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भाया न मुझको अपना उत्कर्ष ,
तुम पर दावँ लगा बैठा।
सोचा था तुम प्रेम के प्याले हो ,
प्यार के खजाने हो ,
तुमको दाता समझा था
भिछुक से भी गए -गुजरे निकले।
रूप था गर्वीला ,आँखे थीं शर्मीली ,
पर अहसास से थे नावाकिफ ,
अपनेपन का अभाव था।
कितना नाजुक बंधन था ,
पल भर में टूट गया।
करके सबको अचंभित ,
दावानल सा फैल गया।
जिसको समझा अपरिमित ,
वो कितना था सीमित ,
न दिल ने कबूला ,
न मन ने अपनाया।
कैसा था वो खेला ,
तुमको समझ के अकेला ,
दाँव चल दिया।
पर कितने थे तुम सतर्क ,
एक कदम आगे बढ़े भी,
तो मुझको फंसाते हुए ,
अनगिनत जाले बुनते हुए।
अच्छा होगा ,
तुझसे दूर -दूर रहा जाए।
---राजीव रत्नेश -----------

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