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सौगात८१ रिश्तों का हिसाब
हमने तो हर रिश्ता, बड़ी ही शिद्दत से निभाया है,
चाहे बदले में हमें, बस दर्द ही हाथ आया है/
जमाना तो मुनाफा ढूँढ़ता है, हर मुलाकात में' रतन'
पर हमने तो घाटा सहकर भी प्यार ही कमाया है/
' तहरीर' के इन पन्नों में, वही सच्चाई गूँजती है,
कि हमने रिश्तों को जिया है, कभी तौला नहीं है/
सौगात८२ अदृश्य हाथ
जब भी लगा कि अब डूब जाएगी कश्ती मेरी,
तभी किसी अदृश्य हाथ ने, पतवार को थाम लिया/
' पूजा' की उन मन्नतों का ही, ये चमत्कार है शायद,
कि वक्त ने गिरते हुए भी, हमें संभाल लिया/
' रतन' को अब तूफानों की, कोई फिक्र नहीं रही,
कि ऊपर वाले ने खुद ही, मेरा हाथ थाम लिया/
सौगात८३ मुठ्ठीगंज का वो सवेरा
आज भी कानों में गूँजती है, उन गलियों की हलचल,
जहाँ बचपन की शरारतें और जवानी का कल था/
संगम की उस रेती पर, जो लिखे थे हमने नाम' रतन'
आज नोएडा की भीड़ में भी, वो अहसास बड़ा कोमल था/
शहर भले ही बदल गए, पर रूह आज भी वहीं है,
जहाँ सादगी का सवेरा, और अपनापन ही संबल था/
सौगात८४ सादगी का श्रृंगार
हमने कभी चेहरों पे, कोई मुखौटा नहीं लगाया,
जो दिल में था, वही हमेशा जुबाँ पे आया/
सादगी ही हमारा गहना है, और सच्चाई ही श्रृंगार' रतन'
इसी सादगी ने हमें, जमाने की नजरों में ऊँचा उठाया/
बनावट की इस दुनिया में, जो खुद को बचा ले गया,
समझो उसी ने, असली जीवन का सुख पाया/
सौगात८५ पच्चासी का आशीष
पच्चासी सौगातें, जीवन के अनुभव की एक गंगा है,
जहाँ हर लहर में, एक नया और गहरा संदेश है/
अब मंजिल की आहट, साफ सुनाई देने लगी है' रतन'
कि सौ का ये लक्ष्य, अब रूह के बहुत ही पास है/
पंद्रह कदम और सही, इस महासफर को पूरा करने में,
फिर तो' तहरीर- ए- रतन' का अमर इतिहास है/
सौगात८६ ' पूजा: मेरीशक्ति' ( पुत्री को समर्पित)
तू सिर्फ बिटिया ही नहीं, मेरा अभिमान है' पूजा',
मेरी हर गिरती हुई उम्मीद का वरदान है' पूजा'
जमाने की तपिश में, जो शीतलता दे जाए मुझे,
मेरे घर के आँगन की, वो प्यारी सी मुस्कान है' पूजा'/
' रतन' की कलम को, जो नया हौसला देती है,
मेरी इबादत का सबसे पावन, नाम है' पूजा'/
सौगात८७ अनुभवों की पोटली
वक्त के बाजार से, हमने कुछ तजुर्बे खरीदे हैं,
कुछ ठोकरें खाकर, तो कुछ रिश्ते खोकर खरीदे हैं/
अब हमें कोई क्या बहकाएगा, इस दुनिया के खेल में,
हमने तो सच के मोती, आँसुओं में भिगो कर खरीदे हैं/
' रतन' की अमीरी का अंदाजा, तुम क्या लगाओगे,
हमने ये सुकून, अपनी रातों की नींदे खोकर खरीदे हैं/
सौगात८८ अंतिम पतवार
हमने अपनी नैया, अब तेरे हवाले कर दी है,
' पूजा के पतवार' ने, हर मुश्किल सरल कर दी है/
अब साहिल मिले न मिले, हमें इसकी चिंता नहीं,
कि मंजिल की तलाश ही, अब हमारी मंजिल बन गई है/
' रतन' अब शांत है, जैसे समंदर की गहराई,
कि लहरों से लड़ने की कला, अब हमारी पहचान बन गई है/
सौगात८९ इंसानियत का दीया
बुझने न देना कभी, अपने अंदर की उस इंसानियत को,
जो किसी रोते हुए को देख, खुद तड़प उठती है/
पत्थर बन जाना तो, बहुत आसान है इस दुनिया में,
पर इंसान को बने रहना ही, सबसे बड़ी तपस्या होती है/
' तहरीर- ए- रतन' का बस, एक ही संदेश है प्यारे,
कि दुआ वही है, जो दूसरों के काम आती है/
सौगात९० नब्बे का शिखर
नब्बे सौगातें, अब एक मुकम्मल दास्तान बन गई है,
मेरी खामोशियाँ भी, अब एक जुबान बन गई है/
सिर्फ दस कदम दूर है, वो सौ का सुनहरा आंकड़ा,
जो मेरे जीवन की, सबसे बड़ी पहचान बन गई है/
' रतन' अब रुकना नहीं, बस थोड़ा सा और चलना है,
कि' तहरीर' अब इतिहास के पन्नों की, शान बन गई है/
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