कल हमने- तुमने नवसृजन का सपना देखा था शायद/
तुमको याद हो कि न याद हो, कल के बिछड़े मिलेंगे,
ऐसा ही कुछ अंजामे- वफा हमने साथ देखा था शायद/
मेरी अंतर्व्यथा शायद शब्दों में पूरी उतर न सकी,
कुछ पीड़ाएँ खामोशी की जुबान में ही पलती हैं/
कल नवसृजन का जो स्वप्न साथ बुना था हमने,
आज उसकी राख में भी कुछ चिंगारियाँ जलती हैं/
आपको याद हो न याद हो, उन वादों की वह शाम,
हमने भी कभी आने वाले कल की तस्वीर सँवारी थी/
' कल के बिछड़े आज मिलेंगे '-- यही विश्वास था हमें,
इसी उम्मीद में हमने कितनी रातें साथ गुजारी थीं/
अंजाम- ए- वफ़ा की राह आसान कहाँ होती है,
मगर हमने तो हर मोड़ पर साथ चलने की ठानी थी/
अब जो फासले हैं, उन्हें भी एक कहानी मान लेते हैं,
क्यूँकि कुछ रिश्ते दूरी में ही अपनी निशानी रखते है/
राजीव रत्नेश
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