Tuesday, April 28, 2026

रतन से क्यूँ रूठा है ताज ( गजल)

रतन से क्यूँ है रूठा है ताज  ( गजल)
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राह- रस्म छोड़ दी तुमने मुझसे तिलमिलाते- तिलमिलाते/
मेरी ओर फिर न देखा नजर झुका के शरमाते- शरमाते/

बिजली न चमकी आस्मां में आखिर बरसते-
बरसते,
जुल्मत में भी तुझे न पुकारा हमने, थे जुगुनुओं
की रोशनी के सहारे/

जमाना तो मुद्दई था पहले ही, सही वक्त पे सही
दोस्त पहचाना,
यूँ ही मिल गया था तू मुझे सही वक्त पर पैर मेरा
फिसलते- फिसलते/

एक मुसव्विर ने बिजली की कौंध में तस्वीर तेरी
उतारी थी,
उसे सिरहाने अपने रखी मैंने, तुझसे बातें करते
करते/

चैन नसीब कहाँ था आखिर भींगी हुई ठंडी बरसाती
रात में,
छाजन से टपकती बूँदों से हमने मर्तबा सुनाया सिसकते- सिसकते/

कहाँ अब वो रातें थीं, सितारों के ही तब हर तरफ
नजारे थे,
मात खा गए उसी दुश्मन से, जो अब शेर बना था
मुझसे पिटते- पिटते/

गुलाबी आँचल का तेरे हमने एक बार पस्चम भी
बनाया था,
भटक गई थी जब कश्ती अपनी, लगी थी किसी
अनजान टापू के सहारे/

मिजगां की कालिमा, रोशनी में तेरी , मुझे चमकते
नजर आती थी,
हम उसी से बाबस्ता थे सरे- जिन्दगी, दागे- दिल
दिखाते- दिखाते/

चाक गरेबां हो गई थी मुहब्बत अपनी, जाने किस
मोड़ पर,
हम जानते थे कि सदा देने पर भी तुम पलट कर
न आते/

तेरे लिए दैरो- हरम- गुरुद्वारे जा जाकर हर जगह
दुआ माँगी,
तेरी राह का दरवेश तक बना, फिर भी तुम सितम
ही ढ़ाते रहे/

कैलेन्डर में अप्रेल छब्बीस भी अब बीतने- बीतने
को ही है,
जज्बात रुठे रहे, कलम रुक गई, दो हजार पच्चीस
बिताते- बिताते/

तेरी महफिल के रक्स में लग्जिशें ही लरिजिशें थीं
बेतहाशा,
हर बार तुझे गिरते-गिरते बचाया, तेरी नजाकतों
को सहते-सहते/

चाँद- चँदनियाँ भी खुश हैं, मोर- मोरनी भी मस्त हैं
अपने आप में ही,
' रतन' से ही क्यूँ रूठा है ताज, मौसम के बदलाव
समझते- समझते//

              राजीव रत्नेश

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