बड़ी देर से दर पे आँखें लगी थीं
राजीव रत्नेश
बड़ी देर से दर पे आँखें लगी थीं, हमसे गफलत हो गई,
मौसम के परिंदे थे तुम, हमको तुमसे उल्फत हो गई/
बगीचे में अबकी पौधा एक अमरूद का लगाया था,
सैर- ए- गुल्शन को चले तो हर शजर से उल्फत हो गई/
चाहत न थी कोई चाँद का टुकड़ा ही जीनत बने मेरी शाम का,
जिसके पैरहन में सितारे जड़े थे, उसी से चाहत हो गई/
सू- ए- मंजिल जाते थे और भी रास्ते पर परवाह न की,
बस उनकी खूबियों को देखा, हमसे कुछ हिमाकत हो
गई/
बौर बनके कब तक पत्तों में छुपोगी, कभी तो घूँघट
उठाओगी,
पूछेंगे तब तुमसे तुम्हारा हाल, दिल में अभी से हलचल हो गई/
जिंदगी में एक मोहब्बत ही तो है, इसी आस पे जिए जा रहे हैं,
अजल ने दी सदा- ए- शिरकत, हमारी भी क्या जुर्रत हो गई/
महकमा था ये मुंसिफी का, हम तो कब के बेजार हो
गए,
काजल आँखों में लगाया तुमने, तुमसे आरजू- ए-वस्ल हो गई/
कब के निकले थे घर से, मंजिल पर कैसे पहुँच पाते,
निकले थे सज-धज के, रास्ते में ही मय्यत हो गई/
किसने कहा था महफिल से हमेशा के लिए चले जाने
को,
समझ न पाए तुमको, दिल को तुम्हारी हसरत हो
गई/
बरबादी- ए- किस्मत का तमाशा देखा, शोहदों को भी
परखा,
न जाने मुहब्बत की कायनात में, किधर से क्यामत हो
गई/
तुम कहो तो मान लेता हूँ, जहान में बाकी इज्जत न रही,
साथ हमारे न किसी का खौफ, न चाहत--- बस सबसे
अदावत हो गई/
तुम्हारा साथ पाकर ही तो जुगनू से आफताब हुआ
था,
रतन, तुम्हारे आँचल की छाँव मिली तो सबकी रहमत
हो गई/
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