Thursday, January 1, 2026

पहली कविता आज आपको प्रेषित कर चुका हूं/दूसरी यहाँ प्रस्तुत है:पहन के आई हो तुम बाघम्बरी,और बिखेर रही हो मधुर मुस्कान,एक मीठी चितवन से ही----हर रही हो मेरे मन प्रान/रह रह के होठों से अंगुली लगाती भी हो,अदाओं से मेरा मन भरमाती भी हो,होकर मेरी मुस्कान से तन्मय,भरी महफिल में जल्वे लुटाती भी हो/झूठ मूठ का दिखलाती हो शान,बातों में काट रही हो मेरे कान/क्या हुआ जो बिजली चली गई,जला दी बोर्ड पर तुमने अपनी टार्च,जरूरत ही क्या थी, रूप की रोशनी,थी तुम्हारी काफी करने को प्रकाश/बेकार दिखाया नक्शा तुमने मेरी जान!बिजली आने पर समझ लेतीं सवाल/जाम छलकाती, बिजली गिराती हो,मेरी निगाहों पर हर खुशी लुटाती हो,ख्वाबों के अँधियारों में आकर,मेरी वीरान तनहाई को बेखुदी बनाती हो/बनती हो झूठ मूठ का जंजाल,एक मीठी चितवन से ही,हर रही हो मेरे मन प्रान/जंगल जंगल, बस्ती बस्ती,मैं फिरता हूँ तेरी सदा के सहारे,वंशी बजती है तनहाई में,वहीं कहीं गंगा के कूल किनारेमिटा दो सारे व्यर्थ बवाल,छोड़ो नक्शा छोड़ो मेरी जान!करती हो मेरा मन मोह लेने को,नित नवीन प्रयास,कभी जुल्फों को लहरा कर,कभी पलकों को बिछा कर,कभी दिखलाती हो यौवन की,इठलाती बलखाती मत्त उफान,एक मीठी चितवन से ही,हर रही हो मेरे मन प्रान// राजीव ख्नेश

Tuesday, December 23, 2025

जिन्हें हम भूलना चाहें( संस्मरण) किश्त(१०)

जिन्हें हम भूलना चाहें( संस्मरण)
     किश्त(१०)
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मैं सन्ध्या से मिल कर चला तो आया था पर दिल में
एक खाली पन, एक अधूरापन मुझ पर तारी हो चुका
था/ मैंने संध्या को अपनी बात बता ही नहीं दिया था,
बल्कि एक तरह से प्रोपोज ही कर दिया था/ यन्दि प्रभात जानता तो सीधे मुझसे और संध्या से दुश्मनी
पर उतर आता, क्यूँकि वह जान्हवी को खुश देखना
चाहता था और उसके लिए हर हद तक गिर सकता था/
        उसके पापा की अकड़ लगभग समाप्त हो चुकी
थी और वो अब मुझे पहले से कहीं ज्यादा बुजुर्ग लगते थे/ मैंने उनसे कभी कुछ न कहा था और न ही
अपनी माँग उन तक स्वयं पहुंचाई थी/ अपनी बात
मनवाने का जान्हवी का तरीका भी मुझे पसंद नहीं था/
         प्रभात सोचता था शायद कि संध्या की लगी-
लगाई तयशुदा शादी है, उसके पापा भी दिलो- जान
से उसी को संरक्षण देते हैं पर वह समझ रहा था कि
जान्हवी के भविष्य को लेकर वो जरा भी चिन्तित नहीं
थे अथवा उसे उन्होंने भाग्य के भरोसे ही छोड़ दिया
था या अपनी बात प्रभात के जरिये मुझ तक पहुंचवा
रहे थे/
   कितना बचायें दिल को, सख्त मरहले हैं,
   हम उन्हीं को प्यार कर बैठें है, जो अधमरे हैं//
         जान्हवी की माता जी अस्वस्थ चल रही थीं और मेरे साथ एक बार वो तांत्रिक सरकार के यहाँ भी
गईं थीं/ उनके हाथ पैरों के नाखून तीव्रता से पीले पड़े
जा रहे थे/ रिक्शे पर उन्होंने मुझसे कहा," राजीव मैं
इसलिए परेशान हूँ कि जान्हवी अपने घर नहीं जा रही
है/ वो अपने घर चली जाए तो मैं ठीक हो जाऊँगी/ इससे अच्छा था कि उसकी शादी आपसे हो जाती"
तो मैंने बताया कि भला यह कैसे संभव ले पाता, जबकि मेरी आय उस समय मात्र 120 रू० थी/
वह कहने लगी, अब तो तुम्हारी तनख्वाह ज्यादा है,
सरकारी नौकरी में भी हो/ जान्हवी को तुमसे ज्यादा
खुश कोई और नहीं रख सकता है/ मैंने कहा," जिससे आप लोगों न उसकी शादी की है, वह भी तो
अच्छा कमाता है पर जान्हवी क्या उसके साथ खुश
रह सकी? और तो और उस पर तलाक के लिए मुकदमा भी तो आप लोगों ने करवा दिया है"/ उन्होंने
फिर कहा," मैं मरना नहीं चाहती पर मुझे डाक्टरों ने गंभीर बीमारी के बारे में सूचित किया है/" मैं चुप
हो लिया, यह कहने की सामर्थ्य मुझ में नहीं थी कि
जान्हवी की जिन्दगी तो उन लोगों ने मिल कर ही
बर्बाद की है/
" ये हाल तुम्हारा क्या हो गया, जरा सोचो,
दामन तुम्हारा बा काँटों से ही भर गया/
तरजीह जिन्दगी के फलसफे में तुम्ही को दिया,
खता हमसे हुई कि दिल बस तुम्हीं पर आ गया//
               एक बात तो तय थी कि रिक्की का बाप
मेरे सिवाय कोई भी हो, माँ तो उसकी जान्हवी ही थी/
इस नाते भी मैं उससे ज्यादा दूरी नहीं रख पा रहा था/
प्रभात उससे मुझको पापा कहने को कहता रहता था
और जान्हवी भी यही चाहती थी शायद, जो उसने
कभी रिक्की को मुझे पापा कहने पर टोका नहीं/
             प्रभात अब मेरी शादी को लेकर बहुत तत्पर
हो रहा था और मुझ पर निरंतर दबाव बना रहा था/ पर मैं चुप था क्यूँकि कहानी के अंत तक मैं संध्या का
इंतजार करना चाहता था पर वह उसकी शादी की चर्चा न करके वह मुझे शादी करने के लिए उकसा
रहा था/ नौकरी में परमानेन्ट हुए मुझे लगभग पाँच
साल हो रहे थे पर मैं अभी भी घर वालों को शादी
की बात से इंकार कर दे रहा था/ शायद उनको डर
था कि मैं कहीं जान्हवी के चक्कर में फिर न पड़ जाऊँ/
             प्रभात जानता था कि मैं गवर्नमेंट सर्विस में
एक ही शादी कर स सकता था और मेरी दो बीबियों को समाज भी कभी मान्यता नहीं दे सकता था/ जब
वह जान्हवी की शादी मुझसे करवाने के अपने इरादे
में बिल्कुल निराश हो गया तो उसने दूसरा रास्ता पकड़ा", उसने मुझे इस बात पर राजी करना चाहा कि मैं शादी कर लूँ और जान्हवी मेरी रखैल( kept)
हो कर रहे" पर मुझे अब उसकी किसी बात का भरोसा या विश्वास नहीं था फिर भी मैंने उससे पूछा
कि क्या उसने इस बारे में जान्हवी से कोई मंत्रणा की
है तो वह चुप हो लिया पर मेरे लिए कोई ऐसा रिश्ता
मुझे नहीं सुझाया, जिसके साथ मैं शादी के बंधन में
बँधकर भी एक' रखैल' को अपनी जिन्दगी में आबाद
कर सकूँ/ यदि ऐसा किसी तरह संभव भी हो पाता तो उसने रिक्की के बारे में क्या सोचा था, जिसके दो बाप
होते हुए दो दो माँए भी होती/
                 मुझे उसकी बात का गड़बड झाला समझ
नहीं आया तो मैंने जान्हवी से हकीकत जाननी चाही/
और इस बात के लिए जान्हवी से मुलाकात करने का
मन बनाने लगा---
सूरते दिल तुम्हारी खस्ता हाल हुई
तुम्हारे बाप की अकड़ की लाठी घूट गई/
हाले दिल का ब्यौरा हम भला क्या देते,
तुमसे थी लगावट, तुमसे ही थी आशनाई//

               मैं पहले भी कह चुका हूूँ कि मैं संधया को
अंत तक मौका देना चाहता था और इस बात के लिए
कटिबद्ध था कि शादी करूंगा भी तो संध्या की शादी के बाद ही/ ऐसा अवसर प्राप्त करने में , अपने को मैं तैय्यार नहीं कर पा रहा था कि जान्हवी या संध्या से खुल कर बात कर पाता क्यूँकि मैं संध्या को अब अपने से जुदा करने की बात नहीं सोच पा रहा था----

" हम देवदास को अपने मुहब्बत के फलसफे में
                                      किरदार करेंगे,
मंजूर हो तो आ जाना, सबके सामने हम तुम्हारी
                                       मांग भरेंगे//"

                मेरे पर हर तरफ से अब प्रेशर बनाया जाने लगा था/ मैं अभी शादी कर के अपनी स्वतंत्रता
का हनन होते नहीं देख सकता था/ मेरे जीजा जी
और घर वालों ने कई लड़कियाँ देख रखी थीं/ उन लोगों की निगाहें एक जगह जा के टिकीं तो मुझे
आगाह किया गया कि ऐसी लड़की फिर नहीं मिलेगी/
वो डी० आर० एम० आफिस में मुलाजिम है/ मेरे जीजा जीने तो यहाँ तक कहा कि वो तबला बजाने में
माहिर है और मेरे पिताजी भी नित्य शाम को तबल पर रियाज किया करते थे, घर का माहौल अच्छा रहेगा/ पर मैं नौकरी वाली लड़की से शादी करने की
कोई वजह नहीं समझ पा रहा था तो मेरे जीजा जी
ने मुझे समझाया," दोनों यदि नौकरी में रहोगे तो
तंगहाली से दूर रहोगे और कभी आर्थिक परेशानी नहीं होगी/"
                बहरहाल, फिलहाल के लिए मैंने शादी के
लिए इंकार कर दिया घर वालों ने यहाँ तक कहा," एक बार मिल लोगे और देख लोगे तो ऐसा नहीं कहोगे, ऐसी लड़की फिर नहीं मिलेगी/"
                पर मैं उन लोगों के साथ उक्त लड़की से मिलने या देखने की इच्छा का त्याग कर दिया/ मेरी
माता जी और बहनें यही सोच रही थीं कि मैंने जान्हवी के लिए इंकार कर दिया है/ उन लोगों ने साफ
कर दिया,' जान्हवी को तुम इस घर में ले आ न सकोगे, अपनी जिद छोड़ दो' में उन्हें कैसे समझाता
कि वस्तुतः मैं सन्ध्या के फैसले का इंतजार कर रहा हूँ/" वस्लेयार पर ये फिराक ज्यादा भारी था"/
                उधर संध्या के पापा उससे शादी के लिए,
दिनेश के बहनों की शादी की प्रतीक्षा करने को कह
रहे थे/ इस उलझी डोर का सिरा खोजना भी मेरी
मजबूरी में ही शामिल था शायद/ संध्या की मनःस्थिति क्या थी, मैं समझ नहीं पा रहा था----
" कहकशां का तीव्र बहाव है वो,
बागों की नकहते- गुलाब है वो/
दिल की बात भी नहीं समझती,
कितनी भोली औ' नादान है वो/"
                 एक दिन प्रभात ने मुझे बताया कि उसकी माता जी' मेडिकल कालेज' के प्राइवेट वार्ड में
भर्ती हैं/ मैं उनसे मिलने गया तो वहाँ प्रभात ने मुझे
बताया कि उनकी किडनी में प्राब्लम है और डायलिसिस के बारे में बात चल रही है/ डायलिसिस
की सुविधा उस समय इलाहाबाद में नहीं थी शायद/
प्रभात के पाप अब ढ़ीले पड़ गए थे और सबसे उनकी
बीमारी के बारे में बता रहे थे/ मुझसे भी बात करने की कोशिश की पर मैं उनकी बातों में इन्टरेस्ट न लेकर फालतू ही हाँ ना में जवाब देता रहा/ हफते भर
करीब वे बेड पर रहीं और यही कहती रहीं,' मैं अभी
मरना नहीं चाहती'/
                पर उनके लड़की दामाद भी उन्हें झूठी
तसल्ली देते रहे/ कोई उन्हें बचा नहीं पाया/ और
उन्होंने हम सब की तरफ से आँखें फेर लीं/
                अस्पताल में ही मेरी जान्हवी और संध्या से मुलाकात हुई पर अवसर उपयुक्त न जान कर मैंने
उनसे कोई बात न की/
                   मैं चाहता था कि संध्या का धीर-गंभीर
व्यक्तित्व अब उभर कर सामने आए, जो जान्हवी के
आकर्षण के शोर में कहीं दब सा गया था/ एक बार तो वह अपने पापा से मेरी बात करे या कराए पर उसके पापा से मेरा कहना हाथी के सामने दंड पेलने
के समान ही था/ उसके पापा के रवाने और दिखाने के दाँत अलग- अलग थे/
                   एक बार जान्हवी और संध्या से मिलने
की उत्कंठा लिए हुए उनके घर कीडगंज जाने की सोच ही रहा था कि अचानक पीछे से प्रभात ने रास्ते
में ही पुकारा और कहा,' मैं कीडगंज ही जा रहा हूँ,
तुमको भी चलना हो तो चलो, जान्हवी से भी मिल
लेना/' पर मैं समझ पा रहा था तो यही कि उसके
सामने कोई बात करने का कोई फायदा नहीं होगा
और कोई स्थिति बनेगी भी तो वही' ढ़ाक के तीन पात'/

" मैंने तेरी इबादत में जिन्दगी अपनी गुजार दी,
न खुदा ही मिला, न विसाले- सनम ही हुआ/
हजरते- वाइज को देखा हमने जब मयखाने में,
मैंने भी हसीनों की आँखों से दो पैग पी लिया/
जन्नत के बारे में सुना था रिन्द ने बहुत कुछ,
अनजाने में ही जन्नत का मजा जी लिया/
तेरी आँखों में ही नजर आए जन्नत भी, दोजख भी,
मैंने साकी से प्याले में दोजख डालने को ही कहा/"

               मैंने प्रभात से कहा,' अभी आज नहीं फिर
कभी आऊँगा/' पर मुझे दोनों बहनों से मिलने की
शीघ्रता थी इसलिए दूसरे ही दिन मैं कीडगंज जा पहुंचा/ मैंने विकास से जान्हवी के बारे में पूछा/ वह
जाकर उसे बुला लाया/ आते ही उसने चाय के बारे
में पूछा/ मैंने मना किया और उससे बैठने को कहा/
वह बैठी और कहा,' लगता है, आजकल आप किसी
गफलत के शिकार हो गए हैं/ मैंने कहा," तुमने सही
पहचाना,' मैं कुछ पूछने, जानने तुम्हारे पास आया हूँ,
पहले तो तुम मुझे यह बताओ कि रिक्की का असली
बाप कौन है?  

        वह बोली ," रविन्द्र ही उसका असली बाप है/ मेरी
गलत आदमी से हड़बड़ी में मेरी शादी कर दी गई कि
आज मैं लांछन का शिकार हो रही हूँ" मैं बोला," पर
उसने तो सब लोगों से कहा है कि वह संतान पैदा करने में असमर्थ है/" वह बोली," वह झूठ बोलता है/
मुझे छोड़ने का बहाना है/ इसीलिए मुझे बदनाम करने
के लिए ही वह तुम्हारा नाम ले रहा है" मैंने फिर कहा,
" मेरे और अपने बीच की सारी बातें तुमने उसे बताई हैं/ वह मेरे बारे में गफलत जदा है और तुम्हारे साथ
ही साथ मुझे भी बदनाम करने पर आमादा है/ तुम्हारी
माता जी जब तक रहीं, तुमको लेकर ही परिशान रहीं/
अब तो उनकी आत्मा की शांति के लिए अपने घर
लौट जाओ/" उसने जवाब दिया," वहाँ अब मैं नहीं
जाऊँगी/ मुझे वह मारता है और उसकी माँ मुझे तरह-
तरह के ताने देती है/" मैंने पूछा," फिर तुम्हारा भविष्य क्या है? उसने कहा," मेरा भविष्य तुम्हारे
साथ ही बँधा है/ तुम मुझे अपने प्यार के वास्ते बस
एक बार सहारा दे दो/" मैंने पूछा," फिर रिक्की का क्या होगा?" तो वह बोली," उसे भी आपको ही
संभालना होगा और उसे अपना खून स्वीकार करना
होगा/",' रविन्द्र को मेरे तुम्हारे बीच गलत संबंध
उड़ाने का उसे मौका मिल जाएगा, वह तुम्हारे जीवन
भर तुम्हें ब्लैक मेल करेगा, हो सकता है शायद मुझे भी वह ब्लैकमेल करे/ अगर तुम्हारा कहना सही है
कि रिक्की का बाप वही है तो उसे उसके पास भेज
दो,' मैंने उसे समझाते हुए कहा/
                  मैंने फिर कहा,"मेरे घरवाले रिक्की के
बारे में जान कर कभी राजी नहीं होंगे/ इसीलिए मैंने तुमसे रिक्की का मोह हमेशा के लिए छोड़ने के लिए
कहा था/ पर प्रभात भी मेरी बात से सहमत था फिर भी तुम लोग रिक्की को इस दुनिया में लाए/ मैं पहले ही कहा था कि रिक्की हमारे तुम्हारे बीच व्यवधान है/
तुम्हारे बारे में किसी तरह मैं घर वालों को राजी करने
के बारे में सोच भी सकता था पर अब वह मेरे लिए
संभव नहीं है/"
                वह आगे बोली," फिर मेरे भविष्य के बारे में सोचने का तुम्हारा क्या अधिकार है?" " फिर क्या
तुम मेरी बीबी के साथ सौत बन कर रह सकोगी,"
मैंने पूछा/ तो उसने तल्खी से जवाब दिया," नहीं,
एक म्यान में दो तलवार कभी नहीं रह सकती/" फिर
मैंने कहा," प्रभात ने तो मुझे शादी कर लेने का दबाब बनाते वक्त यही कहा था कि तुम मेरी रखैल बन कर
भी खुश रहोगी/ क्यूँ भाई- बहन का मतैक्य नहीं है/
वह कुछ कहता है, तुम कुछ कहती हो/"
                  मैं समझ गया कि मेरी शादी की बात उसको कचोट रही है और वह मुझसे बिना शादी हुए
ही मेरी बीबी को तलाक दिलवाने का इरादा संजोए
बैठी है/
                   पर अभी मैं स्वयं ही शादी करने के लिए
तैयार नहीं था, इसलिए मैंने उससे यही कहा," रिक्की
को आगे करके उसके बाप से संबंध सुधारो, यही
तुम्हारे लिए उचित है, जो तुम्हारे भविष्य के लिए रास्ता खोलेगा और रविन्द्र के पास वापस चली जाओ, तुम्हारी माँ की अंतिम इच्छा यही थी/ उन्होंने
मुझसे बार- बार यही बात कही थी/"
               मैं स्वयं भी आक्रोशित हो उठा था पर जाहिर न करके शांत भाव से बैठा रहा/ फिर उससे
कहा," तुमने मुझे प्यार में धोखे के सिवाय क्या दिया
है? तुम तो मेरा इंतजार भी न कर सकी/ मैंने तुम्हारी
शादी रोकने का इरादा किया तो तुमने अपने पापा की
मर्जी के आगे हथियार डाल दिया/ कम से कम मेरी
नौकरी लगने तक तो रुक जाती"
              उसने कहा," यहीं तो मुझसे गलती हो गई/
पापा को मैं मना नहीं कर पाई/" मैंने कहा," अब तुम
अपने पापा से ही पूछो," क्या वह तुमको जिन्दगी भर
बिठा के खिलाने को तैयार हैं ? अथवा कोई अन्य तरीका उनके दिमाग में हो तो उसे भी आजमा देखें
और तुम्हारा रंज दूर करें/ मुझे तुमसे पूरी सहानुभूति
है------
      " कल तक थीं जो हाजिर जवाब,
        आज सुझ नहीं रहा उनको जवाब/
        गुल भी चाहिए और नकहत भी,
        सूरत औ' सीरत साथ, तो क्या इत्तफाक/"

                 अब मेरी सारी आशाओं का केन्द्र संध्या ही रह गई थी, जिससे मिलने में मुझे संकोच हो रहा
था पर उससे कुछ न पूछ परिस्थितियों के हवाले करने की भी मेरी मनोकामना नहीं थी/
                  जान्हवी को मेरी बातों में संभवतः कोई
आशा की किरण नजर आई हो, पर इससे मैं अनजान
था/ वह जाने का नाम भी नहीं ले रही थी/ और संध्या
से बातें करने और उसके हाथ की चाय पीने के लिए
मेरे होठ व्याकुल ले उठे/ करीब शाम के आठ बज रहे होंगे/ जान्हवी से संध्या को भी बुलवा लेने की पेशकश
की/ तो वह बोली," मैं संध्या को अभी जाकर भेजती हूँ' जाते-जाते उसने मुझे चाय के लिए पूछा, मैंने
इत्मीनान की सांस लेते हुए कहा," मेरी चाय का समय
भी अब हो रहा है/" और वह संध्या को बुलाने चली
गई---
        " तेरी चाय के मुंतजिर हैं हम तो,
           मिले तेरे हाथों से तो वाह-वाह"
                    संध्या चाय बना कर ले आई थी/ वह
आकर बैठी तो मुझसे पूछने लगी," आपका यूनिवर्सिटी फिर से ज्वाइन करने के बारे में क्या विचार है? मैंने बताया कि अब यूनिवर्सिटी ज्वाइन करने में अब तो और दिक्कत है/ साल भर के लिए बिना तनख्वाह के छुट्टी पर रहना पड़ेगा और पैसे की
अहमियत जान्हवी ने मुझे अच्छी तरह समझा दिया है/ मैं अब इस बारे में सोच भी नहीं सकता हूँ/ हाँ तुम
अपना विचार, अपनी दिक्कतें मुझसे शेयर कर सकती हो, मेरे घरवाले शादी के लिए मुझ पर दबाव
बना रहे हैं और प्रभात भी कुछ इसी प्रकार की बात
कर रहा है और जान्हवी को रखैल के रूप में स्वीकार
करने को कह रहा है पर जान्हवी का ख्याल इसके उलट है/ वह किसी की सौत बनना पसंद नहीं करेगी,
बलिक अभी भी मुझ पर अपना पूर्ण अधिकार रखना
चाहती है/ बिना शादी किए ही वह अभी से मेरा तलाक करवाने की मुहिम पर अडिग है/ वह कहती
है कि मैं शादी करूँ तो उससे, नहीं तो किसी से नहीं/
               सन्ध्या ने मुझसे पूछा," क्या आप जान्हवी
के विचार से सहमत हैं?" मैंने कहा," हर्गिज नहीं, अभी तो मैं शादी करने के ही पक्ष में नहीं हूँ/ शादी कर
भी लेता हूँ तो उसे जान्हवी के लिए तलाक कैसे दे सकता हूँ/ जिसे सात फेरों के बंधन में बाँध कर लाऊँगा, उससे अलग होने की बात सोचना तो दूर की
कौड़ी लाना होगा/ यह मेरे लिए किसी हाल संभव नहीं
होगा/ वैसे शादी के लिए जल्दी जान्हवी ने ही की है/
उसने मेरा इंतजार करना भी जरूरी नहीं समझा,
मुझसे इजाजत लेना तो दूर की बात है/ मैं उसके 
विकल्प की तलाश में मारा-मारा फिर रहा हूँ/ पर
मंजिल सामने होते हुए भी मैं उससे कुछ कहने की
हैसियत से अनजान हूँ/ सच पूछो तो मैं तुम्हारा ही
इंतजार कर रहा हूँ----
        " रौशन है चाँद झिलमिलाते
                         सितारों की चादर ओढ़कर,
           हम तुम भिलेंगे भी क्या कभी
                          जमाने की चाहत छोड़कर/
           किस्सए कैशो- लैला, शीरी-फरहाद
                          आखिर अंत में अधूरे ही रहे,
            तुम बताओ, दो दूनी चार छोड़
                            मिल सकेंगे क्या दो दो चार जोड़
                                                                कर/"

                          वह मेरी बात पर जरा भी हैरान-
परेशान न हुई पर इतना जरूर बोली," पापा अभी भी
दिनेश की बहनों के लिए रिश्ते खोजने में उसकी मदद
कर रहे हैं/ और मुझसे कहते हैं कि वह अपनी बहनों की शादी करने के बाद मुझसे शादी करने की बात पे
संजीदा है'' मैं जानता था कि भरे-पूरे समृद्ध परिवार
से उसका ताल्लुक है और शायद मुझसे भी अच्छी नौकरी करने लगा है/
                    मुझे फिर से इस विषय पर 120 रू० की याद आ गई----- पर मैंने संध्या से इतना ही पूछा,
" तो उसका तुम कब तक इंतजार करोगी? उसकी
चारों बहनों की शादी कब तक होगी? इस इंतजार में
तो तुम्हारी आधी उम्र गुजर जाएगी/" उसने बताया,
" मैंने पहले ही आपसे बताया था कि पापा कि पापा
की मर्जी के खिलाफ जाने की मेरी हस्ती नहीं है और मैं जान्हवी की परिस्थिति देख कर फिक्रमंद भी हूँ कि
कही मेरा हाल भी उसकी तरह ही न हो/"
                    मैंने कहा," मैंने अभी तक अपने घर वालों की तय की हुई शादी से इंकार कर दिया है/ और
तुम भी जान्हवी की तरह मुझे लेकर गंभीर नहीं लग रही हो और इस बाबत अपने पापा से बात भी नहीं
करना चाहती हो/ मुझे क्या करना चाहिए, यह मुझे
समझ नहीं आ रहा है/ मैं तुमसे यह भी नहीं कह सकता कि तुम्हारी तरफ से भी मैं धोखे का शिकार
हुआ हूँ पर विकल्प के लिए सोचने को तुम्हीं ने मुझसे
कहा भी था और फूल की खुशबू बन कर मेरी छोटी सी बगिया को सुगंधित कर देना भी तुम्हीं चाहती भी 
थी/ अब बस मैं उसी खुशबू का ही इंतजार करना
चाहता हूँ/ मैं समझता हूँ कि तुम्हारे लिए, या जान्हवी
के लिए भी तुम्हारे पापा से मैं जिरह करने के लिए
तत्पर भी नहीं हूँ/ शायद मुझे वह 120 रू० वाला छोरा अभी भी समझते हैं/ तुम भी नहीं पूछोगी तो मुझे अब अपने इंतजार और संवाद दोनों पर ब्रेक
लगाने के लिए सोचना ही पड़ेगा/ तुमने दो नाव पर
एक साथ पाँव जमाने की नाकामयाब कोशिश की है/
एक गया तो दूसरा तो तुम्हारे, और तुम्हारे पापा की
गिरफ्त में है ही/ भगवान न करे कि दिनेश अपनी बात
से फिर जाए और तुम दो नावों पर पाँव रखे हुए ही बीच भँवर में फँस जाओ"/
        " क्या मांगू खुदा से, तुम्हीं से मांगता हूँ,
           क्या मांगू तुमसे, तुम्हीं को मांगता हूँ//"
                   " अगर मैंने जल्दबाजी में कोई कदम
उठा लिया तो इसके लिए न तो पापा ही मुझे बख्शेंगे
और न ही दिनेश/ वाकई मैं बीच भँवर में हूँ/ लगता है
कि अब तो कश्ती भी मेरा साथ छोड़े जा रही है/ आपने मेरे बारे में जो सोचा है, उससे मुझे इंकार भी नहीं है पर जान्हवी की हालत देख एक बार फिर मैं
आपके सामने शरमिंदा होने को मजबूर हूँ," संध्या ने
बिना किसी लाग लपेट के कहा/
                       
संध्या से मैंने प्रत्य प्रत्यक्ष कहा," मेरे सामने भी अब
कोई रास्ता नहीं बचा है सिवा इसके या तो बिना शादी
किए जिन्दगी गुजार दूँ या फिर जहाँ माँ- बाप चाहें, वहाँ शादी कर लूँ/ तुम्हारे लिए यह एक निर्णायक
पड़ाव है, अपना निर्णय मैंने तुम्हें बता दिया है/ मेरे
घर के दरवाजे तुम्हारे लिए हमेशा खुले रहेंगे, तुम कभी भी आ सकती हो बहरहाल अब मैं कीडगंज
लौट कर नहीं आने वाला/ अपना ध्यान रखना/"
इसके बाद मैं बोसीदा कदमों से अपने घर की तरफ
लौट चला/
                मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि डाल पर
मैं और संध्या दो पंछी की तरह बैठे थे और मुझे बहे लिए के तीर की जद में देख कर मेरा साथी कहीं दूर
उड़ गया है/
                उसके बाद न तो संध्या से ही मिला और
न जान्हवी से/
                 आज स्थिर मन से सोचता हूँ तो मुझे
जान्हवी पर न रोष है न गुस्सा/ उसका दर्द और कुसूर
सिर्फ इतना था कि उसने मुझे अपनी बेपनाह मुहब्बत
से नवाजा पर उसने मेरा कुछ दिनों और( यानी फाइनल हो ने तक) इंतजार नहीं किया/ न सूरत देखी
न सीरत और पैसों को मुझसे अधिक महत्व देकर
रविन्द्र के डाले चारे में फँस गई/ जहाँ तक संध्या का
सवाल है, जबरदस्ती ही मेरे और जान्हवी के बीच आ
धमकी थी/ दिनेश के होते हुए भी मेरे प्यार की अँधेरी
कोठरी में अपनी मुहब्बत से चरागां करने की कोशिश
में प्राण प्रण से जुट गई थी/ जान्हवी के धोखा देने के
बाद अब वह प्रेम का मरहम लेकर आई थी और मेरे
टूटे हुए दिल का मदावा कर रही थी और अब मुझे
भी बिना पतवार की अपनी कश्ती में मुसाफिर बना
लिया था/ खुद से ही हारा हुआ होकर मैं किसी विशेष
को दोष नहीं देना चाहता था पर मेरी अपलक पलकें अब शायद किसी विशेष मेहमान की प्रतीक्षा में आतुर
थीं/
              अब मैं" जिन्हें हम भूलना चाहें'' संस्मरण
को इसी किश्त में समाप्त करना चाहता हूँ/ बिना विस्तार दिए दिए ही इसे अब संक्षिप्त करना चाह रहा
हूँ/ समझ रहा हूँ, पाठकों के पास यह निष्कर्ष तो होगा ही कि मैंने जान्हवी को अपनाया क्यूँ नहीं और
क्यूँ उसे दर-दर की ठोकर खाने के लिए इतनी बड़ी
दुनिया में अकेला और बेसहारा छोड़ दिया/ उसने तो
मुझे प्यार ही दिया था और उसी प्यार के भरोसे ही
लौट के मेरे पास वापस आई थी/
               मैं पाठकों के समाधान के लिए इतना ही
अर्ज करना चाहता हूँ कि मैं रिक्की को भी उसकी माँ
के साथ ही अपना लेता पर मेरे परिवार वालों को
असलियत पता ही नहीं थी और समाज भी मेरे इस
फैसले को सम्मान की दृष्टि से न देखता और जान्हवी भी जबरदस्ती मेरे गले पड़ने की फिराक में थी, उसे
अपने किए का किसी तरह का पछतावा भी तो नहीं था/
             मेरी दो छोटी बहनों और एक छोटे भाई की शादी भी मेरे अतिरिक्त होनी थी/ मैं अगर रिक्की को
अपनी संतान बताता तो बिना शादी किए बाप बनने
की भर्त्सना जिन्दगी भर झेलता और अभी तो मेरी
शादी भी नहीं हुई थी/ बीस बसंत देखने के बाद भी
क्या मैं अपनी बाकी बची जिन्दगी को जुमलों का
शिकार होते देख पाता/
              लगता है इसीलिए उसके पापा भी प्रभात
के जरिए अपना" मौन निमंत्रण" मुझ तक भिजवा
रहे थे पर खुद वो खुदा का बंदा मेरी देहरी पर एक
बार भी आने में अपनी अकड़ को न छोड़ सका, वह
मेरे पिताजी को अपना मुँह कैसे दिखाता सो वह
छिप कर ही लक्ष्यभेदी तीर चला रहा था/
               पर प्रभात मुझे मनाने और समझाने में जब असफल रहा तो जान्हवी को मेरी रखैल बन कर
रहने की सिफारिश तक कर डाली/ जान्हवी को भी
किसी हाल, लाख गर्दिशों में होते हुए भी, सौतन के
प्रति ईर्ष्याभाव न त्याग सकी/ मैं पहले ही सन्ध्या और
जान्हवी से बता चुका था कि मैं जान्हवी के सिवा किसी से शादी न करूंगा/
              मुझे तो अब संध्या परले दर्जे की चालाक
और अति सावधान लग रही थी, जिसने जान्हवी के
खिलाफ मुझे भड़काया और स्वयं ही वो दो नावों पर
पैर जमाए खड़ी थी/ और उसने अपने पापा का नाम
लेकर मेरे प्रेम को भी अस्वीकार कर दिया, जिस बंधन में बँधने को पहले वो लालायित थी/
                अब घरवालों से मेरा और इंतजार कराना
संभव नहीं ले पा रहा था/ मेरी मँझली बहन की शादी
के लिए लड़के देखे जा रहे थे/ मैं भी उसके हाथ पीले
करवाने को जी जान से लगा हुआ था/
                एक दिन मुझे अचानक ही पता लगा कि
मेरी बहन की शादी के साथ ही मेरी भी शादी तय कर
दी गई है/ मुझे बताया भी नहीं गया था/ दोनों तरफ से
कार्ड भी छपवा कर उनका आदान-प्रदान तक हो चुका था/ बात बस ये थी कि मेरी बहन के साथ- साथ मेरी भी शादी निपटा देने की तैयारी पूरी कर ली गई थी/ मुझसे पूछ भी नहीं गया था/ अंततः जिस दिन
मेरी मझली बहन की बरात आने वाली भी, उसी दिन
मेरा फलदान भी ले लिया गया/
तुलसीदास जी के अनुसार----- मैंने
         हर्ष विषाद कछु मनु न आँका/
               दोनों शादियाँ हुईं/ काफी ताम-झाम भरा वो हफते भर का समय बीता/ क्यूँकि सभी दूर- पास के संबंधियों को बुलाया गया था और पूरा मुहल्ला तो था ही/ साथ ही मेरे ढेरों दोस्त भी था/ कोई भी दोस्त
मेरे निमंत्रण से न छूटा/
                मेरे पिता जी " दहेज- विरोधी" थे/ उन्होंने
मेरी शादी के लिए कोई माँग नहीं की थी पर एक बार
उन्होंने मेरी बहन की शादी के वक्त यह बात कही थी
कि मैं तो दहेज विरोधी हूँ पर किसी लड़के वाले ने उन्हें नहीं बख्शा/ उनकी उस समय की कही हुई बात
अभी तक मेरे सीने में जज्ब है/
                 अपनी पत्नी को विदा करा कर हम लोग वापस हो लिए/ लोकल ही शादी थी/ एक बड़े स्कूल
को हायर किया गया था, उसमें ही सभी मेहमान टिके
हुए थे/ खाने- पीने के लिए कई हलवाई कई दिन से
लगे हुए थे/
   

जिन्हें हम भूलना चाहें --- संस्मरण किश्त (9 )

जिन्हें हम भूलना चाहें --- संस्मरण
         किश्त (9 )
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जहाँ तक मैं समझ पा रहा हूँ कि मेरी जिन्दगी में बार बार जान्हवी के अतिक्रमण से पाठक गण भी अब ऊब रहे हैं पर प्यार में दूसरा मोड़ होने पर भी मैं उस
ओर सिर्फ मुड़ कर और आगे निकल जाने के प्रयास में मंजिल भी कहीं पीछे ही छोड़ आया हूँ/ मेरे प्यार के
ग्रामोफोन की सूई भी रिकार्ड पर एक ही जगह जाकर
फंस गई है/ और गुलाब की कॅटीली झाड़ी में उलझ
कर, अपने अस्तित्व को तार-तार करने पर मैं क्यूँ
उतारु था पर अब तो यह चुभन कसक बन कर संध्या
के वियोग की खुशबू से माहेत्तर होने को उत्कंठित थी/
और अब मैं संध्या से मिल पाने के लिए किसी शुभ
मौके की तलाश में था/ उससे एक बार बात करने और उसके फैसले का सुनने को सुनने की उत्सुकता
दिल में जड़ें जमाए उसके इंतजार में तन्मय हो रही थी/ उसकी जिन्दगी में जबरन प्रवेश की अनुमति
के लिए मेरा दिल गवाही नहीं दे रहा था/ संध्या को
अपनी साँसों में महसूस तो करता था, पर उसे अपनी
बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकता था/ जान्हवी ने
तो अपने परिवार की इज्जत से खिलवाड़ किया ही था, अब संध्या सचेत थी और मेरी जरा सी लापरवाही मेरे उसके प्यार का आशियाना उजाड़ भी सकती थी/
                जान्हवी के पेट से होने के कारण स्वयं
को क्षत- विक्षत सा मैं महसूस कर रहा था कि वह किस निर्दोष को पाल पोस रही थी या इसमें उसका
कोई दोष नहीं था/
                मैंने उसे भुला देने और फिर उससे न मिलने की सोची/ ज्यादा दिन नहीं बीते होंगे कि प्रभात एक दिन बिना किसी पूर्वसूचना के मेरे आफिस
आ पहुँचा और बताया कि जान्हवी बाहर मेरा इंतजार
कर रही है और वह स्वयं निरंजन पैलेस में पिक्चर के
12 से 3 के तीन टिकट ले आया है/
                  मैंने उससे साफ- साफ कहा कि मैं आफिस बिना कोई ठोस कारण के इतनी देर तक छोड़ नहीं सकता/ मैं समझ नहीं पाया कि ऐसी कौन
सी आफत आ पड़ी है कि आज जान्हवी मेरे साथ
पिक्चर का प्रोग्राम बना कर आई है और सपोर्ट में अपने भाई प्रभात को ले आई है/
                   मैंने सोचा कि जाऊँ तो पिता जी से बता कर जाऊँ/ फिर सोचा कि अभी तक जान्हवी
के पापा और मम्मी अब तक मुझ तक नहीं पहुँचे थे/
और न ही मुझसे मुलाकात की गरज ही उनकी दिखाई पड़ रही थी, जब कि जान्हवी की जिन्दगी
बरबादी की कगार पे खड़ी थी/ बस प्रभात ही घर का
गार्जियन बना आगे-आगे कूद रहा था तथा वह न ही
किसी का प्रतिनिधत्व ही कर रहा था/ लगता था सारा
मसला वह अकेले ही सुलट लेगा/
                     मैंने पिता जी से तब तक कुछ न बताने की सोची, जब तक पिकचर और स्पष्ट नहीं हो
जाती/
                      बहरहाल मैं उसके साथ आफिस से
बाहर निकला और जान्हवी को साथ लेकर पैदल
' निरंजन टाकीज' जा पहुँचा/ कौन सी पिक्चर थी,
यह तो स्मरण नहीं है पर इतना अवश्य याद है, कि
पिक्चर के शुरू होने पर पाया कि जान्हवी मेरे और
प्रभात के बीच बैठी हुई थी/ मैं खामोशी से पिकचर
खत्म होने का इंतजार करने लगा/ प्रभात क्या जानना
या समझना चाहता था, शायद इसी बात को ठोक बजा रहा था कि मेरा और जान्हवी का प्यार अबदल
है और उसमें कोई व्यवधान नहीं उपस्थित हुआ है/
                      पिक्चर समाप्त होने पर वह सामने
बहुचर्चित दूसरी पटरी पर स्थित रेस्टोरेन्ट कम होटल
' गिन्जा' में ले गया/ प्रभात ने नाश्ता मंगाया/ उन लोगों की तरफ से क्या बातें की गईं, मुझे याद तो नहीं
पर अपना कहा मुझे याद है/ मैंने कहा था,' गर्भ का 
झंझट वो लोग खत्म करें, तभी मैं कुछ आगे सोच
सकता हूँ/ मेरा अपना बच्चा होता तो अब तक मैं
आकाश पाताल एक कर चुका होता/ चाहे उसके पापा का गुरुर ही मेरा रास्ता रोक कर खड़ा होता/ मैं
जान्हवी की शादी अन्यत्र नहीं होने दे सकता था/'
                        वेटर 12 रु० का बिल लाया था, जो
मैंने ट्रे में रख दिया पर मुझे यह देख कर महान आश्चर्य
हुआ कि जान्हवी ने वे पैसे उठा कर अपने पर्स में रख
लिया, लिहाजा प्रभात ने उसका भुगतान किया/ गर्भ
गिरवाने की बात पर वह राजी हो गया था/
                        मैं आफिस लौट आया था तथा सोचने लगा कि प्रभात के पास पिक्चर का और नाश्ते
का पैसा कहाँ से आया, कहीं वह अप्रत्यक्ष रूप से
उसके मम्मी-पापा का सपोर्ट तो नहीं था/ वह तो बेकार था और अपनी एक किताब खरीदने तक के
लिए उसे अपनी माँ के सामने नाक रगड़नी पड़ती थी/
                        उसके पापा की अकड़ समाप्त होने
का नाम नहीं ले रही थी और उसकी माँ भी खुल कर
सामने नहीं आ रही थी/ मैंने यह बात कही थी जब
अनचाहे गर्भ मुक्ति पाने के हर बड़े गवरमिंट हास्पीटल
में अलग से ' पोस्टपार्टम' विभाग था और तब शायद
किसी की अनुमति भी नहीं लेनी पड़ती थी/
                          इस समय संध्या एक कौतूहल बन
कर मेरे दिमाग में कौंधी/ क्या वह भी जान्हवी को मेरी
जिन्दगी में धकेलने के लिए प्रयत्नशील थी या उसकी
कुछ अलग सोच थी?
                           बहरहाल समय तीव गति से गुजरने लगा/
                          यह खबर पता नहीं कैसे मेरी माता
जी तक पहुँची/ जान्हवी के यहाँ से तो कोई आया नहीं था, जहाँ तक मुझे खबर थी/ पर जिसने भी खबर दी होगी, वह उसके पेट ते होने की बात से
अनभिज्ञ था/ नहीं तो मेरी माता जी के प्रश्नों की बौछार मुझ पर होती और साफ- साफ अपनी बात
उन्हें समझानी होती/ जान्हवी के और मेरा मुहल्ला
अगल-बगल था/ मैंने माता जी से कुछ न पूछा या कहा पर उन्हें मैंने मेरी बहनों से कहते सुना कि शादी-
शुदा के साथ वह मेरी शादी कभी न करेंगी/ अगर वो
लोग चाहें तो वे संध्या से मेरी शादी कर सकती हैं/
                            बच्चा अभी तक जान्हवी के पेट
मे ही था या-----?
                             पर प्रभात ने और जान्हवी ने मेरी बात एक कान से सुन कर दूसरी से बाहर निकाल
दी और जान्हवी अब भी मुझसे अपने को अपनाने के लिए जोर दे रही थी/ वह शायद सोच रही थी कि उसकी उच्छृंखलता के बावजूद, उसके रूप-सौंदर्य का जादू अब भी मेरे सर चढ़ कर बोलेगा/
                            अगर मेरी भावना को वो लोग
आहत न करते तो शायद मैं एक बार फिर उनके जाल
में फँसने को मजबूर हो जाता/
                             एक बार फिर प्रभात मेरे पास
मेरे कमरे में आया और मुझसे जान्हवी के बच्चे को बाप की जगह मेरा नाम देने की सिफारिश करने लगा/ मैंने साफ इंकार कर दिया और संध्या से मिल
पाने का एक सुनहरा मौका गँवा दिया/ पता नहीं उन लोगों ने कहाँ- कहाँ बच्चे की पिता की जगह मेरा नाम
लिखवाया होगा/ मुझसे तो बताया गया कि उसके स्कूल में दाखिले के लिए जरूरी था, जिसमें उन लोगों
ने उसके बाप का ही नाम लिखवाया है/ मुझे पूरी तरह
स्मरण है कि कहीं भी मैंने रिक्की का बाप बनकर कभी कोई साइन नहीं किया/
                             मैंने उसकी बात का सच जानने
की कभी कोशिश नहीं की/ अब मैं समझता था कि वह अब मुझसे झूठ भी बोलने लगा है/
                              मुझे उसने घर आने और जान्हवी तथा बच्चे से मिल जाने का आग्रह किया/ मेरे
मन में संध्या का आकर्षण तीव्र लालसा के रूप में
परिणित हो चुका था और मैंने उसे,' कभी आऊँगा'
कह कर विदा किया/
                              एक रोज मैं संध्या से मुलाकात
की अभिलाषा से त्रस्त होकर कीडगंज उसकी हवेली
पर गया/ जहाँ जान्हवी ने अपने ही कमरे में मुझे बैठाया/ मिलने-जुलने वालों के लिए शायद वही कमरा मेहमान खाने की तरह प्रयोग किया जाता था/
                             मैं पूर्ववत चारपाई पर खिड़की
की टेक लिए बैठा था तो जान्हवी मुझसे चाय के लिए
पूछने आई/ मैंने इन्कार कर दिया और सीधे उसकी
ओर देखते हुए संध्या के बारे में पूछा/ वह वही दीवार
के सहारे खड़ी होकर मुझसे माफी माँगने और अपनी
गल्ती मानने लगी और अपने को सहारा देने की बात
कहने लगी/
                            मैंने कुछ देर पश्चात यह सोच कर
कि वह बिना मेरी मर्जी जाने अपने से वहाँ से जाएगी
नहीं, कहना शुरू किया," यह तभी संभव था जब तुमने और प्रभात ने मेरी बात को अनसुना न कर दिया होता/ " मैने आगे पूछा,' तुम्हारे पापा का अब क्या कहना है, मेरे बारे में उनकी बदगुमानी दूर हुई अथवा अभी भी वह मुझसे वैर-भाव रखते हैं'/ इस
पर वह निरुत्तर थी/" अपनी मम्मी-पापा को मेरे घर
वालों से मिलने को कहो/ अब मेरे हाथ में बात नहीं
रही/ मैं तुम्हारी माँग में दस दफे फिर से सिन्दूर डालता, अगर व्यवधान बन कर तुम्हारा बेटा तुम्हारे
साथ न होता" मैंने प्रश्नसूचक द्वष्टि से उसे देखा और
पूछा," तुम्हारे बारे में संध्या का क्या विचार है, उसने
तुम्हें क्या कुछ नहीं कहा?"
                     वह बोली," आप संध्या से खुद ही बात कर लीजिएगा"/ वह मुझे वहीं बैठा छोड़ कर चली गई और मैं बेतहाशा संध्या का इंतजार करने लगा/
                     कुछ देर बाद संध्या चाय लेकर आई/
और उसी तथाकथित कुर्सी पर बैठ कर मुझे चाय
पकड़ाते हुए बोली," आपको ज्यादा इंतजार तो नहीं
करना पड़ा/ जान्हवी ने कहा कि आप मुझी से मिलना
चाहते हैं, मैंने उससे पूछा," भाई साहब को फिर तुमने
अकेला छोड़ दिया, कम से कम मेरे आने तक तो उनके पास बैठती, तुमसे ज्यादा कहीं वो अपने को अकेला महसूस करते होंगे"/ मैंने कहा,' छोड़ो घिसी-
पिटी बातें," क्या तुम भी मुझसे मिलना नहीं चाहती थी/ इतने दिनों में तुमने एक बार किसी से भी मेरे बारे
में नहीं पूछा/" संध्या ने जो जवाब दिया, वह मेरे लिए
अप्रत्याशित था, वह बोली," मैंने सोचा था कि कागजी फूलों की खूबसूरती से एक दिन ऊब कर, खुद ही खुशबू के बारे में भी सोचेंगे"/ मैं सहसा कोई
उत्तर न दे पाया पर कहा," जान्हवी की शादी के बाद
ही तुम्हारा इरादा जानने के लिए उत्सुक था/ पर तुम्हारी समीपता आज ही मुझे उपलब्ध हुई है/ मैं तुमसे बातें करने के लिए उत्सुक था, पर अवसर मुझे
आज मिल सका है/ "        


जिन्हें हम भूलना चाहें( संस्मरण)
      नवीं किश्त का शेशांश
****************************

" क्या तुम जान्हवी की शादी की पहल से अचंभित
नहीं थी? क्या वह किसी के दबाव में थी कि उसने मेरा इंतजार भी छोड़ दिया?" संध्या ने मुझे बताया,
" मैंने आपसे पहले भी कहा था कि आपसे अच्छा
उसे मिलेगा तो स्वयं ही आपका साथ छोड़ देगी/
मैंने आपसे उसके विकल्प की बात कही थी, तो आपने कहा था कि वह जान्हवी के बिना शादी ही
नहीं करेंगे/" मैंने उससे आगे पूछा," क्या विकल्प का
तुम्हारा समर्थन अपने लिए था/ मैं समझते हुए भी
अनजान बना रहा, मुझे सपने में भी जान्हवी के बदल
जाने का अनुमान नहीं था/ जान्हवी ने मुझे तुम्हारे
खिलाफ भड़काया था, यह कह कर कि तुम्हारा ब्वाय-
फ्रेंड है और तुम्हारी शादी उसी से तय है/ मुझे कुछ
सोचने का मौका ही नहीं मिला, मैं अपनी 120 रू0
की आय वाली बात से ही क्षुब्ध था और यह सोच कर
ही तुमसे किनारा किया कि तुम्हारे पापा 120 रू०
वाले से न तो जान्हवी की शादी करेंगे और न तुम्हारी
ही होने देंगे/" फिर बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,
" मैंने आपका लेटर नाहक तो छिपाया नहीं था/ मुझसे आपने मेरा मंतव्य भी नहीं पूछा और न ही आपने लेटर का कोई जवाब मांगा था, फिर मैं किस
तरह से अपनी बात आगे बढ़ाती? आप जान्हवी की
चिन्ता में घुले जा रहे थे और मैं जबरदस्ती आपकी
फिक्र की मोहताज होकर रह गई थी/ आपके लिए
तो मैं सारी दुनिया की दौलत को ठोकर मार देती"/
मैं स्तब्ध हो कर बैठा रहा और उसकी बात सुनता
रहा और सोचने लगा कि सचमुच वह इंतजार करती,
कम से कम नौकरी तक के लिए ही या जान्हवी की
तरह चारा देख कर मुँह मार देती/ पर अब मेरे पास
अच्छी खासी परमानेन्ट नौकरी थी, अब कोई भी
बड़े बड़े वादे कर सकता था, जान्हवी तो कम से कम
इस बात पे आमादा थी ही/
                  मैंने पूछा," क्या जान्हवी की शादी में तुम्हारे पापा का पैसा नहीं लगा?" वह बोली," बिलकुल नहीं, पापा जान्हवी के नाम से 5000 का फिक्स डिपाजिट करवा के फारिग हो गए/ वह ऐसी ही शादी करने के पक्ष में थे कि लड़का कमाऊ भी हो और फ्री- फंड में शादी भी हो जाए/ जान्हवी की मर्जी
भी जाननी जरूरी नहीं समझी गई/ रविन्द्र की तनख्वाह आपकी आय पर भारी पड़ी"/ मैंने स्पष्ट किया," 120 रु० की वजह से ही मैं मात खा गया पर
जान्हवी का हसबैंड मुझसे कितना बड़ा और सीनियर
होगा, यह बात भी तुम्हारे पापा को नहीं सूझी और यह शादी करके जान्हवी क्या खुश हो गई? उसकी
जिन्दगी का बर्बादी का जिम्मेदार कौन है?"
                  सन्ध्या आगे बोली," मेरी भी शादी पापा
की ही तै की हुई है/ पहले तो दिनेश ने फट से हामी
भर दी पर अब नजाकत है कि अपनी चारों बहनों की
शादी करने के बाद अपनी शादी के बारे में सोचेंगे/
पापा ने एक तरह से मुझे भी घर ही बिठा रखा है/ कब उसकी बहनों की शादी होगी और कब मेरी मांग
सजेगी/ मैं तो इंतजार में ही बूढ़ी हो जाऊँगी"/
                   मैं बोला," जैसी तुम्हारी मर्जी, मैं तुम्हारा साथ ही दूँगा/"
                   मैंने इसी संस्मरण की किसी किश्त में
लिखा है कि जो बात मैं जान्हवी या किसी दोस्त से
नहीं कह सकता था, वह मैं संध्या से बेखट के कह
सकता था/
                    संध्या ने मुझसे पूछा था," आपकी और जान्हवी के बीच क्या बात हुई थी कि वह आपको बदनाम करने पर तुली है/ वह रविन्द्र से
आपके बारे में सब कुछ बता चुकी है और यह भी कह
दिया है कि उसके पीछे अच्छे- अच्छे पड़े थे, पर जाने
कैसे वह एक बंदर के पल्ले बाँध दी गई है? वह 
आपके आफिस के बारे में भी जानता है और इसी
बात का ताना भी देता है कि अभी भी वह आपसे
मिलने, पिक्चर देखने के बहाने वहाँ जाती है और 
रविन्द्र ने यहाँ तक कह दिया है कि जान्हवी के गर्भ
में पलने वाला बच्चा भी उसका नहीं है, क्यूंकि वह
शुरू से ही इम्पोटेन्ट है, उसका बच्चा होने का सवाल
ही नहीं पैदा होता"/
                     उसने मुझसे जानना चाहा कि रिक्की
किसकी वसीयत का हिस्सा है? तो मैंने साफ- साफ
उससे कहा," मेरे और जान्हवी के बीच सभी कुछ तो
हुआ पर कभी मैंने कभी उसके अधोवस्त्र नहीं हटाए,
सिर्फ यही सोच कर कि सिन्दूर- दान के बाद ही
सुहागरात आती है/ मैं उस दिन का बेसब्री से इंतजार
कर रहा था, जब जान्हवी अपने मम्मी-पापा को मनाने में सफल हो जाएगी पर अब मैं महसूस कर रहा हूँ कि उसने इसके लिए कोशिश भी नहीं की और
800 रू० तनख्वाह सुन कर एक चिड़ीमार पर
लट्टू हो गई/"
                   मैंने फिर कहा," मेरे मना करने के बावजूद उसने रिक्की को पैदा किया और मुझे लगता
है कि वह बदनामी से बचने के लिए रविन्द्र के बच्चे को मेरे सर मढ़ने के लिए सारी कहानी गढ़ रही है/
इसके बावजूद वह मुझसे अपने को सहारा देने की
बात कह रही है/ शायद उसे मेरी तनख्वाह का पता
लग चुका है"/
                  मैने सन्ध्या से कहा कि यही बात मैंने
प्रभात से पूछी थी कि बच्चे के बारे में खीन्द्र का क्या
नजरिया है तो उसने मुझे झूठ बोला कि बच्चा वह
मेरा भी नहीं कहता है लेकिन खुद को नपुंसक भी
बताता है/ मेरे सामने भी यही प्रश्न है कि हवा में
तो बच्चा आ नहीं गया, बिना आग के धुँआ निकल
ही नहीं सकता/ बहरहाल मैं मुतमईन हूँ कि बच्चा
मेरा तो नहीं है, भले चाहे किसी का हो/
                   सन्ध्या ने कहा," मुझे इस बात का पता
नहीं था/ रिक्की को लेकर मैं स्वयं असमंजस में थी/
यदि अब मैं जान्हवी से पूछती हूँ तो वह मुझसे भी झूठ बोलेगी/"
                   मैं सोच रहा था क्या उन दिनों DNA
Test नहीं होते थे या और कोई तरीका उस समय
तक ईजाद नहीं हो सका था, जो इतनी छोटी सी बात
का बतंगड़ बनाया जा रहा था/
                    मैंने उससे यह भी बता दिया कि मेरी
माँ जान्हवी से मेरी शादी की बात सोच भी नहीं सकती हैं, यदि तुम्हारे घर के लोग मुझसे तुम्हारा रिश्ता करने को तैय्यार हों, तो वह तुम्हें अपने घर की
लक्ष्मी बनाने के लिए सहर्ष तैय्यार हैं/ रिक्की की बात
उन्हें नहीं पता है शायद वरना वह मेरा तुम लोगों से
मिलने पर कड़ा प्रतिबंध लगा देतीं/
                        मैंने सन्ध्या की अपनी ओर से दिल
साफ करने को कहा और कहा," तुम्हारे विचार अपने
बारे में जानने के पश्चात ही मैं तुम्हें प्रपोज करना चाहता हूँ/ मेरे साथ मेरे घर वालों को भी तुम्हारा
इंतजार है, फैसला तुम्हारे हाथ में है/
                        वह कुछ देर के लिए गंभीर हो गई
फिर सचेष्ट होकर बोली" जब जान्हवी ने पापा का
विरोध भी नहीं किया और अपनी हालत ऐसी बना ली/ तो फिर पापा की मर्जी के खिलाफ जाते जाने या उनसे विद्रोह करना मेरे लिए इतना आसान नहीं होगा,
जितना आप सोचते हैं/ मैं अपने भविष्य के लिए भी
मम्मी-पापा पर ही निर्भर हूँ और यह और भी दुख-
दायक बात होगी कि अपने स्वार्थ के लिए आपको
मैं भी प्रपोज करूँ/ हाँलाकि दिनेश मुझसे और पापा
से इंतजार करवा रहा है, देखना है पापा कब तक
इंतजार करते हैं अन्यथा वह मुझे भी जान्हवी की
तरह किसी के भी पल्ले से बाँध देंगे/"
                   संध्या ने एक तरह से अपना इकरार-
नामा दे दिया था पर मैंने इसलिए भी उस पर दबाव
नहीं बनाया कि उनके घर की इज्जत, जान्हवी को
लेकर काफी उछल चुकी है, पर उसके घर कोई भी
स्थिति संभालने के लिए उत्सुक नजर नहीं आया, सिवा प्रभात के/ वही मेरे पास आता और एक ही
प्रश्न बार- बार पूछता कि मैं क्या चाहता हूँ? क्या मैं
जान्हवी को हमेशा के लिए खो देना चाहता हूँ? पर
मैंने भी स्पष्ट कर दिया कि रिक्की के आगमन ने मुझे
सचेत कर दिया है कि तुम लोगों ने या तो मेरी बात को
समझा नहीं या जान-बूझ कर तुम लोगों ने मेरी बात
को तवज्जो नहीं दिया/ मेरे लिए हर रास्ता तुमने खुद बंद किया और अब मुझसे पूछ कर मुझे ही गलत
साबित करने पर लगे हो/ वह कहने लगा," तुम लोगों ने घर की इज्जत की भी परवाह नहीं की/" पर मैं बोला," तुम्हारे घर की इज्जत तो तुम्हारे घर वालों ने ही नहीं की, फिर मैं इसमें क्या कर सकता हूँ"
                     उसने कहा तो क्या जान्हवी ऐसे ही बैठी रहेगी," उसने तलाक का मुकदमा खिन्दु पर कर
दिया है और हर्जे- खर्चे का अपने को हकदार माना है"/ मैंने कहा," जो तुम लोगों की खोपड़ी में समाए,
वही बात करो/ मैंने तुमसे गर्भ गिरवाने को कहा था
और तुमने हामी भी भरी थी/ उसके बाद मैंने जान्हवी
से शादीकी बात घर में चलाने को कही थी पर तुम 
लोगों ने मुझे बेवकूफ समझ रखा है, किसी भी दूसरे
के बच्चे को मैं नहीं पाल सकता हूँ/ तुम लोगों ने मुझे,
यहाँ तक कि स्वयं जान्हवी ने भी मुझे धोखा दिया है/
मैं अब जान्हवी के पचड़े में नहीं पड़ने वाला/ तुम्हें
ही जान्हवी की बड़ी फिकर है, इतनी तो उसके माँ-
बाप को भी नहीं/ अब अगर मेरे पास आना तो जान्हवी की कोई बात मुझसे न करना" यह कह कर
मैंने उसे जाने को कहा और स्वयं नींद लाने की कोशिश करने लगा ताकि सुबह रिफ्रेश हो कर दोस्तों
से मिलने जा सकूँ//

  

जिन्हें हम भूलना चाहें---- संस्मरण किश्त ( ८ )

जिन्हें हम भूलना चाहें---- संस्मरण
           किश्त ( ८ )
*****************************
                  
                 मैं जान्हवी के घर कीडगंज जा पहुँचा उसका हाल जानने और बधाई देने के लिए ही शायद/
वह अपने कमरे में ही मिल गई और मैंने उससे सिर्फ
इतना पूछा कि अगर उसे शादी से कोई ऐतराज हो तो
मैं उसकी शादी को प्रयत्न पूर्वक रोक सकता हूँ/ पर
उसने बताया कि लड़का पापा की पसंद का है/ मैंने
फिर आगे पूछा---- क्या करता है, कितना पढ़ा है और
कितना कमाता है/
                उसने मेरे सारे प्रश्नों का उत्तर बस एक ही
बात से दिया कि लड़का जे०ई० है और 800 रु ०
पाता है/ जान्हवी ने उसकी तनख्वाह बता कर शायद
मेरी रूह फाख्ता करने की सोच रही थी/ मेरे कहने-
सुनने को अब कुछ बचा ही नहीं था, फिर भी मैंने कहा
--- तुम चार सौ रुपये के लिए ही परिशान थी, अब
उसके दुगुने में उत्साह से जिन्दगी बसर करना/ अब
120 रू0 स्टाइपेंड के भी मेरे पास नहीं थे और नौकरी छोड़ कर मैं बेकार हो चुका था/ किस मुँह से
उसको रोकता/
                  मैं अब जान्हवी में इंटरेस्टेड नहीं था/ रह रह कर मुझे संध्या की भविष्य वाणी याद आ रही थी/
                   कब जान्हवी की शादी हुई, मुझे कुछ भी
अता-पता न था/ मुट्ठीगंज उसकी नानी के घर से ही
शादी हुई होगी/ ऐसा मेरा अनुमान था/ उसे गुप चुप
तरीके से ही ब्याह दिया गया था, कहीं लोकल ही/
                   मुझे इस बात का ही संतोष था कि मैंने
उसे धोखा नहीं दिया था/
                    रही बात सन्ध्या की तो वह पापा के आगे
पहले ही नतमस्तक थी/ वह भी अब जान्हवी का हाल
देख कर पापा के खिलाफ विद्रोह की भूमिका में मुझे
न दिखाई पड़ी, मैं समझ चुका था कि----
                    प्यार के थर्मामीटर का पारा, जितनी तेजी से ऊपर चढ़ता है, उतनी ही तेजी से नीचे भी उतर जाता है/
                    जान्हवी की शादी के तकरीबन दो तीन
महीने बाद-- इलेक्ट्रिक सबिस कमीशन, में वैकेन्सी
निकली/ तंगहाल तो मैं था ही, सो मैंने अप्लाई कर
दिया/ इस्तहान देकर मैं सेलेक्ट भी हुआ और सात-
आठ सौ के लगभग मेरी स्टार्टिंग तनख्वाह थी/ पर
मुझे कोई खुशी न थी/ अगर यही नौकरी मुझे पहले
मिली होती तो मैं जान्हवी को हमेशा के लिए खो न
देता/
                     कहाँ तो वह मेरे साथ ५०० रु० में गुजारा करने को तैय्यार थी/ वह भी मान जाती और
उसका बाप भी शायद अब व्यवहारिक हो जाता/ पर
जान्हवी ने मुझमें और पैसे में, पैसे को बेहतर चुना, जो
उसकी तंगहाली की वजह से था शायद/ उसे मेरा
भरोसा नहीं था/ यूनिवर्सटी अब मुझसे छूट गई थी,
अब मैं कमपेटेटिव एग्जाम की तैयारी करने लगा/
कविताएँ लिखना एक बार फिर से छूट गया/ अपनी
पहली तनख्वाह मिलने पर मैंने पिताजी को दिया तो
उन्होंने मुझसे लिया नहीं और उसे मेरी पढ़ाई में लगाने
को कहा/ जब मैंने पुनः रिकवेस्ट की तो उन्होंने माता
जी को देने की बात कही/ उसके बाद मैं अपनी
तनख्वाह मैं अपने पास न रख कर माता जी को ही
देता था/ पाकेट- खर्च के रूप में माता जी से दो रुपये
रोज लेता था, सायकिल में हवा भरवाने तथा चाय आदि के लिए/
                    जान्हवी की ताफ से मैं उदासीन हो चुका
था, गाहे-बगाहे उस पर एक दो कविता लिख देता था/
साहित्यक गोष्ठियों में भाग लेना भी लगभग छूट गया
था, कारण कि अब समय का मेरे पास अभाव था/
                     सन 1977 में मैं नौकरी में परमानेन्ट
ले गया/ 1979 में बड़ी बहन की शादी हुई/ जीजा जी को विजय सुपर स्कूटर दी गई, जिसे वह चलाना
नहीं जानते थे/ वह स्कूटर शादी के काफी पहले खरीदी जा चुकी थी/ मैंने उसी स्कूटर से स्कूटर
चलाना सीखा और कुछ दिनों में अभ्यस्त हो गया/

जान्हवी की वापसी
----------------
                     मुझे नौकरी मिलने के कुछ दिनों बाद ही
प्रभात मेरे पास आया और बताया कि जान्हवी मुट्ठीगंज वाले घर पर है और वहीं पर उसने मुझको
बुलाया है---- जान्हवी को भला अब मुझसे क्या सरोकार/ कुछ दिनों के लिए आई होगी, फिर वापस
अपने घर चली जाएगी/ तो वह बोला--- आप बस
उससे एक बार मिल तो लीजिए/
                    जान्हवी ने मुझ पर अपना पता नहीं कौन
सा अधिकार जतला कर बुलवाया था, पर मैं वहाँ उससे मिलने नहीं गया/ बस एक चौराहे से भी कम
की दूरी थी पर उसके घर पर जाने के नाम पर कदम
बोझिलता महसूस कर रहे थे/ उसके साथ के एहसास
के साथ जो मैंने सपने सजाए थे, वो सपनों का महल
धराशायी हो चुका था/ मैं जानता था कि मुहब्बत जितनी तीव्र होती है, उतनी ही तीव्र नफरत में भी
बदल सकती है/
                     मुझे ही अब उसकी मुहब्बत पर 
अविश्वास था और वह मुझसे अब क्या चाहती है, मैं
समझ नहीं पाया था/ पर वह मुझसे मिलने को प्रयत्न-
शील थी/
                        पता नहीं किस तरह विलेन के रूप में,
उसके पापा का चरित्र मेरे पर उजागर हुआ था कि वो
मेरे और जान्हवी के बीच, कठिन परीक्षा की घड़ी
उपस्थित करने में, पूरी तरह कामयाब हो गए थे और
जान्हवी की हिम्मत तोड़ने के लिए हर संभव- असंभव
तरीके ईजाद कर डाले थे कि मुझे लगने लगा था कि
जान्हवी उनकी बिटिया ही न थी/ मुझे लगता है इसका उन्हें जरा भी अफसोस नहीं था/
                        जान्हवी ने मेरा न तो साथ माँगा और
न ही मेरा इंतजार करने में असमर्थता दिखाई / उसके
घर वालों ने जान्हवी के उज्जवल भविष्य की सोच कर
अपनी मनमर्जी से उसकी शादी की थी/
                        पहली बार वह किस खुशी और प्रसन्नता से, अपने घर वालों की बात ठुकरा कर ही तो
मुझसे मिलने आई थी/ पर अब बहुत देर हो चुकी थी,
और चिड़िया शायद अपना दाना-पानी पा चुकी थी/
                          पर पता नहीं क्यों मेरा मन इस बात
को नहीं मान रहा था कि अब वह मुझसे दूर हो चुकी है/ उसका मादक स्पर्श और प्यार का इकरार बार-
बार मुझसे कह रहा था कि इक दिन जरूर वो अपने
प्यार की खातिर लौट कर आएगी/ ज्यादा देर तक किसी गैर की बाहों के सहारे वह नहीं रहने वाली/
मुझे बस उसी दिन का इंतजार था और उसी इंतजार
के सहारे ही मैंने शादी न करने का फैसला कर लिया था/
                             मैंने सोचा इंतजार की बेला अब
समाप्त हुई और वह सचमुच ही लौट आई थी और अपने पापा से दूर अपनी नानी के घर डेरा डाल रखा
था/ इस खबर से मेरे दिल का मुरझाया चमन अचानक ही पुष्पित- पल्लवित हो उठा/ पर वह किस
हाल में पलट के आई थी, मुझे कुछ भी ज्ञात नहीं था/
                            दूसरे दिन प्रभात मेरे पास फिर आया और मुझसे जान्हवी से एक बार मिलने का आग्रह करने लगा, जो जान्हवी की शादी में अपना
विरोध प्रदर्शित करने का साहस भी न जुटा पाया था
और मैं अपने को अकेला समझ कर चुप रहा/ उसके
पापा से मेरा 3 - ६ का आँकड़ा था, आज वही प्रभात
क्यूँ जान्हवी की दलाली कर रहा था/ मैंने सोचा कि
जान्हवी से मिलने में मुझे देर नहीं करनी चाहिए/ 
उसके पापा के अलावा उसके घर का प्रत्येक शख्स
मेरे यहाँ आ चुका था/ पर उसके पापा का कुछ न कहना ही मुझे खल रहा था/ मैंने प्रभात से जानना
चाहा कि वह कब तक मुहीगंज में रहेगी पर वह सांस
रोक कर बैठ गया और बोला पता नहीं, बस एक बार
तुम उससे जरूर मिल लो/
               मैं उसके साथ गया जरूर पर वह मुझे जान्हवी के सामने बिठा कर वहाँ से अंतरध्यान हो
गया बिना कुछ कहे सुने, बिना किसी सूचना के/
जान्हवी मेरे सामने, बिना किसी हाव- भाव, बिना किसी भाव भंगिमा के मेरे सामने बिल्कुल चुपचाप
बैठी थी/ मैंने ही बोर होकर बात शुरू की कि यह
प्रभात कहाँ गायब हो गया, वो भी दरवाजा उढ़का के/
मैंने उससे पूछा--- मुझे क्यूँ बुलवाया था, क्या अब भी
तुम्हें मेरी याद आती है, यहाँ दिल बहलाने को आई हो
या समय बिताने और घूमने फिरने/ फिर मैंने आखरी
सवाल पूछा----- इलाहाबाद में यानि कि अपने मायके
में कब तक रहना है इत्यादि इत्यादि फारमल सवाल
पूछे तो उसने रोना- बिसूरना शुरू किया/ उसने अपने
वैवाहिक जीवन की असफलता का जो रोना-धोना शुरू किया, उसका अंत न होता देख मैंने उसको
टोकना शुरू किया--- अपनी खुशी से तुम गईथी, अब
रोना- बिसूरना किस बात का/ उसने बताया कि उसने
रविन्द्र को त्याग दिया है, वह उसके यहाँ कभी नहीं
जाएगी/ मैंने उसका इस समय का इरादा पूछा तो
वह बताने लगी कि वह मुझ पर शक करता है और
कहता है कि उसके पेट में पलने वाला गर्भ भी उसका
नहीं है/
                   जब मैंने जानना चाहा कि फिर वह गर्भ
किसका है/ इस पर वह बोली-- उसके सिवा भला
किसका होगा/ पर वह मुझे छोड़ने का मन बना चुका
है और मुझे साथ रखने को भी तैय्यार नहीं है और मुझे
हंटर से मारता भी बहुत है/ मेरी तस्दीक के लिए उसने
अपनी जांघ और कमर के वस्त्र खोलने चाहे, पर मैंने
सख्ती से मना कर दिया/
                  अब मैंने ज्यादा कुछ और सुनना और
कुरेदना न चाहा और समझ गया कि भाई- बहन का
इरादा मुझे फँसाने का है/ मैंने पूछा--- प्रभात मुझे बिठा कर कहाँ गया तो वह दरवाजा खोल कर अंदर
आया और कहा--- राजीव तुम्हारे लिए चाय बना रहा
था, अभी आया/ मुझे लगा वह छिप कर मेरी और
जान्हवी की बातें सुन रहा था/
                   जान्हवी से मैंने और कुछ नहीं पूछा पर
मैं इस बात को लेकर निश्चिंत था कि वह मेरा बच्चा तो
बिल्कुल हो ही नहीं सकता था, चुंबन से बच्चा पैदा
लेता है, यह मेरी बहुत पहले की सोच थी/ मैं खुद ही
आगे नहीं बढ़ा था नहीं तो जान्हवी सच में मेरा बच्चा
पालने को भी विवश होती और मुझसे ही जान्हवी की
शादी करने को उसका बाप भी मजबूर होता/ मेरी
सिधाई का नाजायज फायदा उठाने की उसके घर वालों ने सोची कैसे/ क्योंकि रविन्द्र ने अपने को
नपुंसक घोषित कर दिया था कि उसका बच्चा हो
ही नहीं सकता था/ फिर मैं सोचते-सोचते कि वह
बच्चा आखिर किसका होगा, मैंने दरवाजे को झटके
से खोला और बाहर निकल आया/

जिन्हें हम भूलना चाहें ( संस्मरण) किश्त(७)

जिन्हें हम भूलना चाहें  ( संस्मरण)
          किश्त(७)
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             जान्हवी के घर से निकल कर मुझे ऐसा प्रतीत
हो रहा था कि जान्हवी ने मुझे प्यार के तिमंजिले पर
चढ़ा कर अपनी दुर्भावनाओं की सीढ़ियों से नीचे धक्का दे दिया है/ इसके पहले मैं बदहवास और
अनियंत्रित हो जाता, संध्या ने मुझे अपने प्यार के
रिश्ते की डोर से मुझे संभाल लिया है/
            प्रभात अक्सर मुझसे मिलता रहता था पर
उससे मैंने जान्हवी की चार सौ की भूख के बारे में
बताया तो उसने मुझे बताया'', जान्हवी का प्यार डाली
से टहनी की तरह कभी भी टूट सकता था/ वह मेरे
साथ का सहारा लेकर यूनिवर्सटी में अपनी सहेलियों
पर रोब दिखाना चाहती होगी/' पर मैंने सोचा कि वह
ऐसा करना क्यों चाहती होगी, मेर साथ के एहसास
के साथ का रोब पहले ही पूरी यूनिवर्सिटी पर पड़ चुका
था/ हड़ताल में लगभग वह मेरे साथ ही थी, अखबारों में मेरे नाम के साथ उसका नाम भी निकलता था/ क्या यूनिवर्सिटी के लोग मुझसे अलग भी उसका
अस्तित्व नहीं जानते-समझते होंगे/ दूसरे मेरे समक्ष
उसने बिना किसी लाग-लपेट के अपने का समर्पित
कर दिया था/ वह यह भी जानती थी कि 150
लड़के- लड़कियों के बीच हम दोनों प्यार के मजबूत
रिश्ते से बँधे थे/
                   उसके अलावा डिप्टिमेंट में दो चाँद चेहरे
और भी थे पर सबपे जान्हवी भारी थी/ वे दोनों पंडित
घरानों की शान थीं, पर जान्हवी मेरी कास्ट को होते हुए भी क्यों किसी से नीचा देखेगी, यह मैं आज तक
नहीं समझ पाया था/ मेरे घर वालों ने कई बार जान्हवी और सन्ध्या को मेरे साथ देखा था, उनको कोई एतराज न था, होता तो मुझसे जरूर कहते, नहीं तो मेरा उनसे मिलना-जुलना ही बंद करा सकते थे/
पर ऐसा कुछ भी तो उनके मन में नहीं था/ भ्रम में तो
केवल जान्हवी के पापा ही थे, उनकी माँ भी मुझे पसंद
ही करती थी/
                मैं दो नावों पर एक साथ पैर नहीं रख सकता था/ जान्हवी तो कटे डाल की पंछी हो ही गई
थी/ मैं संध्या को किसी तरह से भी कोई हानि पहुँचाने
के पक्ष में बिलकुल भी नहीं था/ जान्हवी ने अपने दिलो-दिमाग पर से मेरे अधिकार को नकार दिया था
और सारा अख्तयार और दारोमदार अपने पापा को
दे दिया था/ एक बात जब मैं शांत मन से विचार
करता हूँ तो बिजली की तरह मेरे मस्तिष्क में कौंधती
है कि जान्हवी ने ऐसा क्या सोच के किया क्या वह तंगदिल या तंगहाल थी, और हर तरह से अपने पापा
पर ही निर्भर थी तथा उसकी कोई स्टाइपेंड 120 रू०
या पाकेट खर्च के लिए पैसे भी उसके पास नहीं थे/
उसकी बात का यही एक ठोस कारण मुझे लगा/ रहा
सवाल प्रभात का तो उसे मैं जान्हवी की तरह ही
अविश्वसनीय समझने लगा था/ मैं यह बात जानता
था कि जो बात मैं जान्हवी या प्रभात से नहीं कह
सकता था, उसे सन्ध्या से बताने में मुझे कोई संकोच
नहीं था/
               इससे पाठक गण यह न सोचें कि मैं अब
सन्ध्या से प्रणय-निवेदन करने की दिशा में अग्रसर होने वाला हूँ क्योंकि यहाँ परिस्थितियाँ विपरीत थीं/
बिना अपनी मर्जी उजागर किए बिना दोनों की मंडी
में नीलामी तय थी और उनमें किसी की बोली लगाना
तो दूर खड़े होने की भी हैसियत मेरी नहीं थी/
               मैं यह समझ गया था क जान्हवी के लिए
यूज एंड थ्रो वाला मात्र एक खिलौना था और संध्या
के लिए शतरंज की बिसात उसने बिछा थी/ अब दोनों
के बीच शह और मात का खेल चल रहा था/ जान्हवी
के लिए मेरे मन में संशय तो संध्या के लिए मोह पनप
रहा था/
              दूसरी बात संध्या जान्हवी से चार-पाँच साल
छोटी थी/ जान्हवी के बाद ही उसकी शादी का नंबर
आता था/ मैं उसके साथ ऐसा कोई कदम नहीं उठा
सकता था/ वरना उसका बाप मुझ पर कानूनी कारवाई करवा सकता था और तब जान्हवी भी मुझे
न छोड़ती/ उसके पास मेरे लेटर्स और कविताएँ थीं/
मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि उससे कभी मेरा अलगाव भी हो सकता था/
                   यूनिवर्सिटी में यही चर्चा आम थी कि
राजीव और जान्हवी के बीच ऐसा क्या हुआ कि जान्हवी अब तन्हां नजर आती है/ मेरे बारे में वह
अपनी सहेलियों से शायद यही कहती होगी कि
पापा को पसंद नहीं था/ वह शायद मेरे नाम के सहारे
मशहूर होना चाहती थी पर मेरी मंशा उसे सिर्फ अपनी
लाइफ- पार्टनर बनाने की थी/ हम दोनों की सोच में
यही विरोधाभास था/ यूनिवर्सटी जाती तो मेरे दोस्त
और उसकी सहेलियाँ उसका मजाक बनाते कि
राजीव को कहाँ छोड़ आई/ सबका सुनती और
अनसुना करते- करते उसने भी यूनिवर्सिटी जाना
बंद कर दिया/
                     इतना सब जान-समझ कर भी मैं
जान्हवी से दूरी बनाने की कोशिश करने लगा/ संध्या
से मिलने की लालसा तीव्र हो उठी पर मैं इतना टूट
चुका था कि उससे मिलने के लिए कोई बहाना न
तलाश सका/ कीडगंज जाना मैंने स्वयं छोड़ा था
और बिना किसी प्रबल कारण के वहाँ जाने वाला नहीं
था/ मेरे फाइनल ईयर के सारे नोट्स जान्हवी के पास
ही थे/ उससे माँगने में अपनी हेठी महसूस कर रहा था/ मैं नहीं गया तो वो भी मुझसे किसी भी बहाने से
मिलने तो नहीं आई/
                    प्रभात बीच में मुझसे मिलने आया था पर वह भी मेरी कुछ मदद नहीं कर सका/ उसका भी
बी०ए० का फाइनल ईयर था/
                    जब कभी मैं जान्हवी की फोटो देखता,
उसी में तल्लीन होकर सोचने लगता कि इतनी मासूम
दिखने वाली लड़की इतनी सख्त जां कैसे हो सकती
है/ उसका भोलापन और सादगी ही तो मुझे मार गई
थी/ मैंने उससे अपनी कोई बात नहीं छिपाई और मुझसे वह अपने दिल की हर बात छिपाने में कामयाब
हो गई, जबकि मैं फेस रीडिंग करना बखूबी जानता था/
                       अब उसे मैं बेवफा करार देते हुए कवितायें लिखने लगा--- फिराक से ज्यादा लज्जत
विसाले यार में नहीं/ मेरी कसौटियों पर यह लाइन
बिल्कुल खरी उतरती है/ दोस्तों के साथ साहित्यिक
गोष्ठियों में भाग लेने जाने लगा/ इस तरह मेरा
साहित्यिक सफर की शुरुआत हुई---
        जाहिर है सफर में कड़ी धूप भी होगी
         तुम तो सर पे आँचल का सायबाँ करना//
                            इस सफर को विस्तार न देते हुए मैं
मूल संस्मरण की ओर लौटता हूँ/
                           जान्हवी से मेरा मनमुटाव बढ़ता ही
जा रहा था, न वह झुकने को तत्पर थी, न मैं ही अपने
उसूलों से समझौता करने को तैय्यार था/
                          दूसरे वर्ष का इम्तहान सर पे था पर
पढ़ाई से मेरा मन उचट गया था/ मैं एडमिट कार्ड लेने
भी नहीं गया/ इम्तहान मैंने अगले वर्ष के भरोसे छोड़
दिया/ दूसरा साल मेरे लिए अजाब बन के व्यतीत हुआ/
                           एक दिन जब मैं अपने घर ऊपर के
कमरे में बैठा था/ मेरी छोटी बहन ज्योति आई और
बताया कि जान्हवी और उसकी माँ आई है/ मैंने उन्हें
ऊपर ही बुलवाया/ जाड़े के मौसम के सुबह ग्यारह
बजे की धूप छत पर बिखरी पड़ी थी/ बड़ी छत पर उन लोगों को फोल्डिंग पर बिठाया गया और वहीं
बगल में लगी कुर्सी पर मैं बैठ गया/ उन्हें चाय पेश
की गई/ जान्हवी की माँ ने बताया कि इम्तहान के
बाद यूनिवर्सिटी में मार्कशीट दी जा रही थी/ जान्हवी
अपना एडमिट कार्ड मेरी ओर बढ़ा कर बोली---
मेरी मार्कशीट ला दीजिएगा/ मुझे लगा कि वह
यूनिवर्सिटी जाने से बचना चाह रही थी/ मुझे एहसास
हुआ कि कहीं उसकी सहेलियों ने उसका साथ तो नहीं
छोड़ दिया था/ पहले तो मैं यही समझा था कि जान्हवी अपने बाप की रजामंदी लेकर मुझसे मिलने
आई होगी, क्योंकि उसकी माँ पहली बार मेरे घर पर
आई थीं/ मुझे अंदाज हो गया कि उसका बाप अपने
को अभी तक लड़के वाला ही समझ रहा था, उसके
गुरुर में कोई कमी नहीं आई थी/ पर ऐसा कुछ भी
नहीं हुआ और वे दोनों वापस भी चले गए/ जाते जाते
मार्कशीट घर पर पहुंचाने की ताकीद भी कर गए/
मैं समझ नहीं पा रहा था कि जान्हवी के पापा के साथ
साथ उसकी माँ को क्या हुआ है?
                     दूसरे दिन मैं यूनिवर्सिटी गया और अपने
दोस्तों के साथ मेल मुलाकात की/ दोस्तों ने जान्हवी
का हाल चाल पूछा तो मैंने बता दिया कि न तो कभी जान्हवी ने मेरे सामने शादी करने का प्रस्ताव रखा और
न मैंने ही कभी उससे शादी करने को कहा, हम दोनों
विरोधाभास के कठपुतले हैं, जिसकी डोरें उसके पापा
की उंगलियों के बीच है, उससे वह सबको नचाने का
उद्यम करते हैं, पर हासिल कुछ नहीं होता/
                   जान्हवी की मार्कशीट लेकर उसे मैं उसके
घर गया/' रायल डिवीजन' में वह पास वह हुई थी और उसकी" यूनिवर्सिटी लाइफ" उस दिन से उसके
घर वालों के द्वारा समाप्त कर दी गई थी, कारण मुझे
ज्ञात नहीं था/
                     उस दिन जान्हवी ने मुझे चाय पीने के लिए रोका और चाय और नमकीन लाई/ पहली बार
उसने मेरे लिए चाय बनाई भी थी और बिल्कुल मुफत
पिलाई भी थी/ हर्षातिरेक से मैंने उसे पहले की तरह
ही चूम लिया/ अब रोमांस तो क्या वह मेरे एक स्पर्श
के लिए भी तरस रही थी/
                    उसने बताया कि पापा ने उसकी शादी
के लिए लड़का ढूँढना शुरू कर दिया है/ मैंने कहा,
" मुझसे अच्छा हो तभी करना, नहीं तो लाइन में मैं
तो लगा ही हूँ/ " उसने मुस्करा कर कहा," जलन
हो रही है?' मैंने कहा,' स्वाभाविक है/' वह मेरा
हाथ पकड़ कर बरामदे के दरवाजे तक छोड़ने आई
और फिर आने को कह कर वापस लौट गई/ संध्या
को मेरी बेताब नजर सरगर्मी से तलाश रही थी पर
वह कहीं मुझे नजर नहीं आई/
                     प्रभात मुझसे अक्सर मिलता रहता था/
मैंने उससे बता दिया था कि नौकरी मैंने छोड़ दी थी/ छोटा भाई विकास अब मेरे यहाँ नहीं आता था, क्योंकि उसे खिड़की पर रेजगारी या पैसे अब पड़े नहीं मिलते थे, अब वह मेरे साथ घूमने जाने के लिए भी
नहीं आता था क्योंकि मेरी जेब में अब फालतू के पैसे नहीं रहते थे/ सब कुछ असामान्य सा हो गया था, फिर भी मैंने लिखना नहीं छोड़ा/ यह सबकुछ बिना
पारितोषिक था/ फ्री फंड का पास टाइम था/ भविष्य
का कोई निश्चित कार्यक्रम नहीं था/
                    मुझे कहीं से खबर लग गई कि जान्हवी
की शादी तै हो गई है/ 

‌‌जिन्हें हम भूलना चाहें--- संस्मरण किश्त ( ६ )

‌‌जिन्हें हम भूलना चाहें--- संस्मरण
             किश्त ( ६ )
******************************

मैं सन्ध्या की बात का मतलब समझ रहा था पर बोला
--- मुझे विकल्प की कोई जरूरत नहीं/ अकेल भी
जिन्दगी बसर कर लूँगा/
                पाठकवृंद, आप मुझे शायद पत्थर दिल
इंसान समझ रहे होंगे, जो मैं संध्या के प्रति इतना
कठोर रवैया अपना रहा था/ यदि मेरा दिल मोम का
न बना होता तो जान्हवी के प्रेम की आँच से पिघल
कर इतना विवश न हो गया होता तथा हकीकत
जानते, समझते हुए भी सन्ध्या की तरफ आकर्षित
होने से अपने को रोक रहा था/ कारण था कि 
जान्हवी के साथ के लिए तो उसके पापा से लड़ने में बड़ी प्राब्लम थी, मैं सिद्धांत वादी तो वो रूढ़ प्रकृति
के थे, यदि संध्या का हाथ अगर मैं उनसे माँगता तो
परिस्थितियाँ और भी भयंकर होने की पूर्ण संभावना
से इंकार नहीं किया जा सकता था/
                 जान्हवी ने मुझे इक रोज पढ़ाई के दौरान
मुझे बताया था कि पापा ने उसको पढ़ाई के लिए साथ के लिए, उसके ब्वायफ्रेंड के साथ कोई शर्त
लगा दी थी कि वह शादी करेगा तो संध्या से ही करेगा/ हाँलाकि उस समय उसकी औकात 120 रू०
की भी नहीं थी/ वह नौकरी भी न करता था, कोई
खूबसूरत भी नहीं था/ पर उसके पापा को पटाने में
कामयाब हो गया था/ घर के अंदर और बाहर न
अकेले न ही संध्या के साथ ही कभी देखा था/
उससे परिचय होने की कभी कोई मौका भी मेरे
हाथ न लगा था/
                   अगर जान्हवी के पापा ने चाहा होता
तो उनकी शर्तों पर मैं भी खरा उतरता/ कारण कि
उनकी चारों लड़कियों में जान्हवी सबसे खूबसूरत थी,
पर दामादों में खूबसूरती में मैं किसी से कम न था/
उसके चाचा जी तो पी कर कहीं सड़क या घर में अपने कमरे में लुढ़के होते थे पर उसके पिताजी बिना
पिए ही न जाने किस सुरूर में गर्वित रहा करते थे/
120 रू० की बात ही कुछ इस तरह शायद उनके पास पहुँची थी कि मेरे लिए ही जानबूझ कर जान्हवी
के कमरे में आए थे और मुझे आने से मना किया था,
पर वो ये समझ भी न सके कि 120 रू० स्टाइपेंड थे,
वह मेरी कोई तनख्वाह नहीं थी और वो ज्यादा से
ज्यादा साल भर के लिए ही थी/ पढ़ाई के साथ मुझे
पाकेट खर्च भी मिल जा रही थी/ इसका उनकी नजरों
में कोई औचित्य नहीं था/
                उन लोगों तक अपनी नौकरी लगने तक
यह रहस्योद्घाटन मैं किसी शुभ मुहुर्त के इंतजार में ही
रखना चाहता था/ संध्या के इतने समर्पण भाव के
बावजूद मैं उसे अपने साथ बँधे रहने को नहीं कह सकता था/ जान्हवी मिले न मिले, संध्या को अपनाने
में उसका बाप नीचताई की हर हद पार कर जाता/
                सन्ध्या ने एक बार, जब मैं ऊपर छत पर
बैठा था और अकेला था, मुझसे कहा था कि जिससे
उसके पापा का मेरी शादी को लेकर कमिटमेंट है,
उसका पैर अपेक्षाकृत बड़ा था/ मैं समझ गया कि
उसने यह बात मुझसे क्यूँ कही थी/ उसके बाप ने
अपनी शर्तें तो जमाई राजा को बता दी थीं, पर उसकी शर्तें नहीं पूछी थी/
                 जब मैं उसके बाप से जान्हवी के लिए
ही भिड़ने से कतरा रहा था तो फिर संध्या को भगा
ले जाने में अपने को असमर्थ पा रहा था, जान्हवी
भी मेरे साथ जाने को तैयार नथी/ अपने बाप के समक्ष उसकी खामोशी मेरे लिए नजीर थी/ संध्या में
मैंने सागर की गंभीरता देखी थी पर जान्हवी के प्यार
का उफान उथले हुए समंदर की तरह छिछला था/
समंदर की लहरों से सिर्फ दिल ही बहलाया जा सकता था, उसे पिया नहीं जा सकता था/ प्यार का
मोती तो कही सागर की गहराइयों में ही पाया जा
सकता था/
                  लिहाजा मैंने जान्हवी से बात करने की
सोची और सन्ध्या को उसके कमरे में बुलवाया/ और
उससे यही पूछा कि उसके होते हुए उसका विकल्प भी ढूँढ़ना चाहिए, क्यूंकि वह मेरा साथ लगता है कि
नहीं देगी/ उसने संशंकित नजरों से सन्ध्या की तरफ
देखा और मुझसे पूछा कि क्या उसके प्यार पर मुझे
कोई शुब्हा है क्या/ तो फिर तुम अपने पापा से खुल
कर अपने दिल की बात क्यों नहीं करती/ जिन्दगी
पहले है कि पढ़ाई पहले है, जिन्दगी (प्यार ) ही न
रही तो पढ़ाई का क्या अचार डालोगी-- मैंने कहा/
वह बोली--- पापा मुझको आपको लेकर अभी गंभीर
नहीं हैं, न ही अभी मेरी शादी की उन्हें कोई जल्दी है/
मैं जानती हूँ कि पापा मेरा भला ही सोचेंगे/
                इस जवाब से मैं स्तीभर आश्वस्त नहीं हुआ/ मुझे संध्या की बात में सच्चाई का आभास
होने लगा था/ जान्हवी खुले तौर पर पापा का पक्ष
ले रही थी कि उसके पापा उसका भला ही सोचेंगे/
मैंने फिर पूछा---- क्या वे तुम्हारी शादी 120 रू० वाले से करना कभी पसंद करेंगे/ इस बात पर बिना
किसी हिचकिचाहट के जैसे उसने कोई निर्णय कर
लिया हो बोली--- कर भी सकते हैं और शायद नहीं
भी/
                फिर मुझे उससे कोई प्रश्न नहीं पूछना था,
मैं समझ गया कि वह मुझे धोखा देगी/ अब विकल्प का तो क्या मैं सचेत होकर सिर्फ और सिर्फ संध्या के
बारे में ही सोचने लगा और जान्हवी के घर जाना छोड़ दिया/

जिन्हें हम भूलना चाहें( संस्मरण) किश्त(५)

मैं जान्हवी का हाल जानने संस्कृत
विभाग जा पहुंचा/ सीढ़ियों से उतर कर वह फौरन
मेरे पास आई और बताया कि पेपर वाक- आउट हो
गया है/ 
              जिन्हें हम भूलना चाहें( संस्मरण)
                         किश्त(५)
              ***************************

                          यही हाल हिन्दी डिपटिमेंट के साथ ही संस्कृत डिपार्टमेंट तथा एन्शियंट हिस्ट्री डिपार्टमेंट का भी था/ बाकी यूनिवर्सिटी का मुझे पता नहीं/ हम
तीन- चार दोस्तों ने मिल कर मीटिंग की और हिन्दी
डिपार्टमेंट की ओर से हड़ताल का ऐलान कर दिया
गया इस आवेदन के साथ कि पहला पेपर फिर से
कराया जाय/ हम लोगों के साथ- साथ संस्कृत
डिपार्टमेंट और एनशिएंट हिस्ट्री डिपार्टमेंट भी हड़ताल
में सम्मिलित ले गए/
                           सम्मिलित मीटिंग के पश्चात यह
निश्चित किया गया कि अपनी माँग के साथ छात्र- छात्राओं के हस्ताक्षर समेत कागज भी वी०सी० को
सौंपे जाएँ/ इसके लिए सबसे कन्टैक्ट करने का काम
शुरू किया गया/ रोज मीटिंग करते और पेपर में
निकलवाते/ इन सब बातों में करीब डेढ़ महीने निकल
गए/ हड़ताल को लंबा खिंचता देख हमारे साथ आए
आगंतुक डिपार्टमेंट्स ने अपनी ओर से ही हड़ताल
वापसी का ऐलान कर दिया/ स्तंभित हो हमारे हिन्दी
डिपार्टमेंट के साथियों ने भी साथ छोड़ना शुरू कर दिया/ हफ्ते भर और बीतते न बीतते लम और शरत
अकेले बचे तो हम लोगों ने वी० सी० से मिल कर
अपनी बात रखने की सोची/
                            और एक दिन शाम के वक्त मैं और शरत वी० सी० से मिलने पहुँच गए/ वहाँ जो
बात हुई उसका सार- संक्षेप यही है कि वी ० सी० ने
हम लोगों को नेता की उपाधि से नवाजा/ उन्हें
हड़ताल वापसी की खबर मिल चुकी थी अब वह
हम दोनों को भी तौल रहे थे पर हम लोगों ने अनुरोध
किया कि हम सिर्फ और सिर्फ छात्र हित में आपसे
मिलने आए हैं/ हम लोगों के दो से ज्यादा प्रश्न हल
होने से रह गए हैं/ और हमें नेता बनने की कोई चाह
नहीं है/ उन्होंने हम दोनों से नाम पूछे जो हमने बदल
कर बताए/ वी० सी० साहब भी समझ गए थे कि
हड़ताल अब समाप्ति के कगार पर है और छात्रों को
दबाने का पूरा बन्दोबस्त उन्होंने कर रखा था/ हम
उन्हें समझाने में बुरी तरह असफल हो गए थे/
                        दूसरे महीने के अंत तक शरत मेरे
पास आया और बताया कि उसके पास चीफ- प्राक्टर
का धमकी भरा पत्र आया है/ हमें यह समझने में देर
न लगी कि किसी ने हमारी सही-सही शिनाख्त की०सी० साहब से की है/ तीन- चार दिन बाद मेरे
पास भी उक्त आशय का लिफाफा आया/ मैंने शरत
से कहा कि अब वह दूसरे पेपर की तैय्यारी करे क्योंकि आगामी इम्तहान की घोषणा हे चुकी है/
                           शरत बिना मुझसे बताए की०सी० ते जाकर मिल आया और मुझे बताया कि मैं भी अब जाकर वी० सी० से मिल लूँ क्यूँकि वह कह रहे हैं कि राजीव से कह दो कि एक बार आकर उनसे
मिल लूँ/ शरत के बार- बार आग्रह करने पर मैं समझ गया कि वह वीसी से मिल कर अपनी रोटियाँ सेंक आया है/
                            पर मैं वी ० सी० से मिलने नहीं
गया और निर्विकार भाव से बाकी के तीनों पेपर दे आया/ मेरा वाइवा मेरे संपूर्ण क्रांति में सहयोगी रहे प्रोफेसर ने खराब करवा दिया, क्यूँकि इग्जामनर
बाहर के थे और उनके पूछने के बजाय मेरे कभी के
सहयोगी रहे मित्र ने मेरा वाइवा लिया और मेरे सही
जवाब को भी नहीं में करार करते रहे/
                                फिर भी मेरे नंबर अच्छे थे और मेरा नाम टाप टेन में था/
                             एम०ए ०( फाइनल) में मैं
यूनिवर्सिटी बीच- बीच में ही जा पाता था/ कारण कि
मेरा आफिस भी था और अब आफिस से मैं बिना
प्रापर एप्लीकेशन के गायब नहीं हो सकता था/ पर जान्हवी मिलने रोज शाम को उसके घर पर जाया
करता था और उससे नोट्स लेकर अपने नोट्स
बनाया करता था/ इस दौरान न जाने कितनी बातें-
वारदातें मेरे और जान्हवी के दरम्यान हुई/ कुछ याद
रह गईं, कुछ जान बूझ कर भुला दी गई/
                                 इसी बीच मुझे बता लगा कि सन्ध्या जान्हवी की बुराई और अपनी अच्छाई ही मुझसे बयान करती थी/ चूँकि मैं शाम को जाता था
और प्रभात भी शाम को ही खाना खाने के वक्त अपनी माँ बहनों से मिलने आता था/ उसकी मुझसे
प्रगाढ़ मित्रता ले गई थी और वह मुझे शाम का नाश्ता
चाय अपने साथ ही कराता था/ उसकी माँ भी बड़े प्रेम से एक अंडा उसके पापा के लिए और एक मेरे
लिए रोज मँगवाती थीं, जिसे मैं दो पराँठे के साथ खाता था और सन्ध्या हम लोगों के लिए चाय बना
लाती थी/
                                पढ़ने के अब जान्हवी भी
अक्सर मुझे अपने साथ ऊपर ले जाती थी, जहाँ
प्रभात और उसकी माँ हमारे इंतजार मे होते थे/
उसके पापा और विकास भी होते थे और मैं कमरे
और रसोई के बीच पड़ने वाले छत पे प्रभात के साथ
बैठता था/ रहा सवाल संध्या का तो वह शायद ही कहीं जाती थी/ नाश्ता तथा खाना बनाने में वह अपनी
माँ के साथ लगती थी/ एक बात मैंने गौर की थी कि जान्हवी ने कभी एक कप चाय भी मुझे बना कर नहीं
पिलाई/ संध्या को जूठे बरतन भी कई बार मैंने माँजते
देखा था/
                               आँखें दिल की जुबान होती हैं और यही कुछ सन्ध्या की आँखों में तिरता हुआ हमेशा
साफ- साफ मुझे नजर आता था/ एक तो उसका, मेरा लेटर जान्हवी को न देना मेरे सन्देह को और पुष्ट करता था, जिसके लिए वो जान्हवी से डाँट भी खा
चुकी थी/ पर उस समय वह मुझे आफत का परकाला लगती थी/
                                    उसने मुझसे जान्हवी की
शिकायत भी की थी कि वह कोई काम नहीं करती
और झाडू-बुहारु से लेकर बर्तन माँजने तक का हर काम वह स्वयं करती है/ अतिथि-सत्कार भी उसी
के जिम्मे है/ मैंने उससे पूछा था ," यह सब काम तुम
अपने मन से करती हो या तुमसे करवाया जाता है?"
तो वह बोली," अपने मन से न करूँ तो माता जी
खाने को भी न पूछें और मारें अलग से/" मैं यह
सुन कर सहम गया और सन्ध्या के प्रति मैं मोह से
भर उठा/
                        जान्हवी आई मेरे पास तो उससे किसी दूसरे रोज मैंने कहा," घर के काम में हाथ बँटाया करो नहीं तो तुम्हारे सुकुमार बदन में जंग लग
जाएगी/" इतना सुनते ही वो तपाक से मुझसे तमतमा
कर पूछ बैठी कि ऐसा मुझे संध्या ने कहा है क्या? पर
मैंने उसे कोई जवाब नहीं दिया/

पढ़ाई के दौरान मैं जान्हवी की आँखों में मतला ढूँढ़ने की कोशिश करता था उसके बाद अशआर के साथ मकता भी उसके रजिस्टर पर लिख
देता था/ ऐसी कितनी ही गजलें मेरी बेपनाह मुहब्बत
का सुबूत बन कर उसके दिलो-दिमाग में जज्ब थीं, जिन पर वह कमेन्ट भी करती थी अपनी सुमधुर आवाज के साथ/
                  एक दिन मैं, छुट्टियों के दिन सबेरे-सबेरे सायकिल से ही पीला गुलाब अपने दायें हाथ में लेकर उसके यहाँ जा पहुंचा/ जान्हवी तो सामने नजर नहीं आई पर मेरी आहट पहचानने तथा आवाज की कशिश की दाद देने वाली सन्ध्या लपक कर मेरे पास
आ गई और गुलाब लगभग छीनते हुए कहा---
शायद यह मेरे लिए है और अपने गुलाबी होठों से लगा कर बोली, खुशबू कितनी अच्छी है/ आखिर
सन्ध्या से मैं पूछ ही बैठा कि उसे फूल की खूबसूरती
पसंद है या खुशबू तो वह बोली पहले पता तो लगे---
कौन फूल है और कौन खुशबू/
                   मैंने इस बात का कोई जवाब न दिया, इस प्रश्न को जानबूझ कर अनुत्तरित रहने दिया/ उसकी हाजिजवाबी और चुलबुली अदाओं से मैं दंग
था-----
           कल तक जो थीं बेजुबान,
           छूटते ही दे रहीं जवाब/
           सूरत भी चाहिए सीरत भी,
           गुल भी चाहिए और नकहत भी//
                        मैंने उससे इतना ही उसका आशय
लगभग भाँपते हुए कहा---- सिर्फ और सिर्फ जान्हवी
का ही मेरे पर अधिकार हो सकता है, किसी और का
नहीं/ यदि तुम्हारे पापा ने जिद ही ठान रखी है तो दो
जिन्दगियों से वो खेल रहे हैं/ अगर मेरी किस्मत रंग लाई तो जान्हवी मुझे जरूर मिलेगी, अगर उसने साथ
दिया तो/ इस पर वह बोली--- अगर साथ न दिया तो क्या आपके पास दूसरा विकल्प भी है/ नहीं है तो होना ही चाहिए/ पापा का स्वभाव मैं जानती हूँ जो
आप समझ रहे हैं, वैसा कतई संभव नहीं हो पायेगा/
                          I understood what he meant but said, "I don't need any alternatives, I can live my life alone."

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!