Saturday, February 14, 2026

. ये क्या हाल तुम्हारा हो गया

ये क्या हाल तुम्हारा हो गया
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सूरते-हाल तुम्हारी खस्ताहाल हुई,
तुम्हारे बाप की अकड़ की लाठी छूट गई/

ये क्या हाल तुम्हारा हो गया,
दामन तुम्हारा सिर्फ काँटों से मर गया/

हाले-दिल का ज्यादा ब्यौरा हम क्या देते,
न थी तुमसे लगावट, न थी दिल को आशनाई/

तरजीह जिन्दगी पर तुम्हीं को दिया,
खता हमसे हुई कि दिल तुम पर गया/

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कहना न होगा किस तरह दूसरे के हो गए वो,
जिसके लिए हम बेजार हो गए, बेकार बैठे हैं/
कितना बचाएँ दिल को, सख्त मरहले हैं,
उन्हीं को प्यार कर बैठा हूँ, जो अधमरे हैं//

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गफलत में तुम्हें ही पुकारा
             किसी और को न आवाज देंगे/
खंजर दिल में उतार कर देखो
             किसी से न हम फरियाद करेंगे/
हम देवदास को अपनी मुहब्बत
             के फलसफे में किरदार करेंगे,
मंजूर हो तो आ जाना, सबके सामने
            हम तुम्हारी माँग भरेंगे//

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           राजीव रत्नेश
      मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/

Thursday, February 12, 2026

अभिनंदन पत्र

अभिनंदन पत्र
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( आयुष्मती सन्नो एवं चिरंजीव गिरीश के शुभ विवाहोत्सव
पर अभिनंदन- पत्र)

सन्नो और गिरीश का परिणय मंगलमय हो
जीवन-पथ दोनों का अति मधुमय हो/

हृदय प्रफुल्लित है हम सबका,
आज यह शुभ अवसर आया है/
जगवन्दन की महत् कृपा ने,
आज बृहत् रूप दिखलाया है/
राम सद्धश हैं श्री गिरीश जी,
सीता रूप है सन्नो सुकुमारी/
दोनों के पावन-परिणय पर आज,
सभी लोग हैं आनंदित भारी/

हल्की मुस्कानों से सँवरती दुनिया ज्योतिर्मय हो,
सन्नो और गिरीश का परिणय मंगलमय हो/

निज पुत्री का वधुरूप देख कर,
प्रमुदित हैं पिता बृजमोहन अपार/
आज पावन-परिणय के शुभ अवसर पर,
गद्गद चाचा जगबहादुर का हृदय विशाल/
स्वागत में भगवती, सतीश और,
राजबहादुर खुश तीनों भाई/
खुशियों का सागर उमड़ा है अपार,
हर्ष की सरिता सबके मन में लहराई/

स्वप्निल आभा में तरंगित जीवन स्वप्नमय हो,
सन्नो और गिरीश का परिणय मंगलमय हो/

प्रेमाश्रु नयनों में भर कर,
होकर मन में सुखी महान,
पिता बृजमोहन आज कर रहे,
युगल- करों से कन्यादान/
कन्या के बहनोई सदानन्द,
विरेन्द्रकुमार और बैठे हैं भगवत् प्रसाद/
रहे वर-वधू की जोड़ी अमर,
मन से देते ताऊ जगमोहन आशिर्वाद/

हर सुव्यवस्थित भावना का आधार निश्छल हो,
सन्नो और गिरीश का परिणय मंगलमय हो/

सुनो सन्नो बहना, आदर बड़ों का करना,
और सबसे हिलमिल कर रहना/
पति की आज्ञा और खुशी का,
ध्यान तुम हमेशा ही रखना/
कि तुम्हारे सुखों का यही है ठिकाना,
वचन सात फेरों के न भूल जाना/
विदा करके पिता ने भी चैन पाया,
सुरक्षा में था अभी तक धन पराया/

महके सदा फुलवारी जीवन तुम्हारा" रत्नमय" हो,
सन्नो और गिरीश का परिणय मंगलमय हो//

                राजीव रत्नेश
            मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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चर्चा ( कविता)

चर्चा( कविता)
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तुम्हारी सहेलियों में,
चर्चा आम है/
कि तुमने मुझे बोर किया,
अपने इन्हीं गोरे हाथों में,
लेकर औरत का हथियार,
मुझपे वार किया/

मदहोश मुझको किया,
दिखाने को उनको,
तुमने समेटी थी,
निगाहों में हया/
बिखेरी थी अधरों पे,
मृदु मुस्कान,
और बड़े धीरे से,
नश्तर बातों का लगाया था/

पर दिल में तुम्हारे था क्या?
मेरे सिवा न जान सका कोई/
मेरी दुनिया लुटी,
बनी रुसवाई अभिशाप,
नक्शा- ए- जेहन पे तुम्हारे,
उभरती रही तस्वीरे- गैर कोई/

मैंने भी तो किया था,
तुमको बोर/
मेरे दोस्तों में,
चर्चा आम है,
उसी की कसर,
निकाली थी,
तुमने शायद/
और उसी का ये अंजाम है,
कि तुमने मुझे बोर किया,
मन- मानस के तंतुओं को,
यूँ झकझोर दिया/

कारण साफ है,
जो कुछ था भंगिमा में,
तुम्हारे/
वो कौन जानता है?
सिवा मेरे- तुम्हारे/
फिर भी------
तुम्हारी सहेलियों में चर्चा आम है,
कि तुमने मुझे बोर किया/

              राजीव रत्नेश
            मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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एक सवाल के तीन जवाब

               उनकी पेशकश
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                हुस्न जब बेनकाब होता है,
                हजारों का हिसाब होता है/
                जिनकी नीयत खराब होती है,
                उनका खाना खराब होता है//

                हमारी सरगोशी
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(१)  कितना पाक था प्यार,
                   सनम हमारे- तुम्हारे दरम्यान,
       सुरूर में न आए पीकर,
                   बोतल पे बोतल शराब/
      जब तुम जवां थी, तब तो
                    नहीं हुई हमारी नीयत खराब,
      आज ढ़लती जवानी में तुम्हारी,
                    क्यूँ होगी हमारी नीयत खराब//


(२)  सुनना जरा गौर से ऐ शाहजादी- ए- महफिल,
       तुम्हारे वार से जाने कितनों का कलेजा चाक होता है/
       तुम अपनी वफा छोड़ कर, दुश्मनी पे उतर आती हो,
       जब तुम्हारी चलती नहीं, और दिमाग खराब होता है//


(३)   अजी! मल्क- ए- तरन्नुम का कहना है,
        कि हमारी नीयत ही खराब है/
        हम कहते हैं, कैसे कायम रहे नीयत हमारी,
        जबकि आँखों से उन्होंने पिलाई शराब है//

                     राजीव रत्नेश
                 मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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पूजा के पतवार से ( कविता)

पूजा के पतवार से  ( प्रार्थना)
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खे रहा हूँ नाव भगवन!
तुम्हारी पूजा के पतवार से/
बढ़ रहा इसी आस में,
बचा लोगे मुझे मँझधार से/

मैं तुम्हारे ही सहारे,
चल पड़ा हूँ, तूफान में भी/
लड़ रहा बल पा तुम्हीं से,
इस भयानक धार से/

देखता हूँ स्वर्ग- सुन्दर,
नत नयनों में तुम्हारे/
नाता नहीं अब कोई मुझे,
अब इस संसार से/

जी रहा हूँ क्यूँकि,
मुझको जीवन तुमने दे दिया/
तुम ही कर अब मुक्त सकते,
जिन्दगी के इस भार से//
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            राजीव रत्नेश
         मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद
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तुमसे है गुजारिश मेरी ( कविता)

तुमसे है गुजारिश मेरी  ( कविता)
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ऐ सनम! तुमसे है गुजारिश मेरी,
मेरे तसब्बुर में भी न तुम आओ/
तुम्हें मालूम नहीं है दस्तूरे- मुहब्बत,
न तुम मेरे दिल को आज भरमाओ/

ये जो सैकड़ों मुहब्बत की दास्तानें हैं,
हीर-राँझा, सोहनी- महीवाल के फसाने हैं/
उनकी बाबत तुम्हें कुछ भी मालूम नहीं,
उनको गुजरे हुए बीत गए जमाने हैं/

हमारी मुहब्बत बिल्कुल रुहानी है,
इसे जिस्मानी का सामां न बनाओ/
ऐ सनम तुमसे है गुजारिश मेरी,
मेरे तसब्बुर में भी न तुम आओ/

जिन्दादिली की बातें भी बहुत सुनी हैं,
लोगों की सीख भी हमने बहुत गुनी है/
अपना सभी कुछ खो के हमने ये पाया,
एक मुहब्बत ही हर चीज से बड़ी है/

हाले- जिगर कुछ दूँ भी ठीक नहीं है,
न मुझे तुम अब और तड़पाओ/
ऐ सनम! तुमसे है गुजारिश मेरी,
मेरे तसब्बुर में भी न तुम आओ/

हम प्यार में तूफां से टकरा सकते थे,
बेगाने तो क्या अपनों से टकरा सकते थे/
काश! तुमने साथ दे के देखा होता,
हम हर हाल में तुम्हें अपनी बना सकते थे/

अब तो बिगड़ गईं हैं बातें भी सारी,
न तुम मुझे गुजरा जमाना याद दिलाओ/
ऐ सनम! तुमसे है गुजारिश मेरी,
मेरे तसब्बुर में भी न तुम आओ//
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जितने तुम दूर होते गए, दर्द बे दस्तो- पा होता गया,
ऐ बेदर्द सुन- समझ, मैं परायों से बावस्ता होता गया/
आहिस्ता कदमों से चलो, चमन के गुल जाग जाएँगे,
दिन पर दिन इश्क मेरा, दूसरों को रास्ता देता गया//

                       राजीव रत्नेश
                   मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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साकिया मेरा एक काम कर दे ( कविता)

साकिया मेरा एक काम कर दे  ( कविता)
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साकिया आज मेरा एक काम कर दे/
अपनी नजर मेरे दिल के पार कर दे/
बहुतों का आज गुनहगार हूँ मैं,
दिले- मासूम को तू आज चाक कर दे/

कभी मुहब्बत की तलाश थी मुझे,
अब इक वफा की बची तलाश है/
एक जाम नहीं काफी साकी मेरे!
दिल में इक अनबुझी सी प्यास है/

आज कुछ इतना मगरूर हूँ मैं,
चाहे तो तू मुझे नजरों से मार दे/
साकिया आज मेरा एक काम कर दे,
अपनी नजर मेरे दिल के पार कर दे/

किसी ने हाथ भी थामा था हाले- गर्दिश में,
वो भी दो रोज के मेहमान बन के आए थे/
आँखों से उनके झलकती थी वफा,
फरेबों के पर दिल में उनके घुमड़ते साए थे/

मुझे मिसाल न दे हीर और राँझे की,
बस आज तू मेरी जिन्दगी तमाम कर दे/
साकिया आज मेरा एक काम कर दे,
अपनी नजर मेरे दिल के पार कर दे//
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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!