Tuesday, September 1, 2026

मेरी आवाज सुना-- ( २ )

मेरी आवाज सुनो--( २ )
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मेरी अन्तर्व्यथा शायद शब्दों में पूरी उतर न सकी,
कुछ पीड़ाएँ खामोशी की जुबान में ही पलती हैं/

कल हमने नव- सृजन का जो स्वप्न बुना था साथ,
आज उसकी राख में भी कुछ चिंगारियाँ जलती हैं/

तुमको याद थी, उन वादों की वह झुरमुटी शाम,
हमने भी तो आने वाले कल की तस्वीर संवारी थी/

' कल के बिछड़े कभी मिलेंगे, यह विश्वास दिल में था,'
उसी उम्मीद में, कितनी रातें हमने, साथ गुजारी थीं/

वफा की राह पुरखतर तो होती, पर आसां नहीं होती,
मगर हमने तो हर मोड़ पर साथ चलने की ठानी थी/

अब अधूरे फलसफे को, पूरी कहानी मान लेते हैं,
क्यूँकि कुछ रिश्ते मिटने के बाद भी अपनी निशानी
रखते हैं/

             राजीव रत्नेश
  ( महोदय, यह वही जान्हवी है, जो मेरे संस्मरण,
" जिन्हें हम भूलना चाहें " की प्रमुख पात्र रह चुकी है )

मेरी आवाज सुनो (१ )

मेरी आवाज सुनो
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मैं इश्क की बाजी जीतना भी नहीं चाहता,
बस अपने अहसासों को थोड़ा मुकाम देना/

और अगर मेरी मुहब्बत तुम्हारी मंजिल न बने,
तो जाते-जाते मुझे दुआओं का पैगाम देना/

मैं शिकायतों का सफर नहीं लिखूँगा,
तुम बस अपनी यादों का एक जाम देना/

जो किस्मत में लिखा होगा, वही होगा,
मुझे बस अपने दिल में एक शाम देना/

मैं उल्झनों में भी, मुस्कराते हुए भी जी लूँगा,
तुम मेरी खामोशी को कभी इल्जाम न देना/

        राजीव रत्नेश
    ( जान्हवी से आखिरी मुलाकात )

Monday, August 31, 2026

मेरे सब्र का दामन छूटा ( गजल )

मेरे सब्र का दामन छूटा  ( गजल )
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दरकिनार कर अपनी खुद्दारी, तुझे मनाने चला हूँ/
तेरी दहलीज पर फिर एक बार आसन जमाने चला हूँ/

मान- मनौव्वल ही कर सकता हूँ, तेरा मानना आसां नहीं,
खुद अपनी कश्ती, तेरे साहिल पे लगाने चला हूँ/

पहले की तरह तू बरहना- पा साहिल पे न आएगी,
तेरे लिए ही बस, तेरी चौखट पे सर झुकाने चला हूँ/

जानता हूँ अब तू, मुझसे ही परदा भी करेगी,
यही सोच, फिर भी तुझे अकेले में बुलाने चला हूँ/

जानता हूँ तेरा बाप, हुक्का गुड़गुड़ा रहा होगा,
उसे इत्मीनान की साँस देने, तुझे माँगने चला हूँ/

अगर वह मजबूर न होता, उसकी बिटिया मेरी न होती,
जमाने की जहालत से उसे आज बचाने चला हूँ/

मेरी मोहब्बत पर तूने नाकामी का चोला डाला है,
मुझसे सब्र का दामन छूटा, तुझे वापस लाने चला हूँ//

                  राजीव रत्नेश

Monday, August 24, 2026

चाहे अपनेपन से देखो ( गजल )

चाहे अपनेपन से देखो  ( गजल )
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तुम्हें मेरा हाल जानने की जरूरत नहीं है/
अपना हाल बताने की मुझे फुरसत नहीं है/

किसी से मिलने की मुझे मनाही नहीं है,
दमे- गुलगश्त मुझे तुमसे उजरत नहीं है/

सलीका- ए- हुस्न अजब है, आँखों से पिलाते हैं,
उनकी जब- जब आँखे अश्कबार मिली है/

आँखो से आँसू गिरें या बह जाए कजरा,
मजबूर थे तुम, तो हमें भी तुमसे मुहब्वत नहीं है/

हजरते- वाइज ने न पीने की हिदायत दी है,
साकी ने भर-भर प्याले पीने की इजाजत दी है/

कहने को तो बड़ी दिलदार, बड़ी सूरमा थी तुम,
मुझे तुझसे कुछ कहने, माँगने की नीयत नहीं है/

दाल में कुछ काला या पूरी दाल ही काली है,
ये मसूर की दाल है हुजूर, कोई उड़द नहीं है/

मुहब्बत में बरबादियाँ तो हमीं दोनों की हुई है,
शिकस्ता बदन जरूर हूँ पर दिल मजरूह नहीं है/

वाइज को समझा, नमाज तो नहीं छूटी है,
भले गले में मेरे कोई तसबीह नहीं है/

तुझसे मिल पाने में भला हिचक मुझको कैसी,
तुझसे मिलने के लिए सनम, हम मशरूफ नहीं हैं/

चाहे अपनेपन से देखो या देखो हिकारत से,
' रतन ' को तुमसे कोई अदावत नहीं है//

             राजीव रत्नेश

तुझे हमेशा के लिए ही ( गजल )

तुझे हमेशा के लिए ही  ( गजल )
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खेल-खेल में ही यह क्या खेला हो गया/
तू मेरी हो गई, थोड़ी देर को मैं तेरा हो गया/

अंगूठी तो पहनाई गई थी आखिर देखभाल के,
तेरी गुड्डी की मेरे गुड्डू से देख झमेला हो गया/

हर कोई जताने लगा तुझ पर दीवानगी अपनी,
मेरे लिए माहौल- ए- महफिल कसैला हो गया/

पिला या न पिला जाम अपने हाथों से मुझे,
फिर भी महफिल में आने का हौसला हो गया/

बरसने लगी थोड़ी गुलाबी भी तेरी आँखों से,
देखो अब मौसम भी आशिकाना हो गया/

हिफाजत तो दिल की सदा की, हर धड़कन के पहले,
लाद के ले जाए शेख जी, ये कैसा माजरा हो गया/

नजर को तो तीरगी का अहसास भी कुछ न था,
बादल गरज उठे तो छाला दिल का अलबेला हो गया/

रस्मो- राह तुझसे हमेशा से रही, तू अकेली कहाँ?
तुझे हमेशा के लिए ही ' रतन ' का सहारा हो गया//

                 राजीव रत्नेश

अभी तो शह और मात बाकी है ( गजल )

अभी तो शह और मात बाकी है
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जख्म भर गया निशान बाकी है/
खो गई तू, तेरी पहचान बाकी है/

आधी रात ढ़ल गई, आधी बाकी है,
आ जा तेरा इंतजार बाकी है/

सजाए बैठा हूँ अभी भी महफिल,
अभी तो दौरे- शराब बाकी है/

मेरे दिलबर, मेरे मुसव्विर!
अभी देखनी तेरी औकात बाकी है/

किस मोड़ से निकल आएगी तू,
मील के पत्थर को देखनी करामात बाकी है/

आ जा अजनबी समझ कर ही,
तेरे इश्क का अंजाम बाकी है/

कितनी रातों का जागा हूँ, थपक दे,
सुला दे रुह की थकन बाकी है/

अभी तक जाने कबसे खामोश है,
एक बार तेरा खोलना जुबान बाकी है/

करीब आके बिछी बिसात उलट दे,
' रतन ' अभी तो शह और मात बाकी है//

                राजीव रत्नेश

Saturday, August 22, 2026

तेरी घुमावदार गलियों का ( गजल )

तेरी घुमावदार गलियों का  ( गजल )
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आजा कि तेरे- मेरे बीच दुनियादारी नहीं है/
वैसे तो मुझ पर तेरी जिम्मेदारी नहीं है/

अक्ल मेरी गुम हो गई थी जाने कहाँ,
मुझे तन्हां छोड़ जाने में तेरी समझदारी नहीं है/

दिलदार हूँ तेरा, तुझे अपनी मानता हूँ,
तेरी मेरे लिए क्या कोई जवाबदारी नहीं है?

अकेली पौध नहीं तू अपने वालिदैन की,
उनकी फसल पे मेरी कोई जमींदारी नहीं है/

कहाँ तक गिनाऊँ तेरे अहसानात मुझ पर,
कभी तो सोच, क्या लौट आने की तैय्यारी नहीं है?

किफायतशारी की आदत तेरी, बुजदिल बना देगी,
क्या मेरी पनाह में तेरी पनाहगारी नहीं है?

चाँद-सितारों के साये तले, तूने किया था पैमाने- वफा,
मुझे भुला पाने की क्या कोशिश तुम्हारी नहीं है?

अजनबियों की सूरत, मुझसे खफा- खफा रहती हो,
प्यार की राह की क्या शातिर खिलाड़ी नहीं हो?

जलजले उठेंगे, समंदर से शोले भड़क उठेंगे,
अब जिद छोड़ आ जाओ, मेरे लिए अजनबी नहीं हो/

खुद ही लौट कर आ, तुझे साहिल पुकारता है,
तेरे बाप के आगे, जरूरी मेरी हाजिरी नहीं है/

तेरी घुमावदार गलियों का मैं तो मुसाफिर,
तेरे सफर- ए- हयात में मेरी हिस्सेदारी नहीं है//

              राजीव रत्नेश

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!