Monday, July 6, 2026

तहरीर- ए- रतन ( सौगात (२१) से (३०)/

सौगात (२१)  ' तन्हाई का जश्न '
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जिसे दुनिया तन्हाई कहती है, वो मेरा सुकून है,
यहाँ मैं और मेरी तल्खियाँ, आमने-सामने होती हैं/

शोर-शराबे में तो अक्सर खुद को खो दिया हमने,
सन्नाटों में ही अक्सर, रुह से बातें होती हैं/

 ' रतन ' को ढूँढ़ना हो तो महफिलों में न जाना,
वो तो अपनी ही यादों की गलियों में, गुमशुदा रहता है/

सौगात (२२) ' नदी और किनारा '
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हम वो नदी हैं, जिसे समंदर की तलाश नहीं,
हमें तो बस अपने किनारों की मर्यादा प्यारी है/

बहना ही हमारी फितरत है, रुकना हमारी मौत,
पत्थर भी आ जाएँ राहों में, बहना हमारा जारी है/

चंदा के साथ नाम का जो साथ मिला है ' रतन '
उसी के सहारे हमने तूफानों से बाजी मारी है/

सौगात (२३) ' कलम की इबादत '
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लोग मंदिर जाते हैं, कोई मस्जिद में झुकता है,
मेरा सजदा मेरे कलम के पन्नों पे होता है/

जो दर्द जुबां तक नआ सका मुद्दतों से,
वो स्याही बन कर कागज पे धीरे से रोता है/

' तहरीर ' जो उतरती है रूह की गहराइयों से,
वही तो खुदा का नूर, मेरी आँखों में बोता है/

सौगात ( २४ ) ' अक्स और आइना '
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जमाना बदल गया, या मेरी नजर बदल गई,
अब आइने में अपना अक्स, बेगाना सा लगता है/.

कल तक जो सपने आँखों में घर किए बैठे थे,
आज उनका पता पूछना, पुराना सा लगता है/

पर एक याद है ' रतन ', जो कभी बूढ़ी नहीं होती,
उसका चेहरा आज भी, सुहाना सा लगता है/

सौगात ( २५ ) ' मुठ्ठीगंज का वो शजर ( वृक्ष ) '
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याद आता है मुठ्ठीगंज का वो पुराना शजर,
जिसकी छाँव में हमने, कई सपने बुने थे/

आज वो पेड़ तो शायद न रहा होगा वहाँ,
पर उसकी जड़ों में, हमारे बचपन दबे थे/

कंक्रीट के इन जंगलों में अब ' रतन ',
वो मिट्टी की खुश्बू, बस यादों में रह गई है/

सौगात (२६ ) ' अधूरी इबादत '
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कुछ पन्ने कोरे ही रह गए मेरी जिंदगी की किताब में,
शायद उनमें तुम्हारा जिक होना अभी बाकी था/.

हमने तो भर दी थी स्याही अपने लहू से ' रतन '
पर उस तहरीर का मुकम्मल होना अभी बाकी था/

अब ' नोयडा ' की इन रातों में बैठ कर सोचता हूँ,
कि उस अधूरी इबादत का दर्द, सहना अभी बाकी था/

सौगात ( २७ ) ' दुआओं का सफर '
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रास्ते कितने ही पथरीले क्यूँ न हों ' रतन '
जिसके साथ चंदा की दुआएँ हों, वो थकता नहीं/

समंदर की लहरें भी रास्ता दे देती हैं उसे,
जिसका यकीन अपने पतवार पे हो, वो डूबता नहीं/

हमने तो उम्र गुजारी है इसी भरोसे के सहारे,
कि नेकी का दामन थामने वाला कभी गिरता नहीं/

सौगात (२८ ) ' इलाहाबादी मिजाज '
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हमारे लहज में आज भी वही पुरानी चाशनी है,
जो कभी संगम की मिट्टी से चुराई भी हमने/

शहर बदले, हालात बदले, पर मिजाज न बदला,
वही सादगी, जो मुठ्ठीगंज में कमाई थी हमने,

लोग पूछते हैं इस मुस्कान का राज ' रतन '
उन्हें क्या पता, कितनी तकलीफें छिपाई थीं हमने/

सौगात (२९) ' मुखौटों का शहर '
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इस शहर में हर शख्स, चेहरा बदल कर मिलता है,
पहचानना मुश्किल है कौन अपना, कौन पराया है/

हकीकत की तलाश में निकले थे हम ' रतन '
पर यहाँ तो हर तरफ, झूठ का साया है/

हमने तो अपनी सादगी ही बचा के रख छोड़ी है,
यही वो सरमाया है, जो हमने कमाया है/

सौगात (३० ) ' धड़कन की गूँज '
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शब्दों के जाल में भावों को मत ढूँढ़ना,
ये तो मेरी धड़कनों की सीधी सी पुकार है/

जो दर्द कलम से कागज पे उतर आया ' रत्न '
वही तो इस तहरीर का असली आधार है/

तीस सौगातें तो बस एक शुरुआत है अभी,
आगे तो यादों का, पूरा एक संसार है/

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!