Monday, May 11, 2026

शेर

किसी ने पत्थर तराश कर' ताज' बना दिया/
हमने लफ्जों में पिरो कर ईमान बचा लिया//

          राजीव रत्नेश
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सिर्फ तेरी निगहबानी सही ( गजल)

सिर्फ तेरी निगहबानी सही  ( गजल)
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सब जवां हैं, सब हसीं हैं, तुम्हारा भी कोई सानी नहीं/
दे दो अपनी ओर से, छोटी कोई इक प्यार की निशानी सही/

मायूस मत होना, आके महफिल में, तेरा दामन खुशियों से भर देंगे,
तुम भी थोड़ा बदलो खुद को, झेल लेंगे हम सारी परेशानी भी/

करना बरदाश्त हर दर्द, जरूरी नहीं हर मसले में टांग
अपनी अड़ाना,
किसी से तुर्की- बतुर्की न करना, भले हो सबको बिना
बात हैरानी सही/

बातों में मंद-मंद मुस्कराती हो, होठों पे उंगली फेर-फेर कर,
आगोश में मेरे आकर, शरमाने की अदा तेरी पुरानी/

नाक तेरी खड़ी-खड़ी, सामने के दो कबूतर उड़ान को
रहते बेताब सदा,
बाहों में लेकर चूमा जब- जब, बंद हो जातीं आँखें
लजीली तुम्हारी/

हम जानते-समझते रहे सदा, मोहब्बत में हमारे कोई
कसर कभी रही नहीं,
मसलने पे फूले-फूले गाल तुम थोड़ा भी झुंझलाती नहीं/

हम क्या जानें, वह प्यार तुम्हारा दिखावा कब और
कैसे बना,
दुपट्टे को सर से जब हटाया, चाँद निकल आया साथ
लेकर जिया ही अपनी/

जाने- तमन्ना! पास आकर मेरी आरजुओं की तदबीर
को नई राह दो,
अपनी समझ कर ही तुझे चाहा, क्या चाहती हो प्यार में मान- मनौवल तुम भी/

मोहब्बत में आखिर कोई बंदिश तो होती नहीं, रख दिया कदमों पे कलेजा निकाल के,
समझ न सकीं तुम प्यार की अजमतों- कुर्बानियों को
भी सही-सही/

मुझे भरोसा पुरा था अपनी मासूम मुहब्बत का, लगी
चोट से जो कभी तिलमिलाई नहीं,
हम मजबूरे- मुहब्बत तुझे कहाँ ले जाते, इसलिए साथ ले तुझे भागे भी नहीं/

सौंदर्य-बोध तेरा, मेरे लिए कोई नया तो नहीं, नजरअंदाज न कर सके तुझे' ताज' कभी,
तुझे चाहा, तुझे पूजा, मुकम्मल कर डाला' तहरीर- ए-
रतन', सिर्फ तेरी निगहबानी सही//

             राजीव रत्नेश
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अशआर

कल का सूरज नई उम्मीदों की बारात लाएगा/
' रतन' के आँगन में फिर दीवाली यादगार बनाएगा/

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अँधेरों की बिसात ही क्या,
जब उम्मीद का सूरज साथ हो/
हर रात एक दीवाली है,
जब हाथ में कलम, सामने चाँद हो//

          राजीव रत्नेश
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महफिल में रौशनियाँ कौंधेंगी ( गजल)

महफिल में रोशनियाँ कौंधेंगी  ( गजल)
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कल लेकर सनम सपनों की बारात आएँगे/
सुब्ह आएँ, शाम आएँ, यूँ ही याद सारी रात आएँगे/

उनको देख दिल तड़पता है, उनके प्यार से,
हाथों में प्याला भर कर वो शराब लाएँगे/

ढूँढ़ेंगे शहर का कोना-कोना, मेरी तलाश में,
नहीं पाया गर, हर कहीं इश्तहार लगवाएँगे/

वो ढूँढंगे मुझे हर कहीं, जल्वा- ए- खुदा है,
कल मुझसे मिलने मेरे घर, मेरे दिलदार आएँगे/

बागों में कलियाँ भी होंगी, गुले- बहार भी होंगे,
वो मुझे वो नग्मा- ए- दिले- खुशगवार सुनाएँगे/

शिकवा भी होता है उनका अदाकारी से सना,
बहार लेकर आएँगे, खुशियों के आबशार लाएँगे/

सुहानी रूत में मेरी खुशबयानी पर वो शरमाएँगे,
सावन में आने का वादा करके, गुलाब लाएँगे/

मुहब्बत के मेरे खास किरदार वही तो हैं,
गर्मी में मेरे साथ घूमने वो नैनीताल जाएँगे/

मुहब्बत की बारीकियाँ भी मुझे वही बताएँगे,
दीवाली में लेकर फुलझड़ी, अनार छुड़ाएँगे/

सामने' रतन' के महफिल में रौशनियाँ कौधेंगी,
हाथों में लेकर सुराही, जब नजरों से जाम पिलाएँगे//

             राजीव रत्नेश
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Saturday, May 9, 2026

कोई रास्ता न रहा मिलन का ( कविता)

चाँद-सितारे सफर में,
सूरज पृथ्वी के चक्कर में,
दुनिया की हर चीज सफर में,
हम- तुम बेसफर कैसे हो सकते हैं/

सदियों से निकला हूँ सफर में,
तूने पैगाम भी भेजा सफर में,
तू गोल- गौहर थी, गुलमोहर थी,
तुझे अपना कभी सोचा ही नहीं/

सालों-साल हम साथ- साथ रहे,
इश्क का भूत तेरे सर चढ़ बोला,
मौका सही जान तेरे बाप ने,
तुझे लत्ती लगा दी/

मैं पाँच- आठ का, तू पाँच- छै की,
निभ सकता था साथ तेरा-मेरा भी,
तूने बाप के सामने हामी न भरी,
अपने प्यार की दुहाई न दी/

तू एक अंजान सफर पे चली गई,
मजबूरी में या मनमर्जी के तहत,
तुम्हें निपटाया कर्मखर्ची में,
बाप की मर्जी से गई/

तुमने किससे नहीं बेवफाई की,
गैर ने ही तेरी शादी में तेरी शामत बुलाई,
तेरा बाप भी था अपने गिरोह का सरगना,
एक- एक पहलवान की करा दी पिटाई/

सबके अपने- अपने संस्कार होते हैं,
मेरे संस्कार का कोई मोल था नहीं,
अपनी धुरी छोड़ किस जानिब गई,
मेरे मोहपाश ते निकल और के साथ बँधी/

क्या दुख तूने सहे, क्या गम मैंने झेले,
किसी ने साथ न पूछा, पड़ी अकेले,
शहर तेरे मेरे अदल-बदल गए,
तू अपने प्यार को देखे या औरों की तमीज सही/

छूट गया तेरा सपनों के सफर में आना-जाना,
भारी पड़ा तुझे किसी से दिल लगाना,
पहले भी पराई थी, अब भी पराई हुई,
तुम लगातार सफर में बनी रही/

कोई रास्ता न रहा, तेरे मिलन का,
क्यूँकि तू मुझसे भी आगे निकल गई//

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नैनीताल की बिसात ही क्या है ( शेर)

नैनीताल के पहाड़ की उसके आगे बिसात ही क्या है/
उसके होने से, दिल्ली के प्लेटफार्म की खूबसुरती ही बयां है//

                 राजीव रत्नेश
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दिल्ली के प्लेटफार्म पर जब ( शेर)

पहाड़ो की ऊँचाई और वादियों की धुन फीकी पड़ गई/
दिल्ली के प्लेटफार्म पर जब उनकी पायल छनक गई//

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समंदर बड़ा सही, पर मछली ही उसकी जान है/
' रतन' के लिए तो बस उसका महबूब ही जहान है//

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कलम आपकी, दर्द आपका और
           सोज- ए- बयां भी आपका/
मैं तो बस आईना हूँ, जिसमें झलकता
            है सारा जहां आपका//

          राजीव रत्नेश
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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!