Saturday, June 27, 2026

जाने कहाँ छोड़ आए ( गजल )

जाने कहाँ छोड़ आए  ( गजल )
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मुकद्दर आजमाने चला तो मुझे याद आया /
मेरा मुकद्दर तो तू थी, तुझे कहाँ छोड़ आया /

बहते पानी में सफीना आगे बढ़ गया,
पतवार हाथ में थी, पानी सर से कब गुजर गया /

नेमत तेरी हर कहीं हमने लुटा दी थी,
कभी नंगे- भूखों में, तो कभी फकीरों को बाँट दिया /

तू क्या जाने, मेरी मुसाफतों के गुजरगाहों ने,
मुझे कहाँ-कहाँ से न तोड़ा, न्यौता झंझावातों को दिया /

अनकही बातों को ही अपनी डायरी में लिखता हूँ,
कुछ उलझे किस्सों ने कुछ हिस्से अफसानों को दिया /

मेरे दिल के हाशिये पर तेरी तस्वीर यकायक उभर आई,
उंगलियों ने कलम का काम किया, तूने रेत पर लकीरें
बनाने न दिया /

गमगुसार बैठे थे , तेरी नवाजिश को सोच कर,
ये क्या बात हुई तूने आयते- कुरआने- पाक पढ़ने न दिया /

मजलिस सजी-धजी थी साकी- ए- मपरवाना की,
बरहना- पा तूने मखमली गलीचों पे पाँव धरने न दिया /

मेरा कहा नहीं तो दिल का कहा ही मान लो,
हमने तुझे सदा दी, पर बगावत पर तुमने टिकने न दिया /

तेरे हाथों की लकीरें हमने अपने हाथों पर चस्पा कर लीं,
कहीं से तो रास्ता मिले, साकी ने तो शिकवा भी करने न दिया/

मजबूर मुहब्बत का बस इतना सा ही बस अफसाना है,
उठे तो आंधी की तरह, तूफानों ने मौका सँभलने का न दिया /

इश्क करता हूँ तुझसे, तो करता हूँ डंके की चोट पर,
गए नहाने सरयू पर तो खुद को डूबने को छोड़ दिया /

मुहब्बत मजबूर नहीं करती मुहब्बत के लिए कभी,
सोचा- समझा और तकसीमे- मुहवबत कर लिया /

मुतमईन हो जाओ अगर कोई आशकार इश्क करे,
ये तो उसके दिल की हसरत है, हमने नवाजा, पहचान
लिया /

अगर वेश बदल के आए जो तुम बहुरुपिया की तरह,
तो पहचान लिए जाओगे, हमने तो राज तुम्हारा जान
लिया /

जाने कहाँ तुम छोड़ आए " रतन " को महफिल में,
जबकि उसके इशारे पर चाँद चला, सितारे चले, सारा
आस्मां चला //

               राजीव रत्नेश
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जिसके इशारे पर मुड़ जाते थे कायनात के रास्ते,
वो तन्हां खड़ा रह गया, बस एक चंदा के वास्ते //"

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Thursday, June 25, 2026

एक दुआ मेरे नाम से ( गजल )

एक दुआ मेरे नाम से  ( गजल  )
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तेरा दिया जख्म दिल में ही फले-फूले, बाहर न आए /
मेरे गमो- नाले खुद ही, तेरी जुबां पे कहीं आ न जाएँ /

मैं तुझे पुकारूँ पर भूल कर भी सुध न तू मेरी ले,
मुझे भूल जाने वाले याद न तुझे कभी मेरी आए /

तेरे ऐब सारे, अकेले मेरे हिस्से में ही आएँ,
मेरे हुनर सारे सिर्फ तेरे कब्जे में ही आएँ /

न तू याद मुझे करना, न मैं करूँ कभी याद तुझे,
मेरे हिस्से की सभी खुशियाँ, तेरे दामन में समाए /

आज बरकत की अपनी शुभ घड़ी में, न कर मुझे याद ,
खुशी-खुशी तू डोली में बैठ, और के घर जाए /

मैं न करूँगा तुझसे कभी प्यार का तगादा, भले,
मेरे दिल के चिराग से औरों का चिराग जलाए /

मुब्तिला था कभी साथ- साथ तेरे, प्यार के बंधन में,
आज क्या बात कि दिल मुझे तेरी हिरासत से निकाले 

वीरासत में मिला है तुझे जो अमानते- गुरुरो- हिजाब,
मुझे तो लूटा नाजो- अदा से, इसी तरह आगे काम आए /

दुआ है मेरी, पहली आदमजाद, जो तेरी कोख से जन्मे,
उसके लब पे पहले-पहल मेरा ही नाम आए /

मैं मजबूर हूँ तो इस कदर, तू अब न सता,
खुदा न करे, दुश्मन की जगह मेरे लब पे तेरा नाम आए /

मुहब्बत की कैफियत मेरी, तूने जरा भी तो समझी नहीं,
फिर क्यूँ तेरे लिए ही, जान भी मेरी ही जाए /

नज्मे- फरियाद भी बेअसर हो गए मेरे तेरे सामने,
सुनी न किसी की, बहाने तूने बेपनाह बनाए /

बड़ी मौजूं हो रही थी महफिल वजूदे- दिलदार से,
की तूने सख्ती, दिल को भींच कर लहू टपकाए /

तवील तेरी दास्तां को मुख्तसर मैंने किया है,
वरना बात पहुंचती जाकर कहीं सितारों के भी आगे /

कोई ख्वाबे- पसंदीदा, कोई अरमां न मेरे दिल में रहा,
आकर मेरा दामन तू थाम भी ले, तो तबस्सुम न लब पे आए /

करें ' रतन ' मुहब्बतों में सजदा तेरे लिए मस्जिद में,
भेज दें अल्ला- ताला एक दुआ मेरे नाम से, जो तेरे पास आए //

                  राजीव रत्नेश
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" जिसकी डोली किसी और के आँगन में उतर गई,
रतन की दुआ में वो आज भी खुदा की इनायत बन गई /"

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Monday, June 22, 2026

सब्जा पे आई बहार ( गजल )

सब्जा पे आई बहार  ( गजल )
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गोल-गोल गोलगप्पे जैसे फूले तेरे गाल /
जूड़े में बाँधा है तूने रेशमी लाल रुमाल /

तेरा इरादा क्या है, आँखों में तेरे डोरे लाल,
ओ छैल- छबीली, तेरा पैरहन जैसे सुर्खाब /

चेहरे पर लटकें काली अलकें तेरी सुकुमार,
मेरी समझ से तू बागों की गुले- गुलाब /

आकर दिल में मेरे, और बढ़ा देती हो प्यास ,
जामे- लब तो देती नहीं, और लगा देती आग /

हवाओं के सफर के रास्ते में, तू गेसू खोल उड़ाए,
तेरे जुल्फों की हिरासत से, मुश्किल से छूटा दिलदार /

है बुखार तुझको, और तू कफ- सीरप मंगवाए,
आ मेरे पास, पास मेरे है अचूक पैरासिटामाल /

जमाना कुछ भी कहे, तू मेरे पास तो आजा,
हाथों से दबा कर अपने दर्दे- सर कर दूँ गायब /

नाक साफ कर दे क्यारी में, रंग-बिरंगे फूल आएँ,
तोड़ ले जो फूल तो शबनम हो जाए शर्मसार /

साफ- सुथरी होकर आजा बाहर, करता मैं इंतज़ार हाल जानने को तेरा, लोग बाहर खड़े बेकरार /

लाइट आन कब हो, आँखों में काटी सारी रात,
पूछा तुझसे जलाने को लाइट, सुना तेरा तकिया- कलाम /

कैसे ' रतन ' तुझे समझाएँ, कि तू मेरे दिल की रानी,
बागों में है तू तो, सब्जा पे जैसे आई हो बहार //

                 राजीव रत्नेश
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अशआर
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(१) बाली उमर में दिल पर हुस्न का तीर खा गया,
      मुद्दत बाद जख्म भरा, पर निशान छोड़ गया //

(२)  तुझसे मेरा याराना तो काफी पुराना लगे/
       कैसा घाव दिया है कि भरने में जमाना लगे //

(३)   जबसे देखा है तुझको, तेरी सौगातों से घिरा हूँ /
        अक्स मद्दम हो चला है, कि कोहरों से भरा हूँ //

                      राजीव रत्नेश
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" गोलगप्पे जैसे गालों पर जब लाल रूमाल फबता है/
  रतन के सूखे आँगन में, चंदा की बहार का साज सजता है //"

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दाग तो दिल पर है ( गजल )

दाग तो दिल पर है  ( गजल )
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बच के जमाने की निगाहे- बद से आओ तो समझूँ/
आकर मेरे शरर- ए- दिल को बुझाओ तो समझूँ/

बेइंतहा दिल को तेरे प्यार की प्यास लगी है,
आकर लबों की रूह- अफजा पिलाओ तो समझूँ/

मेरे अफसाने की तू हसीं किरदार है साकी!
जरा अदा- ए- खास अपनी दिखाओ तो समझूँ/

तू हुस्ने- बेमिसाल है, पसीना भी तेरा गुलाब है,
आकर महफिल में पसीना अपना बताओ तो समझूँ/

बातें तेरी सुघढ़- सलोनी, अंदाज तेरा शायराना,
आज फिर से आशिके- दिलदार को पिलाओ तो समझूँ/

मय बहुत पुरानी हो तो पिलाना, न उसमें पानी मिलाना,
पैग पर पैग पिला कर रिन्द को बेहोश बनाओ तो समझूँ/

पास में छदाम नहीं, कुछ सोच कर आया तेरे मयखाने में,
आज तो तुम पहली बार उधार लगाओ तो समझूँ/

आ ही गए नयखाने में आज जब हजरते- वाइज,
मेरे साथ उनको भी दो घूँट पिलाओ तो समझूँ/

रंजो- गम की धूल से गुजर कर तेरे पास आया हूँ,
अंगूर के पानी से मुझे नहलाओ तो समझूँ /

सोचता हूँ कि जामे- नजर हक की छक के पिऊँ,
सुरूर मुझ पर से इस जनम का उतारो तो समझूँ/

गमे- इश्क अगर अश्कों के साथ बह निकलता है,
मेरे साथ ही गम अपना भी हल्का करो तो समझूँ/

जामे- नजर से ही, कुछ यूँ मदहोश हो गया हूँ,
होश में लाने को, जामे- लब लबरेज पिलाओ तो समझूँ/

मुफ्त की पिला-पिला के, दिल हिरासत में ले रखा है,
तुम मेरे पर से बंदिश अपनी हटाओ तो समझूँ /

दिल धड़कता है मेरा, तेरी महफिल के नाम से,
दिल मेरा अपने नर्मो- नाजुक हाथों से सहलाओ तो समझूँ/

दुनिया की नजर लगने का डर था, चेहरे को तो छुपा लेता,
दाग तो दिल पर है ' रतन ', तुम दाग छुड़ाओ तो समझूँ /

              राजीव रत्नेश
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मेरे साकी ऐसा माल दे, उम्र भर की थकान जो उतार दे/
एक बार ऐसी पिला कि उतरे न ह श्र तक, ऐसा लबरेज जाम दे//

              राजीव रत्नेश
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चेहरे का नकाब तो जमाने को धोखा दे देगा,
दिल का दाग तो हर जन्म चंदा का पता दे देगा//

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Sunday, June 21, 2026

दिल पर बस तेरा निशान है ( गजल )

दिल पर बस तेरा निशान है  ( गजल )
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तुझसे मिलने की आरजू तेरी प्यास है/
दिल को तेरी ही जुस्तजू तेरी आस है/

तेरे बगल की महक, मेरे नथुनों में समाई,
जैसे दो जहां की खुशबू मेरे आस- पास है/

कबसे निकला हूँ मैं सफर- ए- हयात में,
दिन कटता नहीं औ' शाम भी उदास है/

इक लग्जिशे- लब ने कयामत ढाई है,
शर्म से झुकी पलकें, चेहरा हुआ लाल है/

किसने कहा कि तुझ बिन परिशान हूँ,
तेरे बिना, तू जानती है, उल्झी हयात है/

खींच लाई है तू रहे- मंजिल की तरफ मुझे,
यही तो दिल को दिया तूने फरेबे- खास है/

खेतों में चरती भेड़ें झुंड में घुस चलती हैं,
डंडों से हांकते उन्हें, चरवाहों के ठाठ हैं/

नहर काट खेतों को सींचते किसान,
कड़ी धूप में अलापते राग मल्हार हैं/

आएगी तू खिंच कर मेरे पास ही,
यही तो मेरे दिल को अहसास है/

लाल रिबन से बँधी तेरी चोटी,
दिल कहता, तू हुस्ने- बेमिसाल है/

अदा तेरी कहती है, ये तो कुछ नहीं,
यही तो असली नजाकते- खास है/

तेरे हुस्न को मेरे इश्क की चाहत,
ये तेरा मुझ पर कितना बड़ा अहसान है/

जीनते- महफिल कोई है तो तू है,
तू ही मेरे धड़कते दिल की शान है/

बिना समझे-बूझे तेरा बाप भड़क गया,
देख कर तुझे मेरी बाहों के पाश में/

नहीं माना, तुझे पकड़कर आखिर ले गया,
लाख समझाया, कि योगा की यही पहचान है/

देख कर मुहब्बत, सुन कर दास्ताने- दिल,
हुआ जमाना आखिर कितना बदहवास है/

तुझे पाकर दिल को नहीं कोई मलाल है,
तू ही मेरी चाहत, मेरे दिल का अरमान है/

पत्थर दिल पे रख के तुझे पुकारा ' रतन ',
मेरे दिल पर पड़ा बस तेरा निशान है//

               राजीव रत्नेश
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Saturday, June 20, 2026

मिलेगा सरे- राह तुमसे ( गजल )

मिलेगा सरे- राह तुमसे  ( गजल)
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तेरी मुहब्बत का मुझे मुकम्मल जहां नहीं मिलता/
कभी जमीं नहीं मिलती, कभी आस्मां नहीं मिलता/

उलझ गई है कुछ यूँ तेरे- मेरे बीच मस्ती की डोर,
कभी गाँठ नहीं खुलती, कभी सिरा नहीं मिलता/

बिना किसी पचड़े में पड़े ही, फूल गया तेरा पेट,
बस कैफियत यही कि मुझे तो कोई मामला नहीं 
लगता/

ससुराल गया था तू, लौट कर खोया- खोया रहता है तू,
बात क्या है, मुझे तो यह कोई फसाना नहीं लगता/

दिल पत्थर, कलेजा मोम, नयन मेरे अश्कबार,
कहीं से तू हद्दे- दिल से मुझे चाक गरेबां नहीं लगता/

तेरा कभी कोई हाल, तेरा कभी कोई हौसला नहीं मिलता,
मुझे तो तेरी ओर से मुहब्बत का कोई संदेशा नहीं
मिलता/

चले थे हम- तुम साथ- साथ, सू- ए- मंजिल तो,
अड़ जाए हमारी राह में, मुझे तो ऐसा जमाना नहीं लगता/

चलो एक दूसरे का हाथ पकड़, हम- तुम कहीं खो जाएँ,
मुझे तो तेरे दर के सिवा, दूसरा कोई ठिकाना नहीं मिलता/

सीरत तेरी कसीदा, मैं मिजाजे- गजल तेरा हूँ तो सही,
रिदा सितारों भरा कोई दरमियां नहीं मिलता/

मिलेगा यूँ ही तुझसे सरे- राह चलते-चलते' रतन '
शामिल उसे कम से कम तुम हाजिरे- मुशायरा करना/

                    राजीव रत्नेश
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" रास्ते में चलते-चलते ही, वो दिल का हाल कह जाता है,
रतन जब चंदा से मिलता है, तो जमाना मुशायरा बन जाता है"

Thursday, June 18, 2026

ट्रेजेडी ( कविता )

           ट्रेजेडी  ( कविता  )
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मेरी जिंदगी के साथ हमेशा ये ट्रेजेडी रही,
जिससे प्यार किया, वो दूसरे के साथ भाग गई,
मेहरबां थी वो कि अपने ही खत सारे ले गई,
मेरे आँगन के मुरझाए गुलाब आँचल भर ले गई/

जमाना खिलाफ था मुहब्बत का, तो क्यूँ डर गई,
मुझसे कुछ कहा भी नहीं, और मेरा घर छोड़ गई,
मेरी तकदीर का सिकुड़ा- सिमटा सा यही अफसाना है
खुशियाँ सारी लूट ले गई, नेरे दामन में सारे गम छोड़ गई/

जिन्दा रहते हैं वही गुलाब, जो खाक से जुड़े रहते हैं,
आबो-हवा खिलाफ हो तो वो खुद सहमे- सहमे रहते हैं
मनचलों के लिए तो, खिले गुलाब भी मुर्झा जाते हैं,
याद हमारी वफा की करके, वो होठों में मुस्कराते हैं/

मौका मिला तो जी भर प्यार किया, बंद कर किवाड़,
जमाना उनका था, पर थे तो वो मेरे दिलबर ही,
दस्तक सुन, छटक कर मेरी बाहों से निकल ही गए,
कुछ भी हो, आखिर थे तो वो मेरे हमसफर भी/

लैला ने साथ छोड़ा तो, मजनूं का जनाजा धूम से निकला,
मेरे शहर की सबसे जमाल नाजनी थी, हर कोई उसका निकला,
मैं वफा- पसंद, उसकी हर इक अदा की कद्र करने वाला,
वो तभी तक मेरी थी, जब तक उसे कोई सहारा न मिला/

वो नाजुक कली गुलशन की थी, चेहरे पे बेनाम गमों के साए थे,
दर- हकीकत बात ये थी, कि मुहब्बत तो मैंने भी उसी
से की थी,
उसकी जान कर उसकी राह में फूल' रतन ' ने बिछाए थे,
मेरी रहगुजर में काबिज वो इक मील का पत्थर भी तो
थी//

                 राजीव रत्नेश
          """"""""""""""""""""

मसखरी नहीं, दरपर्दा ये हकीकत है अहले- जमाने/
यही तो दर्दे- दिल है मेरा, कोई पहचाने न पहचाने/

                राजीव रत्नेश
        """"""""""""""”""""""""""""""

" खत भी ले गई, खुशियाँ भी लूटले गई,
वो शहर की नाजनी,
मगर रतन के सीने में छोड़ गई वो शायरी
की अमर रागिनी/"

लबकुशाई जख्म की तो महसूस की हमने,
खुदारा जख्म के रिसाव का सूखना भी देखें/
चंदा ने वक्त का मरहम लगाया भी तो है,
काश! इस नासूर का वक्त से भरना भी देखें/

             राजीव रत्नेश
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" अतीत के नासूर को चंदा की वफ़ा ने
सुखा दिया,
रतन के रिसते जख्म पर प्रेम का मरहम
लगा दिया/"

गाफिल नहीं सूझबूझ से उसके,
चंदा का सहारा मिला तो है मुझको/
कितनी यातनाएँ झेली हैं अहले- जमाने,
अब कहीं भरपूर खुशी मिली है मुझको/

               राजीव रत्नेश
          """"""""""""""""""""""""""

" जमाने की हर एक टीस को जिसने
हँस कर भुला दिया,
चंदा की पावन सूझ-बूझ ने रतन को
भरपूर जीना सिखा दिया/"

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!