वो लहरों पे चलते चलते ( गजल)
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एक निगाह में हजारों सवाल कर गया/
आखिरकार वह अपनी हद से गुजर गया/
कारवां अपना धीरे- धीरे आगे बढ़ता गया,
साथ छोड़ गया, कुछ पलों का जो हमसफर रहा/
हाथ छुआ था उसका, सिहरन पूरे बदन में हुई,
आखिर दर्द भी उसका शिद्दत से बढ गया/
नक्शा खिंचा दिल पे उसके नयनो- नक्स का,
बादलों की गर्जना की तरह मुकम्मल दर्द दे गया/
वो तो आखिर रहबर ही था, जो रहजन बन गया,
लूट कर मालो- असबाब सारे जाने किधर निकल गया/
उसके दिल लूट कर चले जाने से हैरानी न हुई,
गया था आखिर, जो था पहले से जाने वाला/
पपड़ी जम गई थी आखिरकार खरोंचों पर सारे,
लौट के आ गया फिर पपड़ी खुरचने वाला/
राख पड़ गई थी जलते दिल के अंगारों पर
आ गया लकड़ी से फिर राख कुरेदने वाला/
मुहब्बत यकीनन बदस्तूर निभाता रहा वो,
छाले दिल पर पड़ गए था, आया न सहलाने वाला/
मर्जी उसकी थी , रहे महफिल में या पैंतरा बदल जाए,
हुनरमंद था, ऐब सारे आस्तीन में छिपाए निकल गया/
तमाम अधिकार उसे सौंप दिए थे अपना जान कर,
पहले तो दिल को घर बनाया, फिर आँखों से निकल गया/
छनकते थे पाजेब उसके मखमली गलीचे पे,
शोर-शराबों के बीच, हाथों से मेरे वह फिसल गया/
बरसे बादल झकझोर कर, धरती की प्यास न बुझी,
आया था बादल भी, तपन दिल की बढ़ाने वाला/
समंदर से आया था' रतन', कश्ती पे सवार होकर,
वो लहरों पे चलते-चलते पार पार समंदर कर गया//
राजीव रत्नेश

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