Tuesday, May 19, 2026

बड़ी फरमाबरदार है तू ( गजल)

बड़ी फरमाबरदार है तू  ( गजल)
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तेरे ही सहारे बढ़ चला हूँ, दुनिया के मँझधार में/
मेरे अत्फाल के रस्मो- राह की तू बुनियाद है/

हमारे अज्दाद की निशानी तो तूने ही सँभाली है,
उनके अरमानों के असरार की तू इकलौती आगाज है/

निशानी हमारे प्यार की, तेरी इक-इक नफस में है,
हमारे खान्दानी वसीयत की तू मुस्तकिल आफाक है/

मेरे मुकद्दर की चमकती जिया- स- आफताब तू है,
मकतबी किताबों के वरकों की तू बची निशानात है/

जलजले भी आए, तूफान भी आए, तू न राह से डिगी,
मेरी नसीहतों की ऐ जाने- जहाँ! तू मेरी ऐवाने- ख्वाब है/

कशमकश- ए- गर्दिश में भी हम चलते रहे मंजिल की तलाश में,
तमाशाइयों ने फिकरे कसे जहालत से, क्या करता, तू मेरी ग्रहस्थी, मेरा सामान है/

आगे बढ़ कर शैदाइयों ने कदमबोसी की, तब्सिरा सुन कर,
और कोई क्या कर पाता, तू मेरी ब्याहता हमजाद है/

लहर-लहर में माकूस थी तू, चाँदनी की बागडोर संभाले हुए,
शहरे- आरजू में तू थी गालिब, मेरे लिए तू खुदा का फरमान है/

इबादत तेरी करता हूँ, सुन ऐ नीली आँखों वाली,
महल भले न हों मेरे पर तू मेरी औकात है/

चंचल, शोख हसीना, कितना तरसाएगी' रतन' को,
सीने से लग जा, आजा पास, तू बड़ी फरमाबरदार है/

                  राजीव रत्नेश
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जिन्दगी में भले न और कोई काम हो/
अस्ल बात तो तब, जब मुहब्बत मेहरबान हो/
वो पिलाएँ जाम, सुराही से ढ़ाल कर,
उनका साथ हो, उनसे आगोश मेरा आबाद हो//

              राजीव रत्नेश
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अब भी ढ़ाल बाकी है ( शेर)

परिंदे उड़ गए सारे, मगर वो डाल बाकी है,
रतन के इस सुखनगोई में अबभी ढाल बाकी है/

जिधर तू कहे, उधर चलें ( गजल)

जिधर तू कहे, उधर चलें  ( गजल)
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यौवन- तरुवर के पात झड़ चले/
अब भी आ जाओ तो गगन में उड़ चलें/

उड़ गए सब पंछी, डाल पहले छोड़ चले,
अब किसी से दुश्मनी- दोस्ती समझ चले/

याराना था मेरा सारी दुनिया के दीवानों से,
अपने जो थे, छोड़ अकेला, छोड़ जग चले/

बैठे थे जहाज पर, बीच समंदर कहाँ जाते,
उड़कर फिर वापस जहाज पर जम पाते/

संभल जाओ अब भी, सब पहले नाता तोड़ेंगे,
कुंडली मारे बैठी नागिन, कब जाने डस डाले/

मतलब के सब बंदे, इस चार दिन के मेले में,
गया कोई न लौटा, कितने छोड़ हमें अकेले/

संभलना ही तो नआया, एक चोट के बाद दूजी खाए,
उन्होंने वफा न सीखी, मुहब्बत में उनकी हम मिट चले/

दूर से आ रही शहनाई की गूँज, सुन लेने दो,
दिल भरा नहीं, चलो हम भी उधर चलें/

सबका किया भरोसा, कोई भी काम न आया,
अकेले ही आए हैं, अकेले ही अब चलें/

जिधर गए सब, छोड़ यहीं अपनी वीरासत,
तेरी मर्जी के माफिक' रतन', जिधर कहे उधर चलें//

                राजीव रत्नेश
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Monday, May 18, 2026

रतन के छलके प्याले में ( शेर)

समंदर का पानी खारा सही,
पर उसमें उतरना ही तकदीर है/
रतन के छलके प्याले में,
आज फिर चंदा की तस्वीर है//

दिल का प्याला छलका दिया है ( गजल)

दिल का प्याला छलका दिया है  ( गजल)
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तेरे दिल की चकमक से रगड़ दिया है दिल,
तपिशे- खूँ- ए- रग और बढ़ाने के लिए,
आ पाए गर जो तू महफिल में मेरे,
आसां किया रास्ता फासला- ए- मंजिल घटाने के लिए/

आजमाइश में तू अब फिर से मुझे न डाल,
तेरे लिए छोड़ा कबूतरों को दाना- पानी देना,
अबकी बरस कर देना आजाद उन्हें भी,
असर- ए- मुहब्बत और बढ़ाने के लिए/

हाले- दिले- बेकरार का अब है आलम जुदा,
देख, न अब तू मगरमच्छ के आँसू बहा,
दामने- दिल तार- तार आखिर हुआ क्यूँ,
दिया था गुलाब, तुझे तो जुड़े में लगाने के लिए/

सागर में इक कश्ती के मुसाफिर हम- तुम,
पीने को भी न मिलेगा यहाँ सादा पानी,
हम - तुम खाक- ए- दिल से करेंगे मुअत्तर,
तेरे घुंघराले केशों को महकाने के लिए/

अब तू छोड़ हठधर्मी और तुनुकमिजाजी भूल जा,
पूछ ले कम से कम एक बार मेरी तबीयत का हाल,
हम तुझे आखिरी छोर तक तेरा साथ निबाहेंगे,
भेजेंगे कासिद को तुझे समझाने के लिए/

दिलदार मेरे! अकेले मसला हल न होगा,
गर्दिश में कश्ती, मारका ऐसे सर न होगा,
मैं बंधन में तो तू है अपनी तबीयत की आजाद,
चाहिए हाथ में तेरा हाथ, जिन्दगी संवारने के लिए/

जमीन ओ' आस्मान के कुलाबे मिलाएँगे तेरे लिए
तेरी राह में फूल बिछाएँगे, तेरी अगवानी के लिए,
आजा एक बार जो तू मेरे दिल की महफिल में,
तर्जे- बयानी झेलेंगे तेरी, अपने अफसाने के लिए/

समंदर में इक बार नहा कर तो देखो,
इक बार मेरी कश्ती में होके सवार तो देखो,
कितना नमकीन है समंदर का पानी,
हम बुलावा देते हैं तुझे साथ नहाने के लिए/

मौजूँ नहीं समझती, इक बार नहा तो सही,
रुख्सारों को चूम कर अहसासे- चरपरा करूँ तो सही,
किस कदर नमकीन हो गई हो पहले से भी,
कोई गरज नहीं तुम्हारी, गुलाबी कपोल छिपाने के लिए/

प्याला उठा, जाम उठा, खोल दे बंद बोतल,
समंदर से आज तक किसी की प्यास बुझी नहीं,
हम इतने गाफिल भी न थे मसाफत में अपने,
मफरूर न थे, आए है खुद ही तुझे ले जाने के लिए/

करीब से करीबतर हर लमहा होगा,
नसीब तुझे चैन- ओ- सुकूँ होगा,
दिल का प्याला और छलका दिया है ' रतन'
तेरी कसक और बढ़ाने के लिए//

            राजीव रत्नेश
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Friday, May 15, 2026

अभियान पर कमेंट्स पर आधारित

कलम की प्यास बुझने को है, दरिया करीब है/
मुकम्मल होने को अब सिर्फ हमारा नसीब है/

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क्रांति के नारों से शुरू हुआ था जो एक अफसाना/
जमुना के तट से गुजरा, बना फिर एक जमाना/
रतन ने पाया चंदा को, चंदा ने पाया अपना रतन,
मुकम्मल हुई तहरीर, पूरा हुआ मुहब्बत का अफसाना//

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क्रांति के नारों के बीच वो चाय की चुस्कियां,
वो पगडडियाँ, वो सेवा और चंदा की नजदीकियाँ/
इतिहास लिखेगा जब भी, जे ० पी ० के दीवानों का नाम,
रतन की तहरीर में गूंजेगा, बनारस के साथ चंदा का नाम/

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कलम रुकी थी जरा, थमी नहीं है अभी,
दास्तां- ए- वफा, पूरी हुई नहीं है अभी
अभी तो अस्ल में मुसलसल प्यार जारी है
नतीजा अभियान का पूरा हुआ नहीं है अभी//

                अभियान के कमेंट्स पर आधारित

             राजीव रत्नेश
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Wednesday, May 13, 2026

अभिचान पार्ट -३

तो वह बोली,' तुम्हारी ही चीज हूँ, मुझे अपनी बाहों का सहारा दो रतन!' उसका यह वाक्य मुझसे चीख-चीख कर कह रहा है कि मुझे अब और अपना प्यार लुटाने के लिए क्या सुनने की इच्छा है/ चंदा ने
तो खुल्लम खुल्ला अपना समर्पण मेरी आगोश में
झोंक दिया है/ यह जान कर हैरत भी हुई कि चंदा ने मुझे पहली बार मेरा नाम लेकर पुकारा और प्यार की
इंतहाई है कि वह मुझसे आपसे तुम पर उतर आई है/
क्यूँकि उर्दू शायरी में आप से तुम और ज्यादा अपनापन होने पर तू और तेरा लफ्जों से ही संबोधन
ज्यादा ही आत्मीयता दर्शाता है/ उसका मेरे प्रति यह अपनापन उसके उत्कट प्रेम की तीव्रता को ही दर्शाता है/
                   इस समय उससे मैंने इतना ही कहा,
' मैं भी तुम्हारा ही हूँ पर अभी नहीं, जब तक कि
सामाजिक और आधिकारिक रूप से तुम मेरी ब्याहता
नहीं बन जाती/' चंदा ने इतना और कहा,' मेरे माता-
पिता से मुझे माँग लो/ मुझे उम्मीद है, मेरी खुशी के लिए वो मना नहीं करेंगे/ तुम्हारे भरोसे मुझे कहाँ-कहाँ तुम्हारे साथ नहीं भेजा/ उनकी भी यही इच्छा रही होगी/'
                      मैंने उससे बताया कि पहले अपने मम्मी-पापा से बात कर लूँ फिर मैं तुम्हारे साथ बनारस भी चला चलूँगा/ इस बात से वह सहज हो गई और बोली,' मैं तुम्हें पा कर कहीं खो न दूँ, मुझे बस यही डर है'/ मैंने उसे आश्वस्त किया और अँधेरा छाने से पहले ही हम घर की ओर लौट पड़े/
                      मैंने उससे यह नहीं कहा,' अभी मैं
तुम्हारी दिली इच्छा पूर्ण कर दूँ/ फिर तुम कोई दूसरी
फरमाइश कर दो तो करने न करने के ऊहापोह में मैं
फँसा रहूँगा/ करता हूँ तो अपनी नजर में गिरता हूँ, नहीं करता तो तुम्हारी बात न  मानकर फिर भी अपनी
नजर में गिरता हूँ/ आज तक मैंने ऐसा कोई काम नहीं किया, जिस कारण मैं अपनी ही नजर में गिर जाऊँ,
भले जमाने ने मेरी झूठी बदनामी करने में कोई कसर
न छोड़ी हो/ अपनी नजरों में स्वयं गिरने वाले ही अवसाद के अंधे कुए में गिरकर आत्मघात तक कर
लेते हैं/ और तुम्हें खोकर या पाकर भी अपनी नजर
में गिरने का मलाल नहीं पाल सकता/' यह मेरी अपनी
सोच थी/ जो मैं चंदा से किसी हाल नहीं कह सकता था/
                         चंदा की योजना मैंने माताजी को बताई और उसके घरवालों से बात करने को कहा/
एक बात उन्होंने मुझसे कही कि मुझे भी अब गृहस्थी के लायक बनना पड़ेगा और अपने पैरों पर खड़ा होना
पड़ेगा/ यही बात उन्होंने पिताजी से भी कही/ लिहाजा मैंने कोई बंधन स्वीकार करने के पहले ,
अपनी छोड़ी पढ़ाई पूरी न करके मैंने नौकरी ज्वाइन
कर ली/ माताजी का मंतव्य था कि फिलहाल तो चंदा
को बनारस छोड़ आऊँ फिर उसके बाद उसके घरवालों से बात की जाएगी/
                          मैंने भी यही लाजिमी समझा और
एक दिन चंदा से मशविरा कर के हमने सबेरेवाली गाड़ी बनारस के लिए पकड़ ली/
                          बनारस जाकर मैं सीधे जौहरी जी
से मिला और उनसे अपने माता- पिता की दिली इच्छा बताई/ वह एक प्रसन्नचित और स्वस्थ व्यक्ति मुझे लगे/ उन्होंने मुझसे कहा,' हम लोगों की भी यही राय थी'/ उनकी पत्नी ने कहा,' हम इलाहाबाद आकर जल्द ही आपके घरवालों से मिलेंगे और वो मुझे
आशातीत खुशी देकर अपने लोगों के साथ रहने की मिन्नत करने लगे/ पर मैंने अपनी नौकरी की बात बता कर उनसे लौटने की इजाजत मांग ली/
                        चंदा मेरे साथ ही आने को तत्पर थी
मैंने उसे समझाया कि कुछ रोज की बात है अपने माता- पिता के साथ ही आना क्यूँकि उसके पापा ने
बताया था कि चंदा उनकी इकलौती संतान थी और उसे उन लोगों ने बड़े नाजों से पाला है और उसकी
हर इच्छा का मान रखा है/ मैंने उनसे कहा था,' आप लोग मेरी ओर से निश्चिंत रहिए/ मेरे साथ चंदा को
कभी किसी किस्म की तकलीफ नहीं होगी/ मेरी माताजी अभी से उसे अपने घर की लक्ष्मी मान चुकी हैं/
                        मैंने चंदा के घर को शादी के पहले
ससुराल समझने की भूल कतई भूल नहीं की/ और
उन लोगों को इलाहाबाद आकर मेरी माँ और पिताजी से मिलने को कहा और इलाहाबाद चला आया/
                       सीधे शब्दों में कहूँ तो यह शादी बहुत ही सादगी भरी और नपी-तुली थी/ न कोई लेन-
देन का सवाल था और न ही किसी की नाक का सवाल था/ देखी गई थी तो सिर्फ मेरी और चंदा की
खुशी/
                       छुट्टियों में अक्सर मैं चंदा के साथ बनारस जाता और फिर साथ- साथ ही लौट आ आते/ चंदा न मेरे बिना कहीं ठहर सकती थी और न
मैं चंदा के बिना/ हम एक दूसरे से जुदा कभी न हुए/
                       पहली रात मेरा उससे पहला सवाल था,' मुझे पाकर क्या तुम खुश हो?' उसने मेरे कंधे पर
अपना सर रख दिया और मेरे हाथ अपने सीने पर रख
कर बोली,' सुन लीजिए, मेरी धड़कनें क्या कहती हैं/
खुशी बताने की चीज नहीं वरन महसूस करने की चीज है/' और मैंने उसे जमुना किनारे तो टाल गया था पर अब वह सिर्फ मेरी है, अब सिर्फ इस अहसास से ही आज उसको अपनी बाहों की गिरफ्त में कस कर
बेतरह चूमा और उसकी आँखों में मुझे नीली जमुना
फिर चमकती दिखने लगी और मुझे अहसास हुआ कि चंदा को पाना ही मेरा अस्ल में मुकम्मल अभियान
था/

वो मुखातिब भी थे, और मेरे पहलू में भी,
हमने भी रात उनकी जुल्फों के साये में काटी/
कसम खाई है हमने, एक दूसरे से न होंगे जुदा,
चाहे मिलन में रात को हो या दिन की लाचारी//

                        और हम दोनों दूधिया रौशनी में दो
जिस्म और एक जाँ हो गए//

                  राजीव रत्नेश
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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!