++++++++++++++++++++
जिसे दुनिया तन्हाई कहती है, वो मेरा सुकून है,
यहाँ मैं और मेरी तल्खियाँ, आमने-सामने होती हैं/
शोर-शराबे में तो अक्सर खुद को खो दिया हमने,
सन्नाटों में ही अक्सर, रुह से बातें होती हैं/
' रतन ' को ढूँढ़ना हो तो महफिलों में न जाना,
वो तो अपनी ही यादों की गलियों में, गुमशुदा रहता है/
सौगात (२२) ' नदी और किनारा '
++++++++++++++++++++
हम वो नदी हैं, जिसे समंदर की तलाश नहीं,
हमें तो बस अपने किनारों की मर्यादा प्यारी है/
बहना ही हमारी फितरत है, रुकना हमारी मौत,
पत्थर भी आ जाएँ राहों में, बहना हमारा जारी है/
चंदा के साथ नाम का जो साथ मिला है ' रतन '
उसी के सहारे हमने तूफानों से बाजी मारी है/
सौगात (२३) ' कलम की इबादत '
+++++++++++++++++++++
लोग मंदिर जाते हैं, कोई मस्जिद में झुकता है,
मेरा सजदा मेरे कलम के पन्नों पे होता है/
जो दर्द जुबां तक नआ सका मुद्दतों से,
वो स्याही बन कर कागज पे धीरे से रोता है/
' तहरीर ' जो उतरती है रूह की गहराइयों से,
वही तो खुदा का नूर, मेरी आँखों में बोता है/
सौगात ( २४ ) ' अक्स और आइना '
+++++++++++++++++++++++
जमाना बदल गया, या मेरी नजर बदल गई,
अब आइने में अपना अक्स, बेगाना सा लगता है/.
कल तक जो सपने आँखों में घर किए बैठे थे,
आज उनका पता पूछना, पुराना सा लगता है/
पर एक याद है ' रतन ', जो कभी बूढ़ी नहीं होती,
उसका चेहरा आज भी, सुहाना सा लगता है/
सौगात ( २५ ) ' मुठ्ठीगंज का वो शजर ( वृक्ष ) '
+++++++++++++++++++++++++++++
याद आता है मुठ्ठीगंज का वो पुराना शजर,
जिसकी छाँव में हमने, कई सपने बुने थे/
आज वो पेड़ तो शायद न रहा होगा वहाँ,
पर उसकी जड़ों में, हमारे बचपन दबे थे/
कंक्रीट के इन जंगलों में अब ' रतन ',
वो मिट्टी की खुश्बू, बस यादों में रह गई है/
सौगात (२६ ) ' अधूरी इबादत '
++++++++++++++++++++
कुछ पन्ने कोरे ही रह गए मेरी जिंदगी की किताब में,
शायद उनमें तुम्हारा जिक होना अभी बाकी था/.
हमने तो भर दी थी स्याही अपने लहू से ' रतन '
पर उस तहरीर का मुकम्मल होना अभी बाकी था/
अब ' नोयडा ' की इन रातों में बैठ कर सोचता हूँ,
कि उस अधूरी इबादत का दर्द, सहना अभी बाकी था/
सौगात ( २७ ) ' दुआओं का सफर '
++++++++++++++++++++++
रास्ते कितने ही पथरीले क्यूँ न हों ' रतन '
जिसके साथ चंदा की दुआएँ हों, वो थकता नहीं/
समंदर की लहरें भी रास्ता दे देती हैं उसे,
जिसका यकीन अपने पतवार पे हो, वो डूबता नहीं/
हमने तो उम्र गुजारी है इसी भरोसे के सहारे,
कि नेकी का दामन थामने वाला कभी गिरता नहीं/
सौगात (२८ ) ' इलाहाबादी मिजाज '
+++++++++++++++++++++++
हमारे लहज में आज भी वही पुरानी चाशनी है,
जो कभी संगम की मिट्टी से चुराई भी हमने/
शहर बदले, हालात बदले, पर मिजाज न बदला,
वही सादगी, जो मुठ्ठीगंज में कमाई थी हमने,
लोग पूछते हैं इस मुस्कान का राज ' रतन '
उन्हें क्या पता, कितनी तकलीफें छिपाई थीं हमने/
सौगात (२९) ' मुखौटों का शहर '
+++++++++++++++++++++
इस शहर में हर शख्स, चेहरा बदल कर मिलता है,
पहचानना मुश्किल है कौन अपना, कौन पराया है/
हकीकत की तलाश में निकले थे हम ' रतन '
पर यहाँ तो हर तरफ, झूठ का साया है/
हमने तो अपनी सादगी ही बचा के रख छोड़ी है,
यही वो सरमाया है, जो हमने कमाया है/
सौगात (३० ) ' धड़कन की गूँज '
+++++++++++++++++++++
शब्दों के जाल में भावों को मत ढूँढ़ना,
ये तो मेरी धड़कनों की सीधी सी पुकार है/
जो दर्द कलम से कागज पे उतर आया ' रत्न '
वही तो इस तहरीर का असली आधार है/
तीस सौगातें तो बस एक शुरुआत है अभी,
आगे तो यादों का, पूरा एक संसार है/
"""""""""""""""""
