Saturday, March 14, 2026

चलो ओढ़ कर सो जाएँ कफन ( कविता)

चलो ओढ़ कर सो जाएँ कफन
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जाती नहीं ये दिल की तड़प तुम बिन,
चलो ओढ़ कर सो जाएँ अब तो कफन/

चाँद-सितारे चमकते हैं गगन में,
जलते हैं पर दो बदन प्यार के अगन में/
सय्याद के आने की खबर हो लाख,
मगर खिलते हैं गुल फिर भी चमन में/

मिटती नहीं किसी तरह रूह की थकन,
चलो ओढ़ कर सो जाएँ अब तो कफन/

न होंगे जुदा, जमाना बने दीवार भले,
दुश्मन बने जगत व्यवहार भले/
मेरी तू, मैं तेरा, ये बंधन न टूटेगा,
मजबूर हो जाए हमारा प्यार भले/

बढ़ गई है अब तो दिल की तपन,
चलो ओढ़ कर सो जाएँ अब तो कफन/

तुम दूर से पास आई हो तो क्या,
दूरी- ए- दिल मिटी, फासला सिमटा तो क्या/
रोक तुम पे, पहले से भी ज्यादा लगी है,
भले तुम मेरे और करीब आई हो तो क्या/

ये नजदीकी बनी है और भी जलन का सबब,
चलो ओढ़ कर सो जाएँ अब तो कफन/

बजती है तुम्हारी पायल अब भी,
सजती है यादों की बारात अब भी/
तुम हँसती हो तो लबों से फूल झड़ते हैं,
अँधेरों में बिजली चमकती है अब भी/

अब तो बनी जाती है दुश्मन ये पवन,
चलो ओढ़ कर सो जाएँ अब तो कफन/

शबनमी अश्क हैं, तुम्हारी सोने की काया,
क्या कहूँ, समझ नहीं पाया तुम्हारी माया/
कभी तो कौंधती हो सावन की बिजली सी,
कभी बन जाती हो धूप तो कभी छाया/

आग लगाने लगी है दिल में तुम्हारी लाल रिबन,
चलो ओढ़ कर सो जाएँ अब तो कफन//

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      पिलाने को कोई साकी न रही,
      हम पर कोई रात अब भारी न रही/
      निकल जाते हैं, हम तो उस राह पर,
      जिधर कोई आवाजाही भी न रही//

                  राजीव रत्नेश
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साकिया! मेरा एक काम कर दे ( कविता)

सकिया मेरा एक काम कर दे
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साकिया! आज मेरा एक कर दे,
अपनी नजर मेरे दिल के पार कर दे/
बहुतों का आज गुनहगार हूँ मैं,
दिले- मासूम को आज तू चाक कर दे/

कभी मोहब्बत की तलाश थी मुझे,
अब इक वफा की बची तलाश है/
एक जाम नहीं काफी साकी मेरे,
दिल में एक अनबुझी प्यास है/

आज कुछ इतना मगरूर हूँ मैं,
चाहे तो तू मुझे नजरों से मार दे/
साकिया! आज मेरा एक काम कर दे,
अपनी नजर मेरे दिल के पार कर दे/

किसी ने हाथ भी थामा था हालाते- गर्दिश में,
वो भी दो रोज के मेहमान बन के आए थे/
आँखों से उनकी झलकती थी वफा,
फरेबों के पर दिल में उनके घुमड़ते साएथे/

मुझे मिसाल न दे हीर और राँझे की,
बस आज तू मेरी जिन्दगी तमाम कर दे/
साकिया! आज मेरा एक काम कर दे,
अपनी नजर मेरे दिल के पार कर दे//

           राजीव रत्नेश
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Friday, March 13, 2026

तुमसे है गुजारिश मेरी ( कविता)

तुमसे है गुजारिश मेरी
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ऐ सनम! तुमसे है गुजारिश मेरी, 
मेरे तसब्बुर में भी न तुम आओ/
तुम्हें मालूम नहीं है दस्तूरे- मुहब्बत,
न तुम मेरे दिल को आज भरमाओ/

ये जो सैकड़ों मुहब्बत की दासतानें हैं,
हीर-राँझा, सोहनी-महिवाल के फसाने हैं/
उनकी बाबत तुम्हें कुछ भी मालूम नहीं,
उनको गुजरे हुए बीत गए जमाने हैं/

हमारी मुहब्बत बिल्कुल रुहानी है,
इसे जिस्मानी का सामां न बनाओ/
ऐसनम! तुमसे है गुजारिश मेरी,
मेरे तसब्बुर में भी न तुम आओ/

जिन्दादिली की बातें भी बहुत सुनी हैं,
लोगों की सीख भी हमने बहुत गुनी है/
अपना सभी कुछ खो कर हमने ये पाया,
इक मुहब्बत ही हर चीज से बड़ी है/

हाले- जिगर कुछ यूँ भी ठीक नहीं है,
न मुझे तुम और तड़पाओ/
ऐ सनम! तुमसे है गुजारिश मेरी,
मेरे तसब्बुर में भी न तुम आओ/

हम प्यार में तूफां से टकरा सकते थे,
बेगाने तो क्या अपनों से टकरा सकते थे/
काश! तुमने साथ दे के देखा होता,
हर हाल में हम तुम्हें अपनी बना सकते थे/

अब तो बिगड़ गई हैं बातें भी सारी,
न गुजरा जमाना तुम मुझे याद दिलाओ/
ऐ सनम! तुमसे है गुजारिश मेरी,
मेरे तसब्बुर में भी न तुम आओ//

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जितने तुम दूर होते गए, दर्द बेदस्तो- पा होता गया,
ऐ बेदर्द! सुन- समझ, मैं परायों से बावस्ता होता गया/
आहिस्ता कदमों से चलो, चमन के गुल जाग जाएँगे,
दिन पर दिन इश्क मेरा, दूसरों को रास्ता देता गया//

                  राजीव रत्नेश
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पूजा के पतवार से ( प्रार्थना)

खे रहा हूँ नाव भगवन!
तुम्हारी पूजा के पतवार से/
बढ़ रहा इसी आस में,
बचा लोगे मुझे मँझधार से/

मैं तुम्हारे ही सहारे,
चल पड़ा हूँ तूफान में भी/
लड़ रहा बल पा तुम्हीं से,
इस भयानक धार से/

देखता हूँ स्वर्ग सुन्दर,
नत नयनों में तुम्हारे/
नाता नहीं अब कोई मुझे,
अब इस संसार से/

जी रहा हूँ क्यूँकि,
जीवन मुझको तुमने दे दिया/
तुम ही कर अब मुक्त सकते,
जिन्दगी के इस भार से//

        राजीव रत्नेश
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एक सवाल के तीन जवाब ( सवाल- जवाब)

          उनकी पेशकश
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              हुस्न जब बेनकाब लेता है,
              हजारों का हिसाब होता है/
              जिनकी नीयत खराब होती है,
              उनका खाना खराब होता है//

           हमारी सरगोशी
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              कितना पाक था प्यार,
                    सनम हमारे- तुम्हारे दरम्यान,
              सुरूर में न आए पी कर,
                     बोतल पे बोतल शराब/
              जब तुम जवां थी, तब तो,
                     नहीं हुई हमारी नीयत खराब,
              आज ढ़लती जवानी में तुम्हारी,
                     क्यों होगी हमारी नीयत खराब//

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सुनना जरा गौर ऐ शाहजादी- ए- महफिल,
तुम्हारे वार से जाने कितनों का कलेजा चाक होता है/
तुम अपनी वफा छोड़कर दुश्मनी पे उतर आती हो,
जब तुम्हारी चलती नहीं, और दिमाग खराब होता है//

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                    अजी! मल्क- ए- तरन्नुम का कहना है,
                    कि हमारी नीयत ही खराब है/
                    हम कहते है, कायम रहे कैसे नीयत हमारी,
                    जबकि आँखों से पिलाई उन्होंने शराब है//

                           राजीव रत्नेश
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चर्चा ( नज्म)

चर्चा  ( नज्म)
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तुम्हारी सहेलियों में,
चर्चा आम है/
कि तुमने मुझे बोर किया,
अपने इन्हीं गोरे हाथों में,
लेकर औरत का हथियार,
मुझपे वार किया/

मदहोश मुझको किया,
दिखाने को उनको,
तुमने समेटी थी,
निगाहों में हया/
बिखेरी थी अधरों पे,
मृदु मुस्कान,
और बड़े धीरे से,
नश्तर बातों का लगाया था/

पर दिल में तुम्हारे क्या था,
मेरे सिवा न जान सका कोई/
मेरी दुनिया लुटी,
बनी रुस्वाई अभिशाप,
नक्शा- ए- जहन पे तुम्हारे,
उभरती रही तस्वीरे- गैर कोई/

मैंने भी तो किया था,
तुमको बोर/
मेरे दोस्तों में,
चर्चा आम है,
उसी की कसर,
निकाली थी ,
तुमने शायद/
और उसी का ये अंजाम है,
कि तुमने मुझे बोर किया,
मन- मानस के तंतुओं को,
यूँ झकझोर दिया/

कारण साफ है,
जो कुछ भंगिमा में था तुम्हारे/
वो कौन जानता है,
सिवा मेरे- तुम्हारे/
फिर भी-----
तुम्हारी सहेलियों में चर्चा आम है,
कि तुमने मुझे बोर किया//

         राजीव रत्नेश
      ****************

तीसरा संकलन ( 13 मार्च 2026)

      समझ रहा था बहुत बेवकूफ वो मुझको/
      जिसको अच्छी तरह जानता हूँ, वो क्या है//

                 राजीव रत्नेश
              ***************

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