Wednesday, April 22, 2026

सारे रतन माँग आया ( गजल)

सारे रतन माँग आया  ( गजल)
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टुकड़ा- ए- माहताब था या मुकम्मल चाँद मेरी नजरका,
देख उन्हें अहबाब संग मैं ईद मना आया/

कुछ न था लुटाने को पास अपने,
खुदा से अपना पुराना आस्मां माँग आया/

उनके मुँह का खाकर, मुँह के अपने पान खिला आया,
झील के पानी में, मैं चाँद उतार लाया/

बिगड़ा शहर था, आबो-हवा खराब थी,
साथ उनके नैनीताल चला आया/

भर के बाहों में हरारत- ए- बदन मिटा,
उनको हमने हमसफर माना, मसीहा माना/

चोट खाई थी दिल से गरेबान तक,
कोई न मिला दिलदार, उनकी वफा माँग लाया/

तसब्बुर में हमेशा वो जोहराजबीं ही तो रहा,
आज उसे मुकाबिले- महफिल उठा लाया/

अजमतें थीं उसकी पाक, शीशा- ए- दिल सी,
मैं पैमाने में जाम भर के उठा लाया/

वो बाहों में थे मेरे, सर सीने पे था,
उनके होठों पे चुंबनों को बरसा आया/

सितारे टंके थे उनके आँचल पे,
घड़ी भर में सारे" रतन" उनसे माँग लाया//

            राजीव रत्नेश

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