तुम्हीं मेरी वकालत हो
--- राजीव रत्नेश
दीवाने को तब्दीली- ए- राख की हाजत नहीं,
तुम्ही मेरी वकील हो,
तुम्हीं मेरी वकालत हो/
तेरे दर पे आया हूँ,
तो कुछ सोच कर ही आया हूँ,
कल से निकला हूँ,
मगर आज भी
तेरा नजारा पूरा नहीं हुआ/
कहीं चाहत में अपनी,
कोई कमी तो नहीं रह गई मुझसे?
तुम पास आकर भी
न जाने कहाँ चली जाती हो---
एक अनबूझ पहेली की तरह
मेरे सामने रहती हो/
नखरे दिल को दिखाती हो,
मगर पास आती नहीं,
मन में जाने कैसी खिचड़ी पकती हो,
होली का त्यौहार भी
अक्सर भूल जाती हो/
और फिर अपनी ही मनमानी करके,
मुझे महबूब समझ कर
इठलाती हो,
नखरे दिखाती हो/
तुम्हें शाम के धुँधलके में,
किसी झुरमुट के पीछे,
जब देख लेता हूँ,
मैं जहाँ कहीं भी रहूँ,
सब छोड़ कर
तुम्हारे पास आ जाता हूँ/
तुम समझाती हो,
फिर दूर न जाने की कसमें खाती हो/
मुझको पलकों पर बिठाने की बात करती हो,
और फिर----
अपनी ही बात से
खुद मुकर जाती हो/
बहाने बनाती हो,
उन बहानों में खुद उलझ जाती हो,
और मैं,
दिल को दिलासा देकर,
स्वयं को बहलाता हूँ/
शरत्- पूर्णिमा की चाँद हो तुम मेरी,
अधखिली रात हो तुम,
अभी भी आ जाओ पास मेरे-----
जिंदगी की
वक्त- ए- शाम हो तुम/
कब तक तुम्हें पुकारूँ?
कब तक आवाज दूँ तुम्हे?
मेरे बेबुनियाद फसानों की
जागती रात हो तुम,
नजरों से नजाकत दिखाती हो,
अदाओं की गुलफाम हो तुम/
मनमर्जी तुम्हारी
आखिर कब तक चलेगी?
मेरी बज्म- ए- गजल की
मधुमास हो तुम/
अब भी करीब आ जाओ,
इठलाती, मदमाती----
बरसात हो तुम/
' रतन ' को तुम्हीं से मतलब है,
तुम्ही उसकी आवाज हो/
आ जाओ मुकाबिल महफिल के,
मेरी जान हो तुम/
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