Sunday, August 17, 2025

मैं अपनी मर्यादा भी तोड़ दूँ( कविता)

मैं अपनी मर्यादा भी तोड़ दूँ
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रोज निकल जाता हूँ,
मुँह अँधेरे,
अपने खोए हुए प्यार,
की तलाश में/
आखिरी सितारे के, 
डूबने के इंतजार में,
बैठा रहता हूँ, झील किनारे/

बेसाख्ता बातें करता,
लहरों से,
मन की कहता बात,
जो तुमसे कहना चाहता हूँ/
कभी मिलने आ भी जाओ,
यूँ  निर्विकार, निःशब्द न रहो/
दिल के गुलदस्ते के हर,
फूल पर किसका अधिकार?
तुम मुझे बतलाओ/

जानता हूँ पर तुमसे ही,
सुनना चाहता हूँ/
तुम इतनी दूर क्यूँ,
हो गई हो मुझसे?
मैंने तो तुम्हें कुछ,
न कहा था/
कुछ पूछा भी नहीं था तुमसे,
किस अंतहीन व्यथा से,
तुम अतिक्रमित हो?
मुझसे मिलने से भी,
क्यूँ भ्रमित हो?

आज नहीं तो कल,
तुम्हें मुझे जवाब देना ही होगा/
मैं तुमसे ज्यादा दिन,
जुदा रह नहीं सकता/
मन को मर्यादित,
रख नहीं सकता/
गर तुम समझ,
नहीं सकते मेरी व्यथा,
तो फिर अपने और,
मेरे बीच फासला और न बढ़ाओ/
वैसे ही तंगदिल है जमाना सारा,
अपनी बद्दुआओं से ही,
हमें ग्रस्त कर देगा/

मैंने तुमसे झूठ नहीं कहा था कि
" जमाना प्यार का दुश्मन है",
मैं जानता हूँ,
जमाने को अच्छी तरह,
परख सका हूँ/
तुम पहल गर,
कर नहीं सकते तो,
आस्मान की ओर देखो,
या झील की गहराई में,
अपने अस्तित्व को खोजो/
कितनी मुहब्बतें न जाने,
आस्मां ने अपने दामन में,
समेट रक्खी हैं/
मैं अपनी मर्यादा भी तोड़ दूँ,
झील की सतह से ,
फिसलती तेरी चाहत,
अगर मुझ तक पहुंचे//

       राजीव रत्नेश
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