Monday, July 6, 2026

उसके सिवा किसी और का ( गजल )

उसके सिवा किसी और का
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जबभी चंदा का नाम मेरे नाम के साथ आता है/
होठों की प्यास जाग जाती है, माथे से पसीना चूता है/

उसके सिवा जिंदगी मेरी जिंदगी नहीं होती,
करी वो रूठ जाती तो कभी मैं रूठ जाता हूँ/

उसके बिना कभी मेरी कोई बंदगी पूरी नहीं होती,
उसके साथ के अहसास से ठिकाना याद रहता है/

उसकी दौड़ ' मियाँ की मस्जिद तक ' ही होती है,
मेरे सिवा अकेले नहीं जाएगी, जानता- समझता हूँ/

भूलना उसको मेरे लिए मौत से नहीं बेहतर,
इसी बात से वो मेरे, मैं उसके नाज उठाता हूँ/

वो एक हसीं गुल है मेरी बगिया की,
एक- एक फूल उस पर वार देता हूँ/

किस मुँह से कहूँ, कि वही मेरी छोटी सी दुनिया है,
सारा आलम है उसका, उसकी राहें मैं बुहार जाता हूँ /

अँधेरी रातों में सितारा है, वो मेरी दुल्हन, मेरा चाँद है,
मेरे पास ही वो होती है, भोर के तारे की तरह जब मैं बिखर जाता हूँ/

नाखुदा मेरी कश्ती का है, भले दूर किनारा है,
मेरे दिल का यकीं है वो, भरोसा उसका करता हूँ/

किस बात पे फूला-फूला रहता है ' रतन '
उसके सिवा किसी और का हो नहीं सकता हूँ/

            राजीव रत्नेश
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" दुनिया के सारे ऐशो-आराम ठुकरा कर
फकीर ले गया,
रतन जबसे चंदा का हुआ, मुकद्दर का
अमीर हो गया "/

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