Tuesday, January 6, 2026

तुम मेरी दिलरुबी हो !!! ( कविता)


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माना तुम हसीं भी हो, दिलजबीं भी हो,
हमदम भी हो मेरी, दिल की यकीं भी हो,
आस मेरी आकर बदलो इत्मीनान में,
क्या जानो, ख्वाबों की तुम, दिलरुबी भी हो/

व्यर्थ में मृदुल मुस्कानों को लुटाने से क्या फायदा?
भरी इस महफिल में बिजली गिराने से क्या फायदा?
बहारें आनी होंगी मेरे वीरान दिल में तो आएँगी ही,
बेमेल इस मौसम में जल्वे दिखाने से क्या फायदा?

तुम मेरी ख्वाबदीदा अरमानों की सरजमीं भी हो,
माना तुम हसीं भी हो, दिलजबीं भी हो/

काले बोर्ड पर अक्षरों का पढ़ना तुम्हारा गौर से,
सर घुमा कर देखना मुझे खास निगाहे चोर से,
क्या है अदा? क्या है सदा? बन कर अन्जान,
देते हो मुझे निमंत्रण आज तुम बड़ी दूर से/

हुस्ने बहारा, दिले सितारा, तुम बहार में बदली भी हो,
माना तुम हसीं भी हो, दिल जबीं भी हो/

वो अचानक तुम्हारा उठ कर चले जाना क्लास से,
फिर बाहर जाकर पीना पानी, कैंटीन के गिलास से,
बहुत खूब! खुद की प्यास बुझाने का उम्दा है तरीका,
मेरा क्या, जो घबरा गया हूँ गमे- फर्दा के लाजवाल से/
मेरी भी प्यास बुझाओ, तुम बड़ी नरम नमीं भी हो,
माना तुम हसीं भी हो, दिल जबीं भी हो/

सोचता हूँ पता लगाऊँ किसी तरह घर तुम्हारा,
क्या लेकर देखूँ डेस्क पर रखा रजिस्टर तुम्हारा,
रायटिंग तुम्हारी क्या मालूम समझ आएगी या नहीं,
तुम्हीं बता दो, तुम तो जानती हो हाल दिल का हमारा/
घर से क्या लेना, सोचता हूँ तुम बड़ी नामी भी हो,
माना तुम हसीं भी हो, दिल जबीं भी हो/

लौट कर आओगी, अब जाने तुम कब तक,
आस मेरी पूरी होगी कब तक, लौटोगी कब तक?
कितनी बला की जाने फिजा में गर्मी भरी है?
तुम में शरर- ए- इश्क भड़केगी भला कब तक?

पुरशबाब भी हो, अदा से तुम बड़ी इश्की भी हो,
माना तुम हसीं भी हो, दिल जबीं भी हो/
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अशआर
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हमने कोई तकल्लुफ नहीं दिखाया है,
हमने आज जी भर कर खाया है/
कीजिएगा गुस्ताखी हमारी माफ!
आपके हिसाब में जो घाटा आया है//
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साथ में देने को कुछ न था,
          तो बाजार से मँगाया होता/
चीनी भी न थी तुम्हारे पास जो,
          तो पानी में नमक ही मिलाया होता//
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सोचता हूँ, तुम क्लास में क्या करती होगी,
       मेरी तरह क्या पीछे बैठे कविता लिखती होगी?
मेरे' सर' पूछते हैं, तो मैं खामोश ही रह जाता हूँ,
      तुम्हारी' मैडम' जब पूछती होंगी, तब तुम क्या
                                                 करती होगी//

           राजीव' रत्नेश'
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नया साल मुबारक हो!!! ( कविता)


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ऐ मेरी भोली और मासूम सनम,
नया साल मुबारक हो,
ये सुब्ह की लाली, ये मौजें ,
नयी सुब्ह मुबारक हो/

हर लम्हा चैन से बीते,
न रहे तू कभी उदास,
तेरा हर गम बाँट लूँगा मैं,
मेरी हर खुशी तुझे मुबारक हो/

प्रसन्नता का पारावार नहीं,
सुब्ह लगती है सावन की,
तेरी खिड़की नजर आती है मुझे,
नई नवेली दुल्हन सी/

मौजों का ठिकाना न पूछो,
खुशियों का आलम न पूछो,
हर घड़ी मुझे लगती है तुझसे,
मिलन की रातों सी/

जीवन मिले तुझे, 
खुशियों के गीत मिलें तुझे,
मेरे दिल के अत्युत्तम भावों,
का गुलदस्ता मुबारक हो/

ये सुब्ह ये शाम, ये रात ये सितारे,
सभी रौशन तेरा जीवन करें,
ऐ मेरी भोली और मासूम सनम,
नया साल मुबारक हो/

नई सुब्ह को कितने अहसास,
दिल में मेरे उपजे हैं,
जिनको मैंने दिल से चाहा,
वो ही मेरे अपने सपने हैं/

चाहता हूँ आज तुझसे मिलन,
की घड़ी में शम्मअ भी जले,
कर सकूँ मैं पूरी वो बातें,
तुमसे जो मुझे कहने हैं/

मेरे दिल में तमन्नाओं का दीप,
जलता रहे हमेशा,
हर साहिल हो तेरा, सागरे- उल्फत,
की हर मौज मुबारक हो/

ये" रत्न" भी तेरा, मेरे गीत की,
हर कड़ी तुझे मुबारक हो,
ऐ मेरी भोली और मासूम सनम,
तुझे नया साल मुबारक हो//
       """"""""""
       अशआर
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तुम्हारा चेहरा बना सकता हूँ मैं बड़ी आसानी से,
पर बोर्ड पर की फीगर नहीं बन पाएगी/
तुम्हारी हर हरकतें, हर राज पढ़ लूँगा मैं,
पर' सर' की बताई थ्यूरी समझ नहीं आएगी/
               --------

तेरा चेहरा हसीं गुलाब है,
आँख तेरी लबरेज शराब है/
' सर' के सवाल का जवाब क्या?
तेरी नीची निगाह में हर जवाब है/
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पंखे की हवा से उड़ती हैं जुल्फें तुम्हारी,
कभी- कभी बंद हो जाती हैं पलकें तुम्हरी/
मैं नजर उठा कर देखता हूँ अपलक जब,
शोख हो जाती हैं और भी अदाएँ तुम्हारी//

             राजीव' ख्नेश'
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शायर !!! ( कविता)


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कहते हैं वो,' हम शायर हैं,
अपने जुल्फों की इक लट दे दो,
हम महल बना कर छोड़ेंगे,
रहे लट जो तुम्हारी, मेरी मुठ्ठी में,
जब जी चाहे, हम पानी बरसा देंगे,
ये वो मतवाले बादल हैं,
जी चाहे, दुश्मन को बहा देंगे'/
बहुत बड़े दार्शनिक हैं वो,
हर समय शून्य में घूरा करते हैं,
कहते हैं,' बिन पिए चाय,
तुम्हारे हाथों से,
मेरे दिल को चैन नहीं मिलता है',

सामने खड़े हो जाते हैं, जो जाकर हम,
अपलक हमें ही निहारा करते हैं,
खोलते हैं मुँह कुछ कहने को,
पकड़ कलम हाथों में,
कुछ लिखने लगते हैं,
कहते हैं हम,' अजी! जरा सुनो तो',
गंभीर होकर कहते हैं,' जरा चुप रहो तो',
' तुम्हीं तो मेरी कविता हो,
तुम्हीं तो मेरी नगमा- ए- शायरी हो,
तुम्हारी चोटी को देख कर,
एक सर्पिणी का ध्यान आता है,
यूँ ही बिन हिले,
खड़ी रहो कुछ देर और,
वरना यह जाकर,
किसी शायर को डस देगी'/

' और मैं इस जहर को,
उतारने का तंत्र-मंत्र,
थोड़ा बहुत भी तो जानता नहीं/
तुम्हारे सुरमई कपोलों को देखकर,
ढ़लते हुए सूरज की याद आती है,
तुम्हारी पलकों में नीली बूँदे,
उस झील के पानी सी लगती हैं,
जहाँ शाम के धुंधलके में हम,
घंटों घूमा करते थे,
खिलखिलाया करते थे/'

' हर अदा है तुम्हारी कातिल,
किस खूबसूरत अदा से,
शरमाया करती हो?
तुम्हारे कपोलों पर दौड़ती सुर्खी,
प्रिये! तुम और हसीं लगती हो,
सीने पर सर रख कर यूँ न शरमाओ,
मेरी जां! मेरी बाहों में आ जाओ,
अपने हाथों दुल्हन तुम्हें बना कर,
इक तस्वीर तुम्हारी बनानी है,
अपनी रुठी हुई कविता को,
इक बार फिर से,
धानी साड़ी पहनानी है'

कहने को तो प्रिया मैं हूँ,
पर ध्यान कविता का रखा करते हैं/
कहते हैं,' मेरी अर्धांगिनी तुम्हीं हो',
पर, पूरा समय कविता को दिया करते हैं,
और जब कविता का मूड नहीं बनता है,
गाली अपने साले को दिया करते हैं/
और साला कहता है...
उनकी कविता को देखकर
शायर, आधे पागल हुआ करते हैं/
       """""""""

अशआर
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अभी तुम कली हो,
           इक दिन खिल कर फूल होगी/
तुम्हें न चाहूँ मैं,
           तो मेरी यह भूल होगी/
      ---------

कहाँ गईं वो मख्मूर निगाहें,
           कहाँ गईं वो उल्फत की बातें/
मेरी तन्हाइयाँ ढूँढ़ती हैं तुझे,
          तेरी गदराई, मेरे गिर्द कसती बाहें/
        -----------;

प्यार के दो बोल ही,
           तुम्हारे काफी हैं , मेरे जीने के लिए/
मिल जाए जो ये तो,
           फिर न कहूँगा, कभी मैं पीने के लिए/
           ------------

तुम्हें बेवफा समझने को मजबूर हूँ,
फिर भी तुम्हारे प्यार में मगरूर हूँ/
तुम्हारे होठों की लाली जब मुस्कराती है,
जाने क्यूँ हो जाता नशे में चूर हूँ/
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ऐ सनम खड़ी हो ओगी,
        आके यूँ ही जो खिड़की पे,
ढ़लेगी रात कैसे?
          आएगी नींद सितारों को कैसे?
           -----------

खामोश से क्यूँ बैठे हुए हैं मेरे सामने आप,
नजरें नीची हैं, क्यूँ शरमाए हुए हैं आप?
आपसे हम कुछ न कहेंगे, कीजिए सितम भी,
ख्वामखाह ही हमसे घबराए हुए हैं आप/
            ----------

सोचती होंगी तुम भी वादा करके मिला नहीं,
तुमने निभाई दुश्मनी, पर किया कोई गिला नहीं/
ये अपनी आदत है, खफा किसी से नहीं होते,
तुम करके देखो मदहोश, हम कहेंगे हमने पिया नहीं/
            -------------

अजी हमने तुमसे खफा हो के भी देख लिया,
तुम्हें भुलाने को, दूर जाके भी हमने देख लिया/
न तुमने ही जफा छोड़ी, न हम ही तुम्हें भुला सके,
बहुत याद आए तुम, तुम्हें भुला के भी देख लिया//

            राजीव रत्नेश

बेयरा !!! ( कविता)


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वो एक कारवां ही था,
जो होटल में आकर ठहर गया,
वो व्हिस्की के दौर,
और भुना मुर्ग और कबाब,
इक ही इशारे पे उनके हाजिर,
मदहोश साकी का शबाब/

खड़ा रहा देहरी पे मैं,
आँखें फैलाए------
कुछ लोगों की ( जो रईस कहे जाते हैं)
निगाह शायद मुझपे भी उठ जाए,
क्यूँकि मैं एक बेयरा था,
खाली एक बेयरा( जिसकी कोई मुराद नहीं)
जिसका काम था केवल,
उनकी हर आज्ञा का पालन करना,
पर तवज्जह मना था/

रात की बात ढ़लती पहर में,
बिखरी हुई हुई साकी को,
अंक में भर कर,
दीवान तक ले जाना,
जो चंद लोगों की होकर,
अपना सब कुछ खो चुकी थी,
चंद सिक्कों के लिए,
कितनों की हवस का,
शिकार बन चुकी थी/

उन अँधेरे गलियारों में,
उसके जलते हुए होठों के अँगारों पे,
धीमे से अपने होंठ रख देता हूँ/
किसी जाम की महक आती है,
जिसमें वो मदहोश हो चुकी है,
नशे में धुत्त,
मेरी बाँहों में निढ़ाल/

अपनी साकी को और,
अपनी बाँहों में कस लेता हूँ,
मेरे बढ़े- रुखे बालों में,
उसकी उल्झी जुल्फों का जोर,
सोचता हूँ--------
उसको कोई गम तो नहीं,
हर कोई उसके अहम् पर,
ही तो चोट करता है,
फिर भी उसे कोई ऐतराज नहीं/

एक बार सिहर कर,
वो अपनी आँखें खोल देती है,
और मैं उसकी मस्तानी आँखों को,
हौले से चूम लेता हूँ,
मेरे गिर्द उसके कसते हुए हाथ,
महसूस करता हूँ------
पूछता हूँ,' बात है क्या?'
कहती है,' यूँ ही पिलाए जा आशिक'/

मालूम है उसे-------
अँधेरों का मैं आशिक हूँ/
अँधेरों का इसलिए कि,
उसके हुस्न का मैं दावेदार नहीं,
उसका मालिक कोई और है,
वो तो मेरी पर्दे की महबूबा है,
क्यूँकि-------
मैं केवल एक बेयरा हूँ//
       """"""
अशआर
""""""""
अधमुँदे तेरे पलकों पे,
विचरते स्वप्न मेरे अन्जाने,
तनहाई में ये आँधियारे,
रातों में लगते कितने पहचाने/
      -------

बन के कजा आज ये बहार आई है,
लगता है, मेरी मौत का पैगाम लाई है/
हम तो खामोश ही रहे उल्फत में,
वो है कि राजे- इश्क जुबां पे लाई है/
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इश्क इक ऐसी बेनाम हस्ती है,
जो कभी मिटाई नहीं जा सकती/
औरत वो शराब है जो------
पीकर कभी भुलाई नहीं जा सकती/
        -----------

जिन्दगी ने कहा,
' हम तो लड़खड़ाए ही जाएँगे,'
बहके कदमों ने कहा,
' अब तो हम डगमगाए ही जाएँगे'/
हमने हँसते हुए कहा,
' तुझे सँभलना हो तो सँभल जा दिल,
वरना हम तो पिए- पिलाए ही जाएँगे'//
         -------------

कसूर उनका ही क्या है?
हम ही उन्हें उल्फत दे न सके/
मेरी तमन्ना ने उनसे क्या माँगा,
वही कुछ जो वो दे न सके//
          --------

कुछ मालूम नहीं मुझको,
नूर बरसता है कैसा रुख पे मेरे/
खोजते हैं कौन सा नगमा वो,
मेरी आँखों में, मुझे सामने बिठा के//

         ---------

अभी तो निरा बच्चा हूँ
           कुछ रोज जरा और ठहर जा/
बड़ा तो हो लेने दे मुझे,
          फिर देख महफिल का मजा//
      --------------

राजीव' रत्नेश'
खजूरी कालोनी, पांडे पुर, वाराणसी/
       1970
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रोमांचित कर गया था मुझको !!! ( कविता)


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रोमांचित कर गया था,
मुझको उन्माद नयन का,
जगा एक नया भाव गया था,
निरभ्र चाँद गगन का/

द्वगों में तुम्हारे लाल डोरे,
जले हों जैसे दीप साँझ सकारे,
प्रणय वेला में विरहणि,
खड़े पी की राह तके द्वारे/
नीलम की सी आभावाली,
मूक दृष्टि, अनोखी भाषावाली,
दे प्यार का नया संदेश गई थी,
जला कर दीप नव आशा वाली/

लगा इक आशा गया था,
झोंका इक मस्त पवन का,
रोमांचित कर गया था,
मुझको उन्माद नयन का/

फूलों पर रात में ओस का,
गिरना और दामन से लिपटना,
कलियों का इक बार शर्माना,
फिर प्यार की आभा से लाल होना/
नव पल्लवित लतिकाओं का,
बोझ से रह- रह कर झुकना,
चाँद की गोद में रह- रह कर,
चंद्रिका का मचलना/

सपना इक नया सज गया था,
सदियों से वीरान चमन का,
रोमांचित कर गया था,
मुझको उन्माद नयन का/

सँवरी थी नवल आशालतिका,
सपनों का महल झिलमिला गया था,
चटकी फिरी चमन- चमन गुलनार,
दे नया संसार, प्यार तुम्हारा गया था/
प्यार में लिपटी झरनों की चंचलता,
महक में पुष्पों की अंतर्हित मादकता,
व्याकुल मन बार- बार डोला,
न मिली किसी फूल में समरसता/

मुझको तन्मय बना गया था,
संचारित इक भाव लगन का,
रोमांचित कर गया था,
मुझको उन्माद नयन का/

स्वप्न- महल में मेरे,
रह- रह कर तुम्हारा थिरकना,
तुम्हारे आँचल में झिलमिल सौंदर्य,
नील अंबर पर जैसे सितारों का चमकना/
भुला न सका, चाह कर भी,
मधुर- मुस्कान वो छवि का,
नित्य मधुर संसार सजाता है,
जैसे प्रखर ताप रवि का/

बदन से निकल कर मधुराका,
भर हृदय में गई प्यार सनम का,
रोमांचित कर गया था,
मुझको उन्माद नयन का//
         """"""""

      अशआर
   """""""""""

न पिलाओ मस्त निगाहों से,
अपनी हया लो संभाल,
दुनिया कहीं दीवार न बने,
हो न जाए जी का जंजाल/
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ढलता है आँचल तो ढ़ल जाने दो,
बिखरती है जुल्फ तो बिखर जाने दो,
तुम क्यूँ महफिल उठाने पर उतारू हो,
मेरी इक रात, अपने साथ भी गुजर जाने दो//
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ये माना तुमने प्यार का इजहार किया,
आँखों ही आँखों में इकरार किया,
लो चले ही आए खिंच के महफिल में,
हमने तुम्हारी बात का, चलो एतबार किया/
    -------------

तुम्हारी तीरे-नजर दिल पे असर लाए जाती है,
मेरी मुहब्बत मगर कसर बताए जाती है,
किस तरह सुकूने- दिल होगा, तस्कीन होगी,
मेरी जिन्दगी हर डाल को बसर बनाए जाती है//

        राजीव" रत्नेश"
    "''''''"'"""""""""""""

पूछते हैं तुमसे!!! ( कविता)


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पूछते हैं तुमसे जो दिल
धड़कता है क्यूँ तुम्हारा बार- बार/
शरमा के पलकों की चिलमन
गिरा घायल क्यूँ कर देते बार- बार//

जफाई तो न देखी थी, तेरी कभी,
वह हमने देखी आज/
पी लेने से मदहोश जो हूँ,
तड़पती क्यूँ बिजली सी बार- बार//

गुनाह हजारों की तू है,
बंदानवाजों का और कत्ल न कर/
साबित हो अपराध तुम्हारा,
तुम पर कोई, खुदारा न हो//

चाहते नहीं कातिल करार देना तुम्हें,
भले कत्ल हुए बैठे हैं/
जल्वागर भी तुम्हें नहीं कहना है,
भले बेहोश हुए बैठे हैं//

मयखाने में तेरे फिसलनदार
गलीचों पे पायल की छमछम/
बिन पिए हो जाते हैं मदहोश,
दीवाने सुन कंगन की खनखन//

तीर नजरों का चलता है कैसे?
तेरी आँखों में भरे अफसाने/
हस्ती की इन राहों में अलगाव
अखरता है तेरा अपने को//

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   अशआर
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तुम तो न कहो जालिम,
मुझे शराब पीने के लिए/
नजरों का जाम पिया है,
ये क्या चीज है पीने के लिए//
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मेरी दोस्ती इतनी आसां नहीं यारों,
मैं पतझड़ हूँ, समझ लो ऐ बहारों/
न किसी के लिए तड़पता हूँ, न मरता हूँ,
खुद अपना सहारा हूँ, समझ लो ऐ सहारों//
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अजी इसको कहते हैं शायरी,
इसको कहते हैं दिमाग/
शायर की बात न पूछो,
काँटे को बना देते हैं गुलाब//
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मैं एक प्यार भरा नगमा गुनगुनाना चाहता हूँ,
तुम्हें ऐ जाने- तमन्ना, मैं अपनी बनाना चाहता हूँ/
तुम दिलरुबा हो, अहदे- वफा हो, मेरी चाहत हो,
तुम्हें चाहता हूँ, तुम्हें अपनी बनाना चाहता हूँ//
          --------------

भावनाओं के समंदर में,
इक तूफान सा आता है,
हर पड़ी रह- रह के मुझे,
सिर्फ तुम्हारा ख्याल आता है/
सोचता हूँ घर में बैठ कर,
तुम क्या करती होगी,
मेरे चलते वक्त याद वो,
तुम्हारा सलाम आता है//
          ---------

वाराणसी, यू० पी० कालेज 1970

तेरी शरबती आँखों का दीवार( कविता)


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तेरी शरबती इन आँखों का दीदार,
बना देती है प्यार को व्यापार,
नदी किनारे विजन दुकूल में,
मस्ती भरे पैगाम, प्यार के अहसास/

बादलों का समां दिलफरेब सा है,
मौसम कुछ- कुछ अजीब सा है,
तुम क्या जानो, बहारों का शिकवा है,
समझ लो मामला कुछ संगीन सा है/
उठा रहा हृदय में तमाम अहसास,
तेरी शरबती इन आँखों का दीदार/

बदलता रहता है मौसम ये,
उफनता रहता है जीवन ये,
हर साँस में प्रिये तरंगित है,
मेरा छोटा सा मधुबन ये/
दिल में अगन लगाती है बरसात,
तेरी शरबती इन आँखों का दीदार/

बरसती है दिल पे सावन की लहरियाँ,
कटती है तेरी याद में ये उमरिया,
मूक निमंत्रण देती है तेरी कजरिया,
रोक के मुझे बीच डगरिया/
मेरे लिए जगजाहिर, तुम्हारे लिए राज,
तेरी शरबती इन आँखों का दीदार/

कुछ- कुछ काँटा सा चुभता है कभी,
अश्क भी मेरा मोती बनता है कभी,
तेरी यादों के वीराने में करवटें बदलता हूँ,
फूल तेरी यादों के चुनता हूँ कभी/
आकर एक बार दिल में, दिला दो एतबार,
करा कर अपनी शरबती आँखों का दीदार//
              """"""""""
बरसात की पहली बौछार बन कर,
खुशी की पहली फुहार बन कर,
आओ न जीवन की फुलवारी में,
तुम खुशबू- ए- गुलाब बन कर//

           राजीव' ख्नेश'
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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!