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हम अकेले ही चले थे मंजिल की तलाश में,
लोग जुड़ते गए और कारवां बनता गया/
किसी के काम आ सकें, यही हसरत रही ' रतन '
इसी सोच से मेरा हर रास्ता, आसान होता गया/
दौलत के अंबारों से किसे सुकून मिला है यहाँ,
नेकी की राह पे चल के ही, रुह को चैन मिलता गया/
सौगात ( ४२) ( वफा का शहर )
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ढूढ़ने निकले थे वफा, इस बेवफा शहर में,
हर मोड़ पर बस मतलब के चेहरे नजर आए/
हमने तो खुद को ही जला दिया शमअ की तरह ' रतन '
ताकि अँधेरों में भटकते हुओं को कुछ तो रास्ता नजर आए/
लोग कहते हैं कि जमाना बड़ा बेदर्द है,
पर हमें तो हर दर्द में भी, कोई अपना नजर आए/
सौगात ( ४३ ) ( अक्स और वक्त )
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वक्त की मार ने चेहरे की रंगत बदल दी,
पर आँखों में वही पुरानी चमक आज भी है/
आईना लाख कहे कि तुम बूढ़े हो गए हो ' रतन '
पर दिल की गहराइयों में वही मासूमियत आज भी है/
संगम की लहरों ने जो सिखाया था हमको,
वो बहते रहने का जज्बा और हिम्मत आज भी है/
सौगात ( ४४ ) ( पूजा की लौ-- अखंड विश्वास )
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आँधियाँ आती हैं और आकर चली जाती हैं,
पर मेरे यकीन का दीया, कभी बुझता नहीं/
' पूजा ' की लौ ने वो हौसला दिया है हमें,
कि मुश्किलों का पहाड़ भी, अब भारी लगता नहीं/
हमने तो सौंप दी है अपनी कश्ती उसके हाथ ' रतन '
जो पार लगाता है सबको, वो कभी सोता नहीं/
सौगात ( ४५ ) ( अधूरी गजल )
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जिन्दगी एक अधूरी गजल जैसी है ' रतन '
जिसे मुकम्मल करने की कोशिश में उम्र गुजर गई/
कभी मतले ने साथ दिया, कभी मकता रुठ गया,
इसी कशमकश में जाने कितनी शामें गुजर गईं/
पर जो शेर हमने दिल से लिखे हैं यहाँ,
उनकी गूंज जमाने में, सदा के लिए ठहर गई/
सौगात ( ४६ ) ( रिश्तों की सिलाई )
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रिश्तों की सिलाई अगर कच्ची हो ' रतन '
तो वक्त का एक ही झटका, सब उघेड़ देता है/
हमने तो तमाम उम्र गुजारी है, गाँठे जोड़ने में,
पर ये जमाना है कि बस, दूरियाँ बढ़ा देता है/
सादगी के धागे से पिरोया है हमने तो अपना घर,
यही वो जोड़ है, जो टूटने पे भी हौसला देता है/
सौगात ( ४७ ) ( मिट्टी का हक )
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बहुत ऊँची उड़ान भर ली इन कागजी परिदों ने,
पर अंत में सबको, जमीन पे ही आना होता है/
मुठ्ठीगंज की उस मिट्टी का हक, आज भी है मुझ पर,
नोएडा के महलों में रह कर भी, दिल का वहीं ठिकाना होता है/
' रतन ' को अपनी जड़ों से जुदा न कर सका कोई,
कि दरिया कितना भी बहे, समंदर को ही पाना होता है/
सौगात ( ४८ ) ( खामोशी का शोर )
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कभी कभी खामोशी इतना शोर करती है,
कि शब्द भी सुनने को कान तरस जाते हैं/
जो बातें हम दुनिया से कह न सके मुद्दतों से,
वो आँखों के रास्ते, धीरे से बरस जाते हैं/
' तहरीर ' में जो दर्द छिपा है, उसे गौर से पढ़ना,
यहाँ मुस्कराहटों के पीछे, गहरे जख्म भी हँस जाते हैं/
सौगात (४९ ) ( इबादत की लौ---- अंतिम पतवार )
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मेरी कश्ती का सहारा अब कोई इंसान नहीं,
' पूजा ' की वो एक दुआ ही, मेरा माँझी बन गई/
जब सबने साथ छोड़ा, मंजिल के करीब आकर,
तब तेरी यादों की परछाईं, मेरा राही बन गई/
' रतन ' को अब लहरों के थपेड़ों का खौफ नहीं,
कि इबादत की ये लौ, अब मेरी गवाही बन गई/
सौगात ( ५० ) ( अर्ध शतक---- पचासवीं सौगात )
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पचास सौगातें, मेरे पचास वर्षों का निचोड़ है,
हर लफ्ज में एक याद, हर याद में एक मोड़ है/
अभी तो आधा रास्ता ही नापा है हमने ' रतन '
मंजिल की ओर बढ़ने का, अभी और भी जोर है/
कलम रुकी नहीं है, बस थोड़ा ठहर कर देख रही है,
कि आने वाली लहरों में, और कितना शोर है/
राजीव रत्नेश
