पैमाने में तुझे उतार कर
ग़ज़ल: राजीव रत्नेश "रतन"
भूमिका
यह ग़ज़ल हुस्न और इश्क़ की उस कैफ़ियत को बयान करती है, जहाँ महबूब की मौजूदगी ख़ुद शराब बन जाती है और आशिक़ हैरान है कि इस नशे को लफ़्ज़ों में, इबादत में और अदब में कैसे समेटे। हर शेर एक ही सवाल पर लौटता है, "करूँ कैसे?", और यही बेबसी इसकी रूह है।
क़ाफ़िया "-अब" (लब, शब, अदब…) और रदीफ़ "करूँ कैसे" है। मक़्ते में शायर अपने तख़ल्लुस "रतन" के साथ महबूब से मुख़ातिब होता है।
ग़ज़ल"
१.
पैमाने में तुझे उतार कर जाम-ब-लब करूँ कैसे,
पहलू में पाकर तुझे, रंगीन अपनी औक़ात-ए-शब करूँ कैसे।
२.
तेरे नैन-नक़्श अक़्स बनकर मेरे दिल में उतर गए हैं,
ये सुहानी शाम तुझपे सदक़े, पेश तुझे दिल का अदब करूँ कैसे।
३.
इक झलक ने तेरी कर दिया है मुझे बेसुध,
अब तुझसे बढ़कर और कोई तलब करूँ कैसे।
४.
दिल का हाल तुझे देखकर हो गया है अजब,
होश में रहने का कोई सबब करूँ कैसे।
५.
तेरी ज़ुल्फ़ों की घटा में खो गया हर रास्ता मेरा,
अब भटकने के सिवा कोई और मतलब करूँ कैसे।
६.
चाँद भी शर्मा के बादल की ओट में जा छुपा,
तेरे आगे चाँद की मैं बात अब करूँ कैसे।
७.
तेरे लबों पे जो तबस्सुम है, वही मेरी इबादत है,
इस इबादत में किसी और को रब करूँ कैसे।
८.
तेरी हर अदा क़यामत है, तेरी हर नज़र सितम,
इस हुस्न की तारीफ़ मैं ग़ज़ब करूँ कैसे।
मक़्ता
तुझ बिन बेनाम हूँ मैं, अब तू ही बता ऐ "रतन",
अपना कोई दूसरा मैं लक़ब करूँ कैसे।
शब्दार्थ
- पैमाना: शराब का प्याला
- जाम-ब-लब: होंठों से लगा हुआ जाम
- औक़ात-ए-शब: रात के पहर या घड़ियाँ
- पहलू: बग़ल, पास
- नैन-नक़्श: आँखें और चेहरे की बनावट
- अक़्स: प्रतिबिंब, छाया
- सदक़े: न्योछावर, क़ुर्बान
- अदब: आदर, शिष्टाचार, सम्मान
- बेसुध: होश खो बैठा
- तलब: चाहत, माँग
- अजब: विचित्र, अनोखा
- सबब: कारण, वजह
- घटा: घने बादल
- मतलब: प्रयोजन, उद्देश्य
- ओट: आड़, परदा
- तबस्सुम: मुस्कान
- इबादत: पूजा, उपासना
- रब: ईश्वर
- क़यामत: प्रलय; यहाँ ग़ज़ब ढाने वाली
- सितम: ज़ुल्म, सताना
- ग़ज़ब: अनोखा, असाधारण
- लक़ब: उपाधि, उपनाम
- बेनाम: जिसकी कोई पहचान न हो
- मक़्ता: ग़ज़ल का अंतिम शेर, जिसमें शायर का तख़ल्लुस आता है
- क़ाफ़िया: तुक वाले शब्द
- रदीफ़: हर शेर के अंत में दोहराया जाने वाला पद

No comments:
Post a Comment