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सूरते-हाल तुम्हारी खस्ताहाल हुई,
तुम्हारे बाप की अकड़ की लाठी छूट गई/
ये क्या हाल तुम्हारा हो गया,
दामन तुम्हारा सिर्फ काँटों से मर गया/
हाले-दिल का ज्यादा ब्यौरा हम क्या देते,
न थी तुमसे लगावट, न थी दिल को आशनाई/
तरजीह जिन्दगी पर तुम्हीं को दिया,
खता हमसे हुई कि दिल तुम पर गया/
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कहना न होगा किस तरह दूसरे के हो गए वो,
जिसके लिए हम बेजार हो गए, बेकार बैठे हैं/
कितना बचाएँ दिल को, सख्त मरहले हैं,
उन्हीं को प्यार कर बैठा हूँ, जो अधमरे हैं//
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गफलत में तुम्हें ही पुकारा
किसी और को न आवाज देंगे/
खंजर दिल में उतार कर देखो
किसी से न हम फरियाद करेंगे/
हम देवदास को अपनी मुहब्बत
के फलसफे में किरदार करेंगे,
मंजूर हो तो आ जाना, सबके सामने
हम तुम्हारी माँग भरेंगे//
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राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
