Tuesday, January 6, 2026

शायर !!! ( कविता)


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कहते हैं वो,' हम शायर हैं,
अपने जुल्फों की इक लट दे दो,
हम महल बना कर छोड़ेंगे,
रहे लट जो तुम्हारी, मेरी मुठ्ठी में,
जब जी चाहे, हम पानी बरसा देंगे,
ये वो मतवाले बादल हैं,
जी चाहे, दुश्मन को बहा देंगे'/
बहुत बड़े दार्शनिक हैं वो,
हर समय शून्य में घूरा करते हैं,
कहते हैं,' बिन पिए चाय,
तुम्हारे हाथों से,
मेरे दिल को चैन नहीं मिलता है',

सामने खड़े हो जाते हैं, जो जाकर हम,
अपलक हमें ही निहारा करते हैं,
खोलते हैं मुँह कुछ कहने को,
पकड़ कलम हाथों में,
कुछ लिखने लगते हैं,
कहते हैं हम,' अजी! जरा सुनो तो',
गंभीर होकर कहते हैं,' जरा चुप रहो तो',
' तुम्हीं तो मेरी कविता हो,
तुम्हीं तो मेरी नगमा- ए- शायरी हो,
तुम्हारी चोटी को देख कर,
एक सर्पिणी का ध्यान आता है,
यूँ ही बिन हिले,
खड़ी रहो कुछ देर और,
वरना यह जाकर,
किसी शायर को डस देगी'/

' और मैं इस जहर को,
उतारने का तंत्र-मंत्र,
थोड़ा बहुत भी तो जानता नहीं/
तुम्हारे सुरमई कपोलों को देखकर,
ढ़लते हुए सूरज की याद आती है,
तुम्हारी पलकों में नीली बूँदे,
उस झील के पानी सी लगती हैं,
जहाँ शाम के धुंधलके में हम,
घंटों घूमा करते थे,
खिलखिलाया करते थे/'

' हर अदा है तुम्हारी कातिल,
किस खूबसूरत अदा से,
शरमाया करती हो?
तुम्हारे कपोलों पर दौड़ती सुर्खी,
प्रिये! तुम और हसीं लगती हो,
सीने पर सर रख कर यूँ न शरमाओ,
मेरी जां! मेरी बाहों में आ जाओ,
अपने हाथों दुल्हन तुम्हें बना कर,
इक तस्वीर तुम्हारी बनानी है,
अपनी रुठी हुई कविता को,
इक बार फिर से,
धानी साड़ी पहनानी है'

कहने को तो प्रिया मैं हूँ,
पर ध्यान कविता का रखा करते हैं/
कहते हैं,' मेरी अर्धांगिनी तुम्हीं हो',
पर, पूरा समय कविता को दिया करते हैं,
और जब कविता का मूड नहीं बनता है,
गाली अपने साले को दिया करते हैं/
और साला कहता है...
उनकी कविता को देखकर
शायर, आधे पागल हुआ करते हैं/
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अशआर
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अभी तुम कली हो,
           इक दिन खिल कर फूल होगी/
तुम्हें न चाहूँ मैं,
           तो मेरी यह भूल होगी/
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कहाँ गईं वो मख्मूर निगाहें,
           कहाँ गईं वो उल्फत की बातें/
मेरी तन्हाइयाँ ढूँढ़ती हैं तुझे,
          तेरी गदराई, मेरे गिर्द कसती बाहें/
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प्यार के दो बोल ही,
           तुम्हारे काफी हैं , मेरे जीने के लिए/
मिल जाए जो ये तो,
           फिर न कहूँगा, कभी मैं पीने के लिए/
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तुम्हें बेवफा समझने को मजबूर हूँ,
फिर भी तुम्हारे प्यार में मगरूर हूँ/
तुम्हारे होठों की लाली जब मुस्कराती है,
जाने क्यूँ हो जाता नशे में चूर हूँ/
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ऐ सनम खड़ी हो ओगी,
        आके यूँ ही जो खिड़की पे,
ढ़लेगी रात कैसे?
          आएगी नींद सितारों को कैसे?
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खामोश से क्यूँ बैठे हुए हैं मेरे सामने आप,
नजरें नीची हैं, क्यूँ शरमाए हुए हैं आप?
आपसे हम कुछ न कहेंगे, कीजिए सितम भी,
ख्वामखाह ही हमसे घबराए हुए हैं आप/
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सोचती होंगी तुम भी वादा करके मिला नहीं,
तुमने निभाई दुश्मनी, पर किया कोई गिला नहीं/
ये अपनी आदत है, खफा किसी से नहीं होते,
तुम करके देखो मदहोश, हम कहेंगे हमने पिया नहीं/
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अजी हमने तुमसे खफा हो के भी देख लिया,
तुम्हें भुलाने को, दूर जाके भी हमने देख लिया/
न तुमने ही जफा छोड़ी, न हम ही तुम्हें भुला सके,
बहुत याद आए तुम, तुम्हें भुला के भी देख लिया//

            राजीव रत्नेश

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