Saturday, June 13, 2026

आँखें बिछीं रहगुजर पे थीं ( गजल )

आँखें बिछीं रहगुजर पे थीं   ( गजल  )
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मैं भी खोल दूँ तेरे हर राज, दिल समझाए/
फिक्र है, यार तेरा कहीं तिलमिला न जाए/

तुझसे तेरी जिंदगी के राज पूछ शक जताए,
मैं मुतमईन हूँ औ' तैय्यार भी, जो वो खंजर उठाए/

मुझे डर है, कहीं याददाश्त अपनी वो खो न दे,
लड़ने- भिड़ने के पैंतरे कहीं वो भूल न जाए/

तू मेरी पुरातन महबूब, बात तुम्हीं तुम जानती हो,
याद आ जाए मेरी, तो कहीं तुझे गले न लगाए/

तेरी अश्कबार, भींगी बातें मेरा दिल कचोटती हैं,
रोज आने को कहकर, हर दिन तू भूल जाए/

यकलख्त आँचल उलट तू घूंघट में आ गई बेवफा!
गैर की हो गई कैसे? बिना मुझसे पूछे, बिना बताए/

काँटों भरा तेरा हर अहसास, गुलाब कभी का झर गया,
समझ कर तुझे' विश्वमोहिनी', कौन फंदे में आए?

दिल का करार गया, तेरी जुदाई का विष पिया मैंने,
इंतजार में तेरे क्या- क्या न मैंने सदमे उठाए/

मुझे यकीं दिला के, कि तुम सिर्फ मेरी ही थीं,
चोट कोई खाई नहीं, सिर्फ मुझे चोट पहुँचाए/

दूर तक फैली हुई, अगन बरसाती दोपहर थी,
सदियों की प्यास थी दिल को, तू और प्यास बढ़ाए/

गर्मियों की धूप का तेरे आँगन में कुछ ऐसा नजारा था,
पाने को निजात, सहन में तूने उतार कपड़े बिछाए/

अब गर्द भरे रास्तों पे, है मेरा अनजाना सा सफर,
वो दिन गए, जब राहों में मेरी, राह देखती थी फूल बिछाए/

मेरे मकां के दरो-दीवार कब से बुला रहे हैं तुझे,
तू अपने शहर से मेरे शहर को गाड़ी भी न चलवाए/

जब तक आया नहीं था सामने, वो इक अजाब था,
आए जब- जब मेरे सामने, बेदस्तो- पा हो- हो जाए/

उदासी तेरी इक अदा, सरासर तेरा तकल्लुम है,
पीठ पीछे जबान तू कैंची की तरह चलाए/

समझते रहे तुझे बहुत मासूम हमेशा" रतन"
आँखें बिछीं रहगुजर पे थीं, कब तू पलट आए//

                 राजीव रत्नेश
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खुदा करे जीना चढ़ते वक्त तेरे कदम लड़खड़ाएँ/
और तू सीधे, मुझ नीचे खड़े की आगोश में समाए//

                 राजीव रत्नेश
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सीढ़ियों से लड़खड़ा कर ही सही, उसे आना तो
रतन के ही पास है,
जमाना चाहे जितना बदले, इस दिल को चंदा की
ही प्यास है/

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