औकात कहाँ से लाऊँ ( गजल )
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तुम्हारी औकात है, औकात अपनी मुझे दिखाओ,
मेरी तो औकात नहीं है कि वैसे तुझे दिखाऊँ/
शबे- बारातें सब याद मुझे, लम्हा-लम्हा फिसलता हुआ,
वो जिन्दगी की आखिरी शबे- रात कहाँ से लाऊँ/.
तुझे देख कर पहली बार जो दिल धड़का था मेरा,
तब का अपना तेरे लिए इजहार कहाँ से लाऊँ/
तू जो आमादा है, धज्जियाँ मोहब्बत की उड़ाने को,
तेरे लिए अब मैं पुराने अखबार कहाँ से लाऊँ/
गुजर चुका अब तो सर से पानी भी कब का,
मैं कोई गोताखोर नहीं, अच्छा तैराक कहाँ से लाऊँ/
तेरी ' ना' को' हाँ' में तब्दील करूँ तो आखिर कैसे,
दिल के मिटे अपने अरमान कहाँ से लाऊँ/
मिलन की झूठी तसल्लियाँ भी तू अब मुझे न दे,
जमाना बाद में भूल जाएगा, तुझे मेहरबाँ कहाँ से बनाऊँ/
तेरी तस्वीर तो सब जाहिरे- जमाना कर दूँ, गर चाहे,
तस्वीर के लिए अब इश्तहार कहाँ से लाऊँ/
जमाना था पहले भी मुद्दई, उसको क्या समझाऊँ,
तुझे मंजूर नहीं तो किस तरह तेरा फैसला सुनाऊँ/
जानता हूँ तू मान छोड़ कर फिर-फिर आवेगी,
तेरे साथ के लिए सब्रो- एहतियात कहाँ से लाऊँ/
कभी मेरे दिल का सुकूं थी तू हुस्न की मलिका,
सबके सामने तेरा हाथ पकड़ने की औकात कहाँ से लाऊँ/
मुतमईन हूँ, हुस्नवालों की तरफदारी जमाना करेगा,
अपनी वफा का तेरे सिवा कद्र दां कहाँ से लाऊँ/
उखड़ रही साँस अब तो भुला कर शिकवे आ जाओ,
दिल में घुमड़ रहे कैसे जज्बात तुझे कहाँ से बताऊँ/
तुझसे तो बिछड़ने का गम कुछ ज्यादा ही ' रतन ' को,
जनाजा तो जनाजा, तुरबत पर भी नआए, कैसे किसी की समझाऊँ//
राजीव रत्नेश

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