एक बूँद आस की
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बची एक बूँद आस की
हो गई नेस्तनाबूँद वो भी,
दूर कहीं मुर्गा बोला
जैसे हो गई हो सुबह अभी ही/
चिरैंधी- चिरैंधी बू
आने लगी श्मशान से भी,
हस्ती किसी की आज मिट गई,
दूर से आवाजें आती थीं रोने की/
चील, कौवे नोचे डालते थे
किसी अन्जानी लाश को,
तेरे पिजरें की बुलबुल तड़फड़ाती
किसी तरह कफस से निकल भागती/
नब्ज थमने लगी, साँसें बोझल हुईं
कौन ये पुल से दरिया में कुदा,
मछुआरे दौडे बिन कश्ती- जाल ही,
बचा तो स्याह हो चुका था बदन भी/
मेरी सोन चिरइय्या क्यूँ बदहवास हुई,
हर नजारा आँखों के सामने था उसकी,
साँसों की रफतार थमे तो कुछ बोलूँ,
आखिर एक मासूम नई-नवेली थी वो भी//
राजीव रत्नेश

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