राह की मेरी वह रुकावट न था ( गजल)
++++++++++++++++++++++++
देखा उसे, प्यार हुआ, रोजो- रोज उसका इंतजार होने लगा/
जो कल होना था, वही कहीं आज तो नहीं होने लगा/
करीब से करीब आने की कोशिशें होने लगीं,
बेसाख्ता वो दिन- ब- दिन मुझ पर मेहरबां होने लगा/
कभी उससे कहा नहीं मैंने कि उस पर मरता हूँ,
खामख्वाह वो मुझ पर मरने का दावा करने लगा/
मैं क्या कहता, चुप सी लगा रखी थी मैंने भी,
कायनात भर में मुझे उससे बढ़कर कहाँ था मिलने वाला/
कुछ दिनों का मेरा मौन उस पर भारी पड़ गया,
वह रोज ही मुझसे मिलने को बहाने ढूढ़ने लगा/
कितने कितआत उसे नजर में भरकर मैंने लिखे,
दिन पर दिन वो मेरी गजलों का उजाला होने लगा/
वो मेरी खामियों को भी जानबूझ कर हुनर बताने लगा,
बागों में प्यार के झूले पर दम भर पेंग बढ़ाने लगा/
मैं नहीं चाहता था कि प्यार अभी इस कदर परवान चढ़े,
माँग उसकी सिन्दूरी किए बिना, आगे बढ़ने में घबराने
लगा/
. दूर से घंटियाँ बोलने लगीं गाँव के शिवाले की,
पंडे जोशो-खरोश से भाँग घोटने की तैयारी करने लगे/
नहीं चाहता था कि अभी से वो मेरा नाम लेकर पुकारे,
चार दिन बाद ही उसकी माँग सजाने की सोचने लगा/
आगाज तो हमने मुहब्बत का कर ही दिया था अपनी जबानी,
अब वो हथेलियों से मुँह ढाँप खिलिखिलाने लगा/
अब डोली लेकर उसे विदा कराने कब आऊँ, पूछा उससे,
उसका जवाब पाने को उसके आगे-पीछे चक्कर लगाने लगा/
मैं समझा कि पहले मुझे वो मेरे बच्चों का बाप बनाने
पे उतारू है,
फिर बाद में अग्नि के सात फेरों में बंधने का इरादा
समझ आने लगा/
समझने को तो मैं समझता था चालाकियाँ उसकी,
वह रोज हुनर- दर- हुनर, खुद-ब-खुद मुझे आजमाने
लगा/
साफ-साफ मैंने उससे कह ही दिया इक दिन,
बिना मुहिम पूरा किए, मैं किसी फंदे में आने से रहा/
जब भी मिलता वो मुझसे अब काम काम से ही,
मेरे साथ हमेशा रहा, मेरे अभियान से वो जुड़ा हुआ/
आज उसको देखता हूँ कि ठुकरा के उसे गलत किया
मैंने,
वह तो मेरी चाहतों की चाहत था, मेरे अरमानों से जुड़ा हुआ/
ये दिलफरेब रास्ते कब तक मुझे फरेब आखिर देते,
उसके और अपने घरवालों से बात कर, उस अपना बना लिया/
मेरा अभियान तो पूरा हुआ, पर अस्ल तो अधूरा ही रहा,
उसे पूरा करने को मैंने आगे बढ़ने का इरादा किया/
जिसकी आँखों में नीली जमुना तिरती थी,
उसी जमुना में डुबकी लगाने को आमादा हुआ/.
मैंने उससे प्यार किया था, अनजाने झुठला बैठा था,
वह तो मेरी साँसों की साँस था, उससे कैसे जुदा रहा/
घर- बार सब कुर्बान करने की बारी मेरी थी,
वह तो कभी का सब छोड़ कर था निकला हुआ/
" रतन" की वह कमजोरी कभी न रहा, मजबूरी भी न
हुआ,
जिया उसकी फैली थी खलाओं के पार तक, राह की
मेरी वह रुकावट न था//
राजीव रत्नेश
""""""""""""""
