फिर भी उसे मैंने
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कृश गात, पीत वर्ण, कोमलांगी, सब्ज वसन,
का आडम्बर लिए वह मेरे समीप खड़ी थी/
जाने किस मनोरथ की पूर्णाहुति हेतु,
वह मुझे अपलक देखती मूक खड़ी थी/
मैं जान न सका, कुछ समझ न सका,
कि उसको मुझसे अब क्या चाहिए था/
मेरी लुटी जवानी के बरसों बाद आई थी,
कभी की मेरे गीतों की वह नायिका थी/
वे गीत जिसमें मिलन से ज्यादा जुदाई थी,
अगणित शोलों के बीच नाचती उसकी रानाई थी/
मैंने पूछा भी नहीं, मिलने अब क्यूँ आई थी,
कौन सा भाव हृदय में था, क्या जरूरत थी/
अपने हाथ मेरे ओर बढ़ा, मुझे प्रतिबंधित कर,
अपने होंठ मेरे होठों पे बिठा , हर्षित थी/
आँखों में तरल प्रवाह के साथ, एक सवाल था,
" मुझे क्या भूल गए या वक्त ने तुम्हें भी छला है"/
मैं उसको प्रत्युत्तर भी भला क्या दे सकता था?
मेरे पास अपना कहने को कुछ भी तो नहीं था/
फिर भी उसे मैंने अपने हृदय में स्थान दिया,
जिसमें पहले ही कोई अवस्थित था//
राजीव रत्नेश
