Monday, July 6, 2026

ऐसा तमाशा सरेआम तो है ( गजल )

ऐसा तमाशा सरेआम तो है  ( गजल  )
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तू नहीं पास मेरे पर तेरा अहसास तो है/
लगी है दिल में आग, होठों पर प्यास तो है/

खुल के बताओ, दूर क्यूँ हो, ये माजरा क्या है,
तुझसे ही करता प्यार, मुझे तेरा ख्याल तो है/

जाने किस घड़ी में दूर जाने का इरादा तूने इरादा किया,
तड़पता दिल तेरे लिए आज भी फिलहाल तो है/

पतंग लूट के लाया हूँ, डोर तुमने हाथों में लपेट ली,
मेरा तेरे साथ पतंग उड़ाने का इरादा आज तो है/

तुम जो आ जाओ मेरे साथ, लूट लें महफिल भी,
पीता नहीं हूँ कभी पर न पीने का मलाल तो है/

जिन्दादिली छोड़ी है, जीने का करीना नहीं बदला,
मेरे जीने के लिए तू आज भी जिन्दा मिसाल तो है/

लुट गया नशेमन तो क्यों मनाएँ गम भला,
चमन मेरा पहले की तरह आज भी गुलजार तो है/

सीने में तेरे लिए धड़कनें आज भी जिन्दा हैं,
आजमा ले चाहे, हाथों में तेरे लिए गुलाब तो है/

साहिल से गई कश्ती लौट तट पे आएगी,
मुझे यकीं है, क्यूँकि तेरे हाथ में पतवार तो है/

क्यूँ उदास रहती है इन दिनों, कुछ इशारा तो कर,
यह दिलवालों की बस्ती है, सुब्ह न हो, शाम तो है/

अँधेरे, धूल और गर्द से अटा तेरे पास आया हूँ,
तू अंगूरी से मुँह धुलवाएगी, मुझे इमकान तो है/

आजा एक बार फिर से हम गले मिल जाएँ,
माना कुछ न बचा पास मेरे, दिल में अरमान तो है/

मिलकर हम तुम दुनिया नई बसायेंगे फिर से,
मेरी आँखों में तेरे लिए आँसुओं का सैलाब तो है/

जाते-जाते फिर पलट आया हूँ, तेरा इशारा पाकर,
जिसको जो कहना हो कहे, मेरे लबों पे तेरा नाम तो है/

तू बुलाए और मैंन आऊँ, ऐसा हो कैसे सकता है,
लहू ही पुकारेगा लहू को, जिस्म में जान तो है/

जान से भी जाएगा ' रतन ', तू जो न पलट आई,
तमाशाई खुद तमाशा बने, ऐसा तमाशा सरेआम तो है/

                राजीव रत्नेश
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" जमाने की गर्द से अटा हुआ जब रतन
वापस आता है,
चंदा के हाथों की अंगूरी में ही वो मुकम्मल
सुकून पाता है "/

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