तेरा ही था जमाना
---- राजीव रत्नेश
सुन तो रहा था गौर से जमाना हमारी दास्ताँ,
हमको ही नींद आ गई सुनाते हुए अफसाना/
दिल फरेब था मौसम, तेरी याद का मंजर,
तुम्हें ही सुनाना, तुम्हीं से कभी झुठलाना/
एक बार फिर तूफान उठा कहीं समंदर में,
अहले- दिल ने चाहा, समंदर को कह दें टा-टा/
कुछ न सोचेंगे तुम्हारे सिवा किसी के बारे में,
तुम्हें सदा देते-देते ही चाहेंगे तुमसे बिछड़ना/
उछलती लहरों ने ही तो शोर मचाया समंदर में,
हमने जमाने से बगावत न कर, चाहा तुझे सँभालना/
जानना भी नहीं चाहते थे, अफसाने की हकीकत,
हमको सुनाने से पहले करते जमाने से शिकवा/
खुद दूर हुए महफिल से, कैसे तुझे हम समझाते,
पत्थर तराश कर हमने यकीनन तुम- सा बनाया/
तुम्हें देखा तो मुझे अपनी शिकस्त का ख्याल आया,
मेरे लग कर ही तुम्हें था हर हाल मुझे आजमाना/
मातम था या खुशी की शहनाई का आलम था,
शरमाता था चाँद तुझसे, तेरा ही था जमाना/
' रतन ' को नहीं चाहिए तेरी मुफ्त में मुहब्बत,
आकर गले न मिले और दिल में रखा शिकवा/
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