Saturday, January 25, 2025

achha hoga

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 भाया न मुझको अपना उत्कर्ष ,

तुम पर दावँ लगा बैठा। 

सोचा था तुम प्रेम के प्याले हो ,

प्यार के खजाने हो ,

तुमको दाता समझा था 

भिछुक से भी गए -गुजरे निकले। 

रूप था गर्वीला ,आँखे थीं शर्मीली ,

पर अहसास से थे नावाकिफ ,

अपनेपन का अभाव था। 


कितना नाजुक बंधन था ,

पल भर में टूट गया। 

करके सबको अचंभित ,

दावानल सा फैल गया। 

जिसको समझा अपरिमित ,

वो कितना था सीमित ,

न दिल ने कबूला ,

न मन ने अपनाया। 


कैसा था वो खेला ,

तुमको समझ के अकेला ,

दाँव चल दिया। 

पर कितने थे तुम सतर्क ,

एक कदम आगे बढ़े भी,

तो मुझको फंसाते हुए ,

अनगिनत जाले बुनते हुए। 

अच्छा होगा ,

तुझसे दूर -दूर रहा जाए। 

---राजीव रत्नेश -----------

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