Sunday, August 17, 2025

गलत पते पर पहुँचा लिफाफा मेरा( कविता)

कितनी घातक है त,
झाड़ी की ओट से,
जहरबुझे तीर चलाती है/
खुद छिप के,
अच्छे-अच्छों को,
निशाना बनाती है/
बड़े- बड़े महारथी भी,
तेरा वार सँभाल न पाए/
शर-शैय्या पर आज पितामह!
किसने ये साजो-सामां सजाए?
मैं महाभारत बचाने की सोचता हूँ,
तू रोज नये-नये शिखंडी,
पैदा कराए/
कर ले अपने दिल की, 
चली जा तू भी रणक्षेत्र में,
मुझसे रिश्ता तोड़ दे,
तरकश के सारे तीर,
एक साथ ही मुझ पर छोड़ दे/

तेरा बचपना अब मैं,
ज्यादा बरदाश्त नहीं कर सकता/
दूर हो जा मेरी नजरों से,
अब तुझे और मौका दे नहीं सकता/
न कभी तू मेरी थी,
न कभी मेरी हो पाएगी/
मैं अब और तेरा साथ,
दे नहीं सकता/
अपने दामन में अब,
और दाग लगा नहीं सकता/
जितना निभाते बना,
निभाया मैंने/
बस अब और नहीं!
गलत पते पर पहुंचा,
लिफाफा मेरा/

तेरे भाइयों ने चक्रव्यूह,
बनाया है,
मेरे खिलाफ साजिश रचने में,
अपना सारा दिमाग लगाया है/
चली जा उन्हीं के पास,
उन्हीं से तो कम से कम निभा/
मेरे पास रहेगी तो,
नित नये उत्पात करेगी/

मुझे देने को मात,
वहीं से करना सारे प्रयास,
तुझसे तो पहले ही हारा हूँ/
पर सालों के सामने,
हथियार नहीं डाल सकता/
अपने को खुद,
दावानल में डाल नहीं सकता/
होगा तेरा प्रतिशोध कब पूरा?
अपने भाइयों से ही, नित नये,
चकव्यूहों की रचना करवाना/
पर मेरे आँगन में,
भूल कर भी न कदम रखना/

       राजीव रत्नेश
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