मेरी आवाज सुनो--( २ )
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मेरी अन्तर्व्यथा शायद शब्दों में पूरी उतर न सकी,
कुछ पीड़ाएँ खामोशी की जुबान में ही पलती हैं/
कल हमने नव- सृजन का जो स्वप्न बुना था साथ,
आज उसकी राख में भी कुछ चिंगारियाँ जलती हैं/
तुमको याद थी, उन वादों की वह झुरमुटी शाम,
हमने भी तो आने वाले कल की तस्वीर संवारी थी/
' कल के बिछड़े कभी मिलेंगे, यह विश्वास दिल में था,'
उसी उम्मीद में, कितनी रातें हमने, साथ गुजारी थीं/
वफा की राह पुरखतर तो होती, पर आसां नहीं होती,
मगर हमने तो हर मोड़ पर साथ चलने की ठानी थी/
अब अधूरे फलसफे को, पूरी कहानी मान लेते हैं,
क्यूँकि कुछ रिश्ते मिटने के बाद भी अपनी निशानी
रखते हैं/
राजीव रत्नेश
( महोदय, यह वही जान्हवी है, जो मेरे संस्मरण,
" जिन्हें हम भूलना चाहें " की प्रमुख पात्र रह चुकी है )

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