Tuesday, January 6, 2026

रोमांचित कर गया था मुझको !!! ( कविता)


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रोमांचित कर गया था,
मुझको उन्माद नयन का,
जगा एक नया भाव गया था,
निरभ्र चाँद गगन का/

द्वगों में तुम्हारे लाल डोरे,
जले हों जैसे दीप साँझ सकारे,
प्रणय वेला में विरहणि,
खड़े पी की राह तके द्वारे/
नीलम की सी आभावाली,
मूक दृष्टि, अनोखी भाषावाली,
दे प्यार का नया संदेश गई थी,
जला कर दीप नव आशा वाली/

लगा इक आशा गया था,
झोंका इक मस्त पवन का,
रोमांचित कर गया था,
मुझको उन्माद नयन का/

फूलों पर रात में ओस का,
गिरना और दामन से लिपटना,
कलियों का इक बार शर्माना,
फिर प्यार की आभा से लाल होना/
नव पल्लवित लतिकाओं का,
बोझ से रह- रह कर झुकना,
चाँद की गोद में रह- रह कर,
चंद्रिका का मचलना/

सपना इक नया सज गया था,
सदियों से वीरान चमन का,
रोमांचित कर गया था,
मुझको उन्माद नयन का/

सँवरी थी नवल आशालतिका,
सपनों का महल झिलमिला गया था,
चटकी फिरी चमन- चमन गुलनार,
दे नया संसार, प्यार तुम्हारा गया था/
प्यार में लिपटी झरनों की चंचलता,
महक में पुष्पों की अंतर्हित मादकता,
व्याकुल मन बार- बार डोला,
न मिली किसी फूल में समरसता/

मुझको तन्मय बना गया था,
संचारित इक भाव लगन का,
रोमांचित कर गया था,
मुझको उन्माद नयन का/

स्वप्न- महल में मेरे,
रह- रह कर तुम्हारा थिरकना,
तुम्हारे आँचल में झिलमिल सौंदर्य,
नील अंबर पर जैसे सितारों का चमकना/
भुला न सका, चाह कर भी,
मधुर- मुस्कान वो छवि का,
नित्य मधुर संसार सजाता है,
जैसे प्रखर ताप रवि का/

बदन से निकल कर मधुराका,
भर हृदय में गई प्यार सनम का,
रोमांचित कर गया था,
मुझको उन्माद नयन का//
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      अशआर
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न पिलाओ मस्त निगाहों से,
अपनी हया लो संभाल,
दुनिया कहीं दीवार न बने,
हो न जाए जी का जंजाल/
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ढलता है आँचल तो ढ़ल जाने दो,
बिखरती है जुल्फ तो बिखर जाने दो,
तुम क्यूँ महफिल उठाने पर उतारू हो,
मेरी इक रात, अपने साथ भी गुजर जाने दो//
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ये माना तुमने प्यार का इजहार किया,
आँखों ही आँखों में इकरार किया,
लो चले ही आए खिंच के महफिल में,
हमने तुम्हारी बात का, चलो एतबार किया/
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तुम्हारी तीरे-नजर दिल पे असर लाए जाती है,
मेरी मुहब्बत मगर कसर बताए जाती है,
किस तरह सुकूने- दिल होगा, तस्कीन होगी,
मेरी जिन्दगी हर डाल को बसर बनाए जाती है//

        राजीव" रत्नेश"
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