पहन के आई हो तुम बाघम्बरी,
और बिखेर रही हो मधुर मुस्कान,
एक मीठी चितवन से ही----
हर रही हो मेरे मन प्रान/
रह रह के होठों से अंगुली लगाती भी हो,
अदाओं से मेरा मन भरमाती भी हो,
होकर मेरी मुस्कान से तन्मय,
भरी महफिल में जल्वे लुटाती भी हो/
झूठ मूठ का दिखलाती हो शान,
बातों में काट रही हो मेरे कान/
क्या हुआ जो बिजली चली गई,
जला दी बोर्ड पर तुमने अपनी टार्च,
जरूरत ही क्या थी, रूप की रोशनी,
थी तुम्हारी काफी करने को प्रकाश/
बेकार दिखाया नक्शा तुमने मेरी जान!
बिजली आने पर समझ लेतीं सवाल/
जाम छलकाती, बिजली गिराती हो,
मेरी निगाहों पर हर खुशी लुटाती हो,
ख्वाबों के अँधियारों में आकर,
मेरी वीरान तनहाई को बेखुदी बनाती हो/
बनती हो झूठ मूठ का जंजाल,
एक मीठी चितवन से ही,
हर रही हो मेरे मन प्रान/
जंगल जंगल, बस्ती बस्ती,
मैं फिरता हूँ तेरी सदा के सहारे,
वंशी बजती है तनहाई में,
वहीं कहीं गंगा के कूल किनारे
मिटा दो सारे व्यर्थ बवाल,
छोड़ो नक्शा छोड़ो मेरी जान!
करती हो मेरा मन मोह लेने को,
नित नवीन प्रयास,
कभी जुल्फों को लहरा कर,
कभी पलकों को बिछा कर,
कभी दिखलाती हो यौवन की,
इठलाती बलखाती मत्त उफान,
एक मीठी चितवन से ही,
हर रही हो मेरे मन प्रान//
राजीव ख्नेश

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