Sunday, July 12, 2026

मेरी अंतर्व्यथा शायद कोई ( कविता )

मेरी अंतर्व्यथा शायद कोई समझता तो अच्छा होता,
कल हमने- तुमने नवसृजन का सपना देखा था शायद/
तुमको याद हो कि न याद हो, कल के बिछड़े मिलेंगे,
ऐसा ही कुछ अंजामे- वफा हमने साथ देखा था शायद/

मेरी अंतर्व्यथा शायद शब्दों में पूरी उतर न सकी,
कुछ पीड़ाएँ खामोशी की जुबान में ही पलती हैं/

कल नवसृजन का जो स्वप्न साथ बुना था हमने,
आज उसकी राख में भी कुछ चिंगारियाँ जलती हैं/

आपको याद हो न याद हो, उन वादों की वह शाम,
हमने भी कभी आने वाले कल की तस्वीर सँवारी थी/

' कल के बिछड़े आज मिलेंगे '-- यही विश्वास था हमें,
इसी उम्मीद में हमने कितनी रातें साथ गुजारी थीं/

अंजाम- ए- वफ़ा की राह आसान कहाँ होती है,
मगर हमने तो हर मोड़ पर साथ चलने की ठानी थी/

अब जो फासले हैं, उन्हें भी एक कहानी मान लेते हैं,
क्यूँकि कुछ रिश्ते दूरी में ही अपनी निशानी रखते है/

              राजीव रत्नेश
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मैं उलझनों में मुस्करा लूँगा ( गजल )

मेरी खामोश धड़कनों को एक नाम देना/
बुझते हुए खवाबों को फिर अंजाम देना/

साज मैंने छेड़ा मोहब्बत की राहों में
मुझे जरा तुम अपनी आवाज देना/

अगर मिलो तो मुस्करा कर मिलना,
मेरी तन्हाई को थोड़ा सा आराम देना/

मैं इश्क की बाजी जीतना नहीं चाहता,
बस अपने अहसासों को थोड़ा मुकाम देना/

अगर मेरी मुहब्बत तुम्हारी मंजिल न बने,
जाते-जाते मुझे दुआओं का पैगाम देना/

मैं शिकायतों का सफर नहीं लिखूँगा,
तुम बस अपनी यादों का एक जाम देना/

किस्मत में लिखा हुआ ही अंजाम होगा,
मुझे बस अपने दिल में एक शाम देना/

मैं उल्झनों में भी मुस्कुरा लूँगा ' रतन '
तुम मेरी खामोशी को भले इल्जाम देना/

              राजीव रत्नेश
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किसी सुबह की आहट बाकी है ( गजल )

मैं उलझनों का शिकार हो गया हूँ,
लगता है दिल से बीमार हो गया हूँ/

एक अनजान सी सूरत दिल में बसा के,
खामोश हूँ-- मैं भी कितना नादान हो गया हूँ/

खुद की ही आवाज से डरने लगा हूँ,
शायद अपने ही विचारों का शिकार हो गया हूँ/

जो रास्ते कभी आसान लगे थे,
अब उन्हीं मोड़ों पर बेकरार हो गया हूँ/

कुछ सवाल दिल में ठहर से गए हैं,
कुछ जवाबों का इंतजार हो गया हूँ/

फिर भी कहीं एक दीप जलता है,
शायद अभी पूरी तरह हर नहीं गया हूँ/

किसी सुबह की आहट बाकी है मुझमें ' रतन '
मैं बस थोड़ी देर का अंधकार हो गया हूँ/

                राजीव रत्नेश
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Saturday, July 11, 2026

तुम सा एक रहनुमा ( गजल )

तुम सा एक रहनुमा  ( गजल )
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नजरों से गिरा हूँ, दिल में रहा चाहता हूँ/
हर हाल तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ/

प्यार सबसे करता हूँ, तगादा नहीं करता,
सब जानते हैं, मैं क्या चाहता हूँ/

प्यार अगर किसी खेल का ही नाम है,
जिंदगी में खेलना मैं ये जुआ चाहता हूँ/

लिख के मेरा नाम जमीं पर मिटाते तो हो,
अगर हर्फे- गलत हूँ, तो मिटा चाहता हूँ/

ये किस तरफ से आई अजान की सदा,
मैं उधर की तरफ बढ़ा चाहता हूँ/

अगर पहले ही रुक जाता, तो संगम न होता,
मैं तो दरिया हूँ बस बहा चाहता हूँ/

तहरीर लिखने की अदा रास न आई मुझे,
मैं तो बस जमाने के लिए आईना चाहता हूँ/

किसी को प्यार में गच्चा देना, मेरा काम नहीं,
मैं तो खुद जमाने के सितम सहा चाहता हूँ/

दुनिया के ऐशो-आराम, तुम्हें हों मुबारक,
मैं न सितारे, न चाँद, न ये जहां चाहता हूँ/

किसी की मुझे गरज नहीं ' रतन '
बस तुम सा एक रहनुमा चाहता हूँ//

           राजीव रत्नेश
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मेरे अँगने में तुम्हारा क्या काम है ( कविता )

मेरे अँगने में तुम्हारा क्या काम है  ( कविता )
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जबसे मेरे घर में हुआ पहली बार पदार्पण तुम्हारा,
मुझे याद आया ' मेरे अँगने में तुम्हारा क्या काम है '/

आँगन तो था नहीं, छत पे ले जा तुम्हें नचाया,
गली के मनचलों ने हूँटिंग कर दी, तुम्हें नीचे बुलाया/

जिसकी बीबी मोटी उसका भी बड़ा नाम है,
एक किक लगा दो, फुटबाल का क्या काम है/

जबसे तुम आईं, मुहल्ले में ' गोरिल्ला- युद्ध ' शुरू हुआ,
दो को पकड़ के ' शांति- भंग ' में उनको बंद कराया/

जिसकी बीबी पतली, उसका भी बड़ा नाम है,
खूँटी से लटका दो, हैंगर का क्या काम है/

तुमने दी थी मुझको एक छल्ला अपनी निशानी,
मैं क्या जानूँ, तुम छत पे खड़ी, गली में दिलबर जानी/

जिसकी बीबी लंबे केशों वाली, उसका भी बड़ा नाम है,
पकड़ कर हाथ-पाँव बाँध दो, रस्सी का क्या काम है /

मैं महबूब तेरा, तेरे नाम- रूप का दीवाना,
मैं खड़ा छत पे, बगल की छत से कोई कुदा/

जिसकी बीबी की आँखें झील, उसका भी बड़ा नाम है,
डुबकी लगा लो, जमुना का क्या काम है/

सुनी-अनसुनी बातों से ही दिल को सहारा हो गया,
तूफान आया न आया, नसीब मुझे किनारा हो गया/

जिसकी बीबी चाँद जैसी, उसका भी बड़ा नाम है,
अमावस की रात छत पे सुला दो, चाँदनी का क्या काम है/

               राजीव रत्नेश
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सइय्यां से भइय्या तक का सफर ( गजल )

सइय्याँ से भइय्या तक का सफर  ( कविता )
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दिल तोड़ने का तुमसे गिला नहीं है/
राखी मुझको भेजा, शिकवा यही है/

मेरी गुस्ताख निगाही पर ब्रेक लगाया,
या साल में दो बार मिलने का मन बनाया/

मुझे ये कैसा तुमने शिफा दिया,
खुल्लम खुल्ला मिलने की रजा दिया/

तुम्हारे पास दिल नहीं पर भेजा तो है,
राखी का लिफाफा मुझे भेजा तो है/

तुमको आना हो तो , जब चाहे आओ,
मैं ही क्यूँ मिलूँ, कुछ तो अक्ल लगाओ/

यूँ तो चोरी-चोरी भी मिल लेते थे,
एक दूसरे की आँखों में झांक लेते थे/

इन बातों की तुमने खुली मुनादी कर दी,
मेरी जेब से जबरन पैसा उगाही कर दी/

निकम्मे थे तो ही हम भले थे,
कमाने लगे हैं, ये बात तुम्हें पता थी/

तुम्हें अपना जान कर ही दोस्ती की थी,
तुमने सारी दोस्ती की ऐसी-तैसी कर दी/

अब तुम्हारी राह तकना भी छूट गया,
जिस राह आओगी, वो रास्ता भी दूर गया/

' रतन ' को सइय्याँ से भइय्या बना गई,
दूर जाके भी मुझे अपना बना गई//

             राजीव रत्नेश
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" जिसके लिए छत पर खड़े रहे,
वो राखी का लिफाफा पकड़ा गई/
रतन चला था सइयाँ बनने,
वो उम्र भर का भइया बना गई// "

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बस तुम्हारे घर की तरफ ( गजल )

बस तुम्हारे घर की तरफ  ( कविता )
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जान जोखिम में है, जबसे तुमसे इजहार किया/
रास्ता चलना हुआ मुश्किल, जो प्यार किया/

ये क्या हुआ, दुपट्टा गले का सर पे डाला,
एक नजर से देखा मुझे, दूसरी से आँख मारा/

इंतजार में तेरे किसी तरह सुब्ह से शाम किया,
तुम आओगी, ये जान कर अब्बू को तुम्हारे सलाम किया/

तुम्हारा अब्बू सब कुछ या तो पहले से जानता था,
या फिर मुझे किसी तरह वो भाँप गया/

दिन में सितारे तो कभी नजर न आए थे,
आज भरी दुपहरिया में चांद उगा, सितारा उगा/

किस तरह रूठ कर थोबड़ा अपना बिगाड़ लिया,
बीच सड़क तमाशा किया, सड़क जाम किया/

मैं जानता था, हम सी० सी० टी० वी० की जद में हैं,
इसीलिए चुप लगाया, खुद से न कोई हंगामा काटा/

तेरी तस्वीर को कलेजे से लगा सिर्फ आहें भरता हूँ,
किसी तरह आँखों ही आँखों में रात गुजारा/

एक लिफाफा भेज दिया तुमने मेरे नाम,
कौन है? कैसी है? कहाँ की है, मेरे वालिदैन ने पूछा/

हैरान है ' रतन ', अब किसको क्या बताए,
गुपचुप तुम्हारे घर की तरफ किया इशारा/

             राजीव रत्नेश
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सी०सी ० टी० वी० के डर से सड़क पर तो
हंगामा बचा लिया,
पर लिफाफा भेज कर महबूब ने वालिदैन के
सामने फँसा दिया /"

आशिकी में  आखिर डर कैसा, गर इजाजत मिली होती,
दामन तो थामा ही था, हाथ भी उसका थाम लेता/
थोबड़ा बिगाड़ कर आने की बजाय, जो मुस्कराई होती,
उसकी जुल्फों के साये में, सुब्ह से शाम कर लेता/

                 राजीव रत्नेश
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