तो बदल जाते हैं, हर मोड़ पर ' रतन ',
पर वफा का ये कारवाँ, मंजिल तक जाएगा//
सौगात (१२ ) ' बेनाम रिश्ते '
++++++++++++++++++
कुछ रिश्ते बेनाम ही अच्छे लगते हैं,
उन्हें दुनिया की नजर से बचाए रखना/
हर हकीकत को जुबां पे लाना लाजमी नहीं,
कुछ खामोशियों को सीने में दबाए रखना/
जमाना तो ढूँढ़ ही लेगा नुक्स हर बात में,
तुम तो बस अपनी सादगी को बनाए रखना/
सौगात (१३ ) ' आइने की अदालत '
++++++++++++++++++++++
आइने से आँखें मिलाने से डरते हैं वो,
जिनके किरदार पर जमाने की धूल जमी है/
हमने तो खुद को साफ रखा है हर दाग से,
फिर भी नजाने क्यूँ दुनिया की नजर हमीं पे थमी है/
सच बोलने की कीमत चुकानी पड़ती है ' रतन ',
यहाँ झूठ के बाजारों में बड़ी ही गर्मी है/
सौगात (१४ ) ' सफर और हमसफर '
+++++++++++++++++++++++
मंजिल मिले न मिले, ये तो मुक्कदर की बात है,
पर हम सफर ही न करें, ये तो गलत बात है/
काँटें तो मिलेंगे ही रहे- इश्क में हर कहीं ' रतन ',
पर फूलों की उम्मीद छोड़ दें, ये तो शिकस्त की बात है/
थामे रखना उम्मीद का वो पतवार हर हाल में,
लहरों से हार मान लेना, बुजदिली की बात है/
सौगात (१५ ) ' तहरीरे- वफा '
+++++++++++++++++++
मेरी कलम से जो निकला, वो सिर्फ शब्द नहीं,
मेरे बीते हुए लम्हात की पूरी दास्तान है/
जिसने भी पढ़ा इसे दिल से, वो जान जाएगा,
कि जमीन पे रह के भी मेरा घर आसमान है/
' रतन ' को ढूंढ़ना हो तो इन पन्नों में ढूंढ़ना,
यहाँ मेरी रूह का हर एक निशान है/
.
सौगात (१६) ' वक्त की इबारत '
+++++++++++++++++++++
वक्त लिखता है हर चेहरे पर अपनी इबारत,
कोई पढ़ लेता है, कोई अनपढ़ ही रह जाता है/
जो कल तक थे साथ, आज अजनबी से हैं,
ये वक्त का फेर है, जो सबको आजमाता है/
पर जो दिल के पन्नों पे लिखे हैं नाम ' रतन '
उन्हें मिटाने का दम, वक्त भी कहाँ पाता है/
सौगात (१७ ) ' दुआओं का साया '
+++++++++++++++++++++++
जब भी गिरा हूँ, किसी अद्दृश्य हाथ ने थामा है,
ये शायद तेरी उन दुआओं का ही असर है/.
भटके थे जब हम अँधरी रातों के सन्नाटे में,
उन्हीं की लौ से रौशन हुआ मेरा हर सफर है/
दुनिया लाख गिराना चाहे तो क्या हुआ ' रतन ',
जिसके सर पे दुआओं का साया, उसे किसका डर है//
सौगात (१८ ) ' खामोश लब ' ( मुठ्ठीगंज का एक कोना )
+++++++++++++++++++++++++++++++++++
बहुत कुछ कहना था, पर लब खामोश ही रहे,
आँखों ने ही सारा हाले- दिल सुना दिया/
संगम के किनारे जो किए थे वादे हमने,
आज उन्हीं यादों ने हमें फिर से रुला दिया/
लोग कहते हैं कि यादें धुंधली पड़ जाती हैं,
पर तुम्हारी तस्वीर ने तो हर ज़ख़्म हरा कर दिया//
सौगात (१९ ) ' किरदार की खुशबू '
+++++++++++++++++++++
फूलों की खुश्बू तो हवा के साथ उड़ जाती है,
पर इंसान के किरदार की महक सदा रहती है/
दौलत और शोहरत तो हाथ की मैल है ' रतन ',
पर जो रूह से अमीर हो, उसकी हस्ती सदा रहती है/
हमने तो कमाया है बस अपनों का प्यार यहाँ,
ये वो जमा- पूँजी है, जो हर घड़ी साथ रहती है//
सौगात ( २० ) ' अधूरा सफर '
++++++++++++++++++++
अभी तो आधा सफर भी तय नहीं हुआ है,
और लोग कहने लगे कि मंजिल आ गई/
हम तो मुसाफिर हैं उस राह के ' रतन '
जहाँ मंजिल से ज्यादा, राह की महक भा गई/
' तहरीर- ए- रतन ' के सौ पन्ने अभी बाकी हैं,
अभी तो बस कलम ने कागज से आँख मिला ली है//
------------------

No comments:
Post a Comment