---- राजीव रत्नेश' रतन'
भूमिका
यह गजल उस आशिक की है, जिसके और महबूब के
बीच एक अनजाना तूफान आ खड़ा हुआ है/ सुबह लबों
पर नाम है और शाम को दिल में अरमान, यानी चाहत का
सिलसिला रुका नहीं, बस उसके रास्ते में आँधी आ गई है/
हर शेर में यही कशमकश है कि इस तूफान से डरें या इसी
में अपनी कश्ती उतार दें/मकते में शायर मानता है कि जो
तूफान से घबरा कर किनारे बैठा रह गया, वह दिल नहीं, बस
जिंदगी का एक मेहमान है/
गजल
तेरी- मेरी मुहब्बत के दरमियाँ ये कैसा तूफान है,
लब पे सुबह भी तेरा नाम है, शाम को भी तेरा अरमान है/
तू दूर है तो भी नजर में है मेरी हर कहीं,
दिल की हर धड़कन में बस तेरी ही पहचान है/
सामने आए तो चुप, और जाए तो दिल बेकरार,
मेरी खामोशी भी तेरे लिए एक ऐलान है/
तेरी यादों की हवा, जब भी चली है रात में,
दिल का हर कोना मेरा वीरान है, सुनसान है/
जिस राह से तू गुजरी थी, उस राह की धूल भी,
मेरी नजर में आज भी वो मेरा ईमान है/
पूछते हैं लोग मुझसे, कौन है जिसके लिए,
इस कदर बर्बाद होकर भी वही मेरी जान है/
मैं तुझे पा न सका, पर खोया भी तो नहीं,
ये अधूरापन ही मेरे इश्क की शान है/
मकता
तूफान से डर कर जो साहिल पे बैठा रह गया,
' रतन' वो दिल क्या है, वो तो बस एक मेहमान है//
शब्दार्थ
दरमियाँ: बीच में
तूफान: आँधी, यहाँ: मुहब्बत में आई उथल-पुथल
अरमान: अमिलाषा, चाह
पहचान: परिचय, चिन्ह
बेकरार: बेचैन
ऐलान: घोषणा
वीरान: उजाड़
सुनसान: सन्नाटे से भरा
ईमान: आस्था, निष्ठा
साहिल: किनारा
मेहमान: अतिथि; यहाँ: कुछ पल का साथी, जिसका ठिकाना
स्थायी न हो/
"""""""""""""""""""7

No comments:
Post a Comment