Monday, August 24, 2026

चाहे अपनेपन से देखो ( गजल )

चाहे अपनेपन से देखो  ( गजल )
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तुम्हें मेरा हाल जानने की जरूरत नहीं है/
अपना हाल बताने की मुझे फुरसत नहीं है/

किसी से मिलने की मुझे मनाही नहीं है,
दमे- गुलगश्त मुझे तुमसे उजरत नहीं है/

सलीका- ए- हुस्न अजब है, आँखों से पिलाते हैं,
उनकी जब- जब आँखे अश्कबार मिली है/

आँखो से आँसू गिरें या बह जाए कजरा,
मजबूर थे तुम, तो हमें भी तुमसे मुहब्वत नहीं है/

हजरते- वाइज ने न पीने की हिदायत दी है,
साकी ने भर-भर प्याले पीने की इजाजत दी है/

कहने को तो बड़ी दिलदार, बड़ी सूरमा थी तुम,
मुझे तुझसे कुछ कहने, माँगने की नीयत नहीं है/

दाल में कुछ काला या पूरी दाल ही काली है,
ये मसूर की दाल है हुजूर, कोई उड़द नहीं है/

मुहब्बत में बरबादियाँ तो हमीं दोनों की हुई है,
शिकस्ता बदन जरूर हूँ पर दिल मजरूह नहीं है/

वाइज को समझा, नमाज तो नहीं छूटी है,
भले गले में मेरे कोई तसबीह नहीं है/

तुझसे मिल पाने में भला हिचक मुझको कैसी,
तुझसे मिलने के लिए सनम, हम मशरूफ नहीं हैं/

चाहे अपनेपन से देखो या देखो हिकारत से,
' रतन ' को तुमसे कोई अदावत नहीं है//

             राजीव रत्नेश

तुझे हमेशा के लिए ही ( गजल )

तुझे हमेशा के लिए ही  ( गजल )
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खेल-खेल में ही यह क्या खेला हो गया/
तू मेरी हो गई, थोड़ी देर को मैं तेरा हो गया/

अंगूठी तो पहनाई गई थी आखिर देखभाल के,
तेरी गुड्डी की मेरे गुड्डू से देख झमेला हो गया/

हर कोई जताने लगा तुझ पर दीवानगी अपनी,
मेरे लिए माहौल- ए- महफिल कसैला हो गया/

पिला या न पिला जाम अपने हाथों से मुझे,
फिर भी महफिल में आने का हौसला हो गया/

बरसने लगी थोड़ी गुलाबी भी तेरी आँखों से,
देखो अब मौसम भी आशिकाना हो गया/

हिफाजत तो दिल की सदा की, हर धड़कन के पहले,
लाद के ले जाए शेख जी, ये कैसा माजरा हो गया/

नजर को तो तीरगी का अहसास भी कुछ न था,
बादल गरज उठे तो छाला दिल का अलबेला हो गया/

रस्मो- राह तुझसे हमेशा से रही, तू अकेली कहाँ?
तुझे हमेशा के लिए ही ' रतन ' का सहारा हो गया//

                 राजीव रत्नेश

अभी तो शह और मात बाकी है ( गजल )

अभी तो शह और मात बाकी है
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जख्म भर गया निशान बाकी है/
खो गई तू, तेरी पहचान बाकी है/

आधी रात ढ़ल गई, आधी बाकी है,
आ जा तेरा इंतजार बाकी है/

सजाए बैठा हूँ अभी भी महफिल,
अभी तो दौरे- शराब बाकी है/

मेरे दिलबर, मेरे मुसव्विर!
अभी देखनी तेरी औकात बाकी है/

किस मोड़ से निकल आएगी तू,
मील के पत्थर को देखनी करामात बाकी है/

आ जा अजनबी समझ कर ही,
तेरे इश्क का अंजाम बाकी है/

कितनी रातों का जागा हूँ, थपक दे,
सुला दे रुह की थकन बाकी है/

अभी तक जाने कबसे खामोश है,
एक बार तेरा खोलना जुबान बाकी है/

करीब आके बिछी बिसात उलट दे,
' रतन ' अभी तो शह और मात बाकी है//

                राजीव रत्नेश

Saturday, August 22, 2026

तेरी घुमावदार गलियों का ( गजल )

तेरी घुमावदार गलियों का  ( गजल )
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आजा कि तेरे- मेरे बीच दुनियादारी नहीं है/
वैसे तो मुझ पर तेरी जिम्मेदारी नहीं है/

अक्ल मेरी गुम हो गई थी जाने कहाँ,
मुझे तन्हां छोड़ जाने में तेरी समझदारी नहीं है/

दिलदार हूँ तेरा, तुझे अपनी मानता हूँ,
तेरी मेरे लिए क्या कोई जवाबदारी नहीं है?

अकेली पौध नहीं तू अपने वालिदैन की,
उनकी फसल पे मेरी कोई जमींदारी नहीं है/

कहाँ तक गिनाऊँ तेरे अहसानात मुझ पर,
कभी तो सोच, क्या लौट आने की तैय्यारी नहीं है?

किफायतशारी की आदत तेरी, बुजदिल बना देगी,
क्या मेरी पनाह में तेरी पनाहगारी नहीं है?

चाँद-सितारों के साये तले, तूने किया था पैमाने- वफा,
मुझे भुला पाने की क्या कोशिश तुम्हारी नहीं है?

अजनबियों की सूरत, मुझसे खफा- खफा रहती हो,
प्यार की राह की क्या शातिर खिलाड़ी नहीं हो?

जलजले उठेंगे, समंदर से शोले भड़क उठेंगे,
अब जिद छोड़ आ जाओ, मेरे लिए अजनबी नहीं हो/

खुद ही लौट कर आ, तुझे साहिल पुकारता है,
तेरे बाप के आगे, जरूरी मेरी हाजिरी नहीं है/

तेरी घुमावदार गलियों का मैं तो मुसाफिर,
तेरे सफर- ए- हयात में मेरी हिस्सेदारी नहीं है//

              राजीव रत्नेश

Friday, August 21, 2026

नावाकिफ नहीं तू मेरे ( गजल )

नावाकिफ नहीं तू मेरे  ( गजल )
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अगर तेरी नजर का इशारा मिल गया होता/
मेरी एक ठोकर में ये सारा जमाना होता/

तेरी आँखों की नीली जमुना बहाव पे गर न होती,
कई गोते तेरी ठुड्डी को उठा के लगाया होता/

तुझसे ही जहनों में रौशनी है, सुकूने- दिल है,
तेरे आरिजों में तपिश सूरज की, कौन इनसे बावस्ता होता/

तुझे प्यार करता न करता, इकरार करता न करता,
कुछ भी न होता, मगर तेरा चाहने वाला होता/

कश्ती लेकर साहिल पे न आता, अगर तेरा आसरा न होता,
कैसे मिलता सिर्फ समंदर होता, न किनारा होता/

दिलचस्प हैं किस्से, कसमें गंगो- जमन के खाना,
क्या होता न तेरी कसम होती, न प्यार का सहारा होता/

मौजूद तू किरन में, चमके शबनम की तरह बागों में,
तुझसे दूर रह कर भी आखिर मेरा भला क्या होता/

नावाकिफ नहीं तू मेरे इश्क के उसूलों से,
क्या करता, हर हाल जो कश्ती को किनारे पे लाना होता//

            राजीव रत्नेश

खुशबू से भरा तेरा आँगन ( गजल )

खुशबू से भरा तेरा आँगन  ( गजल )
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पहले से जो तू बेमुरव्वत न होती/
गजल मेरी तुझ पर हमलावर न होती/

यकीन कर लो मेरी इस बात का,
जो तेरी मुझसे बगावत न होती/

कारस्तानी- ए- जंग का यह मायने नहीं,
सोचा तुमने जो, तुझसे अदावत न होती/

सलीम से मुहब्बत अनारकली न करती,
मयस्सर उसको हिरासत न होती/

आसमान में धनक की खूबसूरती न होती,
चमन में जब तक बरसात न होती/

साहिल पे पहुँच, मेरी कश्ती थम न जाती,
हाथ में जो ये मजबूत पतवार न होती/

तेरे हुस्न को क्या ही मैं निहारता,
आँख जो तेरी पहले ही अश्कबार न होती/

तेरी- मेरी मुहब्बत परवान न चढ़ती,
जोशे- जवानी न होती, छाती फौलाद न होती/

खुशबू से भरा तेरा आँगन न होता,
बादे- नसीम इतनी गर दिलदार न होती//

           राजीव रत्नेश

Thursday, August 20, 2026

औकात कहाँ से लाऊँ ( गजल )

औकात कहाँ से लाऊँ  ( गजल )
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तुम्हारी औकात है, औकात अपनी मुझे दिखाओ,
मेरी तो औकात नहीं है कि वैसे तुझे दिखाऊँ/

शबे- बारातें सब याद मुझे, लम्हा-लम्हा फिसलता हुआ,
वो जिन्दगी की आखिरी शबे- रात कहाँ से लाऊँ/.

तुझे देख कर पहली बार जो दिल धड़का था मेरा,
तब का अपना तेरे लिए इजहार कहाँ से लाऊँ/

तू जो आमादा है, धज्जियाँ मोहब्बत की उड़ाने को,
तेरे लिए अब मैं पुराने अखबार कहाँ से लाऊँ/

गुजर चुका अब तो सर से पानी भी कब का,
मैं कोई गोताखोर नहीं, अच्छा तैराक कहाँ से लाऊँ/

तेरी ' ना' को' हाँ' में तब्दील करूँ तो आखिर कैसे,
दिल के मिटे अपने अरमान कहाँ से लाऊँ/


मिलन की झूठी तसल्लियाँ भी तू अब मुझे न दे,
जमाना बाद में भूल जाएगा, तुझे मेहरबाँ कहाँ से बनाऊँ/

तेरी तस्वीर तो सब जाहिरे- जमाना कर दूँ, गर चाहे,
तस्वीर के लिए अब इश्तहार कहाँ से लाऊँ/

जमाना था पहले भी मुद्दई, उसको क्या समझाऊँ,
तुझे मंजूर नहीं तो किस तरह तेरा फैसला सुनाऊँ/

जानता हूँ तू मान छोड़ कर फिर-फिर आवेगी,
तेरे साथ के लिए सब्रो- एहतियात कहाँ से लाऊँ/

कभी मेरे दिल का सुकूं थी तू हुस्न की मलिका,
सबके सामने तेरा हाथ पकड़ने की औकात कहाँ से लाऊँ/

मुतमईन हूँ, हुस्नवालों की तरफदारी जमाना करेगा,
अपनी वफा का तेरे सिवा कद्र दां कहाँ से लाऊँ/

उखड़ रही साँस अब तो भुला कर शिकवे आ जाओ,
दिल में घुमड़ रहे कैसे जज्बात तुझे कहाँ से बताऊँ/

तुझसे तो बिछड़ने का गम कुछ ज्यादा ही ' रतन ' को,
जनाजा तो जनाजा, तुरबत पर भी नआए, कैसे किसी की समझाऊँ//

                राजीव रत्नेश

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!