रतन लड़खड़ा कर भी संभलते रहे ( गजल )
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बस्ती में नहीं किसी से हम कोई याराना रखते रहे/
अपनी इक ठोकर में हम सारा जमाना रखते रहे/
कौन कहता है कि दुनिया में मेरा कोई भी नहीं,
सितारे लोगों ने चुने, हम चाँद अपने साथ रखते रहे/
हाँलाकि मिस्मार कर दिया गया , मेरे ख्वाबों का महल,
हम सीने में छुपाए कितने-कितने शुकराना रखते रहे/
तेरी मेहमान- बाजियां तुझे ही मुबारक अहले- जमाने,
हम मेजबानी में मुकम्मल, वरक- वरक मकतबे- इश्क
सुनाते रहे/
किस- किस ने अपना दाँव हम पर नहीं आजमाया,
हम अपनी नजर में, हमेशा दास्ताने- दो जहाँ रखते रहे/
जबां बंदी तो लगाने की कोशिशें तो लोग करते रहे,
खोलने के पहले कुफ्ले- दहन, जुल्फों का सायबां रखते रहे/
किस- किस ने न कोशिशें की, अपना पाबंद करने की,
हम उनकी गली में रोज जाते रहे, इशारे से उन्हें बुलाते रहे/
कभी खुल के आए, कभी छुपते- छुपाते वो आए,
हम बन के नगीना उनके नथ का, करते रहे सजदा मजारों पे/
उन रफीकों को, जो मेरे जनाजे तक में नआ सके,
हमने बुलाया था उनको, फातिहा तुरबत पे सुनाने को/
नजरों ने लाख घेराबंदी की उनके शबाबो- हुस्न की,
वो चमकते- दमकते ही रहे, रात के अँधियारों में/
किस तरह हम बहे हम मौजे- दुनिया में, किस ने न जाना,
कहीं आग का गोला था, कहीं शोलों की तरह भड़कते रहे/
चैन मिला मुझे तो आकर उसके आगोश में ही,
वैसे होकर बेचैन, वो रातभर करवटें बदलते रहे/
मेरे दिल में था चैन तो नींद आ गई दहकते रुखसारों पे,
तसल्ली देने को मुझे वो सारी- सारी रात जागते रहे/
मोहब्बत जवां हुई है, फिर लेने लगे हैं वो अँगड़ाइयाँ,
हम उनके रूख को निशाना कर अफसाना लिखते रहे/
इक शानदार एन्ट्री चंदा की, मेरे मसाफतों के इज्न की,
मैं अन्जान कब रहा उसके प्यार से, बन कर वो रहनुमा मेरी राह में मिलते रहे/
चंदा का चाँदनी में नहाया हुआ उसका बेकाबू शफ्फाक बदन,
' रतन ' के बोझल कदम, लड़खड़ा कर भी संभलते रहे//
राजीव रत्नेश
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जमाना आजमाता रहा हर पैंतरे से
' रतन ' के सब्र को,
वो चंदा की आगोश में आकर हर बार
सँभल- सँभल गया//
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