उम्र हमारी भी हुई
---- राजीव रत्नेश
उम्र हमारी भी हुई, तुम्हारी भी हुई,
हम एट्टीन के हुए, तुम स्वीट- सिक्सटीन ही हुई/
बात ये कि महफिल को तुमने प्ले- ग्राउंड समझा,
मारा छक्का और खुद हेड- विकेट भी हुई/
हम दिलीप कुमार न हुए, तुम मुमताज हो गई,
बिना बात के हम हीरो, तुम हीरोइन हो गई/
चूक हमसे हुई या तुमसे हुई, नामालूम,
किस बात पर खफा हुई, क्या बात हो गई/
दो दिन भी न निभाया गया तुमसे मेरा साथ,
आज वक्त ने भी तुमसे वफा का तकाजा किया/
हम पूछ कर भी तुमसे, क्या बिगाड़ लेते तुम्हारा,
तीर- ए- नजर से तुमने हमें ही निशाना किया/
शमशीर आखिर तुम्हारी नाकाम हुई,
तुफंग हमारी भी जंग में सुपुर्द- ए- खाक हुई/
मिला क्या tumhe ये खेल करके आखिर,
किस तरह जिंदगी हमारी- तुम्हारी बर्बाद हुई/
बर्बादी- ए- मुहब्बत का ये भी नजारा हुआ,
न हम तुम्हारे हुए, न तुम हमारी हुई/
दास्ताँ तल्ख तो थी, मगर इतनी भी तवील न थी,
कि महफिल में हमारी ही रुसवाई हुई/
महदूद है मुहब्बत, शिकवा भी किससे करें,
वैसे मुहब्बत में जायज शिकवा भी गिला भी/
फिर क्यों लौट-लौट आती है नजर तेरी खिड़की से,
हम गर मिट गए होते, तो होती क्या तुम्हें सजा भी/
अब ' रतन ' किससे कहें अपने दिल का हाल यहाँ,
जिसे अपना समझा, वही हमसे जुदा हुई/
हँसते हुए जो शुरू हुई थी ये कहानी,
देखते-देखते जाने कब दर्द की दास्ताँ हुई/
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