--------- राजीव रत्नेश' रतन'
भूमिका
यह गजल एक खुद्दार आशिक की सफाई है/ वफा से महरूम
होकर भी वह खुद को महबूब का शिकार मानने को तैयार नहीं/
रदीफ" तो नहीं" हर शेर में एक इंकार की तरह आता है: मैं टूटा
हूँ, पर हारा नहीं; चाहता हूँ, पर बेबस नहीं/ मकते में यह तेवर
आखिरी बार खुलता है, जहाँ शायर मानता है कि मुहब्बत का
सौदा उसने अपनी मर्जी से किया था/
गजल
महरूम- ए- वफा हूँ पर तेरा शिकार तो नहीं,
तेरा हूँ मगर आशिक- ए- बेइरि०तयार तो नहीं/
तेरी गली में आना मेरी आदत ही सही मगर,
ये आना-जाना मेरा इंतजार तो नहीं/
हर जख्म पर मैं मुस्कराया हूँ, ये सच है पर,
इस मुस्कराहट में कोई इकरार तो नहीं/
तेरी भी कभी गम में भींगी होगी आँख,
इस आँख में छिपा कोई गुबार तो नहीं/
दर्द मेरे दिल का मुझे अजीज है बहुत,
पर इस दर्द पर मुझे ऐतबार तो नहीं/
तूने बहारें मांग लीं, मैंने खिजाँ चुनी,
इस चुनाव में मेरे लिए बहार तो नहीं/
उम्र भर जलता रहा मैं तेरे नाम की आग में,
राख हूँ अब, मगर ये भी बेकार तो नहीं/
मकता:
सौदा किया था दिल का' रतन' ने खुशी-खुशी,
अब कहता है, ये सौदा कोई उधार तो नहीं//
शब्दार्थ:
महरूम: वंचित, जिसे कुछ मिला न हो
वफा: निष्ठा, निभाने का भाव
शिकार: आखेट का पात्र, यहाँ जाल में फँसा हुआ
बेइरिव्तयार: जिसका स्वयं पर वश न रहे
आशिक: प्रेमी
इकरार: स्वीकार, हामी
गुबार: धूल, मन की कड़वाहट
अजीज: प्रिय
ऐतबार: भरोसा
रिवजाँ: पतझड़
सौदा: लेन-देन, दीवानगी भी
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