Monday, July 6, 2026

तहरीर- ए- रतन ( सौगात (२१) से (३०)/

सौगात (२१)  ' तन्हाई का जश्न '
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जिसे दुनिया तन्हाई कहती है, वो मेरा सुकून है,
यहाँ मैं और मेरी तल्खियाँ, आमने-सामने होती हैं/

शोर-शराबे में तो अक्सर खुद को खो दिया हमने,
सन्नाटों में ही अक्सर, रुह से बातें होती हैं/

 ' रतन ' को ढूँढ़ना हो तो महफिलों में न जाना,
वो तो अपनी ही यादों की गलियों में, गुमशुदा रहता है/

सौगात (२२) ' नदी और किनारा '
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हम वो नदी हैं, जिसे समंदर की तलाश नहीं,
हमें तो बस अपने किनारों की मर्यादा प्यारी है/

बहना ही हमारी फितरत है, रुकना हमारी मौत,
पत्थर भी आ जाएँ राहों में, बहना हमारा जारी है/

चंदा के साथ नाम का जो साथ मिला है ' रतन '
उसी के सहारे हमने तूफानों से बाजी मारी है/

सौगात (२३) ' कलम की इबादत '
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लोग मंदिर जाते हैं, कोई मस्जिद में झुकता है,
मेरा सजदा मेरे कलम के पन्नों पे होता है/

जो दर्द जुबां तक नआ सका मुद्दतों से,
वो स्याही बन कर कागज पे धीरे से रोता है/

' तहरीर ' जो उतरती है रूह की गहराइयों से,
वही तो खुदा का नूर, मेरी आँखों में बोता है/

सौगात ( २४ ) ' अक्स और आइना '
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जमाना बदल गया, या मेरी नजर बदल गई,
अब आइने में अपना अक्स, बेगाना सा लगता है/.

कल तक जो सपने आँखों में घर किए बैठे थे,
आज उनका पता पूछना, पुराना सा लगता है/

पर एक याद है ' रतन ', जो कभी बूढ़ी नहीं होती,
उसका चेहरा आज भी, सुहाना सा लगता है/

सौगात ( २५ ) ' मुठ्ठीगंज का वो शजर ( वृक्ष ) '
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याद आता है मुठ्ठीगंज का वो पुराना शजर,
जिसकी छाँव में हमने, कई सपने बुने थे/

आज वो पेड़ तो शायद न रहा होगा वहाँ,
पर उसकी जड़ों में, हमारे बचपन दबे थे/

कंक्रीट के इन जंगलों में अब ' रतन ',
वो मिट्टी की खुश्बू, बस यादों में रह गई है/

सौगात (२६ ) ' अधूरी इबादत '
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कुछ पन्ने कोरे ही रह गए मेरी जिंदगी की किताब में,
शायद उनमें तुम्हारा जिक होना अभी बाकी था/.

हमने तो भर दी थी स्याही अपने लहू से ' रतन '
पर उस तहरीर का मुकम्मल होना अभी बाकी था/

अब ' नोयडा ' की इन रातों में बैठ कर सोचता हूँ,
कि उस अधूरी इबादत का दर्द, सहना अभी बाकी था/

सौगात ( २७ ) ' दुआओं का सफर '
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रास्ते कितने ही पथरीले क्यूँ न हों ' रतन '
जिसके साथ चंदा की दुआएँ हों, वो थकता नहीं/

समंदर की लहरें भी रास्ता दे देती हैं उसे,
जिसका यकीन अपने पतवार पे हो, वो डूबता नहीं/

हमने तो उम्र गुजारी है इसी भरोसे के सहारे,
कि नेकी का दामन थामने वाला कभी गिरता नहीं/

सौगात (२८ ) ' इलाहाबादी मिजाज '
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हमारे लहज में आज भी वही पुरानी चाशनी है,
जो कभी संगम की मिट्टी से चुराई भी हमने/

शहर बदले, हालात बदले, पर मिजाज न बदला,
वही सादगी, जो मुठ्ठीगंज में कमाई थी हमने,

लोग पूछते हैं इस मुस्कान का राज ' रतन '
उन्हें क्या पता, कितनी तकलीफें छिपाई थीं हमने/

सौगात (२९) ' मुखौटों का शहर '
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इस शहर में हर शख्स, चेहरा बदल कर मिलता है,
पहचानना मुश्किल है कौन अपना, कौन पराया है/

हकीकत की तलाश में निकले थे हम ' रतन '
पर यहाँ तो हर तरफ, झूठ का साया है/

हमने तो अपनी सादगी ही बचा के रख छोड़ी है,
यही वो सरमाया है, जो हमने कमाया है/

सौगात (३० ) ' धड़कन की गूँज '
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शब्दों के जाल में भावों को मत ढूँढ़ना,
ये तो मेरी धड़कनों की सीधी सी पुकार है/

जो दर्द कलम से कागज पे उतर आया ' रत्न '
वही तो इस तहरीर का असली आधार है/

तीस सौगातें तो बस एक शुरुआत है अभी,
आगे तो यादों का, पूरा एक संसार है/

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उसके सिवा किसी और का ( गजल )

उसके सिवा किसी और का
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जबभी चंदा का नाम मेरे नाम के साथ आता है/
होठों की प्यास जाग जाती है, माथे से पसीना चूता है/

उसके सिवा जिंदगी मेरी जिंदगी नहीं होती,
करी वो रूठ जाती तो कभी मैं रूठ जाता हूँ/

उसके बिना कभी मेरी कोई बंदगी पूरी नहीं होती,
उसके साथ के अहसास से ठिकाना याद रहता है/

उसकी दौड़ ' मियाँ की मस्जिद तक ' ही होती है,
मेरे सिवा अकेले नहीं जाएगी, जानता- समझता हूँ/

भूलना उसको मेरे लिए मौत से नहीं बेहतर,
इसी बात से वो मेरे, मैं उसके नाज उठाता हूँ/

वो एक हसीं गुल है मेरी बगिया की,
एक- एक फूल उस पर वार देता हूँ/

किस मुँह से कहूँ, कि वही मेरी छोटी सी दुनिया है,
सारा आलम है उसका, उसकी राहें मैं बुहार जाता हूँ /

अँधेरी रातों में सितारा है, वो मेरी दुल्हन, मेरा चाँद है,
मेरे पास ही वो होती है, भोर के तारे की तरह जब मैं बिखर जाता हूँ/

नाखुदा मेरी कश्ती का है, भले दूर किनारा है,
मेरे दिल का यकीं है वो, भरोसा उसका करता हूँ/

किस बात पे फूला-फूला रहता है ' रतन '
उसके सिवा किसी और का हो नहीं सकता हूँ/

            राजीव रत्नेश
        """""""""""""""""""""

" दुनिया के सारे ऐशो-आराम ठुकरा कर
फकीर ले गया,
रतन जबसे चंदा का हुआ, मुकद्दर का
अमीर हो गया "/

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ऐसा तमाशा सरेआम तो है ( गजल )

ऐसा तमाशा सरेआम तो है  ( गजल  )
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तू नहीं पास मेरे पर तेरा अहसास तो है/
लगी है दिल में आग, होठों पर प्यास तो है/

खुल के बताओ, दूर क्यूँ हो, ये माजरा क्या है,
तुझसे ही करता प्यार, मुझे तेरा ख्याल तो है/

जाने किस घड़ी में दूर जाने का इरादा तूने इरादा किया,
तड़पता दिल तेरे लिए आज भी फिलहाल तो है/

पतंग लूट के लाया हूँ, डोर तुमने हाथों में लपेट ली,
मेरा तेरे साथ पतंग उड़ाने का इरादा आज तो है/

तुम जो आ जाओ मेरे साथ, लूट लें महफिल भी,
पीता नहीं हूँ कभी पर न पीने का मलाल तो है/

जिन्दादिली छोड़ी है, जीने का करीना नहीं बदला,
मेरे जीने के लिए तू आज भी जिन्दा मिसाल तो है/

लुट गया नशेमन तो क्यों मनाएँ गम भला,
चमन मेरा पहले की तरह आज भी गुलजार तो है/

सीने में तेरे लिए धड़कनें आज भी जिन्दा हैं,
आजमा ले चाहे, हाथों में तेरे लिए गुलाब तो है/

साहिल से गई कश्ती लौट तट पे आएगी,
मुझे यकीं है, क्यूँकि तेरे हाथ में पतवार तो है/

क्यूँ उदास रहती है इन दिनों, कुछ इशारा तो कर,
यह दिलवालों की बस्ती है, सुब्ह न हो, शाम तो है/

अँधेरे, धूल और गर्द से अटा तेरे पास आया हूँ,
तू अंगूरी से मुँह धुलवाएगी, मुझे इमकान तो है/

आजा एक बार फिर से हम गले मिल जाएँ,
माना कुछ न बचा पास मेरे, दिल में अरमान तो है/

मिलकर हम तुम दुनिया नई बसायेंगे फिर से,
मेरी आँखों में तेरे लिए आँसुओं का सैलाब तो है/

जाते-जाते फिर पलट आया हूँ, तेरा इशारा पाकर,
जिसको जो कहना हो कहे, मेरे लबों पे तेरा नाम तो है/

तू बुलाए और मैंन आऊँ, ऐसा हो कैसे सकता है,
लहू ही पुकारेगा लहू को, जिस्म में जान तो है/

जान से भी जाएगा ' रतन ', तू जो न पलट आई,
तमाशाई खुद तमाशा बने, ऐसा तमाशा सरेआम तो है/

                राजीव रत्नेश
          """"""""""""""""""""""""""""

" जमाने की गर्द से अटा हुआ जब रतन
वापस आता है,
चंदा के हाथों की अंगूरी में ही वो मुकम्मल
सुकून पाता है "/

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जाने से पहले उसको ( गजल )+++++++±+++++++++++



न निशान छोड़ जाऊँगा, न झंडा गाड़ के जाऊँगा /
अपने साथ अपनी सारी कायनात उठा के जाऊँगा /

रंजो- गम के सिवा और मुझे दिया क्या है जमाने ने,
अपने साथ उसको भी उसकी औकात दिखा के जाऊँगा /

कोई बाशिन्दा तेरे शहर का भले न पूछे मुझको,
उजड़ा हुआ शहर छोड़ जाऊँगा तेरा परिस्तान उठा ले
जाऊँगा /

नीम हकीम खतरे जान, इलाज किसका करवाऊँ,
तेरे वैद्य बाप के हुनर को आजमा के जाऊँगा /

माना कि मजबूरे- मुहब्बत था तेरा, तूने भी तो साथ न
दिया,
क्या करता और, नफरतों की बिछा के बिसात जाऊँगा /

दुश्मन न था कोई मेरा, तुमने दुश्मन कई बना दिए,
किस पर करूँ यकीं, हर किसी को बता तेरी जात जाऊँगा /

तेरी गली का रास्ता तेरे बाप की तर्जे- बयानी पे छोड़ा,
जाने से पहले उसको मरने-मारने का सिखा अंदाज जाऊँगा /

हाले- दिल सुना न जाए तो हाथों को कान पे रखना,
तेरी हर सौगात दिल से मिटा हर निशान जाऊँगा /

तेरे बाप से तो भला कबूतर तेरा, तेरे खत तो ले आता है,
जंगे- मुहब्बत हारा हूँ पर उसे प्यार- दुलार जाऊँगा /

कहाँ तक, कैसे मुझे आखिर तुम भुला पाओगी,
तेरा रहगुजर छोड़ जाऊँगा, अपना नक्शे-कदम मिटा
जाऊँगा /

मगरुरियत और मसरूफियत तुझे बार- बार मुबारक,
मेरे गिरेबां के गिर्द कसती तेरी बाहें, झटके से हटा जाऊँगा /

क्या कर लेगा जमाना, आज तक जो कुछ कर न सका,
मौत के भी सर्द हाथों से बचता- बचाता जाऊँगा /

काबलियत तेरी है, अंदाज तेरा वही पहले वाला है,
कुंडली मार के बैठ, टोकरी समेत तुझे पहचाऊँगा /

बारिशों के मौसिम में भी न याद करूँगा कभी तुझे,
ये मेरा अहद है, वादाशिकन तुझे मैं कैसे भुला पाऊँगा

जाने किस बेवफा से दिल लगा बैठा था ' रतन '
जाने से पहले उसको मयकदे का बता के रास्ता जाऊँगा //

               राजीव रत्नेश
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" बाप से बेहतर तो महबूब का कबूतर निकला,
रतन जंगे- इश्क हार कर भी, मुकद्दर का सिकंदर निकला"/

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Sunday, July 5, 2026

तुरबत पे अपने तेरा रतजगा चाहता हूँ ( गजल )

तुरबत पे अपने तेरा रतजगा चाहता हूँ  ( गजल )
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बेवफाओं की इस दुनिया में वफा ढूँढ़ता हूँ/
बड़ा नादां हूँ, नासमझ हूँ, ये मैं क्या ढूंढ़ता हूँ/

भरम अपनी झूठी मुहब्बत का भी रहने न दिया,
तुम्हीं ने दिया जख्म, तुम्हीं से गहरा कहता हूँ/

दिल की दबी राख न कुरेदो, चिंगारी शोला बनेगी,
मेरी शराफत से न उल्झो, तुम्हारी हया ढूँढ़ता हूँ/

क्या तुम्हें मेरी मुहब्बत पे एतबार भी नहीं था,
गैर के भी हो गए, तो भी तेरी अदा समझता हूँ/

निशानियाँ मेरी सारी समेट अपने साथ ले गई,
किस सन्नाटे में गुम हो गई, हर तरफ बियाबां देखता हूँ/

बीच मँझधार हो गए दूसरी कश्ती पर सवार,
कहना बहुत था, जब तेरा दिल दरिया देखता हूँ/

नाकर्दां मेरे गुनाहों की, इसी जनम दी है सजा,
पहले भी यकीं न था, बस तेरी जफा देखता हूँ/

कहाँ वो वायदे, जाती बहार में तुमने किए थे?
साहिल पे से तेरी जाती कश्ती का किनारा देखता हूँ/

मुसलसल गिरती धार से पत्थर पे निशान हो जाते हैं,
इतना गया गुजरा तेरा दिल, निशान से सफा देखता हूँ/

गुजारिश न की कभी, कि तुम अपनाओ मुझे,
मैं सिर्फ तेरे घर तक का बढ़ा किराया देखता हूँ/

अजब दस्तूर देखा तेरे महफिले- दर- ओ-दीवार का,
बिना पुताई तेरी विदाई, ये क्या माजरा देखता हूँ/

खुदगर्ज इतनी पहले न थी कभी मेरी समझ से,
जाते-जाते भी मुझे सदा दे दी, मर्तबा समझता हूँ/

कोई बड़ा तीर न मारा, गम अपनी जुदाई का देकर,
क्या दिल है, क्या कलेजा है, तेरा हौसला देखता हूँ/

दिले- मुज्तर को इतना भी हक न था क्या तुझ पर?
तुझसे मिलने की सोचता हूँ, तो कायदा देखता हूँ/

तेरी मख्मूर- निगाही का सबब आखिर क्या समझूँ,
मैं तो हर बात में बस तेरा ही फायदा देखता हूँ/

मिल कर क्या करोगी, तेरी तरफ से आँखें मूँद लीं,
आगे बढ़-बढ़ पीछे हटे, तेरी रजा समझता हूँ/

जनाजे में मेरे चलो नआए, जायज था ' रतन '
अब तुरबत पे अपने तेरा रतजगा चाहता हूँ//

               राजीव रत्नेश
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" जिसके लिए मँझधार में कश्ती छोड़ दी रतनने,
  आज उसी से तुरबत पे आने की इल्तजा करता है/"

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Friday, July 3, 2026

तहरीर- ए- रतन -- सौ सौगातें (११ से२० सौगातें )

सौगात (११) ' वफा की विरासत '
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लिखा था जो कागज पे, वो आँसुओं ने धो दिया,
पर जो दिल पे लिखा है, उसे कौन मिटा पाएगा/

इलाहाबाद की गलियों में जो गूंजी थी सदा,
वो नोयडा के सन्नाटे में भी रंग लाएगा/

मुसाफ़िर तो बदल जाते हैं, हर मोड़ पर ' रतन ',
पर वफा का ये कारवाँ, मंजिल तक जाएगा//

सौगात (१२ ) ' बेनाम रिश्ते '
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कुछ रिश्ते बेनाम ही अच्छे लगते हैं,
उन्हें दुनिया की नजर से बचाए रखना/

हर हकीकत को जुबां पे लाना लाजमी नहीं,
कुछ खामोशियों को सीने में दबाए रखना/

जमाना तो ढूँढ़ ही लेगा नुक्स हर बात में,
तुम तो बस अपनी सादगी को बनाए रखना/

सौगात (१३ ) ' आइने की अदालत '
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आइने से आँखें मिलाने से डरते हैं वो,
जिनके किरदार पर जमाने की धूल जमी है/

हमने तो खुद को साफ रखा है हर दाग से,
फिर भी नजाने क्यूँ दुनिया की नजर हमीं पे थमी है/

सच बोलने की कीमत चुकानी पड़ती है ' रतन ',
यहाँ झूठ के बाजारों में बड़ी ही गर्मी है/

सौगात (१४ )  ' सफर और हमसफर '
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मंजिल मिले न मिले, ये तो मुक्कदर की बात है,
पर हम सफर ही न करें, ये तो गलत बात है/

काँटें तो मिलेंगे ही रहे- इश्क में हर कहीं ' रतन ',
पर फूलों की उम्मीद छोड़ दें, ये तो शिकस्त की बात है/

थामे रखना उम्मीद का वो पतवार हर हाल में,
लहरों से हार मान लेना, बुजदिली की बात है/

सौगात (१५ )  ' तहरीरे- वफा '
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मेरी कलम से जो निकला, वो सिर्फ शब्द नहीं,
मेरे बीते हुए लम्हात की पूरी दास्तान है/

जिसने भी पढ़ा इसे दिल से, वो जान जाएगा,
कि जमीन पे रह के भी मेरा घर आसमान है/

' रतन ' को ढूंढ़ना हो तो इन पन्नों में ढूंढ़ना,
यहाँ मेरी रूह का हर एक निशान है/
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सौगात (१६) ' वक्त की इबारत '
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वक्त लिखता है हर चेहरे पर अपनी इबारत,
कोई पढ़ लेता है, कोई अनपढ़ ही रह जाता है/

जो कल तक थे साथ, आज अजनबी से हैं,
ये वक्त का फेर है, जो सबको आजमाता है/

पर जो दिल के पन्नों पे लिखे हैं नाम ' रतन '
उन्हें मिटाने का दम, वक्त भी कहाँ पाता है/

सौगात (१७ ) ' दुआओं का साया '
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जब भी गिरा हूँ, किसी अद्दृश्य हाथ ने थामा है,
ये शायद तेरी उन दुआओं का ही असर है/.

भटके थे जब हम अँधरी रातों के सन्नाटे में,
उन्हीं की लौ से रौशन हुआ मेरा हर सफर है/

दुनिया लाख गिराना चाहे तो क्या हुआ ' रतन ',
जिसके सर पे दुआओं का साया, उसे किसका डर है//

सौगात (१८ ) ' खामोश लब ' ( मुठ्ठीगंज का एक कोना )
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बहुत कुछ कहना था, पर लब खामोश ही रहे,
आँखों ने ही सारा हाले- दिल सुना दिया/

संगम के किनारे जो किए थे वादे हमने,
आज उन्हीं यादों ने हमें फिर से रुला दिया/

लोग कहते हैं कि यादें धुंधली पड़ जाती हैं,
पर तुम्हारी तस्वीर ने तो हर ज़ख़्म हरा कर दिया//

सौगात (१९ ) ' किरदार की खुशबू '
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फूलों की खुश्बू तो हवा के साथ उड़ जाती है,
पर इंसान के किरदार की महक सदा रहती है/

दौलत और शोहरत तो हाथ की मैल है ' रतन ',
पर जो रूह से अमीर हो, उसकी हस्ती सदा रहती है/

हमने तो कमाया है बस अपनों का प्यार यहाँ,
ये वो जमा- पूँजी है, जो हर घड़ी साथ रहती है//

सौगात ( २० )  ' अधूरा सफर '
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अभी तो आधा सफर भी तय नहीं हुआ है,
और लोग कहने लगे कि मंजिल आ गई/

हम तो मुसाफिर हैं उस राह के ' रतन '
जहाँ मंजिल से ज्यादा, राह की महक भा गई/

' तहरीर- ए- रतन ' के सौ पन्ने अभी बाकी हैं,
अभी तो बस कलम ने कागज से आँख मिला ली है//

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Thursday, July 2, 2026

तहरीर- ए- रतन : सौ सौगातें ( पूजा के पतवार से ) .(१ से १०) सौगातें

सौगात (१)
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मेरी कश्ती है जर्जर, लहरों का है शोर,
दिखता नहीं दूर तक, कोई साहिल या छोर/
थाम के बैठे हैं हम ' पूजा ' का ये पतवार,
ले जाएगा हमें जो, उस पार की ओर/
जमाने की लहरें गिराना चाहें हमें,
पर श्रद्धा की डोर है, बड़ी ही जोर/

सौगात (२ ) ' साहिल का इंतजार--- अटूट यकीन '
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तुझे तो साहिल पे इंतजार रहता है मेरा,
तूफान में फँसी कश्ती देख तू क्यूँ घबराता है/
' पूजा के पतवार ' से थामी है जो ये लहर,
वही तो मुसाफ़िर को मंजिल तक पहुंचाता है/
किनारे पर खड़े होकर तमाशा देखने वालों,
समंदर की गहराई का अंदाजा किसे हो पाता है//

सौगात (३ ) ' गजल की बेईमानी--( इश्क का वास्ता ) '
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गजल हो जाती बेइमां जैसे,
तेरा मुझसे रूठना काम कर गया/
बादी- ए- इश्क में हम भी तो थे ' रतन ',
जाने क्यूँ जमाना हमें बदनाम कर गया/
हम तो चले थे साहिल की तलाश में,
तेरा भटकाव ही हमें मंजिल के पार कर गया//

सौगात (४ ) : दिल की तख्ती  --( अमिट छाप )
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लिखा है नाम तेरा, दिल की इस तख्ती पर,
जैसे कोई इबादत, लिखी हो पत्थर पर/
दुनिया मिटाना चाहे, तो क्या हुआ ' रतन ',
निशान गहरे हैं, जो उतरे हैं रुह पर/
वक्त की गर्द इसे धुंधला न कर पाएगी,
ये वो तहरीर है, जो गूंजेगी हर दर पर//

सौगात (५ ) ' इबादत का सफर ' ( सच्ची पहचान )
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मेरी इबादत में कोई खोट न था ' रतन ',
पर तेरे दर तक पहुँचने में जमाना बीत गया/
हमने तो हर पत्थर को खुदा मान लिया था,
पर असली मूरत को पहचानने में जमाना बीत गया/
अब जो तुम मिले हो, तो लगता है ऐसा,
खुद को ढूंढ़ने के बहाने, तुम्हे पाने में जमाना बीत गया//

सौगात (६ ) ' खामोश गवाही '  ( इंतजार का आलम )
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ये दर- ओ-दीवार गवाह हैं मेरी तन्हाई के,
कितनी रातें यहाँ बैठ कर गुजारी हैं हमने/
तुम तो आए नहीं, पर तुम्हारी आहटों के इंतजार में,
अपनी ही धड़कनें कई बार पुकारी हैं हमने/
कहने को तो बहुत कुछ था, इस दिल में दबा,
पर तेरी खामोशी की इज्जत ही संभाली हमने//

सौगात (७ ) ' वक्त का पहिया ( मुठ्ठीगंज की यादें ) '
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वक्त का पहिया घूमता है अपनी ही लय में,
कभी हम ऊपर थे, कभी जमाना नीचे है/
इश्क की बाजी में, हमने जो दाँव लगाया था,
उसका हिसाब आज भी अधूरा और पीछे है/
तुमने तो भुला दिया, मुठ्ठीगंज का वो मंजर,
पर मेरी यादों की बस्ती आज भी वहीं पीछे है//

सौगात (८ ) ' उम्मीद का दीया ' ( धैर्य की लौ )
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तूफान कितना ही गहरा हो, डरना कैसे,
जब हाथ में तेरी वफा का दीया है/
अँधेरे रास्तों पे भटके हैं कई राही यहाँ,
पर हमारे नसीब में तेरी यादों का दिया है/
अब बुझने न देंगे इस लौ को ' रतन ',
कि हमने इसे अपने ही लहू से संवारा है//

सौगात (९ ) ' दिल की जमीन ' ( प्रेम का वसंत )
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बड़ी बंजर थी ये दिल की जमीन पहले,
तेरे आने से यहाँ चाहत के फूल खिले हैं/
मुद्दतों बाद नसीब हुई है ये हरियाली,
जाने कितने मौसमों के बाद हम मिले हैं/
तेरी मुस्कराहट की एक किरन ही काफी थी,
मेरे गमों के बादल जैसे कहीं गुम हो गए हैं//

सौगात (१० )' आखिरी फैसला '  ( खुद्दारी का पैगाम )
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फैसला जो भी हो, हमें मंजूर होगा,
बस एक बार अपनी नजरों से कह तो दिया होता/
हम तो खुद ही अपनी महफिल उठा लेते,
तूने बेगाना समझने की जहमत तो न की होती/
चले जाएँगे तुम्हारी महफिल से चुपचाप ' रतन ',
बस एक आखिरी पैगाम तो सुन लिया होता //

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!