काव्य- यात्रा: स्मृतियों के झरोखे से/
कोई खता हो न जाए( गजल)
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कहीं तबीयत फिर तुम पर आ न जाए
जिन्दगी फिर कहीं मुझको भा न जाए
जफाई याद कर के तुम्हारी परेशान हूँ
कहीं मुझे रस्मे- वफा आ न जाए
देखो फिर प्यार से तुमने देखा है मुझको
कदम लडखड़ा न जाएँ, फिर नशा आ न जाए
फिर गुनगुनाने लगी हो मुहब्बत का नगमा
कहीं मेरा दिल फिर जवां हो न जाए
नदामत के छुपे हैं पलकों में तेरे आँसू
कहीं जुल्फ तेरी घटा हो न जाए
मुहब्बत तुझसे करता हूँ मगर डरता हूँ
कहीं रस्मे- उल्फत सजा हो न जाए
मौसमे- इजहार ने फिर नजरें बदली हैं
कली- ए- दिल कहीं गुंचा हो न जाए
फिर दिल लेता है तेरी बज्म में जाने का नाम
कहीं भूले से" रतन" फिर कोई खता हो न जाए
राजीव रत्नेश

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