Friday, August 21, 2026

नावाकिफ नहीं तू मेरे ( गजल )

नावाकिफ नहीं तू मेरे  ( गजल )
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अगर तेरी नजर का इशारा मिल गया होता/
मेरी एक ठोकर में ये सारा जमाना होता/

तेरी आँखों की नीली जमुना बहाव पे गर न होती,
कई गोते तेरी ठुड्डी को उठा के लगाया होता/

तुझसे ही जहनों में रौशनी है, सुकूने- दिल है,
तेरे आरिजों में तपिश सूरज की, कौन इनसे बावस्ता होता/

तुझे प्यार करता न करता, इकरार करता न करता,
कुछ भी न होता, मगर तेरा चाहने वाला होता/

कश्ती लेकर साहिल पे न आता, अगर तेरा आसरा न होता,
कैसे मिलता सिर्फ समंदर होता, न किनारा होता/

दिलचस्प हैं किस्से, कसमें गंगो- जमन के खाना,
क्या होता न तेरी कसम होती, न प्यार का सहारा होता/

मौजूद तू किरन में, चमके शबनम की तरह बागों में,
तुझसे दूर रह कर भी आखिर मेरा भला क्या होता/

नावाकिफ नहीं तू मेरे इश्क के उसूलों से,
क्या करता, हर हाल जो कश्ती को किनारे पे लाना होता//

            राजीव रत्नेश

खुशबू से भरा तेरा आँगन ( गजल )

खुशबू से भरा तेरा आँगन  ( गजल )
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पहले से जो तू बेमुरव्वत न होती/
गजल मेरी तुझ पर हमलावर न होती/

यकीन कर लो मेरी इस बात का,
जो तेरी मुझसे बगावत न होती/

कारस्तानी- ए- जंग का यह मायने नहीं,
सोचा तुमने जो, तुझसे अदावत न होती/

सलीम से मुहब्बत अनारकली न करती,
मयस्सर उसको हिरासत न होती/

आसमान में धनक की खूबसूरती न होती,
चमन में जब तक बरसात न होती/

साहिल पे पहुँच, मेरी कश्ती थम न जाती,
हाथ में जो ये मजबूत पतवार न होती/

तेरे हुस्न को क्या ही मैं निहारता,
आँख जो तेरी पहले ही अश्कबार न होती/

तेरी- मेरी मुहब्बत परवान न चढ़ती,
जोशे- जवानी न होती, छाती फौलाद न होती/

खुशबू से भरा तेरा आँगन न होता,
बादे- नसीम इतनी गर दिलदार न होती//

           राजीव रत्नेश

Thursday, August 20, 2026

औकात कहाँ से लाऊँ ( गजल )

औकात कहाँ से लाऊँ  ( गजल )
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तुम्हारी औकात है, औकात अपनी मुझे दिखाओ,
मेरी तो औकात नहीं है कि वैसे तुझे दिखाऊँ/

शबे- बारातें सब याद मुझे, लम्हा-लम्हा फिसलता हुआ,
वो जिन्दगी की आखिरी शबे- रात कहाँ से लाऊँ/.

तुझे देख कर पहली बार जो दिल धड़का था मेरा,
तब का अपना तेरे लिए इजहार कहाँ से लाऊँ/

तू जो आमादा है, धज्जियाँ मोहब्बत की उड़ाने को,
तेरे लिए अब मैं पुराने अखबार कहाँ से लाऊँ/

गुजर चुका अब तो सर से पानी भी कब का,
मैं कोई गोताखोर नहीं, अच्छा तैराक कहाँ से लाऊँ/

तेरी ' ना' को' हाँ' में तब्दील करूँ तो आखिर कैसे,
दिल के मिटे अपने अरमान कहाँ से लाऊँ/


मिलन की झूठी तसल्लियाँ भी तू अब मुझे न दे,
जमाना बाद में भूल जाएगा, तुझे मेहरबाँ कहाँ से बनाऊँ/

तेरी तस्वीर तो सब जाहिरे- जमाना कर दूँ, गर चाहे,
तस्वीर के लिए अब इश्तहार कहाँ से लाऊँ/

जमाना था पहले भी मुद्दई, उसको क्या समझाऊँ,
तुझे मंजूर नहीं तो किस तरह तेरा फैसला सुनाऊँ/

जानता हूँ तू मान छोड़ कर फिर-फिर आवेगी,
तेरे साथ के लिए सब्रो- एहतियात कहाँ से लाऊँ/

कभी मेरे दिल का सुकूं थी तू हुस्न की मलिका,
सबके सामने तेरा हाथ पकड़ने की औकात कहाँ से लाऊँ/

मुतमईन हूँ, हुस्नवालों की तरफदारी जमाना करेगा,
अपनी वफा का तेरे सिवा कद्र दां कहाँ से लाऊँ/

उखड़ रही साँस अब तो भुला कर शिकवे आ जाओ,
दिल में घुमड़ रहे कैसे जज्बात तुझे कहाँ से बताऊँ/

तुझसे तो बिछड़ने का गम कुछ ज्यादा ही ' रतन ' को,
जनाजा तो जनाजा, तुरबत पर भी नआए, कैसे किसी की समझाऊँ//

                राजीव रत्नेश

Wednesday, August 19, 2026

बस मेरी तस्वीर ( नज्म )

बस मेरी तस्वीर  ( नज्म  )
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मेरी एक- एक निशानी मुझे वापस कर तो रही हो,
पर हृदय- मंदिर में समाई, मेरी तस्वीर भी वापस करना/

वरना एक टीस हमेशा के लिए तुम्हारे सीने में दफ्न न
हो पाएगी,
रह- रह के जो तुम्हें तड़पाएगी, मन को कचोटती रहेगी/

याद आएँगे वो दिन, जो हमने- तुमने साथ- साथ हैं गुजारे,
हर कशमकश में हम- तुम साथ थे, रूठी हुई किस्मत
के मारे/

तुम्हें क्या सूझी, तुम क्यूँ हाल-बेहाल हुई, क्या बरबाद
हुई,
हया की राह छोड़ क्यूँ आज तुम बेहयाई पर उतर आई/

मुहब्बत किया था तो आगा-पीछा सोच कर न किया था,
कि एक दिन अलगाव का गम भी सहना पड़ेगा, बेमौत
मरना पड़ेगा/

तेरी मुहब्बत में दुनिया छोड़ी थी, फिर उसी से नजरें मिलाना पड़ेगा,
तुमसे ये सोच कर सामना कर लूँगा, मेरी है भले हरजाई ही सही/

नदी का किनारा, तुझे रह- रह कर मेरी याद दिलाता रहेगा,
जहाँ मिल बैठ कर हमने- तुमने मछलियाँ काँटे में थीं
फँसाई/

जिंदगी तुमसे दूरी की मुस्तहक न थी, न ही जिंदगी
अजाब बनी थी,
क्या सोच कर तुमने नाहक हमारे- तुम्हारे बीच की दूरी बढ़ाई/

लौटा न सको मुझे तुम, मेरी दी हुई सौगातें, अपनी पुरानी यादें,
बस मेरी तस्वीर कम से कम मुझे अपनी तस्वीर के साथ वापस करना//

                 राजीव रत्नेश

Monday, August 17, 2026

फिर भी उसे मैंने ( नज़्म )

फिर भी उसे मैंने
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कृश गात, पीत वर्ण, कोमलांगी, सब्ज वसन,
का आडम्बर लिए वह मेरे समीप खड़ी थी/

जाने किस मनोरथ की पूर्णाहुति हेतु,
वह मुझे अपलक देखती मूक खड़ी थी/

मैं जान न सका, कुछ समझ न सका,
कि उसको मुझसे अब क्या चाहिए था/

मेरी लुटी जवानी के बरसों बाद आई थी,
कभी की मेरे गीतों की वह नायिका थी/

वे गीत जिसमें मिलन से ज्यादा जुदाई थी,
अगणित शोलों के बीच नाचती उसकी रानाई थी/

मैंने पूछा भी नहीं, मिलने अब क्यूँ आई थी,
कौन सा भाव हृदय में था, क्या जरूरत थी/

अपने हाथ मेरे ओर बढ़ा, मुझे प्रतिबंधित कर,
अपने होंठ मेरे होठों पे बिठा , हर्षित थी/

आँखों में तरल प्रवाह के साथ, एक सवाल था,
" मुझे क्या भूल गए या वक्त ने तुम्हें भी छला है"/

मैं उसको प्रत्युत्तर भी भला क्या दे सकता था?
मेरे पास अपना कहने को कुछ भी तो नहीं था/

फिर भी उसे मैंने अपने हृदय में स्थान दिया,
जिसमें पहले ही कोई अवस्थित था//

                  राजीव रत्नेश

Wednesday, August 12, 2026

शेर

देखिए अभी वक्त क्या- क्या इम्तहां लेता है,
मिल के बिछड़ने का भी अंदाज नया होता है/
             राजीव रत्नेश

शेर

कुछ इस तरह उसके अहसास से मैं तो गुजरा हूँ,
खुद गुम सा हो गया हूँ, या खुद ही एक सपना हूँ/

           राजीव रत्नेश
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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!