तुरबत पे अपने तेरा रतजगा चाहता हूँ ( गजल )
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बेवफाओं की इस दुनिया में वफा ढूँढ़ता हूँ/
बड़ा नादां हूँ, नासमझ हूँ, ये मैं क्या ढूंढ़ता हूँ/
भरम अपनी झूठी मुहब्बत का भी रहने न दिया,
तुम्हीं ने दिया जख्म, तुम्हीं से गहरा कहता हूँ/
दिल की दबी राख न कुरेदो, चिंगारी शोला बनेगी,
मेरी शराफत से न उल्झो, तुम्हारी हया ढूँढ़ता हूँ/
क्या तुम्हें मेरी मुहब्बत पे एतबार भी नहीं था,
गैर के भी हो गए, तो भी तेरी अदा समझता हूँ/
निशानियाँ मेरी सारी समेट अपने साथ ले गई,
किस सन्नाटे में गुम हो गई, हर तरफ बियाबां देखता हूँ/
बीच मँझधार हो गए दूसरी कश्ती पर सवार,
कहना बहुत था, जब तेरा दिल दरिया देखता हूँ/
नाकर्दां मेरे गुनाहों की, इसी जनम दी है सजा,
पहले भी यकीं न था, बस तेरी जफा देखता हूँ/
कहाँ वो वायदे, जाती बहार में तुमने किए थे?
साहिल पे से तेरी जाती कश्ती का किनारा देखता हूँ/
मुसलसल गिरती धार से पत्थर पे निशान हो जाते हैं,
इतना गया गुजरा तेरा दिल, निशान से सफा देखता हूँ/
गुजारिश न की कभी, कि तुम अपनाओ मुझे,
मैं सिर्फ तेरे घर तक का बढ़ा किराया देखता हूँ/
अजब दस्तूर देखा तेरे महफिले- दर- ओ-दीवार का,
बिना पुताई तेरी विदाई, ये क्या माजरा देखता हूँ/
खुदगर्ज इतनी पहले न थी कभी मेरी समझ से,
जाते-जाते भी मुझे सदा दे दी, मर्तबा समझता हूँ/
कोई बड़ा तीर न मारा, गम अपनी जुदाई का देकर,
क्या दिल है, क्या कलेजा है, तेरा हौसला देखता हूँ/
दिले- मुज्तर को इतना भी हक न था क्या तुझ पर?
तुझसे मिलने की सोचता हूँ, तो कायदा देखता हूँ/
तेरी मख्मूर- निगाही का सबब आखिर क्या समझूँ,
मैं तो हर बात में बस तेरा ही फायदा देखता हूँ/
मिल कर क्या करोगी, तेरी तरफ से आँखें मूँद लीं,
आगे बढ़-बढ़ पीछे हटे, तेरी रजा समझता हूँ/
जनाजे में मेरे चलो नआए, जायज था ' रतन '
अब तुरबत पे अपने तेरा रतजगा चाहता हूँ//
राजीव रत्नेश
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" जिसके लिए मँझधार में कश्ती छोड़ दी रतनने,
आज उसी से तुरबत पे आने की इल्तजा करता है/"
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