Friday, July 3, 2026

तहरीर- ए- रतन -- सौ सौगातें (११ से२० सौगातें )

सौगात (११) ' वफा की विरासत '
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लिखा था जो कागज पे, वो आँसुओं ने धो दिया,
पर जो दिल पे लिखा है, उसे कौन मिटा पाएगा/

इलाहाबाद की गलियों में जो गूंजी थी सदा,
वो नोयडा के सन्नाटे में भी रंग लाएगा/

मुसाफ़िर तो बदल जाते हैं, हर मोड़ पर ' रतन ',
पर वफा का ये कारवाँ, मंजिल तक जाएगा//

सौगात (१२ ) ' बेनाम रिश्ते '
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कुछ रिश्ते बेनाम ही अच्छे लगते हैं,
उन्हें दुनिया की नजर से बचाए रखना/

हर हकीकत को जुबां पे लाना लाजमी नहीं,
कुछ खामोशियों को सीने में दबाए रखना/

जमाना तो ढूँढ़ ही लेगा नुक्स हर बात में,
तुम तो बस अपनी सादगी को बनाए रखना/

सौगात (१३ ) ' आइने की अदालत '
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आइने से आँखें मिलाने से डरते हैं वो,
जिनके किरदार पर जमाने की धूल जमी है/

हमने तो खुद को साफ रखा है हर दाग से,
फिर भी नजाने क्यूँ दुनिया की नजर हमीं पे थमी है/

सच बोलने की कीमत चुकानी पड़ती है ' रतन ',
यहाँ झूठ के बाजारों में बड़ी ही गर्मी है/

सौगात (१४ )  ' सफर और हमसफर '
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मंजिल मिले न मिले, ये तो मुक्कदर की बात है,
पर हम सफर ही न करें, ये तो गलत बात है/

काँटें तो मिलेंगे ही रहे- इश्क में हर कहीं ' रतन ',
पर फूलों की उम्मीद छोड़ दें, ये तो शिकस्त की बात है/

थामे रखना उम्मीद का वो पतवार हर हाल में,
लहरों से हार मान लेना, बुजदिली की बात है/

सौगात (१५ )  ' तहरीरे- वफा '
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मेरी कलम से जो निकला, वो सिर्फ शब्द नहीं,
मेरे बीते हुए लम्हात की पूरी दास्तान है/

जिसने भी पढ़ा इसे दिल से, वो जान जाएगा,
कि जमीन पे रह के भी मेरा घर आसमान है/

' रतन ' को ढूंढ़ना हो तो इन पन्नों में ढूंढ़ना,
यहाँ मेरी रूह का हर एक निशान है/
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सौगात (१६) ' वक्त की इबारत '
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वक्त लिखता है हर चेहरे पर अपनी इबारत,
कोई पढ़ लेता है, कोई अनपढ़ ही रह जाता है/

जो कल तक थे साथ, आज अजनबी से हैं,
ये वक्त का फेर है, जो सबको आजमाता है/

पर जो दिल के पन्नों पे लिखे हैं नाम ' रतन '
उन्हें मिटाने का दम, वक्त भी कहाँ पाता है/

सौगात (१७ ) ' दुआओं का साया '
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जब भी गिरा हूँ, किसी अद्दृश्य हाथ ने थामा है,
ये शायद तेरी उन दुआओं का ही असर है/.

भटके थे जब हम अँधरी रातों के सन्नाटे में,
उन्हीं की लौ से रौशन हुआ मेरा हर सफर है/

दुनिया लाख गिराना चाहे तो क्या हुआ ' रतन ',
जिसके सर पे दुआओं का साया, उसे किसका डर है//

सौगात (१८ ) ' खामोश लब ' ( मुठ्ठीगंज का एक कोना )
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बहुत कुछ कहना था, पर लब खामोश ही रहे,
आँखों ने ही सारा हाले- दिल सुना दिया/

संगम के किनारे जो किए थे वादे हमने,
आज उन्हीं यादों ने हमें फिर से रुला दिया/

लोग कहते हैं कि यादें धुंधली पड़ जाती हैं,
पर तुम्हारी तस्वीर ने तो हर ज़ख़्म हरा कर दिया//

सौगात (१९ ) ' किरदार की खुशबू '
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फूलों की खुश्बू तो हवा के साथ उड़ जाती है,
पर इंसान के किरदार की महक सदा रहती है/

दौलत और शोहरत तो हाथ की मैल है ' रतन ',
पर जो रूह से अमीर हो, उसकी हस्ती सदा रहती है/

हमने तो कमाया है बस अपनों का प्यार यहाँ,
ये वो जमा- पूँजी है, जो हर घड़ी साथ रहती है//

सौगात ( २० )  ' अधूरा सफर '
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अभी तो आधा सफर भी तय नहीं हुआ है,
और लोग कहने लगे कि मंजिल आ गई/

हम तो मुसाफिर हैं उस राह के ' रतन '
जहाँ मंजिल से ज्यादा, राह की महक भा गई/

' तहरीर- ए- रतन ' के सौ पन्ने अभी बाकी हैं,
अभी तो बस कलम ने कागज से आँख मिला ली है//

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Thursday, July 2, 2026

तहरीर- ए- रतन : सौ सौगातें ( पूजा के पतवार से ) .(१ से १०) सौगातें

सौगात (१)
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मेरी कश्ती है जर्जर, लहरों का है शोर,
दिखता नहीं दूर तक, कोई साहिल या छोर/
थाम के बैठे हैं हम ' पूजा ' का ये पतवार,
ले जाएगा हमें जो, उस पार की ओर/
जमाने की लहरें गिराना चाहें हमें,
पर श्रद्धा की डोर है, बड़ी ही जोर/

सौगात (२ ) ' साहिल का इंतजार--- अटूट यकीन '
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तुझे तो साहिल पे इंतजार रहता है मेरा,
तूफान में फँसी कश्ती देख तू क्यूँ घबराता है/
' पूजा के पतवार ' से थामी है जो ये लहर,
वही तो मुसाफ़िर को मंजिल तक पहुंचाता है/
किनारे पर खड़े होकर तमाशा देखने वालों,
समंदर की गहराई का अंदाजा किसे हो पाता है//

सौगात (३ ) ' गजल की बेईमानी--( इश्क का वास्ता ) '
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गजल हो जाती बेइमां जैसे,
तेरा मुझसे रूठना काम कर गया/
बादी- ए- इश्क में हम भी तो थे ' रतन ',
जाने क्यूँ जमाना हमें बदनाम कर गया/
हम तो चले थे साहिल की तलाश में,
तेरा भटकाव ही हमें मंजिल के पार कर गया//

सौगात (४ ) : दिल की तख्ती  --( अमिट छाप )
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लिखा है नाम तेरा, दिल की इस तख्ती पर,
जैसे कोई इबादत, लिखी हो पत्थर पर/
दुनिया मिटाना चाहे, तो क्या हुआ ' रतन ',
निशान गहरे हैं, जो उतरे हैं रुह पर/
वक्त की गर्द इसे धुंधला न कर पाएगी,
ये वो तहरीर है, जो गूंजेगी हर दर पर//

सौगात (५ ) ' इबादत का सफर ' ( सच्ची पहचान )
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मेरी इबादत में कोई खोट न था ' रतन ',
पर तेरे दर तक पहुँचने में जमाना बीत गया/
हमने तो हर पत्थर को खुदा मान लिया था,
पर असली मूरत को पहचानने में जमाना बीत गया/
अब जो तुम मिले हो, तो लगता है ऐसा,
खुद को ढूंढ़ने के बहाने, तुम्हे पाने में जमाना बीत गया//

सौगात (६ ) ' खामोश गवाही '  ( इंतजार का आलम )
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ये दर- ओ-दीवार गवाह हैं मेरी तन्हाई के,
कितनी रातें यहाँ बैठ कर गुजारी हैं हमने/
तुम तो आए नहीं, पर तुम्हारी आहटों के इंतजार में,
अपनी ही धड़कनें कई बार पुकारी हैं हमने/
कहने को तो बहुत कुछ था, इस दिल में दबा,
पर तेरी खामोशी की इज्जत ही संभाली हमने//

सौगात (७ ) ' वक्त का पहिया ( मुठ्ठीगंज की यादें ) '
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वक्त का पहिया घूमता है अपनी ही लय में,
कभी हम ऊपर थे, कभी जमाना नीचे है/
इश्क की बाजी में, हमने जो दाँव लगाया था,
उसका हिसाब आज भी अधूरा और पीछे है/
तुमने तो भुला दिया, मुठ्ठीगंज का वो मंजर,
पर मेरी यादों की बस्ती आज भी वहीं पीछे है//

सौगात (८ ) ' उम्मीद का दीया ' ( धैर्य की लौ )
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तूफान कितना ही गहरा हो, डरना कैसे,
जब हाथ में तेरी वफा का दीया है/
अँधेरे रास्तों पे भटके हैं कई राही यहाँ,
पर हमारे नसीब में तेरी यादों का दिया है/
अब बुझने न देंगे इस लौ को ' रतन ',
कि हमने इसे अपने ही लहू से संवारा है//

सौगात (९ ) ' दिल की जमीन ' ( प्रेम का वसंत )
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बड़ी बंजर थी ये दिल की जमीन पहले,
तेरे आने से यहाँ चाहत के फूल खिले हैं/
मुद्दतों बाद नसीब हुई है ये हरियाली,
जाने कितने मौसमों के बाद हम मिले हैं/
तेरी मुस्कराहट की एक किरन ही काफी थी,
मेरे गमों के बादल जैसे कहीं गुम हो गए हैं//

सौगात (१० )' आखिरी फैसला '  ( खुद्दारी का पैगाम )
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फैसला जो भी हो, हमें मंजूर होगा,
बस एक बार अपनी नजरों से कह तो दिया होता/
हम तो खुद ही अपनी महफिल उठा लेते,
तूने बेगाना समझने की जहमत तो न की होती/
चले जाएँगे तुम्हारी महफिल से चुपचाप ' रतन ',
बस एक आखिरी पैगाम तो सुन लिया होता //

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Monday, June 29, 2026

तेरे रास्ते में न भँवर आया ( गजल )

तेरे रास्ते में न भंवर आया  ( गजल)
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तूने खूब मुझे पासे- वफा में इंतजार कराया/
जानती थी कभी न मुझे तेरा इंतजार भाया/

आने को सुब्ह कह के शाम तक भी नहीं आईं,
किस दुनिया में रहती हो, मुझे समझ न आया/

कहती हो जन्म-जन्मांतर से ही तुम मेरी हो,
झूठा तेरा वादा, वक्ते- शाम तुझे ख्याल आया/

करामाती तेरा हुस्ने- बेमिसाल, मैं समझता हूँ,
लिबासे- शरर में भी तुझे गले से लगाया/.

हसरते- इश्क जाने कहाँ दफन हो गई चमन में,
तुम्हें बुलाया अकेले, तो साथ सारा जहाँ चला आया/

मजबूर मैं हूँ तो तू भी कम बहानेबाज नहीं,
तेरी फिक्रो- रजामंदियाँ क्या न कभी न जान पाया/

खड़े-खड़े मेरे पाँव बोझल हुए बस स्टैंड पर,
न तू आई, न कोई संदेशा लेकर तेरा यार आया/

वक्ते- विसाल तू इश्क के उबाल से महरूम थी,
मैं ही डर गया जमाने से, कुछ कहने से बाज आया/

किस तरफ चली है, किधर को है तेरा रास्ता
गले में डाल कर दुपट्टा, तुमने फंदा क्यों बनाया/

चली नसीमे- सहर, चमन में पेश तुझे गुलाब किया,
तुझसे गुफ्तगू करूँ या अपलक निहारूँ, खूब इंतजार कराया/

मेरी मुहब्बत कुर्बान तेरे हुस्नो- जमाल पर ,
तू आई न फिलहाल, वक्त तेरा हमसाया बना/

मकतबे- इश्क का तू औराके- मस्त तो है,
तू ही बता, तुझे अपनी मर्जी से बुलाने का सहल रास्ता क्या/

मुहब्बत के भी पेचो- ताब तो हैं, तेरी जुल्फों की तरह,
आई तो हो गुल्शन में, कभी अपना वायदा याद न आया/

कल रात खिड़की खोल, खला में क्या तलाशती थी,
क्यूं तेरे मुखड़े पर हवाइयाँ उड़ीं, कौन था तुझे पहचानता/

इश्क करने का भी करीना होता है, हर आशिक जाने,
तुमने इश्क को बेजार समझा, मैं तेरे हाथ न आया/

इरादा किया था, ले जाऊँगा तुझे चाँद के पार,
वहाँ की धूल- माटी में मुझे भुलाना होगा आसां/

गम इसका नहीं, भूल गया मुझे सारा जमाना,
गम है इसका, तूने भी मुझे नहीं पहचाना/

जहरे- गम मुझे पिलाया और खुद आबाद रही,
मीठा- मीठा गप्प किया, कड़वा मेरे हिस्से में आया/

प्यास है सदियों की तेरी, दागे- दिल जाता नहीं,
तूने साथ छोड़ा पर सफीना मेरा साहिल पे आया/

' रतन ' को खुद अपना होश नहीं, कैसे तूने अपना रास्ता बदला,
तेरे रास्ते में न भँवर आया, न दरिया ने तुझे रास्ता बताया//

                 राजीव रत्नेश
          """""""""""""""""""""

तीरे- नजर तूने दिल में उतार दी,
मुस्कराहटें अपनी दिल के पार कर दीं/
अब क्या मदहोश करने की सोची है,
धड़कनें अपनी मेरी सांसों के पास कर दीं//

                  राजीव रत्नेश
           """""""""""""""""""""""""""

" बसस्टैंड पर जिसका इंतजार करते करते
पैर बोझल हो गए थे,
आज उसी की धड़कनें रतन की साँसों का
हिस्सा बन गई हैं/"/

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याद आ गया गुजरा जमाना ( गजल )

याद आ गया गुजरा जमाना  ( गजल )
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तुझसे शुरू होकर बात तुझी पे खत्म होती है/
जमाना देखने के बाद, तेरी सूरत पे बात खत्म होती है/

हाजिरे- हुजूर यही कहानी है, यहाँ दर्द की ही बिसात है,
हुजूम उमड़ा बस्ती में, तेरी सूरत पे बात खत्म होती है/

जाने कैसे मंगतों पर भी तेरी दुआ बरस पड़ी,
हासिले- मुकद्दर है तू, तेरी हर बात मेरी मन्नत होती है/

जाने किसने दर्द का सागर, मेरे दिल में उड़ेल दिया,
कोई भी इल्तजा हो, तेरी अंजुमन में खत्म होती है/

बेकरार नजर को मेरे, एक बार सब्रो- करार तो दे,
मेरी हर कहानी जो भी हो, तुझी पे जाकर खत्म होती है/

गिरहबाने- मुहब्बत कुछ यूँ खुल कर बिखर गई,
तेरी हर दुआ आखिर को मेरी नक्शे-कदम होती है/

मंजूर थी मुहब्बत तेरी तो सारे जुल्म सहन कर लिए,
कुछ इसी तरह से तो पैदाइशे- आदम होती है/

गिला जमाने को था मुझसे, तेरी तो बात कुछ न थी,
अदावत थी तो मुझसे थी, जान कभी कम हुई न खत्म होती है/

रहगुजर पर तेरे, हर कहीं फूल मैंने बिछाए थे,
राहे- मंजिल तेरी आसान हो, इसी तरह अदावत खत्म होती है/

तुम आओ या न आओ, मजबूरी पर तुझे कुछ न कहेंगे,
मेरी तरह दरिया पार आओ, इधर से भँवर कम होती है/

मंजिल का रास्ता था, खौफो- खतर से भरा हुआ,
रास्ता बदलो, उस रास्ते तेरी नकहत कम होती है/

करना न खुद को कभी हवाले- सय्याद, किसी देश का हो,
ले जाके तुम्हारा करेगा व्यापार, इससे कीमत तुम्हारी कम होती है/

' रतन ' को फिर याद आ गया, तेरे साथ का गुजरा जमाना,
न तू दिल से जाती है, याद तेरी, तेरी मूरत पे खत्म होती है//

                राजीव रत्नेश
           """"""""""""""""

मेरी दुनिया से दूर, आखिर जाओगी भी तो कहाँ?
तू मेरे सरमाये में है, याद करूँगा तेरी जुल्फ उलझने 
तक/

               राजीव रत्नेश
       """"""""""""""''''''''"""""""""".
" दुनिया के सारे फलसफे , सारी किताबें पढ़ लीं रतन ने,
पर सुकून सिर्फ चंदा की सूरत पे ही आकर मुकम्मल हुआ//"

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समझो तो रतन का इशारा क्या है ( गजल )

समझो तो रतन का इशारा क्या है  ( गजल )
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मुझे याद आने वाले आखिर तू कहाँ छुपा है/
तेरा नया ठिकाना क्या है, तेरा नया पता क्या है/

तुम क्या जानो, तुम्हारी हसरत मेरे दिल को है,
मैं नहीं समझ पाता, दिल को मेरे हुआ क्या है /

जनम-जनम का साथ तेरा-मेरा, तू कहाँ भटक गया,
मेरी मुहब्बत तेरे दम से है, तुमसे भला छुपा क्या है /

आजा बस एक बार को ही, सूरत अपनी दिखा जा,
मामला क्या है और तू किस बात पर खफा है /

तुमसे ही हसरते- दिल की बात मैंने कही थी,
बुरा मान गया तू, आखिर मैंने कहा क्या है /

मुहब्बत में तेरे, सरफरोशी तक की तमन्ना भी मेरी,
समझ न आया मेरे, तेरे मुहब्बत का सिला क्या है /

आजा अपनी महफिल में, एक बार को ही जो तू,
पिला न पाओ जामे- लब, फिर तेरा फैसला क्या है /

मैंने कहा था कोई नई बात हो तो मुझसे कहना,
चुप सी लगा रखी है तुमने, आखिर इरादा क्या है /

मजनूं को लैला, रांझा को हीर तो मिल न सकी,
बेवजह रोड़े अटकाता बीच में, ये जमाना क्या है /

तीर कमान पे चढ़ाकर, निशाना आस्मां का किया,
दिल बेहाल, खस्ताहाल हुआ, आखिर माजरा क्या है /

मशहूर तुम जमाने में, तेरा हौसला खुद में बड़ा है,
मेरी मुहब्बत को आखिर तुमसे मिला क्या है /

इश्क में तुम्हारे, अगर दिल बीमार ही हो गया मेरा,
बाप तेरा' हकीम लुकमान' का शागिर्द, पूछ दवा क्या है /

छोड़ कर महफिलें सारी, तू बस मेरी गिरफ्त में आजा,
यह बात कहने में, समझो तो जरा ' रतन ' का इशारा क्या है /

              राजीव रत्नेश
          """"""""""""""""

तेरी मेरी जिन्दगी के बीच फासिले तो कभी न थे
कहाँ से रास्ता हम भूले, दरमियां किनारे तो कभी न थे  

               राजीव रत्नेश
         """"""""""""""""""""""""""

" जमाना चाहे जितनी दीवारें खड़ी कर दे, रतन की राहों में ,
वो आज भी मुकम्मल सुकून पाता है, सिर्फ चंदा की बाहों में //

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Saturday, June 27, 2026

जाने कहाँ छोड़ आए ( गजल )

जाने कहाँ छोड़ आए  ( गजल )
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मुकद्दर आजमाने चला तो मुझे याद आया /
मेरा मुकद्दर तो तू थी, तुझे कहाँ छोड़ आया /

बहते पानी में सफीना आगे बढ़ गया,
पतवार हाथ में थी, पानी सर से कब गुजर गया /

नेमत तेरी हर कहीं हमने लुटा दी थी,
कभी नंगे- भूखों में, तो कभी फकीरों को बाँट दिया /

तू क्या जाने, मेरी मुसाफतों के गुजरगाहों ने,
मुझे कहाँ-कहाँ से न तोड़ा, न्यौता झंझावातों को दिया /

अनकही बातों को ही अपनी डायरी में लिखता हूँ,
कुछ उलझे किस्सों ने कुछ हिस्से अफसानों को दिया /

मेरे दिल के हाशिये पर तेरी तस्वीर यकायक उभर आई,
उंगलियों ने कलम का काम किया, तूने रेत पर लकीरें
बनाने न दिया /

गमगुसार बैठे थे , तेरी नवाजिश को सोच कर,
ये क्या बात हुई तूने आयते- कुरआने- पाक पढ़ने न दिया /

मजलिस सजी-धजी थी साकी- ए- मपरवाना की,
बरहना- पा तूने मखमली गलीचों पे पाँव धरने न दिया /

मेरा कहा नहीं तो दिल का कहा ही मान लो,
हमने तुझे सदा दी, पर बगावत पर तुमने टिकने न दिया /

तेरे हाथों की लकीरें हमने अपने हाथों पर चस्पा कर लीं,
कहीं से तो रास्ता मिले, साकी ने तो शिकवा भी करने न दिया/

मजबूर मुहब्बत का बस इतना सा ही बस अफसाना है,
उठे तो आंधी की तरह, तूफानों ने मौका सँभलने का न दिया /

इश्क करता हूँ तुझसे, तो करता हूँ डंके की चोट पर,
गए नहाने सरयू पर तो खुद को डूबने को छोड़ दिया /

मुहब्बत मजबूर नहीं करती मुहब्बत के लिए कभी,
सोचा- समझा और तकसीमे- मुहवबत कर लिया /

मुतमईन हो जाओ अगर कोई आशकार इश्क करे,
ये तो उसके दिल की हसरत है, हमने नवाजा, पहचान
लिया /

अगर वेश बदल के आए जो तुम बहुरुपिया की तरह,
तो पहचान लिए जाओगे, हमने तो राज तुम्हारा जान
लिया /

जाने कहाँ तुम छोड़ आए " रतन " को महफिल में,
जबकि उसके इशारे पर चाँद चला, सितारे चले, सारा
आस्मां चला //

               राजीव रत्नेश
       """"""""""""""""""""""""""""

जिसके इशारे पर मुड़ जाते थे कायनात के रास्ते,
वो तन्हां खड़ा रह गया, बस एक चंदा के वास्ते //"

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Thursday, June 25, 2026

एक दुआ मेरे नाम से ( गजल )

एक दुआ मेरे नाम से  ( गजल  )
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तेरा दिया जख्म दिल में ही फले-फूले, बाहर न आए /
मेरे गमो- नाले खुद ही, तेरी जुबां पे कहीं आ न जाएँ /

मैं तुझे पुकारूँ पर भूल कर भी सुध न तू मेरी ले,
मुझे भूल जाने वाले याद न तुझे कभी मेरी आए /

तेरे ऐब सारे, अकेले मेरे हिस्से में ही आएँ,
मेरे हुनर सारे सिर्फ तेरे कब्जे में ही आएँ /

न तू याद मुझे करना, न मैं करूँ कभी याद तुझे,
मेरे हिस्से की सभी खुशियाँ, तेरे दामन में समाए /

आज बरकत की अपनी शुभ घड़ी में, न कर मुझे याद ,
खुशी-खुशी तू डोली में बैठ, और के घर जाए /

मैं न करूँगा तुझसे कभी प्यार का तगादा, भले,
मेरे दिल के चिराग से औरों का चिराग जलाए /

मुब्तिला था कभी साथ- साथ तेरे, प्यार के बंधन में,
आज क्या बात कि दिल मुझे तेरी हिरासत से निकाले 

वीरासत में मिला है तुझे जो अमानते- गुरुरो- हिजाब,
मुझे तो लूटा नाजो- अदा से, इसी तरह आगे काम आए /

दुआ है मेरी, पहली आदमजाद, जो तेरी कोख से जन्मे,
उसके लब पे पहले-पहल मेरा ही नाम आए /

मैं मजबूर हूँ तो इस कदर, तू अब न सता,
खुदा न करे, दुश्मन की जगह मेरे लब पे तेरा नाम आए /

मुहब्बत की कैफियत मेरी, तूने जरा भी तो समझी नहीं,
फिर क्यूँ तेरे लिए ही, जान भी मेरी ही जाए /

नज्मे- फरियाद भी बेअसर हो गए मेरे तेरे सामने,
सुनी न किसी की, बहाने तूने बेपनाह बनाए /

बड़ी मौजूं हो रही थी महफिल वजूदे- दिलदार से,
की तूने सख्ती, दिल को भींच कर लहू टपकाए /

तवील तेरी दास्तां को मुख्तसर मैंने किया है,
वरना बात पहुंचती जाकर कहीं सितारों के भी आगे /

कोई ख्वाबे- पसंदीदा, कोई अरमां न मेरे दिल में रहा,
आकर मेरा दामन तू थाम भी ले, तो तबस्सुम न लब पे आए /

करें ' रतन ' मुहब्बतों में सजदा तेरे लिए मस्जिद में,
भेज दें अल्ला- ताला एक दुआ मेरे नाम से, जो तेरे पास आए //

                  राजीव रत्नेश
              """""""""""""""""""”""

" जिसकी डोली किसी और के आँगन में उतर गई,
रतन की दुआ में वो आज भी खुदा की इनायत बन गई /"

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!