Friday, October 2, 2026

उल्टा हो गया गंगा का बहाव------ गजल

उल्टा हो गया गंगा का बहाव
------- राजीव रत्नेश

कज़रारी आँखें, बोझिल पलकें, माथे पे बिंदी का आलम,
पुरजोर चली जब आँधी, नाक में झूलती नथ का
आलम/

मेरी तरह थोड़ी सी बची होती तुझ में अहसास-ए- गैरत,
तुझे अपना बना लेता, छोड़ कर दुनिया का सारा
जंजाल/

मीठी-मीठी मिठाई से भी मीठी तेरी जिक्र-ए- जवानी,
कहाँ का मुसाफिर मैं, किस ओर गया तेरा बालम/

ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया, करके तेरा ख्याल,
आ भी जाओ मुकाबिल दुनिया के, अब न करो मलाल/

सँवारेंगे तुझे, गले से लगाएँगे, समझ अपनी जान,
रोशनी में नहाएगी कोठी, गूंजेगा मंगलगान/

पैंतरा बदलना भी कोई तुमसे सीखे, होओगी हलकान,
बह जाओगी दूर कहीं, दरिया में बचा नहीं जाल/

खता दीवानों की क्या, तुम्हें ही थी बस उन्हीं की पड़ी,
हमने तो सिर्फ आईना दिखाया, फरार हुआ साजन/

मोल न करो मेरी कलम का, संभाल लो अपनी तलवार,
चुन-चुन कर एक- एक को पकड़ा, बगुले ने साधा
ध्यान/

रतन को अब भी आस, छोड़ कर न जाओगी उदास,
जाओगी भी तो लौट के आओगी, उल्टा हो गया गंगा का बहाव/

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