Friday, April 24, 2026

बिना पतवार चला आया है रतन ( गजल)

बिना पतवार चला आया है रतन  ( गजल)
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सोचता हूँ चाँदनी रात में क्या करती होगी/
क्या मेरी तरह याद अब भी मुझे करती होगी/

निशानियाँ प्यार की क्या संभाल के रखी होंगी,
या ख्याले- याद से भी आजाद उन्हें करती होगी/

बहुत दूर हूँ तुमसे, तुम तक आ नहीं सकता,
क्या मेरे लिए अब भी रहगुजर पे आँखें बिछाती होगी/

मैं समंदर की मौज था, तू साहिल की ठंडी रेत,
तेरा मेरा महकमा एक था, मुझ बिन कैसे सुकूं पाती होगी/

मैं तुझमें समा जाऊँ, तू मुझ में, छूट जाए बिछड़ने का गम,
भले समंदर से मिल मेरे खिलाफ बिसातें बिछाती होगी/

मुकद्दर ही मिलाता है और दूर भी रखता है हमें,
अपना भी क्या जल्वा है, सबको अपनी ही फिकर रहती होगी/

बिना गुनाह दूर- दूर रहने की सजा पाई है हमने,
आ मिलो, फिजूल मेरी राह में सितारे बिछाती होगी/

मुझे तुमसे रूठना न था कि बार- बार मनाना पड़ा मुझे ही,
एक बार ऐसा मिलो कि फिर मुझसे बिछड़ने की न नीयत तुम्हारी होगी/

बिना पतवार कश्ती में चला आया है' रतन', हिम्मत तो देख जरा,
सुकूने- जिंदगी शायद नहीं मिटाने को उसे न सिफत आरजू तुम्हारी होगी//

             राजीव रत्नेश

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