Saturday, June 6, 2026

मुझसे भारी मेरा बस्ता (०८ नवंबर २०२५ )

" मुझसे भारी मेरा बस्ता" विषय( जीवन की विडंबनाएँ और
यथार्थता के अंतर्गत) अत्यंत महत्वपूर्ण, समसामयिक और संवेदनशील है/ यह विषय सीधे शिक्षा- व्यवस्था, बचपन के खो जाने और महत्वाकांक्षाओं के बोझ को दर्शाता है/ हम इसे निम्न बिंदुओं द्वारा समझने की चेष्टा करेंगे/
(१) शिक्षा व्यवस्था की विडंबना
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           बच्चों के स्वस्थ एवं शुद्ध प्राकृतिक शिक्षा- निकेतनों का आधुनिक युग में अभाव सा हो गया है/१००-१५० वर्षों में पहले देश
में गुरुकुलों में पढ़ाई का उन्मुक्त वातावरण हुआ करता था/
            प्राचीन वैदिक युग के गुरुकुलों में फूल, तितली, गिलहरी और
खरगोश तथा मृगशावकों के साथ खेल-खेल में पढ़ाई होती थी/
गुरुकुलों में किसी के नाम के साथ जातिसूचक शब्द नहीं होते थे/
प्राचीन भारत में वर्ण-व्यवस्था जाति- आधारित न होकर कर्मप्रधान हुआ करती थी/
(२) सह- शिक्षा और उससे नुकसान
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              आजकल सह- शिक्षा का दौर है/ पहले बालक-बालिकाओं के विद्यालय और अध्यापक अलग- अलग होते थे/ लड़कियों के
विद्यालय से लड़कों के विद्यालय दो कोस दूर होते थे/
      माता- पिता की महत्वाकांक्षाओं का दबाव
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आजकल के माता- पिता जो खुद कुछ न कर पाए , वो बच्चों से
वो सब कुछ चाहते हैं और उन पर मानसिक और शारीरिक रूप से
दबाव बनाते हैं, जिनमें निम्न हैं-------
        मेरा बच्चा सबसे आगे: माता- पिता द्वारा बच्चों पर सामाजिक
प्रतिष्ठा और अपनी अधूरी महत्वाकांक्षाओं का भार डालना/
        प्रतिस्पर्धा की दौड़: बच्चों को बचपन से ही' चूहा दौड़' में
धकेलना / यह सोचे बिना कि उनकी अपनी रुचि क्या है/
         महंगे स्कूल और बस्ते: भारी-भरकम फीस और डिजाइनर
बस्तों का चलन, शिक्षा को एक विलासिता बना देता है/ आजकल म्यूनिस्पल और सरकारी स्कूलों की संख्या नाममात्र की रह गई है,
जिसकी जगह प्राइवेट पब्लिक स्कूल गली-गली में खुलते जा रहे हैं/
           किताबों की बाढ़: पाठ्यक्रम में हर छोटी चीज के लिए अलग-
अलग किताबें थोपना, जिससे बस्ते का वजन गैर- जरूरी रूप से बढ़ जाता है/ यही नहीं वे किताबें, बस्ते आदि स्वयं ही देते हैं, जिसमें उनका कमीशन अन्तर्हित होता है/
          स्वास्थ्य और शारीरिक प्रभाव
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                 शारीरिक विकृति: भारी बस्ते के कारण बच्चों में कमर दर्द, रीढ़ की हड्डी में समस्या और कंधों का झुक जाना( जो बचपन में
पढ़ाई से लेकर ताउम्र कंधों पर लैपटाप, टिफिन और पानी की बोतल लादे रहते हैं/ अब तो शुद्ध पानी भी बिकाऊ है और टंकियों का पानी
बीमारियों का गढ़) जैसी स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा होना/
                   मानसिक तनाव: लगातार दबाव के कारण बच्चों में तनाव, चिंता और चिड़चिड़ापन बढ़ना/ जिसकी वजह से वो मनोरोगी हो जाते हैं और कम उम्र में ही साइकेट्री के शिकार तक हो सकते हैं/
बस्ते का वजन वास्तव में बचपन की मासूमियत और सहजता का
हनन कर रहा है/
                बहुमुखी विकास की अनदेखी
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                     पाठ्यक्रम में कला, संगीत, शारीरिक शिक्षा( पी ० टी०) और नैतिकता जैसे विषयों को कम महत्वपूर्ण मानना, जबकि
विज्ञान और गणित को ही भविष्य का निर्णायक समझना/
                     खेल का मैदान बनाम ट्यूशन: वह समय जो बच्चों को
खेलने, कल्पना करने और प्रकृति के साथ बिताने चाहिए, वह अब
होमवर्क के भारी शेड्यूल में कैद है/
                      जेल की उपमा: स्कूल की दिनचर्या एक" रूटीन जेल"
की तरह बन गया है, जहाँ बच्चे अपनी स्वाभाविक जिज्ञासा खो देते हैं/
                       खोई हुई मुस्कान: बच्चों के चेहरे पर सुब्ह- सुब्ह थकान और बोझिलता का दिखना, न कि उत्साह का/
                        ज्ञान नहीं अंक: शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि सर्वाधिक अंक प्राप्त करना बन गया है/ बस्ता रटने की
सामग्री से भरा है/
( 3) शिक्षा में धर्म और राजनीति का प्रवेश
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               धर्म से धार्मिक सौहाद्र बनने की बजाय, देखा जा रहा है और बिगड़ रहे हैं, जो थोड़ी बहुत सहनीय है पर शिक्षा में राजनीति तो
अक्षम्य है/ पहले के जमाने में शिक्षक चाहता तो विद्यार्थियों को
अनुचित व्यवहार पर दंड भी दे सकता था/ राजनीति के प्रवेश शिक्षालय, अखाड़े की मर्यादा संभालने में लगे हैं/ स्कूलों- कालेजों में
स्टूडेन्ट यूनियनें बन गई हैं/ लड़कों को मास्टर जी पसंद न आए तो वे
हड़ताल कर देते हैं और जिन्दाबाद और मुर्दाबाद के नारों के साथ मास्टर साहब को सस्पेंड करा देते हैं अथवा स्कूल- कालेज से निकलवा ही देते हैं/ पहले विद्यार्थी अध्यापक से डरते थे अब
अध्यापक विद्यार्थियों से डरते रहते हैं/ जो शिक्षा के मर्यादित क्षेत्र में
उथल-पुथल मचाने के लिए एक दंडनीय अपराध है/
                प्राचीन भारत के इतिहास में आरुणी और एकलव्य जैसे
विद्यार्थी हो गए हैं जो अपने- अपने गुरु में निष्ठा रखते थे और उनके
कथन को ब्रह्मवाक्य समझते थे/
                दुनिया में जीते हैं वो कीड़े-मकोड़ों की तरह/
                जिन्हें न बढ़ने की तमन्ना, न घटने का गम/.
                गरीब परिवार के बच्चे तो स्कूल का मुख भी नहीं देख पाते क्यूँकि यह महंगी शिक्षा- व्यवस्था बच्चों से समानता का
अधिकार छीन लेती है/ जिनके पास दो वक्त की रोटी का अभाव हो,
वे शिक्षा के बारे में सोचें भी तो आखिर कैसे? वे अपने परंपरागत
हस्त- लाघव से उपार्जन को महत्व देते हैं और आधुनिकता को दूर से
ही नमस्कार करते हैं/
                  किताबों के बोझ तले दब गया बचपन/
                  किसकी खता है, गरीबों के लिए हैं सारे बंधन/
                  हमने न जाना, आजाद खुली हवा में साँस लेना,
                  बोझ लदे हैं हम पर जमाने के अनर्गल/

                   किताबों के बोल तले बचपन किस कदर झुक गया है
                   बचपन में बुढ़ापा आ गया, कंधा किस तरह झुक गया है
                   हमने तो ये भी न सोचा, पापा कैसे काम करते होंगे,
                   उनका सर जमाने के आगे कब का झुक गया है/
               गरीब युवक-युवतियाँ, बहुमंजिला इमारतों में दास-दासियाँ
यथा( ड्राइवर, घर की सफाई और खाना बनाने से लेकर स्त्रियां बच्चों की आया होकर, सभी कुछ न कुछ काम करते हैं/ उनका बचपन
किसने छीना? कहीं वर्तमान महंगी शिक्षा- व्यवस्था ने तो नहीं/
(४) शिक्षा- व्यवस्था और अश्लील साहित्य का प्रकाशन
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                 हिन्दी उपन्यास और अंग्रेजी नावेल तथा फिल्मों में जहाँ-तहाँ अश्लीलता को परोसा गया है, जो उच्च- शिक्षा में चरपरे और
मसालेदार बना कर, हींग- अजवाइन का तड़का देकर प्रकाशित की
जाती हैं/ ऐसे साहित्यों को शिक्षा- सुधार के मद्दे- नजर तुरंत प्रबंधित करना समाज के ठेकेदारों तथा सरकार की नियति होनी चाहिए/ एक
सभ्य समाज के संस्थापन के लिए इन आसुरी- सम्पत्ति वालों का
मूलोच्छेदन तत्काल अनिवार्य है/
(५) सह- शिक्षा विष की जड़
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                   हमारे ऋृषियों- महर्षियों ने शिक्षा के जो नियम बनाए थे,
उनमें पहली व्यवस्था सह- शिक्षा के अभाव की थी/ विश्व- विद्यालयों या डिग्री- विद्यालयों में संभवतः यह व्यवस्था आधुनिक काल में विकसित देशों की देखा-देखी या विश्व की अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं, पाठशालाओं से आई/
                    भारत में पहले ब्रह्मचर्य और सत्य का बोलबाला था/
ऋषियों ने ब्रह्मचर्य को जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं में एक
माना था/ विवाह की उम्र सरकारी गजट में इस समय लड़कियों की
१८ साल और लड़कों की२१ साल है/ पर पहले लड़कियों की उम्र२०
और लड़कों की उम्र४० साल में शादी करने का प्रावधान था/
                      पर मोबाइल और फिल्म- जगत ने हमारे ऋृषियों की
पुरातन सारी अवधारणाओं पर पानी फेर दिया है/ घरों में हर हाथ में
मोबाइल दे दिए जाते हैं/ रात में बंद घर के बाहर भी मोबाइल की
दुनिया तो खुली ही रहती है/ बच्चे मोबाइल- एक्सपर्ट बनते जा रहे हैं
और साथ में जुए की लत का शिकार हो रहे हैं/ आधुनिकता तो
देखिए बच्चों और अभिभावकों तथा स्कूल- टीचर्स को भी एक ऐप से
जोड़ने की तैयारी की जा रही है/ मोबाइल से कम उम्र में ही चैट और
डेटिंग का प्रचलन दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है/ प्रकारान्तर में आत्महत्या और हत्या तथा सारबर- ठगी जैसे प्रकरणों से आए दिन
समाचार-पत्र भरे रहते हैं/ मोबाइल के फायदे कम हैं तो नुकसान
ज्यादा/ विभिन्न ऐप, विज्ञापन तथा अश्लीलता का प्रचार- प्रसार करने
में जितनी भूमिका मोबाइल की है, उससे अधिक कहीं घर- घर मे
 शाम से लेकर रात गए तक टी०वी० कार्यक्रमों की भी भागीदारी है/
                      कारण साफ है लड़के-लड़कियाँ---- ब्रह्मचर्य नाम की
कोई चिड़िया भी इसी भारत देश में हुआ करती थी----- भुला बैठे हैं/
आधुनिकता के नए परिप्रेक्ष्य में वो अपनी हानि को भी लाभ मानने
के लिए मानसिक तौर पर पंगु हो गए हैं/ ब्रह्मचर्य का पालन कोई नहीं कर पा रहा है, जो कि अर्वाचीन भारत की पहली अनिवार्यता है/       
(६) यथार्थ और समाधान का आह्वान
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                         क्या हम सब अपने बच्चों को यथार्थ से परिचित करा, उन्हें मानसिक रूप से परिपक्व बनाने में ऋषियों- महर्षियों के
दिए हुए मूलभूत सुझाओं का आदर करेंगे और टी०वी तथा मोबाइल
जैसे अनावश्यक समय- खाऊ संसाधनों से छुटकारा दिलाएँगे तथा
कम से कम अपने बच्चों को भविष्य में कुछ अच्छा कर गुजरने योग्य
बनाने की महत्वाकांक्षाओं से राष्ट्र को अनुग्रहित करेंगे/ दुनिया आपके
ही इंतजार में, टकटकी लगाए आपकी ओर देख रही है कि आप एक
कदम इस दिशा में आगे बढ़ाएँ तो लाखों कदम आपके पीछे निकलेंगे/
                             विश्वास मानिए विकसित देश इस आधुनिकता
से ऊब चुके हैं और शान्ति पाने के लिए विश्व- गुरु भारत की ओर
उत्सुक्ता से देख रहे हैं/ मेरा शाश्वत प्रश्न अभी भी यही है कि आधुनिक
बस्ता बच्चों को उड़ान भरने के लिए पंख मुहैय्या करा रहा है अथवा उन्हें जमीन से और भी बाँध रहा है?
                       राजीव रत्नेश
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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!