अपने शब्दों के व्यर्थ जाल में,
तुम मुझे उल्झा नहीं सकते,
अपने आडम्बरजाल में मुझे,
किसी तरह फँसा नहीं सकते,
दिखा-दिखा कर मृगमरीचिका,
तुम मुझे भरमा नहीं सकते/
क्यूंकि,
तुम्हारी अगली- पिछली हर चाल से,
भलीभाँति अनावृत अवगत हूँ,
नयन मेरे अश्रुपूरित हैं पहले ही,
मेरी जराओं से तुम गंगा बहा नहीं सकते,
किसी तरह भी अब तुम मुझे,
अपने और समीप बुला नहीं सकते/
अनवरत संघर्ष का ऐलान कर निकला हूँ,
तूफानों से मैं करते पैमान अब निकला हूँ,
तुम्हें अपनी ही चाल से मैं मात दूँगा,
क्या सुब्ह क्या शाम, कभी भी तुम्हें घात दूँगा,
मेरे सिरहाने का तकिया तुम खींच नहीं सकते,
कितना भी चाह कर तुम मेरे करीब आ नहीं सकते/
मछली हूँ सरोवर का, हाथ तुम्हारे आ नहीं सकता,
अपना लगाया जाल क्या तुम्हें दृष्टिगत नहीं होता,
चलते-फिरते कीट-पतंगों पे निशाना लगाते हो,
पर एक भी निशाना सही बैठा नहीं सकते,
तुम डाल- डाल तो मैं अब रहूँगा पात- पात,
मुझे तुम अपने शर से बींध नहीं सकते/
हजारों सन्नाटे गुजर गए दिल से,
क्यूँकर तुम्हें अभी भी यकीन नहीं आता,
प्यार के आँगन की नागफनी हो तुम,
फूलों से तुम सूरत पार पा नहीं सकते,
अजमतें तुम्हारी किसी काम की नहीं,
मुझे तसलीम अपनी नदामतें ही सही,
मंजिल- दर- मंजिल चलता अक्सों के सहारे,
तुम मुझसे ऐलान- ए- जिरह कर नहीं सकते/
जहाँ ठहरा पानी समझते हो वही तो,अपने शब्दों के व्यर्थ जाल में,
तुम मुझे उल्झा नहीं सकते,
अपने आडम्बरजाल में मुझे,
किसी तरह फँसा नहीं सकते,
दिखा-दिखा कर मृगमरीचिका,
तुम मुझे भरमा नहीं सकते/
क्यूंकि,
तुम्हारी अगली- पिछली हर चाल से,
भलीभाँति अनावृत अवगत हूँ,
नयन मेरे अश्रुपूरित हैं पहले ही,
मेरी जराओं से तुम गंगा बहा नहीं सकते,
किसी तरह भी अब तुम मुझे,
अपने और समीप बुला नहीं सकते/
अनवरत संघर्ष का ऐलान कर निकला हूँ,
तूफानों से मैं करते पैमान अब निकला हूँ,
तुम्हें अपनी ही चाल से मैं मात दूँगा,
क्या सुब्ह क्या शाम, कभी भी तुम्हें घात दूँगा,
मेरे सिरहाने का तकिया तुम खींच नहीं सकते,
कितना भी चाह कर तुम मेरे करीब आ नहीं सकते/
मछली हूँ सरोवर का, हाथ तुम्हारे आ नहीं सकता,
अपना लगाया जाल क्या तुम्हें दृष्टिगत नहीं होता,
चलते-फिरते कीट-पतंगों पे निशाना लगाते हो,
पर एक भी निशाना सही बैठा नहीं सकते,
तुम डाल- डाल तो मैं अब रहूँगा पात- पात,
मुझे तुम अपने शर से बींध नहीं सकते/
हजारों सन्नाटे गुजर गए दिल से,
क्यूँकर तुम्हें अभी भी यकीन नहीं आता,
प्यार के आँगन की नागफनी हो तुम,
फूलों से तुम सूरत पार पा नहीं सकते,
अजमतें तुम्हारी किसी काम की नहीं,
मुझे तसलीम अपनी नदामतें ही सही,
मंजिल- दर- मंजिल चलता अक्सों के सहारे,
तुम मुझसे ऐलान- ए- जिरह कर नहीं सकते/
जहाँ ठहरा पानी समझते हो वही तो,
अस्ल- दरअस्ल सरोवर की गहराई है,
तुम्हारी हकीकत जानकर आज,
सितारों को भी अब तो शरम आई है,
तुम मुझसे ऐलाने- बगावत कर नहीं सकते,
वफाई तुम अपनी शुमारे- अदावत कर नहीं सकते//
राजीव रत्नेश

No comments:
Post a Comment