न गुलजार के हुए, न चमन के हुए
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राजीव रत्नेश
न गुलजार के हुए, न चमन के हुए,
हम न जाने किसके हुए, न किसके हुए/
हम कुछ न समझे, तुम कुछ कह न सके,
बात रह गई दिल में, हम न हमदम के हुए/
दो दिन भी न निभाया गया तुमसे मेरा साथ,
आज वक्त ने तुमसे मुहब्बत का तकाजा किया/
हम पूछते भी तुमसे तो क्या पूछते,
तीर- ए- नजर ही जब सारे जवाब के हुए/
शमशीर आखिर किसके लिए उठी थी,
हम तो तुम्हारी राह में बे-जुबाँ के हुए/
मिला क्या हमें इस बर्बादी- ए- मुहब्बत से,
न अपने हुए हम, न किसी और के हुए/
न तुम हमारी हुई, न हम तुम्हारे हुए,
फिर भी किस्सा मोहब्बत के नाम के हुए/
दास्ताँ हमारी कौन सुने अब यहाँ,
हम ही अपनी कहानी के किरदार के हुए/
महदूद है मुहब्बत भी अपनी हदों में,
हम चाह कर भी कहाँ बे- हद के हुए/
फिर क्यों लौट आए तुम मेरी राहों में,
जब हम तुम्हारी याद के होकर भी न हुए/
नहीं था दस्तूर-ए-मुहब्बत में ऐसा,
फिर क्यों हम ही हर बार गुनहगार के हुए/
हम वक्त- ए- रुख्सत भी तुम्हें देखते रहे,
तुम दूर जाते रहे, हम इंतजार के हुए/
न गुल ही अपना हुआ, न चमन ही अपना हुआ,
' रतन ' जुगनू की तरह टिमटिमाते रहे,
न जमीन के हुए, न आसमान के हुए/
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