हर हाल देगा रतन साथ तेरा ( गजल)
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सौष्ठव काया का तेरे, मन मोह लेता है मेरा/
चपल चितवन तेरी, उमगता है दिल मेरा/
बड़े नाज से तेरे माता- पिता ने तुझे पाला,
बनारस की लोहट्टी की गली में रहा ठिकाना तेरा/
मन जब कभी उद्देलित हुआ, तब गए संकटमोचन,
हनुमत्- दर्शन के बाद खाया, चढ़ाया प्रसाद तेरा/
मोहब्बत जब मेहरबां होती है, रंजो- गम हर लेती है,
कड़ी धूप में रास्ते की, ओढ़नी का करना सायबां तेरा/
सुब्ह- सबेरे अक्सर दशाश्वमेध घाट जा नहाना तेरा,
गंगा मैया को कर प्रणाम, फूल और दूध चढ़ाना तेरा/
शुभ्र, धवल, झीनी साड़ी में तू, और कोयल कमनीय लगती है,
अपलक देखता हूँ जब तुझे, ललचा उठता है दिल मेरा/
मैं तो लूँगा तेरे जबीं का बोसा, भले बरजे तेरी अम्मा,
दूर अपने से तुझे होने न दूँगा, निहारूँगा तुझे शाम हो या सबेरा/
बिना भीड़ के, सुनसान से घाट पर तू दीप मनौती का जलाती,
शाम जब पूरी तरह घिर जाती, दर्शन देती सबको मैया
दुर्गा/
कभी नाव से हम- तुम साथ गंगा पार जाते,
बड़ी खुशी से नाव खेते तेरे केवट भैय्या/
मधुर मोहनी सूरत तेरी, इठलाती-बलखाती तेरी चाल,
रूप तेरा सुंदर सजीला, सावन में लगता जैसे मेला/
रातों के अँधियारे में, जुल्फों को तेरी, उलट-पुलट देता मैं,
सुब्ह एक मादक अंगड़ाई के साथ, छोड़ना बिस्तर तेरा/
मुझे दीवाना कर देती है, ऐसी-ऐसी तेरी भाव-भंगिमाए,
बाँध लेतीं मुझे, अल्हड़ जवानी की वो तेरी गदराई
बाहें/
जब- जब तू नहा कर, शीशे के सामने करती अपना
श्रिंगार,
खिड़की से आती सूर्य-रश्मि, करती स्वागत- गान तेरा/
प्यार की राहों की तू माहिर खिलाड़ी, खेल भी ले इक
बार,
बिना कंधी के सँवार दूँ खुद जुल्फे- मुअम्बर तेरा/
हम तुम मुसाफिर प्यार की नगरी के, चलें साथ- साथ,
दिल में लेकर नई उमंग, दर्शन करें गंगा के घाट सारे/
फिर-फिर आएँगे साथ, बुलाएँगे जब बाबा विश्वनाथ,
लेकर विश्वनाथ गली से सुहाग के सामान, सर टेकना दुबारा/
चलेंगे तुम्हारी यूनिवर्सिटी, जहाँ गुजारे अपने चार साल,
घूम लेंगे लंका, बैठ कर कहीं खाएँगे आमलेट, पिएँगे
कोका-कोला/
चले- चलेंगे, जब कह दोगी, साथ मेरे जाना बाजार,
अपनी पसंद से लेना सामान, हर हाल देगा" रतन" साथ तेरा//
राजीव रत्नेश
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आइने में देख-देख कर, खुद ही न तुम शरमाओ/
ताब ला न सकेगा आईना, उस पर रहम खाओ//
राजीव रत्नेश
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गंगा की लहरें और बाबा विश्वनाथ का साया है
रतन ने चंदा के रूप में बनारस का हर रस पाया है
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गगन का चाँद तो बस दूर से ही मुस्कराता है
रतन का चाँद तो पहलू में बैठ हालेदिल सुनाता है
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मिन्नत की कोई गुंजाइश नहीं इस पावन रिश्ते में
चंदा ने रतन को पा लिया है खुदा के फरिश्ते में
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दिल का धड़कना कहीं रस्मे- पहर तो नहीं
राहते हैं एहसासे- दरियादिली से आज भी
मैंने मिलान किया आस्मां के चंदा का
चंदा को जी भर अपने पहलू में बिठा कर
राजीव रत्नेश
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नीली जमुना मुझे और क्या देगी
प्रेम के निश्छल निमंत्रण के सिवा
उसको तो बस रतन की आरजू है
सब कुछ करती है वह मिन्नत के सिवा
राजीव रलेश
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रतन को अपने हक पर पूरी तसल्ली है
वह ही मेरी हमसफर मेरी सारी जिन्दगी है
ऐसा भी नहीं है कहीं कि उसकी चाहत बदले
प्यार को खुदा मानता हूँ, वही मेरी बंदगी है
राजीव रत्नेश
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