Monday, July 13, 2026

तेरी नजरों का निशाना ( गजल )

तेरी नजरों का निशाना  ( गजल )
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महरुमे- वफा हूँ, वफा चाहता हूँ/
क्या कह रहा हूँ, ये क्या. चाहता हूँ/

रैन-बसेरा ढूंढ़ता, जग में फिरता हूँ,
तेरे तो दिल नहीं है, मैं ठिकाना चाहता हूँ/

हमसाया बने, कोई हमसफर तो हो,
बाकी का सफर, मैं सुहाना चाहता हूँ/.

तुम बन के रह सको तो रहो, नहीं तो,
किसी और ठौर किस्मत आजमाना चाहता हूँ/

मुहब्बत मेरी मजबूरी का ही नाम हो तो हो,
मैं तेरे ही गले में बाहें डालना चाहता हूँ/

जिसकी मर्जी, चाहे तो मुझे आजमाए,
मैं मील का पत्थर हूँ, तेरा पता चाहता हूँ/

लुटाने को मेरे पास बचा कुछ तो नहीं,
पाने को सारा आस्मां चाहता हूँ/

दरवेश हूँ तेरी रहगुजर का मैं, बस तुझे,
अपनी दुआओं से नवाजना चाहता हूँ/

मिल जा मुझसे सदाबहार चमन सी,
तुझे सौंपना रहमते- खुदा चाहता हूँ/

घायल न कर सका ' रतन ' को कोई,
बस तेरी नजरों का निशाना चाहता हूँ

       राजीव रत्नेश
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थाम लिया हो वक्त ने रेल का पहिया जैसे,
और रेल तेरे घर के मुहाने पे उड़ी है/
तेरे आ जाने का इंतजार है उसको शायद,
तुआए तो वक्त चले, रेल आगे बढ़े/

          राजीव रत्नेश
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रतन मुस्करा रहा होता ( गजल )

तुम्हारी जद में आया न होता,
जो पेंग तुमने बढ़ाया न होता/

घायल न हो जाता इस तरह,
निशाना नजरों का बनाया न होता/

अपने-आप से भी बिछड़ा न होता,
दिल को तुमने बहलाया न होता/

किसी मोड़ से ये दर्द न हमराह बनता,
वादा अगर तुमने निभाया न होता/

सुकून तो अपनी ही दुनिया में था मुझे,
काश! मुझे ख्वाब तुमने दिखाया न होता/

' रतन ' आज भी मुस्करा रहा होता,
गर इश्क ने तेरे यूँ आजमाया न होता/

            राजीव रत्नेश
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उम्मीद का एक दीप जलाए रखना ( कविता )

हमारी- तुम्हारी आज की यह मुलाकात,
कहीं कल गुम न हो जाए-- यही सोच,
इसे लिखने में समय लगाया/

अपनी आराध्य- देवी के मनोहारी वर्शनों में खोया रहा,
जब चेतना लौटी तो इतना ही समझ आया------
शायद यूँ ही समय गँवाया/

फिर मन ने धीरे से मुस्करा कर कहा-------
जो भाव सच्चे हैं, वे कहाँ मिटते हैं,
स्मृतियों से उन्हें जगाया/

यदि एक भी हृदय उन्हें अपने भीतर स्थान दे दे,
तो कोई भी अभिव्यक्ति कभी गुम नहीं होती---
ऐसा तेरे मन ने मेरे मन को समझाया/

तुम्हारे आँगन में कल की खिली कली आज सिमट जाती है/
या कुछ यादें समय की धूल से आप ही आप अट जाती है/

मुझे लगता है, सब कुछ पाने की जहमत उठाने के बाद भी,
कभी- कभी अपनी ही मंजिल जाने कहाँ स्वयं खो जाती है/

मजबूरियाँ इंसान को कहाँ-कहाँ से नहीं तोड़ के रख देती हैं,
हँसती हुई हसीन आँखो में भी कुछ-कुछ नमी छोड़ जाती हैं/

जिन्दगी भी अजीब खेल खेल जाती है कभी- कभी मेरे साथ,
जीती हुई बाजी भी अपने ही हाथों खुद-ब-खुद हार जाती है/

फिर भी उम्मीद का एक दीप अपने दिल में जलाए रखना ' रतन ',
क्योंकि टूटी हुई, टेढ़ी-मेढ़ी राहों से भी सुबह निकल आती है/.

                राजीव रत्नेश
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Sunday, July 12, 2026

मेरी अंतर्व्यथा शायद कोई ( कविता )

मेरी अंतर्व्यथा शायद कोई समझता तो अच्छा होता,
कल हमने- तुमने नवसृजन का सपना देखा था शायद/
तुमको याद हो कि न याद हो, कल के बिछड़े मिलेंगे,
ऐसा ही कुछ अंजामे- वफा हमने साथ देखा था शायद/

मेरी अंतर्व्यथा शायद शब्दों में पूरी उतर न सकी,
कुछ पीड़ाएँ खामोशी की जुबान में ही पलती हैं/

कल नवसृजन का जो स्वप्न साथ बुना था हमने,
आज उसकी राख में भी कुछ चिंगारियाँ जलती हैं/

आपको याद हो न याद हो, उन वादों की वह शाम,
हमने भी कभी आने वाले कल की तस्वीर सँवारी थी/

' कल के बिछड़े आज मिलेंगे '-- यही विश्वास था हमें,
इसी उम्मीद में हमने कितनी रातें साथ गुजारी थीं/

अंजाम- ए- वफ़ा की राह आसान कहाँ होती है,
मगर हमने तो हर मोड़ पर साथ चलने की ठानी थी/

अब जो फासले हैं, उन्हें भी एक कहानी मान लेते हैं,
क्यूँकि कुछ रिश्ते दूरी में ही अपनी निशानी रखते है/

              राजीव रत्नेश
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मैं उलझनों में मुस्करा लूँगा ( गजल )

मेरी खामोश धड़कनों को एक नाम देना/
बुझते हुए खवाबों को फिर अंजाम देना/

साज मैंने छेड़ा मोहब्बत की राहों में
मुझे जरा तुम अपनी आवाज देना/

अगर मिलो तो मुस्करा कर मिलना,
मेरी तन्हाई को थोड़ा सा आराम देना/

मैं इश्क की बाजी जीतना नहीं चाहता,
बस अपने अहसासों को थोड़ा मुकाम देना/

अगर मेरी मुहब्बत तुम्हारी मंजिल न बने,
जाते-जाते मुझे दुआओं का पैगाम देना/

मैं शिकायतों का सफर नहीं लिखूँगा,
तुम बस अपनी यादों का एक जाम देना/

किस्मत में लिखा हुआ ही अंजाम होगा,
मुझे बस अपने दिल में एक शाम देना/

मैं उल्झनों में भी मुस्कुरा लूँगा ' रतन '
तुम मेरी खामोशी को भले इल्जाम देना/

              राजीव रत्नेश
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किसी सुबह की आहट बाकी है ( गजल )

मैं उलझनों का शिकार हो गया हूँ,
लगता है दिल से बीमार हो गया हूँ/

एक अनजान सी सूरत दिल में बसा के,
खामोश हूँ-- मैं भी कितना नादान हो गया हूँ/

खुद की ही आवाज से डरने लगा हूँ,
शायद अपने ही विचारों का शिकार हो गया हूँ/

जो रास्ते कभी आसान लगे थे,
अब उन्हीं मोड़ों पर बेकरार हो गया हूँ/

कुछ सवाल दिल में ठहर से गए हैं,
कुछ जवाबों का इंतजार हो गया हूँ/

फिर भी कहीं एक दीप जलता है,
शायद अभी पूरी तरह हर नहीं गया हूँ/

किसी सुबह की आहट बाकी है मुझमें ' रतन '
मैं बस थोड़ी देर का अंधकार हो गया हूँ/

                राजीव रत्नेश
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Saturday, July 11, 2026

तुम सा एक रहनुमा ( गजल )

तुम सा एक रहनुमा  ( गजल )
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नजरों से गिरा हूँ, दिल में रहा चाहता हूँ/
हर हाल तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ/

प्यार सबसे करता हूँ, तगादा नहीं करता,
सब जानते हैं, मैं क्या चाहता हूँ/

प्यार अगर किसी खेल का ही नाम है,
जिंदगी में खेलना मैं ये जुआ चाहता हूँ/

लिख के मेरा नाम जमीं पर मिटाते तो हो,
अगर हर्फे- गलत हूँ, तो मिटा चाहता हूँ/

ये किस तरफ से आई अजान की सदा,
मैं उधर की तरफ बढ़ा चाहता हूँ/

अगर पहले ही रुक जाता, तो संगम न होता,
मैं तो दरिया हूँ बस बहा चाहता हूँ/

तहरीर लिखने की अदा रास न आई मुझे,
मैं तो बस जमाने के लिए आईना चाहता हूँ/

किसी को प्यार में गच्चा देना, मेरा काम नहीं,
मैं तो खुद जमाने के सितम सहा चाहता हूँ/

दुनिया के ऐशो-आराम, तुम्हें हों मुबारक,
मैं न सितारे, न चाँद, न ये जहां चाहता हूँ/

किसी की मुझे गरज नहीं ' रतन '
बस तुम सा एक रहनुमा चाहता हूँ//

           राजीव रत्नेश
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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!