Thursday, May 7, 2026

इंतजार ही जिंदगी था ( शेर)

मंजिल मिली न मिली,
इसका मलाल क्या करना/
कौंधती स्ट्रीट- लाइट में वो,
खिड़की का इंतजार ही जिन्दगी था//

साथ देते जो तुम रतन का ( गजल)

साथ देते जो तुम रतन का  ( गजल)
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कासिद को भेज, जो तुम बुलवाए न होते/
हम भी तुम्हारे पास खुद-ब-खुद आए न होते/

गुजरी हयात में चोट जो तुमसे खाई न होती,
बरबस तेरी याद से, मेरे फरिश्ते भी आए न होते/

गुलाब से भी चोट खा सकता है भला क्या कोई,
हम काँटों को अपना राजदां बनाए न होते/

प्यासे होठों ही लौटा था, मैं भी समंदर से यकीनन,
भर-भर के प्याले जाम के तुमने पिलाए न होते/

सुरूर में आए न होते, नशा नजरों में छाया न होता,
पूछते जो दर्दे- दिल की बाबत, हम छुपाए न होते/

प्यार में तुम्हारे दागे- दिल जो मसलहतन पाए न होते,
अपना समझा था तुम्हें, अपना ही बनाए होते/

सफर की धूल जो गई थी पैरहनो- लिबास पर,
लौट कर अंगूर के पानी से ही नहाए होते/

गजलों में मेरे फिर तिरा चाँद चमकने लगा है,
मेरे शेर पर सर झुकाने की अदा पे क्या न सुनाए होते/

दिलकश तेरी अदा, बाँकी चितवन, सरापा नूरे- बदन,
मेरे सुखन की शाहजादी कोई और नहीं, समझाए होते

कली बागों में रिवली, फिजां में खुशबू फैल रही,
तुम बुलाते, गुजरगाहों से कैसे गुजर के न आए होते/

अलग- अलग शक्ल, साहिल की रेत पर हवा बनाती,
उसमे एक अक्स मेरा था, वे अक्स काश! तुमने मिटाए न होते/

निशानियाँ प्यार की तुमको सौंपी थी हमने बाजतन,
काश! दरमियां हमने रिश्ते बनाए न होते/

गर तुमसे मिलना इतना आसां होता मेरे लिए,
जमीनों- आस्मानों के कुलाबे हमने मिलाए न होते/

कमन्द स्ट्रीटलाइट के स्टैंड पर फेंक कर,
तेरी खिड़की तक हम भी नआ पाए होते/

जानते हैं हकीकते- मुहब्बत, चार दिन का झमेला,
कैशो- लैला, शीरी- फरहाद साथ नजर आए न होते/

कश्तियाँ प्यार की रूख मोड़ देती हैं, राहे- पनघट की,
साथ देती जो तुम' रतन' का, हम संगम में नहाए होते/

                   राजीव रत्नेश
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Wednesday, May 6, 2026

कमाल तो तब है ( शेर)

 महफिल से उठ जाना तो रस्म- ए- दहर है ' रतन'
कमाल तो तब है, जाने के बाद भी गूंजता रहे सन्नाटा/

दोबोल बोल दे साकी ( कविता)

दो बोल बोल दे साकी  ( कविता)
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दिल आज बहुत उदास है मेरी साकी!
तेरी महफिल में आज आखिरी रात है साकी!
तेरी बज्म छोड़ कल मुझे जाना होगा,
आज तो लबों से दो प्यार के बोल बोल साकी!

अब जाने किधर होगी अपनी राह साकी!
न मंजिल का पता है, न कोई ठिकाना साकी!
आज आखिरी बार जामे- नजर पिला तो दे,
अपनी किस्मत में कोई कल का भरोसा नहीं/

किसी और मयखाने में वो लज्जत नहीं साकी!
जो चढ़ा सकूँ तेरी आगोश में सर रख के ही/
अब न वो पहलू मिलेगा, न फिर मरमरी बाहें,
आज तो लबों से प्यार के दो बोल बोल साकी!

तेरे मयखाने में रिन्द हैं बड़े- बड़े,
पर उनको भी मुफ्त यहाँ कभी मिलती नहीं/
मैं सिलसिलेवार पीता था, रखता था हिसाब नहीं,
दिल कहे तो लबों से प्यार के दो बोल बोल साकी!

गिरफ्तारे- मुहब्बत हूँ तेरा, महफिल भी तेरी,
हम सुखनवर तेरे, मजलिस भी तेरी/
नजर से ही पैमाना तक पी जाते हैं,
तुझे तो मालूम है हकीकत मेरी/

नजरें मेरी पाबन्द हैं, तेरे नजारे से भी,
आजा ढ़लती रात में ही, इशारे पे ही सही/
दिल अता किया था, जां भी कुर्बान कर देंगे,
दिल कहे तो लबों से प्यार के दो बोल बोल साकी!

मेरे जाने की खबर से तू क्यूँ उदास है साकी!
दिलबर और तुझे मिल जाएँगे, मैकदा न होगा खाली/
आज मेरे लबों की लाली, अपने लबों पे समेट ले,
कल और कौन होगा, जो करेगा तुझसे मुहब्बत साकी

देख अब तू और किनारा मुझ से न कर,
मैं ही निकालूँगा तुझे सुरूर के दरिया से/
अपना फसाना तुझी से तरन्नुम में सुनूँगा,
एक बार प्यार से दो बोल गुनगुना दे साकी!

जिधर तेरी जुल्फों की छाँव न होगी,
उधर ही अब मेरी राह होगी साकी!
चलना होगा काँटों भरी डगर पर,
मंजिल भी कोई मेरे पास न होगी/

जमाना तो मुद्दई- ए- मुहब्बत सदा रहा है,
यही सोच तुझसे अब जुदा हो रहा हूँ/
महफिल मेरे सिवा ही करना आबाद,
चलते-चलते प्यार के दो बोल बोल दे साकी!

             राजीव रत्नेश
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जो शैतान की नानी थी ( शेर)

जिसे बीमारी कहा, वही जीने का सहारा निकली/
वोजो शैतान की नानी थी, वही यादों का किनारा निकली//

यही तो बस कमजोरी है ( कविता)

यही तो बस कमजोरी है  ( कविता)
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ले दे के यही तो बस कमजोरी है/
औरत खुद ही बड़ी बीमारी है/
एक तो मेरे शेरो- सुखन की चोरी,
ऊपर से पूरी सीनाजोरी है/

कभी की थी डाकेजनी मेरे घर,
उसकी याद आजकल टीस दे जाती है/
और कुछ भले वो चाहे न चाहे,
पर यादों के अक्स चुरा अलग हो जाती है/

मेरी एक- एक गजल के लिए,
कितनों से कितनी मारामारी है/
दिल पर छाया यास का नक्शा,
याददाश्त भी मेरी मारी जाती है/

चमन के बूटे- बूटे गुनगुनाते उसकी गजल,
हर गुल में थिरकन है, उसकी याद सुहानी है/
कभी तो उसकी पाजेब रुनझुनाती है,
वो कुछ और नहीं, मेरी अनकही कहानी है/

मगरुरे- फन उसका देखा, हातिम की दादागीरी है,
बात-बात पर लुटाती मोहर, थैली होती न खाली है/
दिलफरेब मंजर उसी का समझते रहे,
अब पता लगा वो शैतान की नानी है/

बदन उसका गुलबदन की नौबत बाजे,
पलकों पे ख्वाब सुनहरे, आँख नशीली है/
गाजे-बाजे की धूम में, ये भी भूल गई,
कब की हो चुकी उसकी माँग सिन्दूरी है/

हम खुद उससे नाता तोड़ नहीं सकते,
यही तो अपने दिल की मजबूरी है/
हम लाख चाहें, भूल जाना दुनियादारी,
पर वह भी नंबर एक की हठीली है/

चुराना आँख का काजल चाहें,
सामने आने में भी कतराती है/
ले दे के यही तो बस कमजोरी है,
औरत खुद में एक बड़ी बीमारी है//

          राजीव रत्नेश
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मेरे मर्ज की दवा वही हैं ( शेर)

एक गीत गुनगुनाना चाहता हूँ/
ख्यालों में उन्हें बुलाना चाहता हूँ/
मेरे मर्ज की बस दवा वही हैं,
यही बात बस उन्हें समझाना चाहता हूँ/

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!