Monday, May 25, 2026

दो कितआत

हवा की जिद थी, जहाँ बिजलियाँ गिराने की,
मेरी धुन भी वहीं पर थी शमां जलाने की/
छोड़ दिए कुचाओ- दर, लगी दिल की बुझाने को,
जरूरत क्या थी, मेरे स्वप्न- महल को माचिस दिखाने की//

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हुकूमत की तलवारें भी म्यान में जंग खा गईं,
मेरे हाथ में थमी कलम, सदियों पे छा गई,
तनहाई दूर करने को, किसी का आसरा नहीं,
मेरी हुकूमत तो चंदा से थी, जिंदगी पे जो छा गई//

            राजीव रत्नेश
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कलम बनाम तलवार

आँधियों का भले ही झोंका आए,
या बवंडर नाच-गा कर आए,
जहाँ तलवारें भी कुंद हो जाती हैं,
कलम ने अपना ईमान नहीं छोड़ा//

दो कितआत एक शेर

महलों की पाबंदियों से खुली हवा में निकल आया हूँ,
हवेलियों की निगहबानियों से भी अब निकल आया हूँ,
दिल के चिराग को बार- बार तो जलाया है मैंने,
वक़्त के थपेड़ों को भीतर ही भीतर जज्ब किया है मैंने/

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अहले- दुनिया हमें बार- बार मना करते रहे/
हम हवा के सामने रौशन शमां करते रहे/
कौन कहता है, मुखालफत तुम्हारी की,
तेरे शौक के सामां ही तुझे पेश करते रहे//

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इधर भी है सिवा कुछ, उधर की मजबूरी,
न उनसे बताए बने, न उनसे छिपाए बने/

           राजीव रत्नेश
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Saturday, May 23, 2026

कितआत

वक्त की क्या बिसात
जो उम्र का एहसास दिलाए,
तेरा दिल वो गुले- गुलाब है,
जो रिवजां में भी मुस्कराए//

जमाने के सारे जख्म, सारे दर्द कहीं खो जाते है,
जब हम तेरी मरमरी बाहों के साए में सो जाते हैं,
अरमानों की दुनिया जब दिल में मचलती है,
ठंडक सी मिलती है तेरे दहकते रुख्सारों से//

           राजीव रत्नेश
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देना अपनी मरमरी बाँहों का सहारा ( कविता)

देना अपनी मरमरी बाहों का सहारा  ( कविता)
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तेरी मदभरी आँखों में प्यार भरे अफसाने हैं,
घुंघराली अलकों में झूमते सावन के तराने है,
नजाकत- ओ- अदा में तू सबसे बढ़कर है,
डाल दे गले में जरा अपनी मरमरी तू बाहें/

तुझसे अलगाव मेरा कभी हो न पाएगा,
पीकर जाम तेरे हाथों से, सुरूर मुझे आएगा,
बाली उमर में थकान तुझे खुदारा न हो,
बस तू देना जरा, अपनी मरमरी बाहों का सहारा/

गैरों से बात करती हो, तो दिल जलता है मेरा,
दूर भगाने को उसे, दिल उमगता है मेरा,
कोई तुझे तकलीफ दे, नहीं, मैं नहीं सह सकता,
दिल मेरा हल्का करने को, देना अपनी मरमरी बाहों का सहारा/

दिल न तजवीज किया था, लाखों में तुझे,
दिल ने अपना माना था, लाखों में तुझे,
तू मौज- ए- समंदर थी, अगणित लहरों में,
करीब दिल के आना, देना अपनी मरमरी बाहों का सहारा/

जाने क्या लिख डाला था, औराके- हैरानी पे,
माँग बैठा था क्या तुझसे, प्यार की निशानी में,
तू मेरी है और सदा मेरी ही हो के रहेगी,
वुसअते- सहरा में, देना अपनी मरमरी बाहों का सहारा/

दिलदार तूने कहा था, रतनार तुझे मैंने कहा था,
तेरे लिए जमाने के जख्मों का दर्द मैंने सहा था,
कली-कली शोख- चंचल थी चमनो- गुल्जार की,
नकार कर भौंरों की गुंजन, देना अपनी मरमरी बाहों का सहारा/

आने वाली बहारें आके ही रहती हैं जीवन में,
मिलते ही हैं सहारे, मिलने वाले जीवन में,
पतझड़ के जर्द पत्तों में कोई जीवन नहीं होता,
प्यार के सब्ज गुल देकर, देना मुझे अपनी मरमरी बाहों का सहारा/

कंदीले- कुर्बत जला, पास आ कर रूखे- रौशन दिखा,
दिखा अपने चंपई होंठों से फूलों का झड़ना,
ऐ सुब्हे- सीमी! आकर मुझे सोते से जगा,
मुँह धुलाते हुए, देना अपनी मरमरी बाहों का सहारा/

जीने से चढ़ते- उतरते, निगाह अपनी नीची रखना,
रेलिंग के सहारे, मेरे कमरे में अपना जादू दिखाना,
गुलाब मेरे टेबल के गुलदस्ते में अपने हिसाब से सजाना,
गुले- आरिज देकर, देना मुझे अपनी मरमरी बाहों का सहारा/

कुछ तो बात है गजब की, तेरी सूरते- नूरानी में,
उससे बढ़ कर कशिश है, नीली आँखों की गहराई में,
मुर्झाए गुल खिल उठते हैं, तेरी मीठी- मधुर सदा से,
मुझ खाकसार से मिलना तो, देना मुझे अपनी मरमरी बाहों का सहारा//

                 राजीव रत्नेश
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नूर बरसता है कैसा रुख पे तेरे,
महफिल के उजालों में,
होड़ लग जाती दीवानों में, पहले ही
तुझ तक पहुँच पाने की/
शमां मंद पड़ जाएगी, जानता हूँ,
दिल बिस्मिल है अर्जे- मस्तानी से,
पहले कर मुझे मदहोश,
फिर करना कोशिश शमां के रुबरु होने की//

           राजीव रत्नेश
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Wednesday, May 20, 2026

नई- नई राहें ईजाद होंगी ( कितआत)

अब तो जहाँ भी जाएँगे, चंदा साथ होगी
उसकी चाँदनी में हर चीज साफ होगी
यही हार्दिक इच्छा, वो हर कहीं मेरे साथ हो
आगे बढ़ने के लिए नई- नई राहें ईजाद होंगी

              राजीव रत्नेश

एक पंथ दो काज होगा ( कविता)

एक पंथ दो काज होगा  ( कविता)
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याद तेरी बरबस आती है 
कभी ज्यादा तो कभी कम आती है
इस जिन्दगी का क्या भरोसा
सांस जबकि थम के आती है

यादों की घटा घनघोर है
बादलों का गर्जन झकझोर है
हम तुझे अब क्या समझाएँ
मुझे बस तेरी बातों का जोर है

जैसे-जैसे मैं बढ़ता जाता हूँ
तू कोमल कमनीय होती जाती है
समंदर से निकली प्यार की मोती है तू
स्फटिक चाँदनी है, बड़ी रमणीक है तू

गीत मनोहर, स्वर वीणा के मंद हुए
मंद-मंद तू मुस्कराती है
सुन मेरे गीत मधुर
हिय में ही हरषाती है

मघुबन में तो राधा थिरके
तू संग सखियों के राग अलापे
मृगछौने इधर- उधर भागे
कान्हा की वंशी जब गूँजे

बरसाने में उत्सव है
आज यहाँ कन्हैया पधारे
गोकुल में हो जैसे त्यौहार
हर तरफ बहते दूध के धारे

मक्खन, दही आज नबचेगा
ग्वाल- सरवा को छक के भोग लगेगा
मंदिर- मंदिर गोपियाँ दर्शन करेंगी
कान्हा अब द्वारिकाधीश कहाएंगे

गोपियाँ पकड़ राह आगे-आगे चलेंगी
दूध बिकेगा, दर्शन भी कान्हा के होंगे
एक पंथ दो काज होगा
दूध के दाम, दर्शन बेदाम मिलेंगे

चलो सखी एक बार हम भी
घूम आएँ मथुरा और बरसाने
नैन- चकोर, कृष्ण दर्शन को प्यासे
लगेगी जीवन- नैया तभी किनारे//

         राजीव रत्नेश
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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!