तुझे देख, एक बार फिर
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तेरी सूरत पे हम तो मर मिटे,
मुझे ठिकाने लगाने न कोई आया,
कम से कम म्यूनिसिपैलिटी को कहो,
न हो तो फायर ब्रिगेड बुलवाओ/
वरना हम तेरे आँचल को ही,
कफन तजवीज न कर लें/
आरजू में तेरी मुकम्मल तौर पर,
हम मरने-मरने को होकर भी मर न पाए,
किसी को पास तुमने फटकने न दिया,
कैसे कोई मातमपुर्सी को आए,
जिसको जो आती हो वही सुनाए/
रात भर मच्छरों ने काटा,
दिन में तेरी सूरत ने मारा,
हम तो बड़े लाड़ले थे तेरे,
किस सूरत गले से लगाए,
कभी- कभी तो दिखलाई पड़ती हो,
कभी- कभी ही तो हम भी मरते हैं,
जाने कितनी बार तुमने मारा,
कितनी बार मर- मर के जिए/
मर तो हम तब भी जाते,
जब देख मुझे तुम परदे की ओट हो जाते,
फिर इशारे से बुला कर,
परदा खींच मम्मी पास भाग जाते/
बिजली रह- रह कड़क जाती है,
हम तेरे सहन में काँपते रह जाते हैं,
आके ओढ़नी का ही सायबां कर दे/
तुझे देख, एक बार फिर,
' रतन' कहीं सचमुच न मर जाएँ//
राजीव रत्नेश
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