होश आया तो
नज़्म: राजीव रत्नेश "रतन"
भूमिका
ग़ज़ल के हर शेर की अपनी अलग दुनिया होती है, जबकि नज़्म एक ही ख़याल को शुरू से आख़िर तक एक धारा की तरह बहाती है। यह नज़्म क़ाफ़िये और रदीफ़ की बंदिश से आज़ाद है। इसकी ख़ूबसूरती इसके मंज़र में है: मदहोशी का एक लम्हा, उसके बाद की ख़ामोशी, और फिर होश आने पर वही एहसास, जो पलकों पर ठहरा रह जाता है।
नज़्म का पहला बंद शायर की मूल पंक्तियाँ हैं और आगे के बंद उसी भाव को विस्तार देते हैं। आख़िरी बंद में नज़्म उसी "पलकों पर" के एहसास पर लौटती है, जहाँ से उसने शुरुआत की थी।
नज़्म
१.
मैं मदहोश हुआ कैसे, ख़बर नहीं,
देखा तो तेरे लब थे मेरे लबों पर,
होश आया तो पाया, तू
झुकी थी मेरी पलकों पर।
२.
वो कौन-सी घड़ी थी, जब वक़्त थम गया,
साँसों में साँसें घुल गईं,
और रात ने चुपके से
अपना आँचल हम पर डाल दिया।
३.
न कोई सवाल था, न कोई जवाब,
बस ख़ामोशी की एक मीठी-सी सरगोशी थी,
तेरी ज़ुल्फ़ों की ख़ुशबू
मेरी रूह तक उतर आई थी।
४.
अब जब सुबह की पहली किरन
खिड़की से झाँकती है,
मैं सोचता हूँ,
वो ख़्वाब था या हक़ीक़त?
५.
बस इतना जानता हूँ,
तेरे लबों की नमी अब भी मेरे लबों पर है,
और तेरी नज़र की ठंडक
अब भी मेरी पलकों पर।
शब्दार्थ
- नज़्म: एक विषय या भाव पर लिखी गई कविता, जिसमें ग़ज़ल की तरह क़ाफ़िये-रदीफ़ की पाबंदी ज़रूरी नहीं
- आज़ाद नज़्म: बिना तुक और बिना बंधे छंद की नज़्म
- बंद: नज़्म का एक खंड, यानी पद
- मदहोश: नशे या ख़ुमारी में डूबा हुआ
- लब: होंठ
- पलकें: आँख के ऊपर-नीचे के पर्दे
- घड़ी: पल, क्षण
- वक़्त: समय
- आँचल: पल्लू, ओढ़नी का किनारा; यहाँ रात की चादर
- ख़ामोशी: चुप्पी, मौन
- सरगोशी: कानों में धीमे से कही गई बात, फुसफुसाहट
- ज़ुल्फ़ें: लंबे घने बाल
- रूह: आत्मा
- किरन: रोशनी की रेखा
- ख़्वाब: सपना
- हक़ीक़त: सच्चाई, वास्तविकता
- नमी: हल्की गीलापन, तरावट
- ठंडक: शीतलता, सुकून
- तख़ल्लुस: शायर का उपनाम

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