सारे रतन माँग आया ( गजल)
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टुकड़ा- ए- माहताब था या मुकम्मल चाँद मेरी नजरका,
देख उन्हें अहबाब संग मैं ईद मना आया/
कुछ न था लुटाने को पास अपने,
खुदा से अपना पुराना आस्मां माँग आया/
उनके मुँह का खाकर, मुँह के अपने पान खिला आया,
झील के पानी में, मैं चाँद उतार लाया/
बिगड़ा शहर था, आबो-हवा खराब थी,
साथ उनके नैनीताल चला आया/
भर के बाहों में हरारत- ए- बदन मिटा,
उनको हमने हमसफर माना, मसीहा माना/
चोट खाई थी दिल से गरेबान तक,
कोई न मिला दिलदार, उनकी वफा माँग लाया/
तसब्बुर में हमेशा वो जोहराजबीं ही तो रहा,
आज उसे मुकाबिले- महफिल उठा लाया/
अजमतें थीं उसकी पाक, शीशा- ए- दिल सी,
मैं पैमाने में जाम भर के उठा लाया/
वो बाहों में थे मेरे, सर सीने पे था,
उनके होठों पे चुंबनों को बरसा आया/
सितारे टंके थे उनके आँचल पे,
घड़ी भर में सारे" रतन" उनसे माँग लाया//
राजीव रत्नेश

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