तो वह बोली,' तुम्हारी ही चीज हूँ, मुझे अपनी बाहों का सहारा दो रतन!' उसका यह वाक्य मुझसे चीख-चीख कर कह रहा है कि मुझे अब और अपना प्यार लुटाने के लिए क्या सुनने की इच्छा है/ चंदा ने
तो खुल्लम खुल्ला अपना समर्पण मेरी आगोश में
झोंक दिया है/ यह जान कर हैरत भी हुई कि चंदा ने मुझे पहली बार मेरा नाम लेकर पुकारा और प्यार की
इंतहाई है कि वह मुझसे आपसे तुम पर उतर आई है/
क्यूँकि उर्दू शायरी में आप से तुम और ज्यादा अपनापन होने पर तू और तेरा लफ्जों से ही संबोधन
ज्यादा ही आत्मीयता दर्शाता है/ उसका मेरे प्रति यह अपनापन उसके उत्कट प्रेम की तीव्रता को ही दर्शाता है/
इस समय उससे मैंने इतना ही कहा,
' मैं भी तुम्हारा ही हूँ पर अभी नहीं, जब तक कि
सामाजिक और आधिकारिक रूप से तुम मेरी ब्याहता
नहीं बन जाती/' चंदा ने इतना और कहा,' मेरे माता-
पिता से मुझे माँग लो/ मुझे उम्मीद है, मेरी खुशी के लिए वो मना नहीं करेंगे/ तुम्हारे भरोसे मुझे कहाँ-कहाँ तुम्हारे साथ नहीं भेजा/ उनकी भी यही इच्छा रही होगी/'
मैंने उससे बताया कि पहले अपने मम्मी-पापा से बात कर लूँ फिर मैं तुम्हारे साथ बनारस भी चला चलूँगा/ इस बात से वह सहज हो गई और बोली,' मैं तुम्हें पा कर कहीं खो न दूँ, मुझे बस यही डर है'/ मैंने उसे आश्वस्त किया और अँधेरा छाने से पहले ही हम घर की ओर लौट पड़े/
मैंने उससे यह नहीं कहा,' अभी मैं
तुम्हारी दिली इच्छा पूर्ण कर दूँ/ फिर तुम कोई दूसरी
फरमाइश कर दो तो करने न करने के ऊहापोह में मैं
फँसा रहूँगा/ करता हूँ तो अपनी नजर में गिरता हूँ, नहीं करता तो तुम्हारी बात न मानकर फिर भी अपनी
नजर में गिरता हूँ/ आज तक मैंने ऐसा कोई काम नहीं किया, जिस कारण मैं अपनी ही नजर में गिर जाऊँ,
भले जमाने ने मेरी झूठी बदनामी करने में कोई कसर
न छोड़ी हो/ अपनी नजरों में स्वयं गिरने वाले ही अवसाद के अंधे कुए में गिरकर आत्मघात तक कर
लेते हैं/ और तुम्हें खोकर या पाकर भी अपनी नजर
में गिरने का मलाल नहीं पाल सकता/' यह मेरी अपनी
सोच थी/ जो मैं चंदा से किसी हाल नहीं कह सकता था/
चंदा की योजना मैंने माताजी को बताई और उसके घरवालों से बात करने को कहा/
एक बात उन्होंने मुझसे कही कि मुझे भी अब गृहस्थी के लायक बनना पड़ेगा और अपने पैरों पर खड़ा होना
पड़ेगा/ यही बात उन्होंने पिताजी से भी कही/ लिहाजा मैंने कोई बंधन स्वीकार करने के पहले ,
अपनी छोड़ी पढ़ाई पूरी न करके मैंने नौकरी ज्वाइन
कर ली/ माताजी का मंतव्य था कि फिलहाल तो चंदा
को बनारस छोड़ आऊँ फिर उसके बाद उसके घरवालों से बात की जाएगी/
मैंने भी यही लाजिमी समझा और
एक दिन चंदा से मशविरा कर के हमने सबेरेवाली गाड़ी बनारस के लिए पकड़ ली/
बनारस जाकर मैं सीधे जौहरी जी
से मिला और उनसे अपने माता- पिता की दिली इच्छा बताई/ वह एक प्रसन्नचित और स्वस्थ व्यक्ति मुझे लगे/ उन्होंने मुझसे कहा,' हम लोगों की भी यही राय थी'/ उनकी पत्नी ने कहा,' हम इलाहाबाद आकर जल्द ही आपके घरवालों से मिलेंगे और वो मुझे
आशातीत खुशी देकर अपने लोगों के साथ रहने की मिन्नत करने लगे/ पर मैंने अपनी नौकरी की बात बता कर उनसे लौटने की इजाजत मांग ली/
चंदा मेरे साथ ही आने को तत्पर थी
मैंने उसे समझाया कि कुछ रोज की बात है अपने माता- पिता के साथ ही आना क्यूँकि उसके पापा ने
बताया था कि चंदा उनकी इकलौती संतान थी और उसे उन लोगों ने बड़े नाजों से पाला है और उसकी
हर इच्छा का मान रखा है/ मैंने उनसे कहा था,' आप लोग मेरी ओर से निश्चिंत रहिए/ मेरे साथ चंदा को
कभी किसी किस्म की तकलीफ नहीं होगी/ मेरी माताजी अभी से उसे अपने घर की लक्ष्मी मान चुकी हैं/
मैंने चंदा के घर को शादी के पहले
ससुराल समझने की भूल कतई भूल नहीं की/ और
उन लोगों को इलाहाबाद आकर मेरी माँ और पिताजी से मिलने को कहा और इलाहाबाद चला आया/
सीधे शब्दों में कहूँ तो यह शादी बहुत ही सादगी भरी और नपी-तुली थी/ न कोई लेन-
देन का सवाल था और न ही किसी की नाक का सवाल था/ देखी गई थी तो सिर्फ मेरी और चंदा की
खुशी/
छुट्टियों में अक्सर मैं चंदा के साथ बनारस जाता और फिर साथ- साथ ही लौट आ आते/ चंदा न मेरे बिना कहीं ठहर सकती थी और न
मैं चंदा के बिना/ हम एक दूसरे से जुदा कभी न हुए/
पहली रात मेरा उससे पहला सवाल था,' मुझे पाकर क्या तुम खुश हो?' उसने मेरे कंधे पर
अपना सर रख दिया और मेरे हाथ अपने सीने पर रख
कर बोली,' सुन लीजिए, मेरी धड़कनें क्या कहती हैं/
खुशी बताने की चीज नहीं वरन महसूस करने की चीज है/' और मैंने उसे जमुना किनारे तो टाल गया था पर अब वह सिर्फ मेरी है, अब सिर्फ इस अहसास से ही आज उसको अपनी बाहों की गिरफ्त में कस कर
बेतरह चूमा और उसकी आँखों में मुझे नीली जमुना
फिर चमकती दिखने लगी और मुझे अहसास हुआ कि चंदा को पाना ही मेरा अस्ल में मुकम्मल अभियान
था/
वो मुखातिब भी थे, और मेरे पहलू में भी,
हमने भी रात उनकी जुल्फों के साये में काटी/
कसम खाई है हमने, एक दूसरे से न होंगे जुदा,
चाहे मिलन में रात को हो या दिन की लाचारी//
और हम दोनों दूधिया रौशनी में दो
जिस्म और एक जाँ हो गए//
राजीव रत्नेश
""""""""""""""""""""
