Tuesday, September 1, 2026

तहरीर- ए- रतन ( सौगात ४१ से ५० )

सौगात (४१)  ( नेकी का कारवां )
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हम अकेले ही चले थे मंजिल की तलाश में,
लोग जुड़ते गए और कारवां बनता गया/

किसी के काम आ सकें, यही हसरत रही ' रतन '
इसी सोच से मेरा हर रास्ता, आसान होता गया/

दौलत के अंबारों से किसे सुकून मिला है यहाँ,
नेकी की राह पे चल के ही, रुह को चैन मिलता गया/

सौगात ( ४२)  ( वफा का शहर )
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ढूढ़ने निकले थे वफा, इस बेवफा शहर में,
हर मोड़ पर बस मतलब के चेहरे नजर आए/

हमने तो खुद को ही जला दिया शमअ की तरह ' रतन '
ताकि अँधेरों में भटकते हुओं को कुछ तो रास्ता नजर आए/

लोग कहते हैं कि जमाना बड़ा बेदर्द है,
पर हमें तो हर दर्द में भी, कोई अपना नजर आए/

सौगात ( ४३ )  ( अक्स और वक्त )
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वक्त की मार ने चेहरे की रंगत बदल दी,
पर आँखों में वही पुरानी चमक आज भी है/

आईना लाख कहे कि तुम बूढ़े हो गए हो ' रतन '
पर दिल की गहराइयों में वही मासूमियत आज भी है/

संगम की लहरों ने जो सिखाया था हमको,
वो बहते रहने का जज्बा और हिम्मत आज भी है/

सौगात ( ४४ )  ( पूजा की लौ-- अखंड विश्वास )
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आँधियाँ आती हैं और आकर चली जाती हैं,
पर मेरे यकीन का दीया, कभी बुझता नहीं/

' पूजा ' की लौ ने वो हौसला दिया है हमें,
कि  मुश्किलों का पहाड़ भी, अब भारी लगता नहीं/

हमने तो सौंप दी है अपनी कश्ती उसके हाथ ' रतन '
जो पार लगाता है सबको, वो कभी सोता नहीं/

सौगात ( ४५ )  ( अधूरी गजल )
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जिन्दगी एक अधूरी गजल जैसी है ' रतन '
जिसे मुकम्मल करने की कोशिश में उम्र गुजर गई/

कभी मतले ने साथ दिया, कभी मकता रुठ गया,
इसी कशमकश में जाने कितनी शामें गुजर गईं/

पर जो शेर हमने दिल से लिखे हैं यहाँ,
उनकी गूंज जमाने में, सदा के लिए ठहर गई/

सौगात ( ४६ )   ( रिश्तों की सिलाई )
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रिश्तों की सिलाई अगर कच्ची हो ' रतन '
तो वक्त का एक ही झटका, सब उघेड़ देता है/

हमने तो तमाम उम्र गुजारी है, गाँठे जोड़ने में,
पर ये जमाना है कि बस, दूरियाँ बढ़ा देता है/

सादगी के धागे से पिरोया है हमने तो अपना घर,
यही वो जोड़ है, जो टूटने पे भी हौसला देता है/

सौगात ( ४७ )  ( मिट्टी का हक )
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बहुत ऊँची उड़ान भर ली इन कागजी परिदों ने,
पर अंत में सबको, जमीन पे ही आना होता है/

मुठ्ठीगंज की उस मिट्टी का हक, आज भी है मुझ पर,
नोएडा के महलों में रह कर भी, दिल का वहीं ठिकाना होता है/

' रतन ' को अपनी जड़ों से जुदा न कर सका कोई,
कि दरिया कितना भी बहे, समंदर को ही पाना होता है/

सौगात ( ४८ )  ( खामोशी का शोर )
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कभी कभी खामोशी इतना शोर करती है,
कि शब्द भी सुनने को कान तरस जाते हैं/

जो बातें हम दुनिया से कह न सके मुद्दतों से,
वो आँखों के रास्ते, धीरे से बरस जाते हैं/

' तहरीर ' में जो दर्द छिपा है, उसे गौर से पढ़ना,
यहाँ मुस्कराहटों के पीछे, गहरे जख्म भी हँस जाते हैं/

सौगात (४९ )  ( इबादत की लौ---- अंतिम पतवार )
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मेरी कश्ती का सहारा अब कोई इंसान नहीं,
' पूजा ' की वो एक दुआ ही, मेरा माँझी बन गई/

जब सबने साथ छोड़ा, मंजिल के करीब आकर,
तब तेरी यादों की परछाईं, मेरा राही बन गई/

' रतन ' को अब लहरों के थपेड़ों का खौफ नहीं,
कि इबादत की ये लौ, अब मेरी गवाही बन गई/

सौगात ( ५० )  ( अर्ध शतक---- पचासवीं सौगात )
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पचास सौगातें, मेरे पचास वर्षों का निचोड़ है,
हर लफ्ज में एक याद, हर याद में एक मोड़ है/

अभी तो आधा रास्ता ही नापा है हमने ' रतन '
मंजिल की ओर बढ़ने का, अभी और भी जोर है/

कलम रुकी नहीं है, बस थोड़ा ठहर कर देख रही है,
कि आने वाली लहरों में, और कितना शोर है/

             राजीव रत्नेश

तहरीर- ए- रतन ( सौगात३१ से ४० )

सौगात ३१  ( किताब- ए- जिन्दगी )
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पन्ने पलटता हूँ तो पुरानी यादें मुस्कराती हैं,
कुछ धूल जमी है उन पर, पर महक वही आती है/

जिन्दगी की इस किताब का हर अध्याय अनोखा है,
कोई रुलाता है बहुत, तो कोई जीना सिखाती है/

' रतन ' ने तो बस वही लिखा, जो जिया है उसने,
ये कोरी कल्पना नहीं, हकीकत की थाती है/

सौगात (३२ )  ( मौन का अर्थ )
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जुबां खामोश हो तो लोग उसे कमजोरी समझते हैं,
उन्हें क्या पता कि मौन में कितनी गहराइयाँ होती हैं/

शोर मचा कर तो दुनिया को जीता जा सकता है ' रतन '
पर खुद को जीतने के लिए, सन्नाटों की दुआएँ होती हैं/

हमने भी सीखी है खामोशी, मुठ्ठीगंज की उन गलियों से,
जहाँ बातों से ज्यादा, निगाहों में वफाएँ होती हैं/

सौगात (३३ )  ( नेकी की राह )
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मंजिल की चाह में, अपनों को मत पीछे छोड़ देना,
ये वो रास्ते हैं, जहाँ साथ चलने में ही शान है/

दौलत तो आएगी और जाएगी एक दिन ' रतन '
पर जो दुआएँ कमा लीं, वही असली पहचान है/

" पूजा के पतवार" ने यही सबक सिखाया है हमें,
कि डूबते को सहारा देना ही, सबसे बड़ा पुण्यदान है/

सौगात (३४ )  ( बदलते मौसम )
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धूप-छाँव तो आती-जाती रहेगी हर मोड़ पर,
तुम बस अपनी रूह के चिराग को जलाए रखना/

मौसम बदलेंगे यहाँ हर पल, हर घड़ी ' रतन '
पर अपनी सादगी के उसूलों को बचाए रखना/

जो वक्त के साथ, अपनी जड़ें भूल जाते हैं अक्सर,
वो सूखे पत्ते की तरह, हवाओं में उड़ जाया करते हैं/

सौगात (३५ )   ( कलम की पुकार )
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ये स्याही नहीं है, मेरे दिल का लहू है,
जो कागज पे बिखर कर, कविता बन जाता है/

हर अक्षर में छिपी है एक गहरी वेदना ' रतन '
जिसे कोई बिरला ही पढ़ और समझ पाता है/

' तहरीर- ए- रतन' के ये पन्ने गवाह बनेंगे एक दिन,
कि कोई था, जो शब्दों में अपनी रूह छोड़ जाता है/

सौगात ( ३६ )   ( किरदार की सादगी )
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बहुत महँगे लिबास पहने हैं यहाँ लोगों ने,
पर अंदर का इंसान, कौडियों में बिक जाता है/

हमने तो अपनी सादगी का जेवर ही पहना ' रतन '
यही वो लिबास है, जो हर मौसम में साथ निभाता है/

चमक-दमक तो बस दो दिन की चाँदनी है हुजूर,
अंत में तो बस बेदाग किरदार ही याद आता है/

सौगात (३७ )  ( . दुआओं का लंगर )
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किसी का पेट भरा हो, तो दुआ अपने आप निकलती है,
ये वो लंगर है ' रतन ', जो रूह को तृप्त कर देता है/

मंदिर की सीढियों पे बैठ के, जो सुकूं मिला हमें,
वो महलों की मखमली दीवारों में कहाँ मिलता है/

' पूजा ' की थाली में सिर्फ फूल नहीं होते ' रतन '
उसमें भूखे कीतृप्ति और बेसहारा का आसरा होता है/

सौगात (३८ )   ( यादों का मुसाफिर )
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मैं वो मुसाफिर हूँ, जो यादों के शहर में रहता है,
मुट्ठीगंज मेरा कल था, और आगरा वर्तमान है/

संगम के पानी में धोई थी जो अपनी हसरतें हमने,
आज उन्हीं लहरों की गूँज, मेरा रुहानी साज है/

जमाना कहता है कि मैं वक्त के पीछे चल रहा हूँ,
उन्हें क्या पता कि मेरा अतीत ही मेरा आगाज है/

सौगात (३९ )  ( खामोश इबादत )
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जरूरी नहीं कि हर दुआ जुबां से ही अदा हो,
कुछ इबादतें तो सिर्फ आँखों के आँसुओं में होती है/

जब दिल टूटता है, आवाज बाहर नहीं आती ' रतन '
पर उस सन्नाटे की गूंज आसमान तक पहुंचती है/

हमने भी सीखी है ये कला, वक्त के थपेड़ों से,
कि सबसे सच्ची बातचीत, अक्सर खामोशी में होती है/

सौगात (४० )   ( अधूरा सच )
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दुनिया जिसे हकीकत समझती है, वो सिर्फ एक परदा है,
असली चेहरा तो अक्सर, तन्हाई के आईने में दिखता है/

बहुत कोशिश की लोगों ने हमें आजमाने की ' रतन '
पर उन्हें क्या पता कि हमारा जमीर, कहाँ बिकता है/

चालीस सौगातें तो बस प्यार के समंदर की लहरें हैं,
गहराई में तो अभी, बहुत कुछ लिखा जाना बाकी है/

            राजीव रत्नेश
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मेरी आवाज सुना-- ( २ )

मेरी आवाज सुनो--( २ )
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मेरी अन्तर्व्यथा शायद शब्दों में पूरी उतर न सकी,
कुछ पीड़ाएँ खामोशी की जुबान में ही पलती हैं/

कल हमने नव- सृजन का जो स्वप्न बुना था साथ,
आज उसकी राख में भी कुछ चिंगारियाँ जलती हैं/

तुमको याद थी, उन वादों की वह झुरमुटी शाम,
हमने भी तो आने वाले कल की तस्वीर संवारी थी/

' कल के बिछड़े कभी मिलेंगे, यह विश्वास दिल में था,'
उसी उम्मीद में, कितनी रातें हमने, साथ गुजारी थीं/

वफा की राह पुरखतर तो होती, पर आसां नहीं होती,
मगर हमने तो हर मोड़ पर साथ चलने की ठानी थी/

अब अधूरे फलसफे को, पूरी कहानी मान लेते हैं,
क्यूँकि कुछ रिश्ते मिटने के बाद भी अपनी निशानी
रखते हैं/

             राजीव रत्नेश
  ( महोदय, यह वही जान्हवी है, जो मेरे संस्मरण,
" जिन्हें हम भूलना चाहें " की प्रमुख पात्र रह चुकी है )

मेरी आवाज सुनो (१ )

मेरी आवाज सुनो
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मैं इश्क की बाजी जीतना भी नहीं चाहता,
बस अपने अहसासों को थोड़ा मुकाम देना/

और अगर मेरी मुहब्बत तुम्हारी मंजिल न बने,
तो जाते-जाते मुझे दुआओं का पैगाम देना/

मैं शिकायतों का सफर नहीं लिखूँगा,
तुम बस अपनी यादों का एक जाम देना/

जो किस्मत में लिखा होगा, वही होगा,
मुझे बस अपने दिल में एक शाम देना/

मैं उल्झनों में भी, मुस्कराते हुए भी जी लूँगा,
तुम मेरी खामोशी को कभी इल्जाम न देना/

        राजीव रत्नेश
    ( जान्हवी से आखिरी मुलाकात )

Monday, August 31, 2026

मेरे सब्र का दामन छूटा ( गजल )

मेरे सब्र का दामन छूटा  ( गजल )
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दरकिनार कर अपनी खुद्दारी, तुझे मनाने चला हूँ/
तेरी दहलीज पर फिर एक बार आसन जमाने चला हूँ/

मान- मनौव्वल ही कर सकता हूँ, तेरा मानना आसां नहीं,
खुद अपनी कश्ती, तेरे साहिल पे लगाने चला हूँ/

पहले की तरह तू बरहना- पा साहिल पे न आएगी,
तेरे लिए ही बस, तेरी चौखट पे सर झुकाने चला हूँ/

जानता हूँ अब तू, मुझसे ही परदा भी करेगी,
यही सोच, फिर भी तुझे अकेले में बुलाने चला हूँ/

जानता हूँ तेरा बाप, हुक्का गुड़गुड़ा रहा होगा,
उसे इत्मीनान की साँस देने, तुझे माँगने चला हूँ/

अगर वह मजबूर न होता, उसकी बिटिया मेरी न होती,
जमाने की जहालत से उसे आज बचाने चला हूँ/

मेरी मोहब्बत पर तूने नाकामी का चोला डाला है,
मुझसे सब्र का दामन छूटा, तुझे वापस लाने चला हूँ//

                  राजीव रत्नेश

Monday, August 24, 2026

चाहे अपनेपन से देखो ( गजल )

चाहे अपनेपन से देखो  ( गजल )
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तुम्हें मेरा हाल जानने की जरूरत नहीं है/
अपना हाल बताने की मुझे फुरसत नहीं है/

किसी से मिलने की मुझे मनाही नहीं है,
दमे- गुलगश्त मुझे तुमसे उजरत नहीं है/

सलीका- ए- हुस्न अजब है, आँखों से पिलाते हैं,
उनकी जब- जब आँखे अश्कबार मिली है/

आँखो से आँसू गिरें या बह जाए कजरा,
मजबूर थे तुम, तो हमें भी तुमसे मुहब्वत नहीं है/

हजरते- वाइज ने न पीने की हिदायत दी है,
साकी ने भर-भर प्याले पीने की इजाजत दी है/

कहने को तो बड़ी दिलदार, बड़ी सूरमा थी तुम,
मुझे तुझसे कुछ कहने, माँगने की नीयत नहीं है/

दाल में कुछ काला या पूरी दाल ही काली है,
ये मसूर की दाल है हुजूर, कोई उड़द नहीं है/

मुहब्बत में बरबादियाँ तो हमीं दोनों की हुई है,
शिकस्ता बदन जरूर हूँ पर दिल मजरूह नहीं है/

वाइज को समझा, नमाज तो नहीं छूटी है,
भले गले में मेरे कोई तसबीह नहीं है/

तुझसे मिल पाने में भला हिचक मुझको कैसी,
तुझसे मिलने के लिए सनम, हम मशरूफ नहीं हैं/

चाहे अपनेपन से देखो या देखो हिकारत से,
' रतन ' को तुमसे कोई अदावत नहीं है//

             राजीव रत्नेश

तुझे हमेशा के लिए ही ( गजल )

तुझे हमेशा के लिए ही  ( गजल )
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खेल-खेल में ही यह क्या खेला हो गया/
तू मेरी हो गई, थोड़ी देर को मैं तेरा हो गया/

अंगूठी तो पहनाई गई थी आखिर देखभाल के,
तेरी गुड्डी की मेरे गुड्डू से देख झमेला हो गया/

हर कोई जताने लगा तुझ पर दीवानगी अपनी,
मेरे लिए माहौल- ए- महफिल कसैला हो गया/

पिला या न पिला जाम अपने हाथों से मुझे,
फिर भी महफिल में आने का हौसला हो गया/

बरसने लगी थोड़ी गुलाबी भी तेरी आँखों से,
देखो अब मौसम भी आशिकाना हो गया/

हिफाजत तो दिल की सदा की, हर धड़कन के पहले,
लाद के ले जाए शेख जी, ये कैसा माजरा हो गया/

नजर को तो तीरगी का अहसास भी कुछ न था,
बादल गरज उठे तो छाला दिल का अलबेला हो गया/

रस्मो- राह तुझसे हमेशा से रही, तू अकेली कहाँ?
तुझे हमेशा के लिए ही ' रतन ' का सहारा हो गया//

                 राजीव रत्नेश

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!