जब जब सर उठाया ( गजल)
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सब कुछ लौटा चुका हूँ मय सूद- ओ- ब्याज के/
दिए थे जख्म मुझे जो जाती हुई बहार ने/
लूट के मेरा सब कुछ मुझे राह पे ला दिया,
सौंपी थीं अमानतें जो तुमने प्यार में/
सचेत हो गया हूँ अब तो हर उस शख्स से,
वार किए जिसने मुझ पर बीच बाजार में/
तुमसे या किसी से शिकायत क्या करता,
कुछ न रहा पास मेरे अब अरिव्त्यार में/
मिले धोखे और दगा से तिलमिला गया हूँ,
अब समझा कुछ रखा न था चाँद के इकरार में/
सलामियाँ ही तो तुमसे मिली थीं मुझे फरेब में,
सैकड़ों दीवानों में मैं ही तो था निशाना- ए- दिलदार में/
एक तेरी याद का ही तो सहारा था मुझे,
हर मजार खोदता फिरा तेरे फिराक में/
माना मुझे शिकस्त ओ' मात ही मिली,
जब- जब सर उठाया" रतन" तेरे इस्तकबाल से//
राजीव रत्नेश

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