तो भूल जाऊँ लिखना ( गजल)
++++++++++++++++++++
कभी दर्पण में तुझे देखूँ, कभी आस्मां में चाँद निहारूँ /
बार- बार आस्मां में देखूँ, फिर-फिर अपनी चंदा
को निहारूँ/
देख देख उसको तबीयत मेरी भरती ही नहीं,
जी कहता है, जी भर उसे अपने सीने से लगाऊँ/
मौसम है बारिशों का, फूल खिले उपवन-उपवन,
फूलों पर भँवरों को देख अपना दिल क्यों ललचाऊँ?
मंद हवाओं से शजर- शजर झूम रहे, फूल विहँसे,
जी करता, बाहों में उसे लेकर भँवरों को जलाऊँ/
बांस के हरियाले पेड़, रात में बाँसुरी सी बजाते,
कुएँ की जगत पर बैठ कर चाहता तरन्नमु मैं सुनाऊँ/
चंदा फिर मेरी बने, या फिर मुझे ही अपना बनाए,
जमुना की रेती में लेट सितारों को इशारे से बुलाऊँ/
रूप उसका सजीला, नयन उसके उन्मत्त मतवारे,
अपना समझते- समझते कहीं अपनी ही नजर न लगाऊँ/
अगर वो मिले मुझसे, जमाने की फिकरो- फब्तियाँ दर किनार कर,
मैं हूँ हमेशा उसके साथ, भले सबके मुँह से उसका मैं
दीवाना कहाऊँ/
कहानी तो कहानी, फिर अफसाना भी तो न बन पाएगी,
बन के कहकशां जो सितारों को न मैं रिझाऊँ/
पास आने की बजाय वो जो मुझसे दूरी बढ़ाए" रतन",
तो भूल न जाऊँ कहीं लिखना भी, न कभी शायर
कहाऊँ//
राजीव रत्नेश
"""""""""""""""""""
अशआर
"""""""""
चाँदी की बेड़ियाँ भी पैरों की छम्मक- छम्मक बोलें,
नथनियाँ मंगा दूँगा तुझे, एक बार प्यार से जो बोले/
"""""""""""
तुझे प्यार करते हैं, हमेशा करेंगे और करते रहेंगे,
जब- जब बाहों में आओगे मेरे, हम इकरारे- वफा करते रहेंगे/
"""""""""""""""
श्रिंगार करके घर से यूँ अकेले तुम निकला न करो,
कौन जाने राह की नीयत बदले और वो मोड़ मुड़ जाए/
"""”"""""""""""""
फूलों की शाख कोई टूट कर कदमों में न आ पड़े,
जमाना खराब है, सँभल कर घर से निकला करो/
"""""""""""""""""""
भर नयन, अपलक देखा है मैंने अपने चांद को,
हर्ज नहीं, एक बोसा तक न दे वो अपने प्यार का//
राजीव रत्नेश
""""""""""""""""""""""""""”"
चंदा की चांदनी से ही चलती है,
रतन के कलम की रवानी,
वो रुठ जाए तो अधूरी रह जाए
इस जमाने की सबसे हसीन कहानी/
-----------------
जमाना लाख समझाए मगर अपनी ही धुन में रहना है,
रतन को चंदा के पहलू में, बस चुपके से बहना है
-------------------

No comments:
Post a Comment