Tuesday, July 14, 2026

इश्क भी कैसी अजब इबादत है ( गजल )

गमे- फिराक में कुछ इस तरह उलझा कि नया फसाना नहीं मिलता/
जिसे अपना कह सकूँ, ऐसा प्यार का कोई मुझे तोहफा नहीं भिलता/

असली प्यार के लिए बेमोल हूँ, मगर कोई मेरा खरीदार नहीं मिलता,
लुटा दूँ अपनी गजलें उसके नाम पे, ऐसा कोई किरदार नहीं मिलता/

हर इक मोड़ पर तेरी यादों का धुआँ- सा फैल गया लगता है,
इस दिल को अब कहीं सुकूँ का कोई बहता दरिया नहीं मिलता/

लोग कहा करते हैं कि वक्त हर गहरे जख्म को भी भर देता है,
मगर तेरे वायदे के बावजूद कोई ऐसा मेहरबां नहीं मिलता/

रात भर चंदा से तेरी ही बाते करता, तेरी हिकायतें सुना करता हूँ,
सुबह होते ही मुझे आसमानी सितारों का कोई कारवां नहीं मिलता/

हमने हर दर्द को हँस कर, सीने से भींच कर दिल में उतार लिया,
फिर भी दिल को जीने का कोई मुकम्मल तरीका नहीं मिलता/

सारी रात खवाबों में अक्सर तू मेरा साथ ही तो रहा करती है,
मगर क्या बात है, सुबह होते ही तेरा पता- ठिकाना नहीं मिलता/

तेरी हँसती हुई हसीन आखों की कोरों में, ये शबनमी अश्क कैसे हैं,
रात भर मेरी तरह क्या तू भी सो ना सकी, मुझे कोई सलीका नहीं मिलता/

सँभाल- संभाल कर हमने रख छोड़े थे सारा असबाबे- जमाना,
फिर भी ऐन मौके पर तेरे बचपन की गुड़िया का वो बक्सा नहीं मिलता/

' रतन ' ये इश्क भी कैसी अजब, कैसी गजब इबादत हुआ करती है,
जिसको चाहो उसी से मुझे तो दिल का अधूरा फलसफा मिलता है//

                      राजीव रत्नेश
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अपने फन को सलामत ही रखना ( गजल )

अपने फन को सलामत ही रख  ( गजल )
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दिल में शूल है, लब पे उसूल है/
यही जिंदगी का अजब दस्तूर है/

दर्द को हमने हँस कर कबूल किया,
यही इश्क का शायद पहला उसूल है/

जिसे अपना समझा, वही दूर हो गया,
इश्क का फैसला कितना मुश्किल है/

हर एक मुस्कराहट के पीछे छिपा,
किसी बेबसी का ही एक शूल है/

न शिकवा किया, न गिला ही किया,
यही दिल का सदियों पुराना वसूल है/

धूप कितनी भी हो, सिर नहीं झुकता,
मेरे किरदार का यही तो नूर है/

जख्म गहरे मिले, मुस्करा भी दिए,
दर्द से दोस्ती ही अब तो दस्तूर है/

राह काँटों भरी थी, चला भी वही,
जिसके सीने में जीने का सुरूर है/

दिल को बेचूँ तो आसां हो जिंदगी,
पर लब पे अब भी उसूल है/

कल से चंदा अजब पशो- पेश नें है,
क्या कहा उसने कि मेरे माथे पे शिकन है/

' रतन ' अपने फन को सलामत ही रखना,
यही दौलत है, बाकी तो सब फिजूल है//

         राजीव रत्नेश
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Monday, July 13, 2026

आज की रात जवाब दे दे ( गजल )

आज की रात जवाब दे दे  ( गजल  )
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गमे- हिज्र में यूँ फँसा कि कोई फसाना नहीं मिलता/
यूँ भी मुकम्मल मुझे कोई प्यार का जहां नहीं मिलता/

तेरा कुछ हाल तो कभी कोई ठिकाना नहीं मिलता,
कभी जमीं नहीं तो कभी कोई आस्मां नहीं मिलता/

तेरे होंठों की लग्जिश ने कुछ यूँ चाल चल दी,
कि अर्जे- खाक भी इतना कभी बेनिशां नहीं मिलता/

उदास शजर को देखा तो दिल हदस कर रह गया,
नादान इस तरह भी किसी को सहरा नहीं मिलता/

पलकों तले की बेपर्दगी तारी थी दूर- दूर तलक,
अश्के- गम भी दो बूँद दरमियाँ नहीं मिलता/

दिल की धड़कनों ने कोहराम सा अंदर मचा दिया,
जुल्फे- बरहम को कभी थोड़ा ताजियाना नहीं मिलता

तुझको छूकर आती तो है नसीमे- सहर भी, क्या पता,
मेरे दिल को कभी तेरे प्यार का आशियाना नहीं मिलता/

शहर का वाहियात मौसम कभी तो खुशगवार भी होगा,
खुदा की रहमत है कि मुझे तेरा कोई समाचार नहीं मिलता/

हुनरमंद हैं जमाने में एक से बढ़ कर एक, सदा देते तुझे,
शहर की गलियों में ढूंढ़ता हूँ, पर वो जमाना नहीं मिलता/

तेरे प्यार में तड़प-तड़प कर ही लगता है कि जान जाएगी,
मुझे तेरी मुहब्बत का कोई इश्तहार नहीं मिलता/

आकर मंजिल पे मिल जाओ, बिछड़े राही की तरह,
मुझे लिखने को अब नया तेरा कोई फसाना नहीं मिलता/

कल तारीख बदल जाएगी, आज की रात तक मुझे जवाब दे दे,
' रतन ' को कभी ये मौसम आशिकाना नहीं मिलता/

              राजीव रत्नेश
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तेरी नजरों का निशाना ( गजल )

तेरी नजरों का निशाना  ( गजल )
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महरुमे- वफा हूँ, वफा चाहता हूँ/
क्या कह रहा हूँ, ये क्या. चाहता हूँ/

रैन-बसेरा ढूंढ़ता, जग में फिरता हूँ,
तेरे तो दिल नहीं है, मैं ठिकाना चाहता हूँ/

हमसाया बने, कोई हमसफर तो हो,
बाकी का सफर, मैं सुहाना चाहता हूँ/.

तुम बन के रह सको तो रहो, नहीं तो,
किसी और ठौर किस्मत आजमाना चाहता हूँ/

मुहब्बत मेरी मजबूरी का ही नाम हो तो हो,
मैं तेरे ही गले में बाहें डालना चाहता हूँ/

जिसकी मर्जी, चाहे तो मुझे आजमाए,
मैं मील का पत्थर हूँ, तेरा पता चाहता हूँ/

लुटाने को मेरे पास बचा कुछ तो नहीं,
पाने को सारा आस्मां चाहता हूँ/

दरवेश हूँ तेरी रहगुजर का मैं, बस तुझे,
अपनी दुआओं से नवाजना चाहता हूँ/

मिल जा मुझसे सदाबहार चमन सी,
तुझे सौंपना रहमते- खुदा चाहता हूँ/

घायल न कर सका ' रतन ' को कोई,
बस तेरी नजरों का निशाना चाहता हूँ

       राजीव रत्नेश
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थाम लिया हो वक्त ने रेल का पहिया जैसे,
और रेल तेरे घर के मुहाने पे उड़ी है/
तेरे आ जाने का इंतजार है उसको शायद,
तुआए तो वक्त चले, रेल आगे बढ़े/

          राजीव रत्नेश
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रतन मुस्करा रहा होता ( गजल )

तुम्हारी जद में आया न होता,
जो पेंग तुमने बढ़ाया न होता/

घायल न हो जाता इस तरह,
निशाना नजरों का बनाया न होता/

अपने-आप से भी बिछड़ा न होता,
दिल को तुमने बहलाया न होता/

किसी मोड़ से ये दर्द न हमराह बनता,
वादा अगर तुमने निभाया न होता/

सुकून तो अपनी ही दुनिया में था मुझे,
काश! मुझे ख्वाब तुमने दिखाया न होता/

' रतन ' आज भी मुस्करा रहा होता,
गर इश्क ने तेरे यूँ आजमाया न होता/

            राजीव रत्नेश
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उम्मीद का एक दीप जलाए रखना ( कविता )

हमारी- तुम्हारी आज की यह मुलाकात,
कहीं कल गुम न हो जाए-- यही सोच,
इसे लिखने में समय लगाया/

अपनी आराध्य- देवी के मनोहारी वर्शनों में खोया रहा,
जब चेतना लौटी तो इतना ही समझ आया------
शायद यूँ ही समय गँवाया/

फिर मन ने धीरे से मुस्करा कर कहा-------
जो भाव सच्चे हैं, वे कहाँ मिटते हैं,
स्मृतियों से उन्हें जगाया/

यदि एक भी हृदय उन्हें अपने भीतर स्थान दे दे,
तो कोई भी अभिव्यक्ति कभी गुम नहीं होती---
ऐसा तेरे मन ने मेरे मन को समझाया/

तुम्हारे आँगन में कल की खिली कली आज सिमट जाती है/
या कुछ यादें समय की धूल से आप ही आप अट जाती है/

मुझे लगता है, सब कुछ पाने की जहमत उठाने के बाद भी,
कभी- कभी अपनी ही मंजिल जाने कहाँ स्वयं खो जाती है/

मजबूरियाँ इंसान को कहाँ-कहाँ से नहीं तोड़ के रख देती हैं,
हँसती हुई हसीन आँखो में भी कुछ-कुछ नमी छोड़ जाती हैं/

जिन्दगी भी अजीब खेल खेल जाती है कभी- कभी मेरे साथ,
जीती हुई बाजी भी अपने ही हाथों खुद-ब-खुद हार जाती है/

फिर भी उम्मीद का एक दीप अपने दिल में जलाए रखना ' रतन ',
क्योंकि टूटी हुई, टेढ़ी-मेढ़ी राहों से भी सुबह निकल आती है/.

                राजीव रत्नेश
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Sunday, July 12, 2026

मेरी अंतर्व्यथा शायद कोई ( कविता )

मेरी अंतर्व्यथा शायद कोई समझता तो अच्छा होता,
कल हमने- तुमने नवसृजन का सपना देखा था शायद/
तुमको याद हो कि न याद हो, कल के बिछड़े मिलेंगे,
ऐसा ही कुछ अंजामे- वफा हमने साथ देखा था शायद/

मेरी अंतर्व्यथा शायद शब्दों में पूरी उतर न सकी,
कुछ पीड़ाएँ खामोशी की जुबान में ही पलती हैं/

कल नवसृजन का जो स्वप्न साथ बुना था हमने,
आज उसकी राख में भी कुछ चिंगारियाँ जलती हैं/

आपको याद हो न याद हो, उन वादों की वह शाम,
हमने भी कभी आने वाले कल की तस्वीर सँवारी थी/

' कल के बिछड़े आज मिलेंगे '-- यही विश्वास था हमें,
इसी उम्मीद में हमने कितनी रातें साथ गुजारी थीं/

अंजाम- ए- वफ़ा की राह आसान कहाँ होती है,
मगर हमने तो हर मोड़ पर साथ चलने की ठानी थी/

अब जो फासले हैं, उन्हें भी एक कहानी मान लेते हैं,
क्यूँकि कुछ रिश्ते दूरी में ही अपनी निशानी रखते है/

              राजीव रत्नेश
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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!