तुझ पर ग़ज़ल लिखूँ
ग़ज़ल: राजीव रत्नेश "रतन"
भूमिका
यह ग़ज़ल एक मीठी हैरानी से शुरू होती है: महबूब पर ग़ज़ल लिखूँ, या महबूब को ही ग़ज़ल में उतार दूँ? इसी उलझन में शायर कभी हुस्न की शफ़्फ़ाफ़ी पर ठिठकता है, कभी मदमाती आँखों के नशे पर, कभी वाइज़ की नसीहत पर मुस्कुराता है, और कभी इश्क़ के तोहफ़े में काँटे और गुलाब का हिसाब लगाने बैठ जाता है।
हर शेर का आख़िरी सवाल एक ही है: "क्या करूँ?"। यही रदीफ़ पूरी ग़ज़ल में शोख़ी, नाज़ और बेबसी की एक महीन डोर बाँधे रखता है। क़ाफ़िया "-आब" (ख़्वाब, शराब, हिजाब, हिसाब, आफ़ताब…) और रदीफ़ "क्या करूँ" है। मक़्ते में शायर अपने तख़ल्लुस "रतन" के साथ इश्क़ के सवाब और अज़ाब के बीच खड़ा, महबूब से ही राह पूछता है।
ग़ज़ल
मतला
तुझ पर ग़ज़ल लिखूँ या ग़ज़ल में तुझे उतारूँ, जनाब, क्या करूँ,
हैरान हूँ मैं, ऐ मेरे ख़्वाब, क्या करूँ।
२.
तेरे शफ़्फ़ाफ़ हुस्न की क्या बात, और ये मदमाती आँखें,
इनका कॉकटेल पी लिया, अब शराब क्या करूँ।
३.
मीनार पर चढ़ा वाइज़ सरहद के पार देखे,
तू सामने है, तो निगाहों में हिजाब क्या करूँ।
४.
तोहफ़ा तो प्यार का तूने ही दिया था मुझको,
काँटा था या गुलाब, इसका हिसाब क्या करूँ।
५.
तू मुस्कुरा दे तो रात में भी सहर हो जाए,
फिर चाँद का मैं और आफ़ताब क्या करूँ।
६.
तू ही सवाल मेरा है, तू ही जवाब भी,
इस दिल की बेक़रारी, ये इज़्तिराब, क्या करूँ।
७.
वो कहते हैं, नज़र का धोखा है तू, मैं मानूँ कैसे,
तू मेरे सामने है, तुझे सराब क्या करूँ।
मक़्ता
इश्क़ तो ऐ "रतन" सवाब भी है, अज़ाब भी,
तू ही बता कि इनमें मैं इंतिख़ाब क्या करूँ।
शब्दार्थ
- जनाब: आदरणीय; यहाँ प्यार भरी शोख़ी में महबूब के लिए संबोधन
- शफ़्फ़ाफ़: पारदर्शी, निर्मल, उजला
- मदमाती: नशीली, मस्ती से भरी
- कॉकटेल: कई चीज़ों को मिलाकर बना मिश्रित पेय
- शराब: मदिरा
- वाइज़: धर्मोपदेशक, नसीहत देने वाला
- मीनार: ऊँचा स्तंभ, मस्जिद की ऊँची मीनार
- सरहद: सीमा
- हिजाब: परदा, आड़
- तोहफ़ा: उपहार
- हिसाब: गणना, लेखा-जोखा
- सहर: सुबह, भोर
- आफ़ताब: सूरज
- इज़्तिराब: बेचैनी, बेक़रारी
- सराब: मृगतृष्णा, छलावा
- सवाब: पुण्य, अच्छे कर्म का फल
- अज़ाब: पीड़ा, यातना
- इंतिख़ाब: चुनाव, चयन
- मतला: ग़ज़ल का पहला शेर, जिसके दोनों मिसरों में क़ाफ़िया-रदीफ़ आता है
- मक़्ता: ग़ज़ल का अंतिम शेर, जिसमें शायर का तख़ल्लुस आता है
- क़ाफ़िया: तुक वाले शब्द
- रदीफ़: हर शेर के अंत में दोहराया जाने वाला पद
- तख़ल्लुस: शायर का उपनाम

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