Tuesday, January 6, 2026

बेयरा !!! ( कविता)


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वो एक कारवां ही था,
जो होटल में आकर ठहर गया,
वो व्हिस्की के दौर,
और भुना मुर्ग और कबाब,
इक ही इशारे पे उनके हाजिर,
मदहोश साकी का शबाब/

खड़ा रहा देहरी पे मैं,
आँखें फैलाए------
कुछ लोगों की ( जो रईस कहे जाते हैं)
निगाह शायद मुझपे भी उठ जाए,
क्यूँकि मैं एक बेयरा था,
खाली एक बेयरा( जिसकी कोई मुराद नहीं)
जिसका काम था केवल,
उनकी हर आज्ञा का पालन करना,
पर तवज्जह मना था/

रात की बात ढ़लती पहर में,
बिखरी हुई हुई साकी को,
अंक में भर कर,
दीवान तक ले जाना,
जो चंद लोगों की होकर,
अपना सब कुछ खो चुकी थी,
चंद सिक्कों के लिए,
कितनों की हवस का,
शिकार बन चुकी थी/

उन अँधेरे गलियारों में,
उसके जलते हुए होठों के अँगारों पे,
धीमे से अपने होंठ रख देता हूँ/
किसी जाम की महक आती है,
जिसमें वो मदहोश हो चुकी है,
नशे में धुत्त,
मेरी बाँहों में निढ़ाल/

अपनी साकी को और,
अपनी बाँहों में कस लेता हूँ,
मेरे बढ़े- रुखे बालों में,
उसकी उल्झी जुल्फों का जोर,
सोचता हूँ--------
उसको कोई गम तो नहीं,
हर कोई उसके अहम् पर,
ही तो चोट करता है,
फिर भी उसे कोई ऐतराज नहीं/

एक बार सिहर कर,
वो अपनी आँखें खोल देती है,
और मैं उसकी मस्तानी आँखों को,
हौले से चूम लेता हूँ,
मेरे गिर्द उसके कसते हुए हाथ,
महसूस करता हूँ------
पूछता हूँ,' बात है क्या?'
कहती है,' यूँ ही पिलाए जा आशिक'/

मालूम है उसे-------
अँधेरों का मैं आशिक हूँ/
अँधेरों का इसलिए कि,
उसके हुस्न का मैं दावेदार नहीं,
उसका मालिक कोई और है,
वो तो मेरी पर्दे की महबूबा है,
क्यूँकि-------
मैं केवल एक बेयरा हूँ//
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अशआर
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अधमुँदे तेरे पलकों पे,
विचरते स्वप्न मेरे अन्जाने,
तनहाई में ये आँधियारे,
रातों में लगते कितने पहचाने/
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बन के कजा आज ये बहार आई है,
लगता है, मेरी मौत का पैगाम लाई है/
हम तो खामोश ही रहे उल्फत में,
वो है कि राजे- इश्क जुबां पे लाई है/
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इश्क इक ऐसी बेनाम हस्ती है,
जो कभी मिटाई नहीं जा सकती/
औरत वो शराब है जो------
पीकर कभी भुलाई नहीं जा सकती/
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जिन्दगी ने कहा,
' हम तो लड़खड़ाए ही जाएँगे,'
बहके कदमों ने कहा,
' अब तो हम डगमगाए ही जाएँगे'/
हमने हँसते हुए कहा,
' तुझे सँभलना हो तो सँभल जा दिल,
वरना हम तो पिए- पिलाए ही जाएँगे'//
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कसूर उनका ही क्या है?
हम ही उन्हें उल्फत दे न सके/
मेरी तमन्ना ने उनसे क्या माँगा,
वही कुछ जो वो दे न सके//
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कुछ मालूम नहीं मुझको,
नूर बरसता है कैसा रुख पे मेरे/
खोजते हैं कौन सा नगमा वो,
मेरी आँखों में, मुझे सामने बिठा के//

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अभी तो निरा बच्चा हूँ
           कुछ रोज जरा और ठहर जा/
बड़ा तो हो लेने दे मुझे,
          फिर देख महफिल का मजा//
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राजीव' रत्नेश'
खजूरी कालोनी, पांडे पुर, वाराणसी/
       1970
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