Wednesday, May 13, 2026

अभिचान पार्ट -३

तो वह बोली,' तुम्हारी ही चीज हूँ, मुझे अपनी बाहों का सहारा दो रतन!' उसका यह वाक्य मुझसे चीख-चीख कर कह रहा है कि मुझे अब और अपना प्यार लुटाने के लिए क्या सुनने की इच्छा है/ चंदा ने
तो खुल्लम खुल्ला अपना समर्पण मेरी आगोश में
झोंक दिया है/ यह जान कर हैरत भी हुई कि चंदा ने मुझे पहली बार मेरा नाम लेकर पुकारा और प्यार की
इंतहाई है कि वह मुझसे आपसे तुम पर उतर आई है/
क्यूँकि उर्दू शायरी में आप से तुम और ज्यादा अपनापन होने पर तू और तेरा लफ्जों से ही संबोधन
ज्यादा ही आत्मीयता दर्शाता है/ उसका मेरे प्रति यह अपनापन उसके उत्कट प्रेम की तीव्रता को ही दर्शाता है/
                   इस समय उससे मैंने इतना ही कहा,
' मैं भी तुम्हारा ही हूँ पर अभी नहीं, जब तक कि
सामाजिक और आधिकारिक रूप से तुम मेरी ब्याहता
नहीं बन जाती/' चंदा ने इतना और कहा,' मेरे माता-
पिता से मुझे माँग लो/ मुझे उम्मीद है, मेरी खुशी के लिए वो मना नहीं करेंगे/ तुम्हारे भरोसे मुझे कहाँ-कहाँ तुम्हारे साथ नहीं भेजा/ उनकी भी यही इच्छा रही होगी/'
                      मैंने उससे बताया कि पहले अपने मम्मी-पापा से बात कर लूँ फिर मैं तुम्हारे साथ बनारस भी चला चलूँगा/ इस बात से वह सहज हो गई और बोली,' मैं तुम्हें पा कर कहीं खो न दूँ, मुझे बस यही डर है'/ मैंने उसे आश्वस्त किया और अँधेरा छाने से पहले ही हम घर की ओर लौट पड़े/
                      मैंने उससे यह नहीं कहा,' अभी मैं
तुम्हारी दिली इच्छा पूर्ण कर दूँ/ फिर तुम कोई दूसरी
फरमाइश कर दो तो करने न करने के ऊहापोह में मैं
फँसा रहूँगा/ करता हूँ तो अपनी नजर में गिरता हूँ, नहीं करता तो तुम्हारी बात न  मानकर फिर भी अपनी
नजर में गिरता हूँ/ आज तक मैंने ऐसा कोई काम नहीं किया, जिस कारण मैं अपनी ही नजर में गिर जाऊँ,
भले जमाने ने मेरी झूठी बदनामी करने में कोई कसर
न छोड़ी हो/ अपनी नजरों में स्वयं गिरने वाले ही अवसाद के अंधे कुए में गिरकर आत्मघात तक कर
लेते हैं/ और तुम्हें खोकर या पाकर भी अपनी नजर
में गिरने का मलाल नहीं पाल सकता/' यह मेरी अपनी
सोच थी/ जो मैं चंदा से किसी हाल नहीं कह सकता था/
                         चंदा की योजना मैंने माताजी को बताई और उसके घरवालों से बात करने को कहा/
एक बात उन्होंने मुझसे कही कि मुझे भी अब गृहस्थी के लायक बनना पड़ेगा और अपने पैरों पर खड़ा होना
पड़ेगा/ यही बात उन्होंने पिताजी से भी कही/ लिहाजा मैंने कोई बंधन स्वीकार करने के पहले ,
अपनी छोड़ी पढ़ाई पूरी न करके मैंने नौकरी ज्वाइन
कर ली/ माताजी का मंतव्य था कि फिलहाल तो चंदा
को बनारस छोड़ आऊँ फिर उसके बाद उसके घरवालों से बात की जाएगी/
                          मैंने भी यही लाजिमी समझा और
एक दिन चंदा से मशविरा कर के हमने सबेरेवाली गाड़ी बनारस के लिए पकड़ ली/
                          बनारस जाकर मैं सीधे जौहरी जी
से मिला और उनसे अपने माता- पिता की दिली इच्छा बताई/ वह एक प्रसन्नचित और स्वस्थ व्यक्ति मुझे लगे/ उन्होंने मुझसे कहा,' हम लोगों की भी यही राय थी'/ उनकी पत्नी ने कहा,' हम इलाहाबाद आकर जल्द ही आपके घरवालों से मिलेंगे और वो मुझे
आशातीत खुशी देकर अपने लोगों के साथ रहने की मिन्नत करने लगे/ पर मैंने अपनी नौकरी की बात बता कर उनसे लौटने की इजाजत मांग ली/
                        चंदा मेरे साथ ही आने को तत्पर थी
मैंने उसे समझाया कि कुछ रोज की बात है अपने माता- पिता के साथ ही आना क्यूँकि उसके पापा ने
बताया था कि चंदा उनकी इकलौती संतान थी और उसे उन लोगों ने बड़े नाजों से पाला है और उसकी
हर इच्छा का मान रखा है/ मैंने उनसे कहा था,' आप लोग मेरी ओर से निश्चिंत रहिए/ मेरे साथ चंदा को
कभी किसी किस्म की तकलीफ नहीं होगी/ मेरी माताजी अभी से उसे अपने घर की लक्ष्मी मान चुकी हैं/
                        मैंने चंदा के घर को शादी के पहले
ससुराल समझने की भूल कतई भूल नहीं की/ और
उन लोगों को इलाहाबाद आकर मेरी माँ और पिताजी से मिलने को कहा और इलाहाबाद चला आया/
                       सीधे शब्दों में कहूँ तो यह शादी बहुत ही सादगी भरी और नपी-तुली थी/ न कोई लेन-
देन का सवाल था और न ही किसी की नाक का सवाल था/ देखी गई थी तो सिर्फ मेरी और चंदा की
खुशी/
                       छुट्टियों में अक्सर मैं चंदा के साथ बनारस जाता और फिर साथ- साथ ही लौट आ आते/ चंदा न मेरे बिना कहीं ठहर सकती थी और न
मैं चंदा के बिना/ हम एक दूसरे से जुदा कभी न हुए/
                       पहली रात मेरा उससे पहला सवाल था,' मुझे पाकर क्या तुम खुश हो?' उसने मेरे कंधे पर
अपना सर रख दिया और मेरे हाथ अपने सीने पर रख
कर बोली,' सुन लीजिए, मेरी धड़कनें क्या कहती हैं/
खुशी बताने की चीज नहीं वरन महसूस करने की चीज है/' और मैंने उसे जमुना किनारे तो टाल गया था पर अब वह सिर्फ मेरी है, अब सिर्फ इस अहसास से ही आज उसको अपनी बाहों की गिरफ्त में कस कर
बेतरह चूमा और उसकी आँखों में मुझे नीली जमुना
फिर चमकती दिखने लगी और मुझे अहसास हुआ कि चंदा को पाना ही मेरा अस्ल में मुकम्मल अभियान
था/

वो मुखातिब भी थे, और मेरे पहलू में भी,
हमने भी रात उनकी जुल्फों के साये में काटी/
कसम खाई है हमने, एक दूसरे से न होंगे जुदा,
चाहे मिलन में रात को हो या दिन की लाचारी//

                        और हम दोनों दूधिया रौशनी में दो
जिस्म और एक जाँ हो गए//

                  राजीव रत्नेश
         """"""""""""""""""""

अभियान पार्ट-टू

                              गाँव के घर से करीब दज गज
के फासले पर हमारा बाबा- आजम का गढ़ अवस्थित है, जिसके ऊपर एक हवादार कमरा है, खिड़की में केवल छड़ें ही लगी हुई हैं/ उसमें एक आलमारी सुराही गिलास आदि रखने के लिए बनी हुई है/ एक पलंग भी आरामगाह की दृष्टि से वहाँ लगा हुआ है/
हमारा सेवक वहाँ रोज लड़ू-बुहारू करता है/ हम लोग आते हैं तो निश्चित तौर पर वह हमारी आवभगत के
लिए तत्पर होता है/ गढ़ के चारों ओर गहरी खाई है, जिसमें बरसात में पानी भर जाता है/ एक रास्ता खुला
रखा गया है, गढ़ से घर तक पहुँचने के लिए/ उस खाई में ढेरों पेड़ लगे हुए हैं, जिनमें बहुतायत से ताड़ के पेड़ हैं/ हम वहाँ गर्मियों के मौसम में गए थे और बरसात शुरू होने के पहले निकलने के मूड में हम थे भी नहीं/
                        हमारे बगीचे में गढ़ एक तरह का टापू है/ हम गढ़ पर ही ठहरे हुए थे/ हरकारे रोज ताड़ी खींचते और दो मर्तबान हमारे कमरे की आलमारी में रख देते/ रोज सबेरे हम अंकुरित चने के साथ ताड़ी पीते थे/ ग्राम प्रवास के दौरान हमारा रोज का यही कार्यक्रम होता था/ दोनों टाइम का खाना आ जाता और हम पानी की जगह ताड़ी प्रयोग में लाते थे/ और
बेसुध होकर सोते थे/ दो सप्ताह में ही मैं तो लाल हो गया था/ चंदा तो पहले से ही लाल थी अब और भी सुर्ख हो गई थी/
                         हम फुरसत में कभी खेतों की ओर निकल जाते, कभी बाग बगीचों में घूमते और अपने
बगीचे के सुनहरे आम और काले जामुन मँगवाते और कभी साथ भी ले आते/ कभी- कभी रात में हम खेतों के बीच मचान पर बैठते और शीतल हवाओं में चाँद को निहारते हुए, अपनी- अपनी कल्पनाओं में खोकर
सो भी जाया करते थे/ नींद खुलने पर नित्य कर्म के लिए घर पहुँच जाते/
                          सिंचाई का साधन उस समय कुएँ से रहट से ही था, जिसमें बैल जोते जाते थे और वहीं पास में ही ईरव पेर कर बड़े से कड़ाह में गुड़ बनाया जाता था/ कभी- कभार हम ईरव का रस भी पीते थे और बड़ी शान से कुँए की जगत पर बैठ कर आनंदित होते थे/
                           दिन में अक्सर हम बाहर ही रहते थे अपनी रिपोर्टिंग के लिए और कभी अपने रिपोर्टर दोस्त से मिलने उसके आफिस भी पहुँच जाते थे/
यथा सामर्थ्य वह आवभगत करता और खबरों का आदान-प्रदान करता/ अपने अभियान के बारे में
हम उसको उकसाते और वद मौजूदा हालत पर
बिफर पड़ता था/ उसके वहाँ होने से हमको भी मसाला मिल जाता था और बिना हींग- फिटकरी के रंग जम जाता था/ चंदा उसे भइय्या कहती, जिससे वह चिढ़कर पेट में की खबरें भी निकाल देता था/
                           हमारा अभी कुछ दिन और वहीं
टिके रहने का प्रोग्राम था कि इलाहाबाद से मेरा मित्र भारत भूषण बलिया आया और उसने हमारे संयोजक शर्माजी का मेसेज हमें दिया कि इमर्जेन्सी खत्म हो गई है और जेनरल इलेक्शन की घोषणा हो चुकी है/ हमें अब लौट आना चाहिए/
                             मुझे समझ नहीं आया कि अभी भी हम अपनी मुहिम से कितनी दूर थे/ असली काम
तो अभी बाकी था जन- जन को मताधिकार के लिए प्रशिक्षित करना/ भारत भूषण से अपने लौटने की सूचना मैंने भिजवा तो दी/ पर अभी मेरा दिल लौटने की गवाही नहीं दे रहा था/
                              रात को मैंने चंदा को बताया कि इलाहाबाद से मेसेंजर आया था और मुझे वापस बुलाया है/ मैंने उसे बताया कि सर्वहारा प्रतिनिधियों से मिलकर उनको उनका कर्तव्य समझाना और रोज कुँआ खोद कर पानी पीने वालों को उनको उनके मत का अधिकार समझाना का मुख्य कार्य तो अभी शेष है/ चंदा ने सुझाव दिया कि हमें आदेश का पालन तुरंत करना चाहिए/ हो सकता है वहाँ कोई नई मुहिम हम लोगों के इंतजार में हो/ बलिया और बनारस हम
फिर आ सकते हैं/ उसकी दूरदर्शिता पर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ/ इसी कारण तो उसे मैंने अपना सहयात्री बना रखा था या सच कहूँ तो वह मेरी सारथी थी, जिसके हाथ में मेरे रथ के घोड़ों की लगाम थी और इस महासमर में वह मुझे सलाह दे रही थी/
                     सुबह होते ही मैंने गाँव वालों से घोषणा कर दी कि कुछ दिनों के लिए हम इलाहाबाद शहर जा रहे हैं/ तब तक अपना- अपना काम मुस्तैदी
से करें/ कुछ दिनों बाद हम फिर लौटेंगे/ हमने अपनी-
अपनी अटैची में कपड़े ठूँसे और कंधे पर गाँधी झोला लटकाए सफर को तत्पर हो गए/
                     हम लोगों ने इलाहाबाद की धरती पर कदम रखा और सीधे घर गए/ चंदा को देख कर मेरा
छोटा भाई लोट-पोट था/ घर वाले बेहद खुश थे पर
एक बाधा थी कि चंदा उन सब के साथ क्या एडजस्ट
कर पाएगी/ शुरू से मेरे साथ वो स्वतंत्र रूप से रही थी पर अपने कमरे में उसको अपने साथ रखना उचित नहीं था/
                    माँ ने मुझसे पूछा तो मैंने कहा,' चंदा से ही पूछ लो, शायद उसे तुम लोगों के साथ कोई एतराज न हो'/ पहले से उन लोगों को सूचित करना संभव नहीं था/ क्यूँकि पत्र पहुँचने में महीनों लग जाते था और हमारा आने का प्रोग्राम तो अकस्मात बना था/ उन्हें मैंने चंदा की कैफियत बताई तो उसे अचानक पुत्रवधू के रूप में पाकर वह अंदर ही अंदर प्रसन्न बहुत थीं, जो उन्होंने पिताजी से जाहिर किया/
                     दूसरी शाम मैं शर्माजी से अपनी उपस्थिति दर्शाने गया तो उन्होंने स्पष्ट किया कि इलेक्शन होने वाला है और असली मुहिम हमारी अब
शुरू होने वाली है/ उन्होंने बताया कि सभी सहभागियों की वो एक मीटिंग रखना चाहते थे सो मुझे बुलवाया था/ और मतदान प्रशिक्षण का अभियान वो चलाना चाहते थे, जिसमें एक बार फिर
हमें एक जुट होना होगा/ हमारे सारे बुद्धिजीवी भाई जेलों से बाहर आ चुके थे/ मैंने उन्हें एवमस्तु कहा और आगे के एजेंडा सुनिश्चित करने को कहा/ मैंने उनसे कहा कि मुझे कुछ दिन के लिए बनारस भी इसी मुहिम की औपचारिकताएँ पूर्ण करने और चंदा की बात उनसे शेयर की/ उन्होंने प्रसन्नता पूर्वक आज्ञा दे दी और मैं उनका आदेश शिरोधार्य कर बनारस जाने की सोचने लगा/
          और माता- पिता की आज्ञा से मैं चंदा को उससे राय करके बनारस आया और शर्माजी की मुहिम की बात सर्वसेवा संघ में प्रचारित करवाने के बाद उसके माता- पितासे आज्ञा लेकर उसे साथ ले इलाहाबाद लौट आया/
           सभी वालंटियर घर-घर जाकर लोगों से उनके मताधिकार की बात समझाते और हम सभी इसी तरह आम जनता को प्रशिक्षित करने का कार्यक्रम चला रहे थे/ इसी तरह इलेक्शन का दिन भी आ गया और हम सभी की मतदान केन्द्रों पर गेट के बाहर ही तैनाती भी हुई/ हमको किसी से भी सिर्फ मताधिकार का प्रयोग करने के सिवा कुछ भी कहने की मनाही थी/
              इलेक्शन का नतीजा घोषित हुआ और जनता दल की' जनता सरकार' सत्ता में आई/ भले
अल्पकालिक ही सही, पूरी दुनिया की यह पहली सरकार थी, जिसने गरीबों के बारे में, गरीबों के लिए भी सोचा और अपने प्रयासों से अपने विचार अमल में
भी लाए/ महात्मा गाँधी के राम- राज्य का सपना जो भी रहा हो इस सरकार से बेहतर नहीं था/ भारतीय-
इतिहास का यह स्वर्णयुग था/
                 हमारे अभियान का असर आज पचास वर्षों के बाद तक भी दिखाई पड़ता है कि प्रधानमंत्री से लेकर एक पार्षद तक, सड़क से लेकर संसद तक हर कोई हर किसी को उसके वोट का महत्व समझाता
है, विपरीत इसके भले ही वोट चोरी होती हो/ 
" राजनीति तेरा दिमाग एक हाथ हजार"/
                  जिसके लिए हम और चंदा एक हुए थे,
वह अभियान तो समाप्त हो गया था पर उससे भी भयावह स्थिति आने वाली है, हमने स्वप्न में भी नहीं
सोचा था/ आज की जनता, चुनावों की चक्की में पिसने को मजबूर है पर हमारा अब कर्णधार कौन है,
सही रूप में पहचानना अभी शेष है/
                   दोस्तों से मिल कर वस्तुस्थिति जानने की मैंने सोची तो पता चला कुछ तो अपने काम-धंधे
से लग गए थे/ कुछ बाहर नौकरी पर चले गए थे/ मौजूद थे तो हमारे संयोजक शर्माजी/ वो भी अब प्रेस
की गतिविधियों में व्यस्त थे/ मैंने सोचा, जिसके लिए मैंने और चंदा ने अपनी जवानी के चंद साल यूँ ही घूम-घूम कर खानाबदोशों की तरह गुजार दी/ अपनी
पढ़ाई को बीच में छोड़कर राजनीति के हवन- कुंड में 
झोंक दी/ क्या उस अभियान का यही हस्र होना था/
                    कोई तो संपूर्ण क्रांति का उत्तराधिकारी होता/देश भ्रष्टाचार से आकंठ लबरेज है/ तमाम
कुरीतियाँ सर उठा कर खड़ी हैं कोई तो अब सांत्वना
का अभियान छेड़ता जो सहभागी जेलों में प्राण त्याग बैठे उनकी अतृप्त आत्माएँ चीख-चीखकर अपनी
जिन्दगी का हिसाब मांग रही हैं/ कौन है जो उनकी
पीड़ा को समझे?
        कोई तो होगा खुदा का बंदा, जिसकी रहबरी में हम चलें/
        
कोई तो होगा खुदा का बंदा, जिसकी ताजपोशी कर
आगे हम बढ़ेंगे/
रास्ता तो बताए, छेड़ फिर से अभियान, आगे खानाबदोशी हम करेंगे//

                 मैंने चंदा से मशविरा किया तो वह बोली
' अकेले चना भाड़ नहीं फोड़ सकता/'
                  मैंने छप्पन इंच का सीना तान कर कहा,
' भड़भूजे की आँख तो फोड़ सकता है/'

उसने मुझसे कहा,' जो होना था हो गया अब हम लोग भी अब अपने को समेट लें और कोई दीर्घ योजना न
बनाकर एक दूसरे का हाथ पकड़कर भीड़भरा रास्ता क्यूँ न पार कर लें/ मेरी तो यही राय हमें अब अपने और अपनी जिन्दगी के बारे में सोचना चाहिए/'
                   एक दिन मैं चंदा के साथ शाम को घूमने
के लिए निकले/ घर से कुछ दूरी पर जमुना प्रवाहमान थीं/ वहाँ बेंच पर बैठकर, एक तो धीर- गंभीर जमुना का शांत पानी, ऊपर से बहती मदमाती हवा में उसके उड़ते केशों में मैं अपनी उंगलियां फिरा कर उन्हें स्थिर करने का प्रयास कर रहा था/ अस्ताचल की ओर झुकता जाता सूर्य चंदा के स्निग्ध सौंदर्य को और भी
लावण्यमय बना रहा था/ शाम के उस झुटपुटे में, अपने पहलू में बैठी चंदा की ठोड़ी उठाकर मैंने उसकी
आँखों में झांका तो वहाँ एक दूसरी नीली जमुना 
हिलोरें मार रही थी/ मैंने उसकी आँखों पर हौले से
अपने होंठ रख दिए तो वह बोली', तुम्हारी ही चीज हूँ,
मुझे अपनी बाहों का

अभियान( वक्तव्य)

अभियान   ( वक्तव्य)
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            हम दोनों बलिया शहर के मेन मार्केट" शहीद पार्क" की एक चाय की दुकान पर बैठे चाय पी रहे थे/
तथाकथित समाज में फैले विद्वेष और नफरत के कारणों का अपने मुहिम के तहत तलाश रहे थे/ तभी
एक लंबोतरे चेहरे वाला, सींकिया रिपोर्टर हमारे पास आया और अपना परिचय देकर मेरा परिचय पूछा/
मैंने साफ किया कि हम जे ० पी ० मूवमेन्ट के अदना प्रहरी हैं और उसी की खबरनवीसी के लिए सड़क- दर- सड़क, दुकान- दर- दुकान, गाँवों और शहरों की खाक छान रहे हैं/ उसने हमारा हेडक्वार्टर पूछा फिर भी न चाहते हुए भी मैंने उसे' सर्व- सेवा- संघ, वाराणसी' बताया क्यूँकि मेरे साथ की चंदा तो वहीं से
संबंधित थी/ उसने चंदा का उत्सुकता और उत्कंठा के
जुड़वा भाव से निहारा और प्रश्नों की झड़ी लगा दी/
                  उसने चंदा का पूरा नाम और पता जानना
चाहा/ मैंने उसे हटाने की गरज से सिर्फ इतना ही कहा--' हमारा चाहे जो भी संबंध हो, इतना तो निश्चित है कि वह तुम्हारी बहन भी हो सकती है/' यह सुन कर वह सटपटा गया और वहाँ से रफूचक्कर हो गया/ बीच-बीच में वह हमारे बलिया- प्रवास के दौरान हमसे
मिलता रहा और अपने पेशे से संबंधित सवाल भी दागता रहा और हमारी जानकारी को डिटेल में जानने
का प्रयास भी करता/ पर मैंने उसे कभी निराश नहीं किया और जब तक हम बलिया में रहे, उसे अपना पूरा सहयोग दिया/ वह हमारे अभियान की दिशा में ही एक सार्थक प्रयास था/
                    बलिया के एक छोटे से गाँव में मेरा पैतृक आवास भी है जो सरयू नदी के किनारे स्थित है और बलिया शहर में बनकटा मुहल्ले से सटी गंगा प्रवाहमान है, वहीं मेरी ननिहाल है /
                    हम दोनों हफ्ते- दस दिन पर बनारस जाते और अपनी रिपोर्ट वहाँ के संचालक को सौंप देते/ तब संचार- व्यवस्था का कोई शीघ्रगामी साधन नहीं था/ इसी सिलसिले में मुझे अपने शहर इलाहाबाद में' नगर- स्वराज्य' अखबार के आफिस
' देश सेवा प्रेस' जाना होता था और मूवमेन्ट से संबंधित सभी दोस्तों से चर्चा भी हो जाती थी/ इस दौरान चंदा बनारस चली जाती थी और वहाँ की व्यवस्था देखती थी/ लौटती में उसके माँ-पिताजी की
अनुमति से उसे लेकर मैं बालिया अपने गाँव चला जाता था/
                        जहाँ कहीं मैं जाता, चंदा मेरे साथ ही
होती थी/ पर कैसे? यह शायद पाठकों की उत्सुकता
जानने-समझने की होगी और मैं अपने प्रिय पाठकों से
कभी कुछ नहीं छिपाता/
                        यह मैं सर्वविदित करना चाहता हूँ कि मेरी और चंदा की मुलाकात मेरे शहर इलाहाबाद में संपादित' अखिल भारतीय सम्मेलन' से ही थी/ जहाँ आठ या दस दिन का वह सम्मेलन निरंतर' लोकनायक जय प्रकाश नारायण' के भाषणों से कृत- कृत्य हो रहा था, जिन्होंने ट्रस्टीशिप स्थापना के माध्यम से" संपूर्ण-
क्रांति" का आवाहन नवजवानों से किया था/ यह पूरे देश में जनता पर थोपी गई इमरजेन्सी के खिलाफ पूरे विद्रोह का एजेंडा था/ हर कोई इस सामंती व्यवस्था से तस्त था/ सारे बुद्धिजीवियों को जेलों में बंद कर दिया गया था/ जेल भर गए तो स्कूलों कालेजों को वैकल्पिक जेल बनाया गया था/ कितने ही साहित्यकार, प्रोफेसर, कवि और चिंतक उन जेलों में से किसी जन- नायक के इंतजार में अपनी बूढ़ी हड्डियों में साँसों का संचार बनाए हुए थे/
                     मैं इस महा- अभियान में अपनी तुच्छ सेवा देने के लिए, अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई को
तिलांजली देकर इस समरक्षेत्र में कूद पड़ा था/
                     एक साधारण कार्यकर्ता की हैसियत से मैं वहाँ बुद्धिजीवियों के लिए अपनी सेवाएँ देने के लिए तत्पर हुआ था/ मेरी तरह सभी वहाँ कार्यकर्ता ही थे/
छोटे- बड़े का कोई सवाल नहीं था/
                      आगंतुकों को स्टेशन, अपने सहयोगियों के साथ जाकर रिसीव करना तथा सम्मेलन- स्थल पर
पहुंचा कर उनकी देखभाल और सेवा- परिचर्या करना मेरी मुख्य तैनाती का विषय था/ बाहर से आने वाली बसों के आगन्तुकों को रूम आदि की व्यवस्था तथा
सुराही और गिलासों की उपलब्धता सुनिश्चित करना तथा सुब्ह का नाश्ता, दिन और रात का खाना उन्हें
खिलाना मेरी ड्यूटी में शामिल था/
                         यहाँ मैं यह बताना जरूरी समझता
हूँ कि मैंने अपनी शुरुआती जिन्दगी से लेकर आज तक कोई भी काम वेतन, मेहनताने या प्रसिद्धि या लालचवश कभी नहीं किया/ ऐसे कार्यों से मुझमें नवऊर्जा का संचार होता था, पाठक यही समझ लें और पूरी अभिरुचि से उसमें भाग लेता था/ अपने छोटे-मोटे खर्चों के लिए भी मैं अपने पिताजी पर ही
आश्रित था/ साथ में तीन ट्यूशन भी करता था और अपना खर्च चला लेता था/ जब कभी आवश्यकता हुई तो माताजी से ही मांगता और मुझे कभी भी निराशा का सामना नहीं करना पड़ा/
                           एक कुशल सहयात्री के रूप में चंदा की मुलाकात मुझसे कैसे हुई, उसे स्पष्ट न करना अब असहज हो रहा है और मैं पूरी ईमानदारी से इस तथ्य को दोस्तों की मजलिस में स्पष्ट करने का इरादा रखता हूँ/ पहले दिन जब मैं अपनी ड्यूटी संभालने में व्यस्त था, मुझे अपने इलाहाबाद के संयोजक प्रोफेसर शर्मा जी का आदेश मिला ,' रतन! जाओ, मेहमानों को खाना खिलाओ'/ मैं तत्परता से रसोई की व्यवस्था देखने गया/ मुझे ज्ञात हुआ कि हलवाई तो लगा हुआ जरूर है पर आटे, दाल, सब्जी, घी वगैरह कुछ भी क्रय नहीं किया गया है और न ही किसी से भी कोई
चंदा या मदद ली गई है/ हुआ यह था कि जितने भी सहयोगी या वालंटियर थे उनकी यह व्यवस्था थी कि सभी अपने- अपने घरों से राशन वगैरह लाए थे, जिससे जो बना कोई घी, कोई चावल, कोई सब्जी अपने बूते से लाया था और पूरे सम्मेलन तक यही व्यवस्था लागू रहेगी/
                          मैं भी पूरी मुस्तैदी से खाना परोसने में लग गया/ बहरहाल मैं सब्जी या दाल ठीक से याद नहीं कि पूड़ी थी कि रोटी थी क्यूँकि इन घटनाओं को बीते पचास सालों में क्रम से याद कर पाना मेरे लिए सहज नहीं है, जो कहीं व्यतिक्रम हो जाए तो पाठक
मुझे क्षमा करेंगे/ एक हाथ में बाल्टी या टोकरी लेकर आगे बढ़ा और पंगत में बैठे अभ्यागतों को सर्विस देने लगा/
                         तभी मुझे एक आवाज सुनाई पड़ी/ कोई मुझसे ही मुखातिब था और मुझसे कह रहा था,
' भाई साहब! मेरी बुआ को नमक और मिर्च सही-सही दीजिएगा/ नहीं तो ये आपको अपना डान्स नहीं दिखाएँगी'/ मेरी नजर उधर गई तो एक सोलह- सत्रह साल की कोमलांगना मुझसे अपनी बुआ की ओर इशारा करती हुई कह रही थी/ मैंने उनकी ओर गौर से देखा और,' जरूर-जरूर' कह कर उनके आगे हाथ की चीज सर्व कर दी/
                          जब मैं इलेक्ट्रिशियन के साथ कमरों की लाइट व्यवस्था ठीक करवा रहा था, पता नहीं वह मुझसे बातें करने में अति उत्साह प्रदर्शित कर रही थी या जे ० पी० महोदय की बातों से वह स्वयं ही उत्साहित थी/
                           बहरहाल जब मुझसे वो लान में मिली तो मैंने उसका नाम पूछा/ उसने नाम तो बताया पर दो ही अक्षरों का/ पूरा नाम नहीं बताया और जानना मैंने जरूरी समझा भी नहीं, क्यूँकि उसके पापा के हाथ पर मैंने' रंग नाथ जौहरी' गुदा हुआ देखा था/ मैं जान गया कि उसका पूरा नाम चंदा जौहरी है/
जाति, धर्म या संप्रदाय के नाते मेरा किसी से कोई दुर्भाव नहीं था/ मेरे पास गीता, रामायण के साथ- साथ बाइबिल और कुरान भी है, जो मेरी खोज के विषय है/ अल्लाह या गाड, राम या रहीम मेरे आराध्य हैं/ और मेरी अंतरात्मा सभी में सिर्फ एक रूप का ध्यान करती है, जो मेरे हृदय में अंतर्हित है/ आत्मा और परमात्मा के साथ ही मैं प्रकृति( कुदरत) की एकात्मकता में विश्वास रखता हूँ/ यही कारण है कि
कोई भी परिस्थिति मुझे डरा, सहमा या विचलित नहीं
कर पाती/ मैं सदा-सर्वदा अपने आप में अवस्थित हूँ/
कारमेलिटी में या सहज उत्सुकतावश उसने मेरा नाम पूछा जो मैंने उसे सहजभाव से बता दिया/ मैंने उसका पता पूछा तो उसने कहा,' आप सर्वसेवा संघ' आ जाइएगा, वहाँ मैं आपको मिल जाऊँगी/'
                         ये तो था उसका प्रथम दृष्टव्या परिचय/ आगे का विवरण ये है कि रोजाना की मुलाकात से मैं उसके परिवार के इतने निकट आ गया था कि उन्हें छोड़ने मैं बनारस तक गया और लौटते वक्त उससे बाय तक न कह सका सिर्फ उसकी तरफ
हाथ हिला कर चला आया/
                         इलाहाबाद के बाद सम्मेलन लखनऊ 
यूनिवर्सिटी में कुछ दिनों बाद हुआ, जिसमें मैं अपने
कतिपय साथियों के साथ सम्मिलित हुआ और एक हफते बाद वापस लौटा/ जहाँ पर मय परिवार चंदा से मुलाकात हुई और अबकी बार मुझे बनारस घर पर
आने का निमंत्रण भी दे गई और अपने माता- पिता
और बुआजी से मिलवाना भी न भूली/
                           लखनऊ में ग्रुप बना के जोन निर्धारित कर दिए गए थे/ चंदा की सहमति से मैंने
अपना जोन इलाहाबाद से छपरा( बिहार) वाया बनारस, बलिया चुना और इसी सिलसिले में मैं और चंदा बलिया की सड़कों पर भी थे और गाँवों की पतली पगडंडियों पर भी साथ- साथ थे/
                           यह तो गाँव वालों का मेरे प्रति प्यार है कि अभी भी यदा कदा जाकर मैं अपनों के बीच शहर की आधुनिकता से दूर सरयू नदी की हिलोंरो के बीच अपना दुख-दर्द भूल कर संतुष्टि की अनुभूतियों से घिर जाता हूँ/
                           उस समय मेरे गाँव में बिजली नहीं थी और लालटेन या तेल वाले लैंप से ही हम लोग अपना काम चलाते थे/ इतना तो मुझे याद है कि शहर में भी मेरे घर रेडियो तो था पर ट्रान्जिस्टर या टी वी
किसी की कल्पना में भी नहीं था/ रेडियो में भी हम लोग रोज हवामहल या विविध-भारती के रंगारंग
कार्यक्रम तथा आल इंडिया रेडियो की खबरें सुनना हमारे रोजमर्रा के नियम थे/
                              चंदा कई बार मेरे साथ मेरे गाँव
' मतदाता- शिक्षण- अभियान' के तहत गई है और गाँवों की रमणीयता में ऐसा खो गई है कि वह' सर्व- सेवा संघ' की बिल्डिंग तक विस्मृत कर चुकी है/
 


Monday, May 11, 2026

शेर

किसी ने पत्थर तराश कर' ताज' बना दिया/
हमने लफ्जों में पिरो कर ईमान बचा लिया//

          राजीव रत्नेश
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सिर्फ तेरी निगहबानी सही ( गजल)

सिर्फ तेरी निगहबानी सही  ( गजल)
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सब जवां हैं, सब हसीं हैं, तुम्हारा भी कोई सानी नहीं/
दे दो अपनी ओर से, छोटी कोई इक प्यार की निशानी सही/

मायूस मत होना, आके महफिल में, तेरा दामन खुशियों से भर देंगे,
तुम भी थोड़ा बदलो खुद को, झेल लेंगे हम सारी परेशानी भी/

करना बरदाश्त हर दर्द, जरूरी नहीं हर मसले में टांग
अपनी अड़ाना,
किसी से तुर्की- बतुर्की न करना, भले हो सबको बिना
बात हैरानी सही/

बातों में मंद-मंद मुस्कराती हो, होठों पे उंगली फेर-फेर कर,
आगोश में मेरे आकर, शरमाने की अदा तेरी पुरानी/

नाक तेरी खड़ी-खड़ी, सामने के दो कबूतर उड़ान को
रहते बेताब सदा,
बाहों में लेकर चूमा जब- जब, बंद हो जातीं आँखें
लजीली तुम्हारी/

हम जानते-समझते रहे सदा, मोहब्बत में हमारे कोई
कसर कभी रही नहीं,
मसलने पे फूले-फूले गाल तुम थोड़ा भी झुंझलाती नहीं/

हम क्या जानें, वह प्यार तुम्हारा दिखावा कब और
कैसे बना,
दुपट्टे को सर से जब हटाया, चाँद निकल आया साथ
लेकर जिया ही अपनी/

जाने- तमन्ना! पास आकर मेरी आरजुओं की तदबीर
को नई राह दो,
अपनी समझ कर ही तुझे चाहा, क्या चाहती हो प्यार में मान- मनौवल तुम भी/

मोहब्बत में आखिर कोई बंदिश तो होती नहीं, रख दिया कदमों पे कलेजा निकाल के,
समझ न सकीं तुम प्यार की अजमतों- कुर्बानियों को
भी सही-सही/

मुझे भरोसा पुरा था अपनी मासूम मुहब्बत का, लगी
चोट से जो कभी तिलमिलाई नहीं,
हम मजबूरे- मुहब्बत तुझे कहाँ ले जाते, इसलिए साथ ले तुझे भागे भी नहीं/

सौंदर्य-बोध तेरा, मेरे लिए कोई नया तो नहीं, नजरअंदाज न कर सके तुझे' ताज' कभी,
तुझे चाहा, तुझे पूजा, मुकम्मल कर डाला' तहरीर- ए-
रतन', सिर्फ तेरी निगहबानी सही//

             राजीव रत्नेश
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अशआर

कल का सूरज नई उम्मीदों की बारात लाएगा/
' रतन' के आँगन में फिर दीवाली यादगार बनाएगा/

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अँधेरों की बिसात ही क्या,
जब उम्मीद का सूरज साथ हो/
हर रात एक दीवाली है,
जब हाथ में कलम, सामने चाँद हो//

          राजीव रत्नेश
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महफिल में रौशनियाँ कौंधेंगी ( गजल)

महफिल में रोशनियाँ कौंधेंगी  ( गजल)
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कल लेकर सनम सपनों की बारात आएँगे/
सुब्ह आएँ, शाम आएँ, यूँ ही याद सारी रात आएँगे/

उनको देख दिल तड़पता है, उनके प्यार से,
हाथों में प्याला भर कर वो शराब लाएँगे/

ढूँढ़ेंगे शहर का कोना-कोना, मेरी तलाश में,
नहीं पाया गर, हर कहीं इश्तहार लगवाएँगे/

वो ढूँढंगे मुझे हर कहीं, जल्वा- ए- खुदा है,
कल मुझसे मिलने मेरे घर, मेरे दिलदार आएँगे/

बागों में कलियाँ भी होंगी, गुले- बहार भी होंगे,
वो मुझे वो नग्मा- ए- दिले- खुशगवार सुनाएँगे/

शिकवा भी होता है उनका अदाकारी से सना,
बहार लेकर आएँगे, खुशियों के आबशार लाएँगे/

सुहानी रूत में मेरी खुशबयानी पर वो शरमाएँगे,
सावन में आने का वादा करके, गुलाब लाएँगे/

मुहब्बत के मेरे खास किरदार वही तो हैं,
गर्मी में मेरे साथ घूमने वो नैनीताल जाएँगे/

मुहब्बत की बारीकियाँ भी मुझे वही बताएँगे,
दीवाली में लेकर फुलझड़ी, अनार छुड़ाएँगे/

सामने' रतन' के महफिल में रौशनियाँ कौधेंगी,
हाथों में लेकर सुराही, जब नजरों से जाम पिलाएँगे//

             राजीव रत्नेश
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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!