Thursday, January 22, 2026

तेरी सूरत पे ( गजल)

तेरी सूरत पे ( गजल)
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तेरी सूरत पे इक रोज,
गुजरे वक्त की परछाइयाँ होंगी,
और मेरे दामन में सिमटी सी,
तेरी अँगड़ाइयाँ होंगी/

जहनों में रोशनी होगी,
यकीं की बारात साथ होगी,
मगर मेरे दिल को अख्तियार,
तमाम खामोशियाँ होंगी/

समंदर किनारे से लौटेंगी,
मौजें टकरा-टकरा कर,
कहीं न कोई साहिल, मस्तूल,
न कश्तियाँ होंगी/

मेरी जिन्दगी की विरासत,
तेरे गम की कायनात होगी,
साथ में मेरे, जमाने भर की,
फिकरो- फब्तियाँ होंगी/

महसूस जो अब है, गए वक्त की,
तिजारत फिर ये न होगी,
महफूज आज जो, मेरे दम से है,
कल न वो हस्तियाँ होंगी/

कल उम्मीदों के महले- दुमहले,
बन जाएँगे हर कहीं,
कहीं न अब सी टिमटिमाती,
जगमगाती बस्तियाँ होंगी/

इसी से दौरे- इश्क खुद को,
आजमा भी ले' रतन',
उल्फत को उल्फत की तरह जी,
कल न ये मस्तियाँ होंगी//

      ----------

रात भर बदन खुशबुओं से
                  माहेत्तर रहा,
कली एक घड़ी भर को,
                 बाहों में शरमाई थी//

           राजीव रत्नेश
            1970 ई०
           वाराणसी
         -----------

Wednesday, January 21, 2026

होली ( कविता)

               होली  ( कविता)
             **************

खुदा करे होली यूँ ही,
            रोज-रोज आती रहे/
मैं तुझे रंग लगाता रहूँ,
             तू रंग छुड़ाती रहे//

गुलशन में बहार आई है,
हर कली आज मुस्कराई है,
कुछ न पूछो, भौरों के दिल में,
आज क्या आई है--
" देखो, चंद कलियाँ खिली हैं" 
एक दूसरे को सुना रहा है,
जिसके जी में जो आता है,
वही वह गुनगुना रहा है/
उदास गुलों पर भी,
आज तो रौनक आई है,
देख कर फिजा को रंगीन,
नरगिस ने भी आँख झपकाई है/
जवान दिलों को देखो,
अब प्यार मचलने लगा है,
आज सड़कछाप हर दीवाना,
शीशे के सामने सँवरने लगा है/

आज तो करीब से बोलो,
न दूर से इशारा करो,
आज ही तो वक्त है,
कहने का बस इरादा करो/
जनाबों के गलों में पड़ी मालायें,
गुलाब के पहलू में जूही पड़ी है,
ये जो प्लेट लिए आईं हैं,
देखो तो, लगती फुलझड़ी हैं/

कहती हैं," देर न करो,
अब जल्दी से सफाया करो,
कभी ही तो मिलते हैं मौके,
कभी तो आँख मिलाया करो/
हँसने-हँसाने का वक्त है,
न तुम शरमाया करो,
कभी खाया करो किसी से,
तो कभी किसी को खिलाया करो"/

हर गली में, हर सड़क पर,
एक ही गीत बज रहा है,
हर हिन्दुस्तानी एक दूसरे से,
बन के भाई गले मिल रहा है/
कोई सलाम, कोई बंदगी,
कोई गुलाल मल रहा है,
कोई होके फाग में मस्त,
बयाने- अफसाना सुना रहा है/
कितनी भीड़ भरी हैं सड़कें,
कितनी जमाते साथ चल रही हैं,
दिल में आया तो साथ पकड़ा,
वरना कोई अकेला चल रहा है/

हर तरफ गौर से देखो,
मुकद्दर की सुबह आई है,
तमाम खैरात ले कर आज,
देखो कैसी होली आई है/
        --------

अशआर
""""""""'
दूर रह के पूछते हो हाल,
         रकीब से भेजते हो पाती/
नजदीकी में यूँ शर्मा के रह गए,
          मिला न सके छाती से छाती//
            ---------

मलते रहें लोग गुलाल कितना ही,
           गाल तुम्हारा हो पाता नहीं लाल है/
लूटते हैं सब वाहवाही खुद- ब- खुद,
            क्या कहें गाल की तुम्हारे क्या बात है//
               ----------

रंग पोत- पात के,
            कोई गुझिया खिला जाएगा/
ये दिल ऐसे ही,
             थोड़े ना बहल जाएगा//
             ------------

पिलाना फर्ज था,
              कुछ तो पिलाया होता/
सागर नहीं था तो,
               आँखों से पिलाया होता//
        ---------------

कोई रंग लगाता रहा,
कोई हाथ धुलाता रहा/
हाथों से गुझिया औ' साथ में,
मय- ए- निगाह पिलाता रहा//
          ---++----

बुरा न मानो होली है,
चढ़ी भले आज गोली है/
हम जिस पर लिख रहे हैं,
वह' चीज' तो सरकारी है//

             राजीव रत्नेश
             1975 ई०
             इलाहाबाद
            ----------

उम्मीदे- वफा करूँ क्यूँकर? ( कविता

उम्मीदे- वफा करूँ क्यूँकर?  ( कविता)
******************************

सोचता हूँ, तुमसे
उम्मीदे- वफा करूँ क्यूँकर/
तुम्हें अपना समझूँ,
और तुम वफा न निभाओ,
तो फिर तुम्हें दूँ सजा क्यूँकर?

मैंने देखी थी, तुम्हारी वो अदा,
लोगों की भीड़-भाड़ में,
रोशनी के ताम-झाम में,
चंद मेरे चंद तुम्हारे,
लोगों के दरम्यान में,
वो दिल पे लगी चोट से,
तुम्हारा तिलमिलाना/
और फिर मुझसे बेरुखी,
दिखाने को रूठना-मचलना/

मेरी किसी से बातों पर,
वो तुम्हारा मुँह फिरा के,
दूसरी ओर निहारना/
और कारण?
कारण तो साफ था,
बस इतना ही राज था/
किसी ने दिया था,
फूल मुझे एक,
लाकर शायद किसी,
क्यारी से,
और मैंने ले लिया था उसे,
अपनी मजबूरी या लाचारी से/

फिर सोचा- समझा,
तो ये ख्याल आया मुझको,
अन्जाने में ये तो,
मुझपे एहसान हो गया/
सच कहता हूँ,
तुम्हारी याद आने से,
खुद पशेमान हो गया/
हैरान हो गया,
बिल्कुल बेजुबान हो गया/

और अपनी तो ये आदत
ही रही है,
जिसने एक भेंट दिया है,
उसे दुगुना भेंट किया है,
जिसने एक फूल दिया है,
उसे दो फूल दिया है/
और इसी बात को,
रख के मद्देनजर,
मैंने गुलाबी गुलाबों का,
पेयर उसे भेंट कर दिया था/
इस तमन्ना के साथ कि,
शायद ये दोनों गुलाब,
उसके दोनों आरिजों की,
सुर्खी चुरा लें/

और फिर वे,
हमेशा-हमेशा के लिए,
रौनक शुआर रहें/
नहीं तो कहाँ कोई गुल,
डाली का साथ,
छोड़ने के बाद,
दम नहीं तोड़ देता है/
नहीं तो यूँ ही कुम्हलाया- कुम्हलाया,
सा रहता है,
कहीं हो भी जाए,
पानी का साथ,
तो कुछ देर को विहंसा,
फिर वीरानियों में ही,
अँधेरों के दायरे में ही,
मिट्टी में,
दफ्न हो जाता है,
बिल्कुल कब्रगाह में,
गड़े एक मुर्दे की तरह/

और तुम मान गईं थीं बुरा,
वो देखी थी मै मैंने,
तुम्हारी मुँह फिराने की अदा,
तुम्हारे माथे पे थी शिकन,
निगाहों में थी थकन,
परास्त भाव की/
पर बात वो नहीं थी,
न तुमने पूछा ही मुझसे,
न मैंने ही कुछ बतलाया,
जो कुछ समझा,
जो कुछ देखा,
वो इशारों से,
उल्टी-सीधी वारदातों से,
ही तुम्हें जतलाया/

मगर तुमने ऐतबार न किया,
दिया था ' मैडम बम्बइया' को,
खाने को एक जोड़ा पान/
उसका भी तो यही राज था,
कभी किसी यूँ ही,
शादी- बारात के मौके के
दरम्यान,
उन्होंने मुझ पे,
किया था एहसान,
खिला कर एक बीड़ा पान/
खैर.....
तुमने ठान ही लिया,
जलाने को दिल मेरा/

वैसे मेरा कसूर,
शायद कुछ भी नहीं था/
वो किसी गैर को देखना,
मुझको दिखा-दिखा कर,
मेरे करीब आने से,
बढ़ना दामन बचा- बचा कर/
वो सब क्या नहीं थी
तुम्हारी अदा?
अपने जाने में क्या,
नहीं थी मेरी सजा?
और तुम तब भी,
रुक न सकीं,
जब दी मैंने तुमको,
तुम्हारे जाते-जाते सदा/

मुझे आई थी हँसी,
तुम्हारी हरकतों पर,
ये सोच के ही मैंने,
तुमसे किनार किया,
कि चलो अच्छा हुआ,
कम से कम अपना दिल,
तो अब फिर से हमारा हुआ/
फिर भी शिकनें उभरीं,
सलवटें पड़ीं,
तुम्हारी पेशानी पर/
जब मैंने तुम्हारी आहट पर,
तुम्हारी शरमाहट पर,
नजर तक न फेरी,
तुम ठिठकीं, मुस्कराईं,
और फिर,
उपेक्षाभाव से,
घुस गईं दुल्हन के कमरे में/

और एक तस्वीर सी उभरी,
मेरे जेहन के कैमरे में,
वो तुम्हारी बेवफाई की पोज,
मैं सोचने लगा,
कैसी तुम्हारी दोस्ती,
और कैसी ये वफा की खोज?
सभी कुछ तो नश्वर है,
इस दुनिया- ए- फानी में,
शाश्वत शायद कुछ भी नहीं,
इस थोड़ी सी जिन्दगानी में/

इससे पेशतर कि,
तुम बेवफा बनो,
बेहतर तो यही है,
मैं ही गुमराहे- राहे- वफा बनूँ/
सुकूने दिल है यही,
मंजिल है यही,
यही सोच कर,
न तुम्हारा दीदार किया,
रहीं कोशिशें भी,
नाकाम तुम्हारी,
न मिला ही तुमसे,
औ' न पर्दाफाश- ए- राज किया/

जानता था क्यूँकि,
तुम लोगों का एतबार,
हासिल करना,
मुश्किल होता है बड़ा/
ये वफा की डगर,
प्यार की मंजिल,
चंद मुलाकातों के उसूल पर,
अधिक दिन टिक नहीं सकती/
और तुम्हें इन्हीं,
खौफनाक ख्यालों में,
उलझा हुआ,
दूर चले जाने दिया/

मिलने भी न आ सका,
जाते-जाते तुमसे,
सिर्फ ये सोच कर,
जो खत्म हो गई है चीज,
उसे अब बढ़ाना नहीं है/
एक बार फुँक चुका है,
आशियाना जो,
उसे दुबारा दियासलाई,
दिखाना नहीं है,
इसीलिए तो तुमसे कहता हूँ,
तुमसे उम्मीदे- वफा करूँ क्यूँकर?
             """""""""""""

अशआर
"""""""""
मुझसे भी खुश नसीब तो
           लाखों होंगे महफिल में/
पर कद्रदां- ए- हुस्न,
           मुझसे ज्यादा नहीं//
               --------

उनसे बीसियों झगड़े कौन खड़े करे,
जिनको गरज हो वही लड़ा करें,
जिनको मयस्सर न हो टेरीकाट,
वही कफन के लिए लड़ा करें//
          -----:::::------

लोगों ने उनको शाहजादी- ए- महफिल कहा
और हमने उनको हजारों की कातिल कहा
उन्होंने बीच भँवर में जो हाथ अपना छुड़ा लिया
फिर भी उनके आँचल को हमने साहिल कहा//
           ---------------

लोग अपने को कहते हैं शरीफ
और हमें बताते हैं वो दीवाना
उन्हें क्या मालूम, शराफत क्या बला
शराफत का वो जानते नहीं पैमाना//
                 --------

भोली, मासूम तुम्हारी आँखों से नहीं हुई
कुछ रोज से एक राज, एक गुफ्तगूं की बातें
बड़ा कठिन है एक दीदार भी तुम्हारा,
लगता खत्म हो जाएँगी मुहब्बतों की बातें//
                  --------

तुम्हारे सिवा नहीं चाहता किसी को
तुम भी न चाहो मेरे सिवा किसी को

                 --------

            राजीव" रत्नेश"
              1974 ई०
            मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद
           """"""""""""""""""""

बहुत याद आईं तुम प्रिये! ( कविता)

बहुत याद आईं तुम प्रिये!    ( कविता)
********************"*********

तुम आज भी मेला घूमने
नहीं गईं,
खिचड़ी का त्यौहार मनाया
भी तो फीका-फीका/
रोज की तरह दाल-रोटी
खाई,
रोज की तरह पानी पीया/

दही- चिउड़ा न खाया,
खिचड़ी न खाया,
आखिर कयूँ?
क्यूँ तुम उदास हो?
बस बँद करके दरवाजे,
घर में पड़ी हो/

न कहीं घूमी,
न टहली हो,
छुट्टी भी है,
आज तो,
सहेलियों संग बातें,
भी न की होंगी/

चुलबुल- चुलबुल
न की होगी,
फिर कैसे पचा
होगा पानी?
उदास होगा मौसम,
तड़पती होगी जवानी/

किसी आशिक ने
आवाज न कसी होगी,
किसी ने फब्ती न की होगी,
तुम्हें करार भी तो,
न मिला होगा/
रोज रहती हो खुश,
त्यौहार पे नाखुशी कैसी?
अपने दिलदार से नाराजगी कैसी?

मैं तो तुम सम,
उदास न था,
माफ कर देना,
तुम्हारे गम में न,
साझा कर सका/
यार आए थे,
चला गया साथ,
मनाने पिकनिक/

झूँसी के खंडहरों में,
बन में, बागों में घूमा,
बाँसुरी बजाई, 
पानी में डुबकियाँ
लगाईं/
जाती हुई मिस माया
को आवाज लगाई,
बाबा को कहा,
' आओ गले लग जाओ'/

काश! तुम होती साथ,
तो तुमसे ही कहता,
वही बात,
भले तुम बुरा मान जाती,
करके अपनी अम्मी
का लिहाज/
देख कर जगत के
रीति-रिवाज,
होती शर्मिन्दा,
करती झूठा मान,
इसी कारन तो और भी,
तुमसे मिलने नहीं गया/

जानता था,
तुम तो न टालोगी,
पर तुम्हारी अम्मी,
टाल जाएँगी/
उस रोज भी तो,
टाल गईं थीं जब,
मैं आया था,
तुमको ले जाने के लिए,
पिकनिक में,
वहीं' मिन्टो पार्क' में/

तुम्हारा इरादा था,
मेरे साथ जाने का,
तुमने कहा था,
' अम्मी से कहिए'
मैंने कहा,
' मैं क्या कहूँ?
तुम ही पूछो ना'/

और तुम्हारी अम्मी ने,
बहाना बनाया था,
पिकचर जाने का,
वहीं' उत्तम' में,
" झील के उस पार"/
और तुम न गई,
पिकनिक में,
पर गई झील के उस पार/

मैं ' सावन- भादों ' का,
मजा लेता रहा/
तुमसे मिल कर खुश था,
जुदाई के गम में,
भादों मनाता रहा/ 
हंस के साथ,
हंसनी डोली,
याद तुम्हारी आई,
बहुत याद आई,
तुम प्रिये!
        """""""""""
अशआर
"""""""""
तमाम पाबंदियाँ हैं, जान को जोखिमें हैं
एक मासूम दिल और हजार दास्तानें हैं
लोग इश्क की इक उल्टी बाजी को,
कहते हैं, लैला-मजनूं के माडर्न फसाने हैं//
               --------:

दस्तूर मुहब्बत का बदल दे सनम!
बदल गया है, लैला-मजनूं का फसाना
अब न वो शीरी रही और न फरहाद
मुहब्बत मशीनी हो गई, आ गया नया जमाना//
                    -----------

तुम सोच लो, गरज पे हम नहीं जीते
भूल जाते हैं हर गम हम पीते-पिलाते
मुहब्बत की डगर पर चलते जाते हैं
बस किसी तरह गिरते- संभलते, मरते- जीते//
                  -------------

दिलो- जां से मैं तुम्हें चाहता हूँ,
तुम्हारी खुशी, मुझे चाहो न चाहो

           राजीव' रत्नेश'
           1974 ई०
           मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद

ये रात झूठी लगती है !!! ( कविता

ये रात झूठी लगती है   !!!  ( कविता)
****************************

अभी तुम मेरे पहलू में थी ये बात झूठी लगती है
ये रात अभी जवान थी, ये रात झूठी लगती है

तुम दिल से रंगीं थीं, नशे में चूर थीं
तुम्हारी शरारती नजरों में मस्ती- ए- शराब भरपूर थी
मैं पीता चला गया होकर मदहोश, ख्याल न था
क्या करता ख्याल, तेरी हर अदा पुरनूर थी

तुमने दिया था पीने को, ये बात झूठी लगती है
ये रात अभी जवान थी, ये रात झूठी लगती है

मैं वो शायर नहीं जो तेरी याद को दर्द बना कर
फिर दर्द भुलाने को आबाद करता है मयखाना
मैं तो जानता हूँ राजे- उल्फत, ये इश्क- ओ- वफा क्या 
                                                                         है
शमां तो होती है बेवफा, क्यूँ जलता है परवाना

अपनी दिलरुबा- ओ- महबूब की जात झूठी लगती है
ये रात अभी जवान थी, ये रात झूठी लगता है

ये उल्फत कुछ हद से गुजरी है कि पहचानी नहीं जाती
मेरी ताज दुनिया की भीड़ में, अब पहचानी नहीं जाती
मैं कोई वंशीधर भी नहीं कि तान से बुला लूँ तुमको
क्या बताऊँ मुश्किल तो ये है कि कुछ कही नहीं जाती

मैं आश्ना- ए- मुहब्बत हूँ, ये बात झूठी लगती है
ये रात अभी जवान थी, ये रात झूठी लगती है

वो तेरे रेशम से लहराते- फहराते कंधे पे झूलते भूरे  
                                                                   बाल
ये नाशपाती से लाल, सेब जैसे तेरे फूले-फूले गाल
आँखों में तेरे मस्ती, जैसे कजा खेल रही हो
बाहों के बंधन में रखी थी अपनी अमानत संभाल

ये अमानत मेरे लिए है, ये बात झूठी लगती है
ये रात अभी जवान थी, ये रात झूठी लगती है

तेरी नीली साड़ी के प्रिये, चमचमाते थे सितारे
खुशबू- ए- पैकर अजीब थी, जुल्फें थीं तुम सँवारे
मेरी बाहों में आ समाई थी, या मैंने बाँधा था बंधन
कुछ यूँ बेताब हुआ दिल, तुमने जो किये इशारे

वो इशारा मेरे लिए था, ये बात झूठी लगती है
ये रात अभी जवान थी, ये रात झूठी लगती है

           """""""""""""""""'''"""""
अशआर
"""""""""
आज ये चाँद भी शरमाया कयूँ है मुझसे
घूँघट से अपने चेहरे को छुपाया क्यूँ है मुझसे
अरे यार आए हैं, तो क्या फर्क पड़ता है
बेवजह ही दिलदार मेरा, घबराया कयूँ है मुझसे?
                   ----------

समझने के लिए ये अंदाज ही काफी है
दिल के धड़कने को ये राज ही काफी है
न समझो यूँ गैर, ये' रत्न' तुम्हारा है
मुझको बुलाने को तुम्हारी आवाज काफी है//
                   --------------

दास्तां गम की चली तो बात आँसुओं तक पहुंची
जिक्र हुआ थामने को हाथ तो बात कमजोर बाजुओं
                                                          तक पहुंची
जिन्दगी मेरी यूँ वीरान क्यूँ हो गई, पूछा ये गया
बात बढ़ी तो मेरी नाकाम आरजुओं तक पहुंची//

                  राजीव' रत्नेश'
                     1974 ई०
                    मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद

काश! मेरे तुम मेहमान न होते...!!! ( कविता)

काश! मेरे तुम मेहमान न होते...!!!  ( कविता)
***********************************

काश! मेरे तुम मेहमान न होते,
औ' बंधन में मेरे मन- प्रान न होते/
तुम यूँ कुछ कह देते, औ' मैं सुन लेता,
सुन लेता,
फिर कुछ न कहता,
ये बात तो न होती,
कुछ होता जरूर,
मेरी ओर से खामोशी
ऐसी अख्तियार न होती/

तुम्हारा क्या,
तुम हो बड़े लोग,
और आए हो बड़ी दूर से,
गौरमिंट की जीप में/

गरीबों के पैसे से,
प्राप्त की गई,
बनारसी साड़ी ,
मुझको दिखाते हो/
ये ऐशो- तरब में,
गुजरी जिन्दगानी,
कितनों को पिला-पिला,
के पानी पाई है खानी,
खा-खा के पराया माल,
बनाई है ये जवानी/

और गुरुर है जिसका,
बनाई है, उठाई है,
पोजीशन,
हराम के माल से,
उठाया है फायदा,
लोगों के बवाल से,
खुद तो खाया है, 
मुझे भी खिलाते हो,
घूस का चंदा/
मुझसे भी चलवाना
चाहते हो अपना धंधा/

मैं कर देता भंडाफोड़,
बिठाल देता तुम्हारा धंधा/
काश मेरे तुम मेहमान न होते,
औ' बंधन में मेरे मन प्रान न होते/


कहीं तो अपनापन जतलाते हो,
कहीं पर अहसासे- गैर दिखाते हो,
कभी किया था एहसान,
जबरदस्ती खिला के अपना नमक,
वैसे भी सब्जी में मिर्च झोंक दिया था,
फ्लैट में अपने घुमाया था,
दिखाने को अपनी चमक-दमक,
गैरों से हँसे थे, बोले थे तुम,
सिर्फ जलाने को किसी को,
किसी का शायद दिल/
दिखा कर किसी को दबाई थी,
तुमने अपनी बाईं आँख/

बातों ही बातों में खिला दिया था,
प्यार का भात,
अकेले में ले जाकर,
धुलाया था हाथ/
पूछा था,' खाना कैसा था?
( वैसे जिससे पूछा था,
हराम का मिल जाय तो खा जाय जहर)
वो नादां था,
बोल दिया था रखने को,
तुम्हारा दिल,
' वाकई! सब बड़ा बढ़िया था'/
वैसे नौकरों की बनाई बिरयानी से,
अपनी माँ के हाथों की बनाई,
रोटी और चटनी ही मुझे सुहाती है,
तुम्हारे मखमली सोफे से,
अपने घर की चटाई अच्छी लगती है/

मैं होता तो निश्चित था,
यही कहता,
' बड़ा बेकार था खाना,
बोर थी सब्जी,
नमक और मिर्च,
झोंक दिया था,
दाल में लहसुन की जगह,
साबुन का छोंक दिया था/
इतने साल से सीखते रहे,
बनाना तुम खाना,
पर न आया अब तक,
बनाना तुम्हें खाना'/

वहाँ पर भी बात वही थी,
यहाँ तुम मेहमान हो मेरे,
वहाँ मैं मेहमान था तुम्हारा/
बात यही है,
सही भी यही है/
मैं जरूर देता तुम्हारी,
बात का जवाब,
भले ही कुम्हला जाता,
तुम्हारा मस्त शबाब,
तुम रूठ कर चल देते,
बिना खाए डिनर,
बिना पिए पानी,
लोगों से मेरी शिकायत,
करते न करते,
मैं भी उसी तरह का,
कुछ....
काश! मेरे तुम मेहमान न होते,
और बंधन में मेरे मन- प्रान न होते//
           """'""""""

अशआर
""""""""
गनीमत है दुनिया में तब तक ही,
जब तक कोई किसी का मेहमान न हो/
छेड़ने की इजाजत है, उस दिल को ही,
जख्म खाया जो इक चट्टान न हो//
              ---------

जब-जब तुमने मुझे बरबाद किया,
हर हाल में तुम्हें मैंने इरशाद किया,
सदियों बाद जो रहे- गुमराह से लौटे,
फिर भी वफा का मैंने इकरार किया//
             ----------

माना उन्होंने तो नजरों से वार किया,
भले अकेले में जी भर कर प्यार किया,
बन गए ऐन वक्त पर दुश्मन वो मेरे,
तुमने भी तो कलेजा ही मेरा चाक किया//
               ----------

तुमने मुझे दोस्त कहा मैंने माना,
तुमने मुझे दिलदार कहा, मैंने जाना,
मौन का अर्थ लगाया मेरी बेरुखी,
बनोगी बेवफा तुम, मैंने पहचाना//

            राजीव' रत्नेश'
            1972 ई०
            मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद
       ------;;;;--;;;;;-----::

तुमसे मुहब्बत करने की...!!! ( कविता)

तुमसे मुहब्बत करने की...!!! ( कविता)
******************************

ऐ खूबसूरत सनम तेरी अदा जानता हूँ,
तुझसे मुहब्बत करने की सजा जानता हूँ/
तेरे प्यार का ठिकाना नहीं, गैर भी हैं,
तू क्या है सनम, तेरी रजा जानता हूँ/

हकीकत जानता हूँ, मैं बदगुमान नहीं,
देगी दगा तू इश्क में, सरेआम यहीं,
माना तू अभी हमकदम है मेरे साथ- साथ,
जानता हूँ, साथ छोड़ जाएगी कहीं न कहीं/

कितने पानी में है तू, तेरी वफा जानता हूँ,
तुझसे मुहब्बत करने की सजा जानता हूँ/

अभी तो मयकदे में लुत्फ है,
मेरे पैमाने में अब तक शराब है,
तेरे होंठों पे रंगत, मेरे पे प्यास है,
अभी तो आजा, तेरे बिना सब उदास है/

बिजली बन गिरेगी सर पे कजा, जानता हूँ,
तुझसे मुहब्बत करने की सजा जानता हूँ/

मदहोश नहीं हूँ, अभी तो होश है बाकी,
हारा नहीं हूँ, अभी तो जोश है बाकी,
शमां जलती है, तू भी जल संग- संग,
अभी तो आलम मयनोश है साकी/

इक दिन तू बन जाएगी बला, जानता हूँ
तुझसे मुहब्बत करने की सजा जानता हूँ/

लहराते हैं तेरी नीली साड़ी पे सितारे,
तू रहती है हर वक्त जुल्फें सँवारे,
आँखों में वफा की काजल दिखाती हो,
कहती है, रहूंगी बावफा, बिना सोचे विचारे/

इक दिन देगी तू मुझको दगा, जानता हूँ,
तुझसे मुहब्बत करने की सजा जानता हूँ/

अभी तो बागों में बोलती है कोयल,
और मुरली की तान पर बजती है पायल,
गेसू तेरे बिखर जाते हैं थिरकन से,
रह- रह के ढ़ल जाता है तेरा आँचल/

चमन में आएगी इक दिन खिजा, जानता हूँ,
तुझसे मुहब्बत करने की सजा जानता हूँ/

भले शायर की हर बात में असर हो,
उसके दिल की हर आह में असर हो,
साथ देने वाले भी हों, अपने भी हों,
बचपन भले रंगीनियों में हुआ बसर हो/

जवानी उसकी बन जाती है मयकदा, जानता हूँ,
तुझसे मुहब्बत करने की सजा जानता हूँ/

अभी तो तुम भी, पहलू मेरा आबाद करोगी,
मेरे हर शेर पे इरशाद कहोगी,
जबरदस्ती प्यार के बंधन में बँधोगी,
मेरी भरी जवानी तुम बरबाद करोगी/

इक दिन बता दोगी धता, जानता हूँ,
तुझसे मुहब्बत करने की सजा जानता हूँ//
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गुलदस्ता- ए- अशआर
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कभी तो ये दिल बहुत उदास होत है,
कभी दिल में रहती है खुशहाली,
सुबह को मिलती है उल्फत,
तो मेरी शाम रहती है प्यासी//
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यार तुम कैसे हो, तुम्हें बेवफा
           तो न मैंने जाना था,
तुम्हें अपना नहीं, तो गैर भी
            न मैंने जाना था/
हकीकत क्या है इश्क की
            इससे तुम अनजान नहीं,
तुम निकले क्या, तुम क्या जानो
            तुम्हें मैंने क्या जाना था//
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मेरे नजदीकी यार-दोस्तों में
              तुम्हारी चर्चा है,
तुम कितनी हसीन हो
              ये भी चर्चा है,
इक परवाना है और
              इक शमां है,
लोग बाग की सुनो उन पे
              तो कयामत बर्पा है//
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लोग कहते हैं मेरी शायरी में
                खास बातें हैं,
जो कहते हैं और लोग
                वो आम बातें हैं/
मेरी उल्टी-सीधी- तिरछी
                 बेपर की बातों पर,
हर बार कहते हैं वो
                 आप बजा फरमाते हैं//
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मुझे ऐ जाने- करार
             तुम मेरी तकदीर लगती हो,
हर हाल में तुम मुझे
             वफा की तस्वीर लगती होमुहब्बत की मंजिल को
             पा लेने की,
ऐ सनम तुम मुझे
             आसां तदबीर लगती हो//
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सोचता हूँ बहुत उदास है वो,
उल्फत की बातों से अन्जान है वो,
मेरी चाहत का हो असर उसपे कैसे,
अभी बहुत भोली, बहुत मासूम है वो//
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         राजीव रत्नेश
           1975 ई०
        मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/

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