Wednesday, April 22, 2026

यही सोच मछेरे ने दरिया में जाल डाला( गजल)

यही सोच मछेरे ने दरिया में जाल डाला  ( गजल)
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सुना कि महफिल में वो आने वाला है,
वो रुख से नकाब उतार के/
आ गए झलक एक उसकी पाने को,
हम भी पिछला कर्जा उतार के/
उसके हुनर ऐब पे कहीं भारी हैं,
बताया उसने, चलाओ निशाना संभाल के/
मरमरी बदन पे मखमली लिबास हैं उसके,
माथे पे बिन्दी है उसके अनुराग के/
उसकी चमकीली नथ को देख हो गए फिदा,
जाना न जख्म दिए जो मुझे बहार ने/
बला की तपिश है आज के मौसम में,
ठंढ़क पहुँची नहीं पालिका के छिड़काव से/
हम उसी से दिल लगा बैठे हैं अहले करम,
जाके कह दे कोई मेरे सारे अहबाब से/
उसी को चुना था हमने शेरो- सुखन के वास्ते,
अब दिल पे छुरियाँ चलाता है वो किस शान से/
जाने किस किनारे लगे कश्ती, बिना पतवार के,
अभी तो है तेज हवा औ' तूफान के दबाव में/
किस मोड़ से वो मोड़ मुड़ गया था,
शायद मंजिल का रास्ता पहचान के/
भँवर में कैसे तुम्हें अकेला छोड़ दूँ,
तुम तो मेरे ही सहारे निकल पड़े थे तूफान में/
तुम्ही तो अकेले हो मेरे, गैरों की जमात में,
तुम्हें खो दिया तो कौन निकलेगा मेरी तलाश में/
मछलियाँ बड़ी होंगी यही सोच मछेरे ने जाल डाला,
तुमको तो फंसा नसका, उल्झा' रतन' से बिना बात के

               राजीव रत्नेश

सारे रतन माँग आया ( गजल)

सारे रतन माँग आया  ( गजल)
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टुकड़ा- ए- माहताब था या मुकम्मल चाँद मेरी नजरका,
देख उन्हें अहबाब संग मैं ईद मना आया/

कुछ न था लुटाने को पास अपने,
खुदा से अपना पुराना आस्मां माँग आया/

उनके मुँह का खाकर, मुँह के अपने पान खिला आया,
झील के पानी में, मैं चाँद उतार लाया/

बिगड़ा शहर था, आबो-हवा खराब थी,
साथ उनके नैनीताल चला आया/

भर के बाहों में हरारत- ए- बदन मिटा,
उनको हमने हमसफर माना, मसीहा माना/

चोट खाई थी दिल से गरेबान तक,
कोई न मिला दिलदार, उनकी वफा माँग लाया/

तसब्बुर में हमेशा वो जोहराजबीं ही तो रहा,
आज उसे मुकाबिले- महफिल उठा लाया/

अजमतें थीं उसकी पाक, शीशा- ए- दिल सी,
मैं पैमाने में जाम भर के उठा लाया/

वो बाहों में थे मेरे, सर सीने पे था,
उनके होठों पे चुंबनों को बरसा आया/

सितारे टंके थे उनके आँचल पे,
घड़ी भर में सारे" रतन" उनसे माँग लाया//

            राजीव रत्नेश

तुम्हारी हकीकत जान कर आज ( कविता)

अपने शब्दों के व्यर्थ जाल में,
तुम मुझे उल्झा नहीं सकते,
अपने आडम्बरजाल में मुझे,
किसी तरह फँसा नहीं सकते,
दिखा-दिखा कर मृगमरीचिका,
तुम मुझे भरमा नहीं सकते/
क्यूंकि,
तुम्हारी अगली- पिछली हर चाल से,
भलीभाँति अनावृत अवगत हूँ,
नयन मेरे अश्रुपूरित हैं पहले ही,
मेरी जराओं से तुम गंगा बहा नहीं सकते,
किसी तरह भी अब तुम मुझे,
अपने और समीप बुला नहीं सकते/

अनवरत संघर्ष का ऐलान कर निकला हूँ,
तूफानों से मैं करते पैमान अब निकला हूँ,
तुम्हें अपनी ही चाल से मैं मात दूँगा,
क्या सुब्ह क्या शाम, कभी भी तुम्हें घात दूँगा,
मेरे सिरहाने का तकिया तुम खींच नहीं सकते,
कितना भी चाह कर तुम मेरे करीब आ नहीं सकते/

मछली हूँ सरोवर का, हाथ तुम्हारे आ नहीं सकता,
अपना लगाया जाल क्या तुम्हें दृष्टिगत नहीं होता,
चलते-फिरते कीट-पतंगों पे निशाना लगाते हो,
पर एक भी निशाना सही बैठा नहीं सकते,
तुम डाल- डाल तो मैं अब रहूँगा पात- पात,
मुझे तुम अपने शर से बींध नहीं सकते/

हजारों सन्नाटे गुजर गए दिल से,
क्यूँकर तुम्हें अभी भी यकीन नहीं आता,
प्यार के आँगन की नागफनी हो तुम,
फूलों से तुम सूरत पार पा नहीं सकते,
अजमतें तुम्हारी किसी काम की नहीं,
मुझे तसलीम अपनी नदामतें ही सही,
मंजिल- दर- मंजिल चलता अक्सों के सहारे,
तुम मुझसे ऐलान- ए- जिरह कर नहीं सकते/

जहाँ ठहरा पानी समझते हो वही तो,
अस्ल- दरअस्ल सरोवर की गहराई है,
तुम्हारी हकीकत जानकर आज,
सितारों को भी अब तो शरम आई है,
तुम मुझसे ऐलाने- बगावत कर नहीं सकते,
वफाई तुम अपनी शुमारे- अदावत कर नहीं सकते//

               राजीव रत्नेश

Sunday, April 19, 2026

जब- जब सर उठाया ( गजल)

जब जब सर उठाया  ( गजल)
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सब कुछ लौटा चुका हूँ मय सूद- ओ- ब्याज के/
दिए थे जख्म मुझे जो जाती हुई बहार ने/

लूट के मेरा सब कुछ मुझे राह पे ला दिया,
सौंपी थीं अमानतें जो तुमने प्यार में/

सचेत हो गया हूँ अब तो हर उस शख्स से,
वार किए जिसने मुझ पर बीच बाजार में/

तुमसे या किसी से शिकायत क्या करता,
कुछ न रहा पास मेरे अब अरिव्त्यार में/

मिले धोखे और दगा से तिलमिला गया हूँ,
अब समझा कुछ रखा न था चाँद के इकरार में/

सलामियाँ ही तो तुमसे मिली थीं मुझे फरेब में,
सैकड़ों दीवानों में मैं ही तो था निशाना- ए- दिलदार में/

एक तेरी याद का ही तो सहारा था मुझे,
हर मजार खोदता फिरा तेरे फिराक में/

माना मुझे शिकस्त ओ' मात ही मिली,
जब- जब सर उठाया" रतन" तेरे इस्तकबाल से//

           राजीव रत्नेश

Thursday, April 16, 2026

महफूज हो आज तुम ( गजल)

महफूज हो आज तुम मेरी रहबरी के दम से,
रास्ता बदल लिया तुमने, आखिरी कदम पे/

दुनिया बदल गई, तो मुझे मलाल न हुआ,
तुम भी हो गए हुनरमंद, तो कोई गम न हुआ/

अपना तो यही फसाना है, रास्ता बदल गए राजदां,
कोई अपना न रहा, कोई अपना न हुआ/

कोई चाँद अपना हुआ, न कोई सितारा अपना हुआ,
दोस्तों ते सुना,' वो तो कभी का गैर का हो गया'/

किनाराबंदी दरिया का किया, तुफानों का रुख मोड़ा,
पत्थर पर लकीर खींचकर हुआ वो खड़ा, फिर न डिगा

गिला भी नहीं, शिकवा भी नहीं किसी से कोई,
मेरे यार सा निराला न था दुनिया में कोई

बहुत जतन से ढूँढा, मिल जाता मुझे भी तुमसा कोई,
खींच लेता पाँव अपना, कहता, रहता न यहाँ कोई/

चक्कर कोई तुमसे, हमने तो पाला न था,
आगे बढ़ के पलट आए, मिला जो न रास्ता कोई/

पासे- वफा तुमसे हुआ, न निभा सके रस्म कोई,
शबे- फिराक में न तुम आए, न आया दूसरा कोई/

मौसम की मार पे भी" रतन", तुम तो संग- संग थे,
रास्ता बदल लिया तुमने ही, आखिरी कदम पे/

             राजीव रत्नेश
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उनकी मेहरबानियों से है ये हाल ( शेर)

नींद आँखों से कोसों दूर है
हाथ भर के फासले पर हैं वो
उनकी मेहरबानियों से है ये हाल
बिन बात तुनक जाते हैं वो

तेरा भरम टूटने न पाए( नज्म)

अहबाब कहते हैं,
मेरी आँखें बड़ी- बड़ी है,
तेरी पासपोर्ट साइज फोटो भी,
जूम करके देखने पर,
आदमकद हो जाती है/

हैरतमंद हूँ तेरी मिची- मिची आँखों से,
जिसमें मैं और मेरी तस्वीर भी,
सिमट कर गर्क हो जाती है/

अपनी उतारी तस्वीर को देख कर,
ही तो तुमने कहा था,
कि मैं दुनिया का बेस्ट फोटोग्राफर हूँ/

तेरा यह भरम न टूटने पाए,
इसलिए तुमसे बिछड़ने के बाद,
खुद कोई तस्वीर नहीं खींची/

अब तो नासमझ भी सेल्फी लेने,
और फोटोग्राफी में महारत ,
हासिल करने की होड़ में है/

क्यूँकि तुम्हारे ही घर के बच्चे,
मुझे तुम्हारी ही नजरों में,
और भी गिराना चाहता हैं//

      राजीव रत्नेश

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!