Saturday, October 3, 2026

न गुलजार के हुए, न चमन के हुए------ गजल

न गुलजार के हुए, न चमन के हुए
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               राजीव रत्नेश

न गुलजार के हुए, न चमन के हुए,
हम न जाने किसके हुए, न किसके हुए/

हम कुछ न समझे, तुम कुछ कह न सके,
बात रह गई दिल में, हम न हमदम के हुए/

दो दिन भी न निभाया गया तुमसे मेरा साथ,
आज वक्त ने तुमसे मुहब्बत का तकाजा किया/

हम पूछते भी तुमसे तो क्या पूछते,
तीर- ए- नजर ही जब सारे जवाब के हुए/

शमशीर आखिर किसके लिए उठी थी,
हम तो तुम्हारी राह में बे-जुबाँ के हुए/

मिला क्या हमें इस बर्बादी- ए- मुहब्बत से,
न अपने हुए हम, न किसी और के हुए/

न तुम हमारी हुई, न हम तुम्हारे हुए,
फिर भी किस्सा मोहब्बत के नाम के हुए/

दास्ताँ हमारी कौन सुने अब यहाँ,
हम ही अपनी कहानी के किरदार के हुए/

महदूद है मुहब्बत भी अपनी हदों में,
हम चाह कर भी कहाँ बे- हद के हुए/

फिर क्यों लौट आए तुम मेरी राहों में,
जब हम तुम्हारी याद के होकर भी न हुए/

नहीं था दस्तूर-ए-मुहब्बत में ऐसा,
फिर क्यों हम ही हर बार गुनहगार के हुए/

हम वक्त- ए- रुख्सत भी तुम्हें देखते रहे,
तुम दूर जाते रहे, हम इंतजार के हुए/

न गुल ही अपना हुआ, न चमन ही अपना हुआ,
 ' रतन ' जुगनू की तरह टिमटिमाते रहे,
न जमीन के हुए, न आसमान के हुए/

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